Jamali Kamali Mosque,Mehrauli,Delhi
मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क:जमाली-कमाली मस्जिद
बलबन के मकबरे को देखने के पश्चात अब मैं, अपनी कार जहाँ एक बाउंड्री के पास खड़ी की थी,वहाँ वापिस आया.कुतुब मीनार के प्रवेश द्वार से लगभग 500 मीटर पर स्थित ये चहारदीवारी जमाली-कमाली मस्जिद और मकबरे की थी.जमाली कमाली मस्जिद के विषय में एक सरसरी तौर पर मैंने अपने पढ़ाई के दिनों में पढ़ा था किंतु इस विषय में मुझको अधिक मालूम न था.उस चारदीवारी के बीच में एक साधारण सा लोहे का दरवाजा था और उस से अंदर घुसते ही एक बहुत बड़ा सा प्रांगण नजर आता है जिसमें कुछ बड़े पेड़ भी हैं.गेट के अंदर घुसते ही बाएं हाथ पर एक लाल पत्थर का स्टैंड जैसा बना है और उस पर काले रंग से इस स्थान के विषय में एक संक्षिप्त जानकारी उत्कीर्ण है जो यह बताती है कि यह मस्जिद और मकबरा शेख फजलुल्लाह या जलाल खान या जमाली से सम्बंधित है.इस मस्जिद का निर्माण 1528-29 में शुरू हुआ और पूरी हुमायूँ के शासन काल में हुयी,मकबरा 1528 में बना,इसका निर्माण सिकंदर लोधी और हुमायूँ के काल में हुआ.यहाँ जो मकबरा है उसमें दो कब्रें हैं एक जमाली की और दूसरी कमाली की जिनका परिचय अज्ञात है.इसी पत्थर पर इस स्थान अर्थात मस्जिद और मकबरे के वास्तु के विषय में भी थोड़ी जानकारी दी हुई है.
मैंने कुछ पढ़ रखा था,कुछ जानकारी वहाँ उपस्थित लोगों से ली और कुछ बाद में लौटकर भी खोज-बीन की जिस से मालूम पड़ा कि शेख जमाल-उद-दीन हामिद बिन फजलुल्लाह कम्बोह देहलवी सुहरावर्दी सूफी संत शेख समाउद्दीन के शिष्य एवं दामाद थे.शेख जमाल उर्फ जमाली भी एक सूफी संत थे और दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोधी के शासनकाल (1489/15-17) के दौरान भारत आये थे.वो एक बहुत अच्छे शायर या कवि भी थे और उनकी कविताओं ने शेख जमाली को बहुत प्रसिद्ध कर दिया था.ये उनकी शख्सियत का ही कमाल था जो उनको सिकन्दर लोधी,बाबर,हुमायूँ सभी के दरबार में इज़्ज़त और जगह मिली.कहा तो यह भी जाता है कि सिकन्दर लोधी अपनी कविताओं में उनसे राय और सहायता लेता था और इस से ही वो भी एक अच्छा कवि बन गया.कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि बाबा फरीद के नाम से जो कवित्त है,जो सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरुग्रंथ साहिब में भी दृष्टव्य है,वो कविताएं भी शेख जमाली ने ही लिखी थीं.इस बात की कहीं से ऐतिहासिक रूप से यद्यपि पुष्टि नहीं हुई है.
शेख जमाली की कविताओं को उस जमाने में इतने ऊंचे दर्जे का माना गया था कि उनको ‘खुसरो-ए-सानी’यानी कि खुसरो के समान की उपाधि से नवाजा गया था.
मेहरौली के शेख जमाली का दिल्ली में इतना सम्मान था कि दिल्ली में सल्तनतें बदल गईं(लोधी से मुगल)सुल्तान बदल कर दिल्ली की हुकूमत बादशाहों के हाथ आ गयी किन्तु शेख जमाली सभी हुक्मरानों के चहेते ही रहे.दिल्ली के बादशाह हुमायूँ से तो उनके सम्बन्ध इतने प्रगाढ़ हो गए थे कि बताते हैं कि शेख जमाली का देहांत सन 1536 में जब हुआ तो उस समय वह हुमायूँ के एक गुजरात अभियान में उसके साथ ही थे.
जहाँ तक बात कमाली की है तो इस चरित्र की सच्चाई अभी तक रहस्य के आवरण में ही छुपी हुयी है.इस प्रांगण में लिखे शिलालेख के अनुसार कमाली का परिचय अज्ञात है जबकि एक अमेरिकी लेखिका केरेन चेज़ ने अपनी पुस्तक ,”Jamali Kamali a Tale of Passion in Mughal India” में उनको एक दूसरे का पुरुष प्रेमी बताया है,कुछ और लोगों के अनुसार वह जमाली के शिष्य थे,किसी और के अनुसार वह उनके भाई या नौकर या दूसरे कवि या साथी थे और कुछेक और के अनुसार कमाली नाम जमाली की पत्नी का है.सत्य जो भी और कभी भी सामने आए या न भी आये किन्तु इतना अवश्य है कि कमाली जिस भी शख्सियत का नाम था वो जमाली की बहुत अज़ीज़ और प्रिय शख्सियत थी तभी दोनों की कब्र एक ही छत के नीचे आस-पास है.
जमाली के मकबरे में उनके द्वारा लिखी गयी पंक्तियां बड़ी गजब की हैं:
कब्र में आके नींद आयी है,
ना उठाये,खुदा करे कोई।
और,
एक जगह उन्होंने लिखा है;
रंग ही रंग,खुशबू ही खुशबू,
गर्दिश-ए-सागर-ए-खयाल हैं हम।
जमाली द्वारा लिखी पुस्तक ‘सियार -ए-अरीफिन’ यानी ‘Mirror of Meanings’ भारतीय सूफी और सुहरावर्दी सम्प्रदाय के संतों,संप्रदायों और उनके द्वारा दैविक कविताओं में प्रयुक्त उदाहरण और संकेतों के विषय में बहुत ही प्रसिद्ध पुस्तक है.यहाँ पढ़ने पर मुझको यह भी ज्ञात हुआ कि शेख जमाली के पुत्र शेख अब्दुर रहमान गदई कम्बोह अकबर के समय में बहुत ही ताकतवर और महत्वपूर्ण शख्सियत थे.
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस जमाली कमाली मस्जिद और मकबरे के वास्तुविद यानी कि Architect भी स्वयं शेख जमाली ही थे.जमाली कमाली मस्जिद प्रांगण की चारदीवारी में गेट के अंदर घुसने को कोई रोक-टोक या टिकट नहीं था.इसमें फाटक से अंदर घुसे ही जैसे ही मेरी निगाह उस प्रांगण में इधर उधर घूमी तो मुझे सामने दो पेड़ों के बीच इस इमारत का बीच का बड़ा सा द्वार,उस पर एक बड़ा गुम्बद बना हुआ और द्वार के ऊपर के हिस्से में एक झरोखा नजर आया,सामने दाहिनी तरफ खुले हिस्से में ही एक बड़ा हौज बना हुआ है जो सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे जाकर एक षट्कोणीय हौद का रूप ले लेता है,किसी जमाने में इसका उपयोग मस्जिद में लोगों के पानी की जरूरतें पूरी करने और वजू आदि करने के लिए होता होगा.सामने एक बड़ा वरामदा या मस्जिद का प्रार्थना स्थल है जिसमें पांच मेहराबदार गेट हैं और इन्हीं के बीच वाले प्रवेश द्वार पर झरोखा और ऊपर गुम्बद बना हुआ है.एक बात जो और दिखती है वो ये है कि किनारे से बीच वाले मेहराब में नाप क्रमशः बड़ा होता चला गया है और सुंदर अलंकरण से युक्त बीच वाली मेहराब सबसे बड़ी है.यह पूरी इमारत लाल बलुआ पत्थर से बनी है किंतु इसमें संगमरमर का प्रयोग भी देखने को मिलता है.मस्जिद में नक्काशीदार खुदाई है,दीवारों पर की गई नक्काशी देखते ही बनती है.यहाँ कुछ अज्ञात कब्र भी हैं.
इस मस्जिद की दीवारों पर बेल-बूटों का अलंकरण है.जहाँ मेहराब की चाप मिलती हैं वहाँ प्राचीन पदकों अथवा मेडेलियन की सजावट है जो हमको इस समय के बाद की इमारतों में भी दिखती है.अंदर के विशाल बरामदे में पश्चिम की ओर दीवाल पर मेहराबें बनी हुयी हैं.अंदर इस बड़े से बरामदे या हॉल कहें इसमें खंभों के बीच में खड़े होने पर एक विशाल गलियारे में खड़े होने की अनुभूति होती है.कई अन्य इस्लामिक इमारतों की भांति इसकी दीवार पर भी कुरान की आयतें उकेरी हुई हैं.मस्जिद के चारों ओर अष्टकोणीय मीनारें हैं.ये इमारत दो मंजिला है और इसमें ऊपर जाने का एक बहुत ही पतला जीना भी है,मैं इस पतले जीने से ऊपर की तरफ गया और उसमें सामने ऊपर जाने पर पीछे का खुला इलाका भी दृष्टव्य है जहाँ की मैंने तस्वीर भी ली थी.इस इमारत में षट्कोणीय सितारा या Star of David or Daud का भी प्रयोग दिखता है.इसके प्रयोग का एक कारण तो यह हो सकता था कि हुमायूँ को खगोलशास्त्र (Astronomy) के प्रति बहुत लगाव एवं रुझान था और दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि स्टार ऑफ डेविड को यहूदी,इस्लाम और ईसाई तीनों धर्मों में ही पवित्र और सम्मानित माना जाता है.
इस मस्जिद स्थल से लगा हुआ ही मकबरे का प्रांगण है किंतु उसके प्रवेश द्वार में ताला लगा हुआ था इसलिए उसके अंदर मैं नहीं जा सका अलबत्ता उसके दरवाजे से ही उसकी कुछ तस्वीरें अवश्य लीं.
इस मस्जिद का जो स्थापत्य है उसमें हमको अफगान,पारसी या ईरानी और भारतीय स्थापत्य का मेलजोल उसी प्रकार से शुरू होता दिखता है जैसा कि उस समय के समाज की भी स्थिति थी.इस समय के भारत में राज्य चलाने को बहुत से नए लोग सत्तासीन हो चुके थे या हो रहे थे जिनकी जड़ें भारत के बाहर के स्थानों की थीं किन्तु समय के साथ साथ उनके आचार,विचार और व्यवहार का भारत देश के आचार विचार और व्यवहार से सामना हो रहा था तो चाहे राजकाज हो,धर्म हो,संस्कृति हो या विभिन्न क्षेत्रों जैसे स्थापत्य या युद्ध इनमें प्रयोग की जाने वाली तकनीकी हो,इन सभी में एक दूसरे का प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा था.दोनों संस्कृतियां एक दूसरे से सीख रही थीं और एक दूसरे में समाविष्ट भी हो रही थीं.उस समय की इस्लामिक संस्कृति के सभी क्षेत्रों में पर्शियन या ईरानी प्रभाव बहुत दिखता है.
स्थापत्य की बात करें तो हमको यदि इस समय की इमारतों में या इस जमाली कमाली मस्जिद में गुम्बद,मेहराब और कुरान की आयतें दिखती हैं तो दिल्ली की इमारतों में जमाली कमाली मस्जिद में ही पहली बार हमको राजस्थानी झरोखे के भी दर्शन होते हैं.मुझको किसी ने बताया और फिर मैंने कहीं पढ़ा भी कि पुराना मेहरौली दिल्ली से मध्य एशिया के मार्ग में एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण बस्ती थी और इस मस्जिद के प्रवेश द्वार के ऊपर स्थित झरोखे में दिया जला कर रोशनी की जाती थी जिस से उस इलाके के मुसाफिरों को ज्ञात हो जाये कि यहाँ पर एक ठहरने/विश्राम करने का स्थान/मस्जिद है और यह सुनते सुनते मुझको लगा कि अचानक मैं उस युग में खुद पहुँच सा गया जब यहाँ आस पास चारों ओर अरावली के पहाड़ों पर जंगल ही जंगल हैं,शाम हो चली है,दिल्ली अभी दूर है,कारवां की सभी सवारियां और उनको ढोने वाले घोड़े आदि भी विश्राम करना चाह रहे हैं साथ ही रात को जंगली जानवरों और लुटेरों का भी भय सता रहा है,सभी बहुत परेशान हैं कि तभी आगे बढ़ने पर दूर ऊंचाई पर एक रोशनी की लौ सी दिखती है जिसको देख कर सभी की जान में जान आती है और आगे बढ कर शेख जमाली की मस्जिद में लोग रात्रि विश्राम हेतु रुकते हैं.
जमाली-कमाली मस्जिद को देख कर यह तो प्रतीत हो ही रहा था कि आगे मुगल काल में जो स्थापत्य कला अपने सौंदर्य और पूर्णता के चरम पर पहुँची थी उसकी नींव इसी काल में रखी जा रही थी.लाल बलुआ पत्थर में संगमरमर का प्रयोग,गुम्बद,मेहराब,बड़ा सा प्रांगण,गुम्बद और मेहराबदार दरवाजों पर झरोखा,मेडेलियनों से अलंकरण और बेलबूटेदार सजावट,कमल के फूलों का उकेरा जाना,बिल्लोरी पत्थर ((Grey Quartzite) का भी अलंकरण/निर्माण में प्रयोग;इस समय के और इस किस्म के वास्तु की परिणति हुमायूँ के ‘किला ए कूहना-Qila-i-Kuhna’ में स्पष्ट दिखती है.दरअसल ये वास्तु बताता है कि संवाद शुरू हो चुका था बल्कि कुछ कदम आगे भी बढ़ चुका था विविध संस्कृतियों का,विचारों का,समाज का और रहन-सहन-सोच के तरीकों का और धीरे धीरे चलते हुए इसको इस सहनशील- समावेशी-सहिष्णु देश की संस्कृति में,सोच में समाविष्ट होते हुए आगे का सफर तय करते जाना था.
Jamali kmali kise marbles se bana h
ReplyDeleteVERY NICE AN APPRECIATING THINGS YOU HAD EXPLORED. HATS OFF SIR. MORE BEAUTIFULLY YOU CAN EXPRESS THE THINGS VIA ADDITION OF ARABIC FARSI AND URDU CONTEXTS AND PHRASES. THIS WOULD HAVE BEEN MORE INTERESTING. PROFESSOR DR MAHMED KHAN.
ReplyDeleteअद्भुत और सार्थक जानकारी।
ReplyDeleteआज भी ये जगह रहस्यमयी और रोमांचक है