Mehrauli Archeological Park:-Rajon Ki Baoli मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क:-राजों की बावली

Mehrauli Archeological Park:-

Rajon Ki Baoli  

मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क:-

राजों की बाउली या बावली/बावड़ी/बैन/बाव

जैसा मैं पहले लिख चुका हूँ कि मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क में बलबन का मकबरा,जमाली कमाली की मस्जिद मैं देख चुका था लेकिन वहाँ चारों तरफ अलग अलग किस्म के इमारतों के अवशेष अथवा इमारतें और माहौल ऐसा था कि मन हो रहा था कि इस हरियाली भरे जंगल नुमा इलाके में और भी देखा जाए कि इतिहास के कौन कौन से जाने-अनजाने पृष्ठ इधर-उधर बिखरे हुए हैं।सही बात यह भी थी कि मुझको खुद भी पूरा ठीक से मालूम नहीं था कि इस परिसर में हमारे देश के पुरातत्व विभाग ने कौन-कौन से ऐतिहासिक खजाने सहेज कर रखे हुए हैं.जमाली-कमाली मस्जिद के पास खड़ी अपनी कार मैंने स्टार्ट की और उस परिसर में और आगे की ओर बढ़ चला.रास्ते में लाल बलुआ पत्थर के ‘स्थान और दिशा सूचक’ चिन्ह थे जिन पर काले रंग से ‘कुली खाँ का मकबरा’ और ‘राजों की बावली’ लिखा हुआ था.

इस स्थान पर आने के पहले मेरी जानकारी बावड़ियों के विषय में बहुत ही कम थी और सच कहूँ तो शाहरुख खान और रानी मुखर्जी अभिनीत एक फ़िल्म आयी थी ‘पहेली’ तो मैंने इस से पहले बावड़ी शायद सिर्फ उसी फ़िल्म में ही ठीक से देखी थी.असलियत यह है कि भारत में बावलियों का इतिहास बहुत पुराना है.बावली को अंग्रेज़ी में ‘step well’, गुजराती में ‘वाव’,राजस्थान और हरयाणा में ‘बावड़ी या बेन’ महाराष्ट्र में ‘बारब’ और कर्नाटक में कन्नड़ भाषा में ‘कल्याणी’ अथवा ‘पुष्करिणी’ कहते हैं.दरअसल बावली कुएं,तालाब और बावली का मिला जुला रूप हुआ करती थीं.इनमें एक कुआं होता है जिसमें एक तरफ एक आयताकार या 'U’या ‘L’ के आकार में खुदाई करते जाते हैं और उस गहरे हिस्से को कुएं के तल के बराबर खोदा जाता है और इस प्रकार से इस हिस्से में पानी भरा रहता है.इस तालाब नुमा हिस्से में एक तरफ तो कुएं का पानी उपलब्ध रहता है तो दूसरी ओर वर्षा के जल का संचयन भी होता है जिसके परिणाम स्वरूप साल के बारहों महीने पानी की उपलब्धता तो रहती ही है साथ ही साथ यहाँ से Rain Water Harvesting और water recharge होने का काम भी होता रहता था.मौसम गर्म होने पर पानी का तल गिरता जाता है और लोग स्टेप वेल की सीढ़ियां उतर कर पानी तक पहुंचते हैं और अपनी जरूरत का पानी लेते रहते हैं.इस प्रकार से स्थापत्य की दृष्टि से इन बावलियों के तीन प्रमुख फीचर होते हैं:

1.कुआं जिससे पानीका स्रोत जुड़ा रहता है और जिसमें बारिश का पानी एकत्रित भी होता रहता है.

2.पानी तक पहुँचने हेतु सीढ़ियाँ और

3.इस जलाशय के शेष (कुएं वाली दिशा के  अलावा)तीनों ओर जमीन तल और उस से नीचे उतरती हुई कमरे,बरामदे या गलियारों, जालियां,आले और खिड़कियों तथा झरोखों से युक्त भव्य इमारतें.वस्तुतः इस पूरे निर्माण को ही बावली कहा जाता है.

पुराने जमाने में राजा,शहंशाह,धनवान लोग और बंजारे लोगों का बावलियों के निर्माण में बहुत बड़ा योगदान रहा है.इन बावड़ियों का एक उपयोग तो स्थानीय लोग करते थे तो दूसरी ओर इनका उपयोग व्यापार के लिए की जाने वाली लंबी यात्राओं में भी रात्रि विश्राम हेतु किया जाता था.इनके बरामदों/गलियारों में लोग बैठ सकते थे,गर्मियों में ठंडी हवा का आनंद आधुनिक वातानुकूलित चैम्बरों की भांति ले सकते थे,कमरों में यात्रियों के ठहरने और विश्राम की व्यवस्था होती थी.इन गलियारों में बने छोटे आलों में दीपक रख कर अथवा मशालें जला कर रौशनी का इंतज़ाम था तो बड़े आलों में लोग जैसे आज कुर्सी पर बैठते हैं वैसे बैठ भी सकते थे.ऐसे इंतज़ामों की व्यवस्था देख कर यह भी प्रतीत होता है कि ये बावड़ियाँ सिर्फ पानी लेने का स्थान ही नहीं थीं अपितु यहाँ पर दिन और रात में भी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां होती थीं और लोग इकट्ठे होते थे.

भारत में पानी की उपलब्धता हेतु वैज्ञानिक तरीके अपनाने यानी कि बावड़ी के उपयोग करने के प्राचीन काल से बहुत प्रमाण उपलब्ध हैं और इसलिए यहाँ की बावड़ियों का इतिहास बहुत पुराना है.कुछ विद्वान तो मोइन-जो-दारो (मोहनजोदड़ो) के प्रसिद्ध स्नानागार को भी बावली का ही एक प्रकार मानते हैं क्योंकि इसमें भी एक टैंक था जिसके पानी की आपूर्ति कुएं से होती थी और उसके पानी तक पहुँचने को सीढ़ियाँ भी थीं;जरा सोचिए चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यता वाले दौर में ऐसा था!!!

बावलियों के विषय में लिखने के पहले मैंने भारत में जल से सम्बंधित क्षेत्र में बहुत काम करने वाले,जयपुर में रहने वाले देश के प्रसिद्ध ‘Water Man' श्री राजेन्द्र सिंह जी से सम्पर्क किया तो उन्होंने इस विषय में कई रोचक जानकारियां दीं जैसे कि बावलियों का निर्माण सूरज द्वारा जल की चोरी से बचाव हेतु और उस से राहत हेतु भी था.उन्होंने बताया कि भारत में जल के क्षेत्र में सबसे अधिक कार्य राजस्थान के बनजारों की घुमंतू कौम ने किया है और वे लोग अपनी आय का 10% भाग जल के लिए काम करने में लगाते ही थे.श्री राजेन्द्र सिंह जी ने यह भी बताया कि उनके मेरठ जिले(अब बागपत)स्थित मूल निवास गांव ‘दौला’ में भी बनजारों ने ही बावड़ी का निर्माण कराया था.एक बात जिसका मैं यहाँ पर उल्लेख करना चाहूँगा वो यह है कि हमारे लिए गर्व की बात है कि  श्री राजेन्द्र सिंह जी भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं और हम लोग समकालीन भी थे यद्यपि वो मुझसे एक या दो वर्ष सीनियर थे और वहाँ दुर्भाग्यवश मेरा उनसे कोई परिचय भी नहीं था.राजेन्द्र सिंह जी ने यह भी बताया कि दिल्ली की बावलियां राजस्थान की बावड़ियों से पुरानी हैं.

अरावली पर्वतमाला क्षेत्र में स्थित दिल्ली के मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क और इस इलाके के पास की तीन मशहूर बावली हैं:

1.अनंगताल बावली

2.राजों की बावली और

3.गंधक वाली बावली

इनमें से अनंगताल बावली मेहरौली पुरातत्व पार्क के बाहर योगमाया मन्दिर के पास स्थित है.

तो जैसी मैं चर्चा कर रहा था कि मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क में जमाली कमाली मस्जिद को देखने के बाद अब मैं उस क्षेत्र में और अंदर चल पड़ा था.कुछ आगे चलने पर एक स्थान ऐसा आया जहाँ रास्ते में पत्थर कुछ इस प्रकार से पड़े हुए थे कि कार का आगे जाना संभव नहीं था तो मैंने गाड़ी एक तरफ खड़ी कर दी.गाड़ी से उतर कर मैंने देखा कि एक तो दाहिने हाथ पर ऊंचे चबूतरे पर कुछ बना हुआ है और  दूसरी ओर बाएं हाथ पर कुछ कदम आगे बढ़ कर एक बाउंड्री बनी हुई है.उस बाउंड्री के बाहर गेट पर एक गार्ड और एक दो लोग और खड़े थे तो मैंने उनसे पूछा कि यहाँ पर कार अकेले खड़ी छोड़ने में कोई समस्या या रिस्क तो नहीं है तो गार्ड ने मुझसे कहा कि आप बाउंड्री के पास एक तरफ लगा दीजिए कोई दिक्कत नहीं होगी,तो मैंने उसके बताए अनुसार कर एक तरफ पार्क कर दी.अब मैंने गार्ड से पूछा कि भाई यह कौन सी बिल्डिंग है?इस पर उसने बताया कि यह “राजों की बावली” है.मेरे जानकारी करने पर बताया गया कि इस बावली का निर्माण लोदी काल में दौलत खान ने कराया था.कुछ लोगों ने बताया था कि इसको ‘राजों की बावली’इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका निर्माण राज-मिस्त्रियों ने अपने संसाधनों से और अपने स्वयं के लिए किया था किंतु इस इमारत की भव्यता बताती है कि इसको बनाने में जितना समय और संसाधन लगे होंगे उससे लगता है कि यह काम राज-मिस्त्रियों ने स्वयं के संसाधनों से खुद के लिए नहीं ही किया होगा.हाँ यह जरूर हो सकता है कि 1857 के विद्रोह के बाद दिल्ली के किले वाले इलाके से बहुत से लोगो विस्थापित हुए थे तो बताते हैं कि उसी दौरान इस बावली के इलाके में राज-मिस्त्रियों के परिवार रहने लगे थे और यह स्थान इसी लिए ‘राजों की बावली’ के नाम से मशहूर हुआ.20वीं शताब्दी में जाकर भारतीय पुरातत्व विभाग ने यह स्थान खाली कराया बताते हैं.इस इमारत में बावली के अतिरिक्त एक मस्जिद और मकबरा भी है ऐसा बताया गया.यह सब सुन कर मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी और मैं उस शानदार परिसर के अंदर दाखिल हो गया.

इस परिसर की बाउंड्री वाल बहुत ऊंची नहीं थी,पत्थर की चहारदीवारी के ऊपर लोहे के नुकीले सरियों की रेलिंग लगी हुयी है और किनारे पर लगभग तीन फीट का एक छोटा सा गेट है.इस बाउंड्री के बाहर से भी अंदर दृष्टि जाती थी.गेट के अंदर घुसने पर चार-पाँच सीढिया उतर कर एक बड़ा चबूतरा सा आयताकार मैदान था और उस चबूतरे से भी आगे बढ़ने पर फिर लगभग पाँच सीढियां उतर कर बावली की सीढ़ियां थोड़े से समतल हिस्से से शुरु हो जाती हैं जो जमीन तल से नीचे उतरती चली गयी हैं और लगभग दो मंजिल नीचे उतर कर तीसरे तल पर पानी भरा दिखा और सीढियां उस पानी के तालाब में भी अंदर चलती चली गयी हैं.उपरोक्त तीनों बावलियों में ‘राजों की बैन’ या राजों की बावली सबसे बड़ी है.यह एक भव्य आयताकार निर्माण है जो जमीन तल से तीन मंजिल नीचे तक बना है.इसकी सीढ़ियाँ इसको चार भागों में विभाजित करती हैं और यह इस प्रकार से बना हुआ है कि पानी का तल जहाँ भी हो आप सीढ़ियों से उतर कर किनारे बने दालानों से जल तक पहुँच सकते हैं.इन दालानों में चूने का चिकना प्लास्टर हो रहा है, रेलिंग के नीचे छज्जा भी है और इन गलियारों में स्टाइलिश मेहराबदार खंभे हैं जो कि इस उत्तर भारतीय मध्यकालीन इमारत को एक अलग भव्यता प्रदान करते हैं.इसकी हर मंजिल पर कमरे हैं जो ठहरने वालों को दिल्ली की अरावली पहाड़ियों की कठोर गर्मी में एक सुखद ठंडक का अहसास कराते होंगे.इस बावली में उत्तर दिशा से सीढ़ियाँ उतरती हुयी जल तक जाती हैं जबकि पूर्व और पश्चिम में ऊँची दीवारों से घिरे गलियारे हैं जिनमें 12-12 खंभे दोनों ओर हैं जिनमें मेहराबदार आले बने हुए हैं.इमारत की दक्षिण दिशा में एक खुला आलानुमा रास्ता है जिस से कुआं और पानी का टैंक जुड़ता है.यहाँ के पत्थरों में पदक एवं अन्य किस्म की पच्चीकारी भी दृष्टव्य है.

इस इमारत में दाहिनी ओर  के गलियारे से ऊपर जाने का एक पतला सीढ़ी का रास्ता भी है जो ऊपर ले जाता है और जहाँ पहुँचने पर सामने एक 12 खंभों पर टिका गुम्बद नुमा मकबरा दिखता है.इस गुम्बद पर कभी खूबसूरत नीला काम रहा होगा हांलांकि अब उसके अवशेष भर दिखते हैं.यह लोदी काल की अन्य इमारतों की तरह ही दिखता है.इसकी छतरी पर एक स्थान पर 912 हिजरी यानी कि 1506 ईस्वी लिखा भी है.अब इस मकबरे के विषय में जब जानकारी ली तो कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली,एक तो किसी ने बताया कि सम्भवतः इसका निर्माण सन 1506 ईस्वी में दौलत खाँ ने किसी ‘ख्वाजा मुहम्मद’ के लिए कराया था.ये एक अप्रामाणिक जानकारी थी और घूमने पर एक किसी ने बताया कि ये कब्र रज़िया सुल्तान की कब्र है लेकिन मैं खुद उस फ़िरोज़ाबाद से हूँ जहाँ के कुछ लोग यह दावा करते हैं कि फ़िरोज़ाबाद की पुरानी लालपुर सब्जी मंडी के पास एक पुराना मध्यकालीन मकबरा है जो कि दिल्ली सल्तनत की एकमात्र महिला सुल्तान रही रज़िया सुल्तान का ही है.

बहरहाल मैं तो उस परिसर में घूमते हुए यह देख रहा था कि आज मैं जिस बावली को देख रहा हूँ इसमें जो पानी भरा हुआ है वो साफ नहीं है,उसमें काई है,गन्दगी है ,प्लास्टिक के टुकड़े,बोतलें आदि भी पड़ी हैं जो हमारी सफाई के प्रति चेतना का परिचय देते हुए जैसे हमको मुँह चिढा रही हैं.वो तो भला हो पुरातत्व विभाग वालों का नहीं तो शताब्दियों की गंदगी,कीचड़ और सिल्ट से यह बावड़ी बिल्कुल भर सी गयी थी और पानी बिल्कुल तली पर ही शायद पहुँच गया था.इसकी सफाई करने पर पानी का स्तर लगभग 20 फिट बढ़ गया और अब लगभग 60 सीढ़ियाँ उतरने पर पानी हमारी पहुँच में आ जाता है.

इस स्थान पर पहुँचने पर एक बड़ा ही अजीब सा अनुभव होता है.यदि स्थापत्य की बात करें तो जरा सोचिए मध्य-युग में अरावली की चट्टानों को काटते हुए कैसे जमीन या पहाड़ के अंदर तीन मंजिला इमारत पत्थर काट कर बनाते चले हो गए होंगे,कैसे कुशल इंजीनियर और कारीगर रहे होंगे वो?!!!ये तो ऐसा ही हुआ जैसे किसी ने एक तीन मंजिला इमारत या पिरामिड जैसी इमारत जमीन के अंदर यानी कि उल्टी दिशा में बना दी हो.आम तौर पर लोग रिहाइश अथवा पूजा-पाठ आदि अर्थात धार्मिक प्रयोजनों से भव्य इमारतें बनवाते रहे हैं किंतु यह संरचना अति भव्य और सुंदर होते हुए भी जनउपयोगी उद्देश्य से निर्मित हुयी होगी.जहाँ एक तरफ लोगों को ठहरने और आराम करने की सुविधा मुहैया कराती थी तो दूसरी ओर यहाँ अनेकों सामाजिक उत्सव होते होंगे.चूँकि जल भरने का काम महिलाएं अधिक करती रही हैं तो यहाँ समाज के विविध तबकों की महिलाएं आती होंगी,बातें करती होंगीं,गीत-गाने गाती होंगी यह सब सोचते हुए अचानक मैं सोचने लगा कि यह उजड़ा दयार नहीं है अपितु यहाँ तो सुबह से जैसे खूब रौनक है,चहल पहल है,घड़े में पानी भरने की आवाज और मीठे गीतों की स्वर लहरियों हवा में जैसे तैर रही हैं,दोपहर को जैसे कुछ लोग कह रहे हैं कि बहुत हो गया काम कि अब दो घड़ी बावली के किनारे बने बरामदे में ठंडी हवा में सुस्ता तो लें.धीरे धीरे शाम ढल रही है लोगों की भीड़ है तो आस पास कुछ मेले जैसा माहौल भी हो जाता रहा होगा जिसमें कहीं बच्चे दिल्ली की प्रसिद्ध चाट खा रहे हैं तो महिलाओं की जरूरत का कुछ सामान भी लोग बेचने को आ जाते होंगे और कुछ आवारा शोहदे भी और तभी धुंधलका होते-होते गलियारों में बने आलों में दीपक और मेहराबदार खंभो पर मशालें जला दी जाती होंगीं और बावड़ी के हिलते हुए जल में ये रोशनी के प्रतिबिम्ब क्या खूब नजारा बनाते होंगे!!!यही सब सोचते हुए मैं अपनी सोच की टाइम मशीन से वापिस वर्तमान में लौटा तो मेरे सामने वही राजों की बावली थी जो एक जमाने में अपनी भव्यता और उपयोगिता के कारण बहुत रौनक युक्त जगह रही होगी लेकिन आज उसकी दशा यद्यपि पहले से बेहतर किन्तु बहुत अच्छी नहीं थी.मुझको लगा कि अन्य कारणों के अलावा जल संचयन और वाटर रीचार्जिंग के हिसाब से आज भी इन बावड़ियों की प्रासंगिकता है और एक ओर जहाँ पुरातत्व विभाग और सरकार को इन स्थानों के लिए और बहुत कुछ करना चाहिए तो दूसरी ओर वहाँ जाने वाले पर्यटकों आदि को भी वहाँ की साफ सफाई के प्रति सचेत रहना चाहिए और गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए.

मैंने बावड़ियों के विषय में लिखने के पहले कुछ ऐतिहासिक तथ्य खोजने का प्रयास किया और देश के कुछ प्रमुख इतिहासविदों से इस विषय में गाइडेंस भी लेनी चाही और जो मुझको मिली भी किन्तु सारी बातों का निष्कर्ष यह निकला कि इतिहास में राजा-महाराजाओं - शहंशाहों-सुल्तानों और बादशाहों की बनाई इमारतों, आरामगाहों, मस्जिदों, मन्दिरों, गुरुद्वारों,बाग-बगीचों,मकबरों आदि के चर्चे तो खूब हैं किंतु आम जन की सुविधा हेतु बने ऐसे स्थलों की चर्चा इतिहास में उनसे जरा कम ही है, यद्यपि वर्तमान में ऐसे स्थलों के लिए भी लोग खूब शोध कर रहे हैं और इन पर रिसर्च-सेमिनार आदि भी अब कई स्थानों पर हो रहे हैं.

यही सब सोचता हुआ मैं उस परिसर से निकला और मेरा अगला गन्तव्य अब ‘गंधक वाली बावली’ था जिसको कहते हैं कि दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने महान सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के स्नान के लिए पानी उपलब्ध न होने पर बनवाया था.


Comments

  1. बहुत दिल से लिखा अतुल भाई आनन्द आ गया पढ़ कर .. दिल से ! बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक लेख है अतुल भाई ! आपकी कल्पना लोक की सैर भी बहुत ही भाई मुझे ! मेरी समझ से ऐसी ऐतिहासिक जगहो पर घूमते हुए उस समय की कल्पना कर ... लोगों को उस काल मे समझना ही सच्ची प्रशंसा और ज्ञान वर्धन होता है .. रोमांच की बात तो अलहदा है ही 👍👌

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद,संदीप भाई!आपकी टिप्पणी से हमेशा की भांति लिखने का हौसला बढ़ता है.

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