फ़िरोज़ाबाद के बड़े हनुमान जी
फ़िरोज़ाबाद शहर का इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना है।इस शहर में वैसे तो अनेकों धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थल हैं किंतु शहर में स्थित हनुमान जी या बड़े हनुमान जी का मंदिर अति प्राचीन और सिद्ध स्थल माना जाता है।मंदिर के पास में ही रामलीला मैदान है जहाँ काफ़ी समय से प्रति-वर्ष होने वाली रामलीला का किसी जमाने में उत्तर प्रदेश के एक बड़े हिस्से में बहुत नाम हुआ करता था।1960 के दशक से तो इस स्थान की यादें मेरी ही हैं।समय के साथ इस रामलीला में वो बात नहीं रही और ना ही इसका वो क्रेज रहा जो कभी हुआ करता था और शायद इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि एक तो पहले यह ही पूरे इलाक़े का सबसे बड़ा मेला और लोगों के मनोरंजन का साधन हुआ करता था और दूसरे तब यह मात्र कुछ लोगों और प्रशासन का काम न होकर सारे शहर का उत्सव होता था।तब शहर के मुअज्जिज़ लोग मिल कर कमेटी बनाते थे और इसके आयोजन हेतु जो कमेटी बनती थी उसके माध्यम से शहर के सभी लोग अपने आपको इस मेले के आयोजन से जुड़ा महसूस करते थे।मुझको याद है कि हर साल एक कागज पर रामलीला का पूरा कार्यक्रम छपा हुआ होता था जिसके पीछे पिछले वर्ष का पूरा हिसाब किताब भी लिखा होता था जो सदस्य लोगों और आम लोगों को भेजा जाता था। हम लोगों के इलाकों में उस वक़्त तीन बड़े मेले प्रसिद्ध थे एक मेरठ का नौचंदी का मेला,एक इटावा की नुमाइश और हम लोगों के शहर फिरोजाबाद की रामलीला जो स्तर और प्रसिद्धि में एक जमाने में इन दोनों से बेहतर ही जानी और मानी जाती थी क्योंकि इसका कोई भी व्यावसायिक रूप प्राधान्य नहीं था और इस से भगवान रामचन्द्र जी की लीला भी जुड़ी हुयी थी। उस जमाने में न काठ बाजार और न ही जानकी बाजार स्थायी हुआ करते थे। खैर आज के इस लेख का मुख्य विषय रामलीला का मेला नहीं है बल्कि हनुमान जी के मंदिर और उसके आसपास के माहौल के इतिहास की चर्चा है।
बताया जाता है कि यह मंदिर मराठा शासनकाल में बाजीराव पेशवा द्वितीय द्वारा फ़िरोज़ाबाद में एक मठ के रूप में स्थापित किया गया था। कुछ इतिहासकारों का कहना यह भी है कि इसके जीर्णोद्धार में ग्वालियर के महाराज सिंधिया (शायद महादजी सिंधिया ) का भी योगदान था। इसके बाद भी समय समय पर लोग इसकी मरम्मत और सौंदर्यीकरण कराते रहे हैं।
मुझको अपने पारिवारिक दस्तावेजों और बाबा स्वर्गीय पंडित सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी के कागजों और डायरियों से बहुत जानकारियाँ मिलती हैं जो प्रामाणिक और ऐतिहासिक दोनों ही होती हैं। मेरे पास शायद 200 वर्ष से ज्यादा के कागजात और 500 वर्ष के लगभग का इतिहास भी है जिसके आधार पर अक्सर मैं लिखता रहता हूँ। फिरोजाबाद के बहुत से विषयों पर बाबा के नोट्स मेरे पास हैं उनमें से हनुमान जी के मंदिर और उसके आसपास के इलाके के विषय में जो बाबा द्वारा लिखा गया था उसके कुछ अंश उनकी ही भाषा में नीचे लिख रहा हूँ। यहाँ यह भी बताना चाहूँगा कि बाबा ने अपने द्वारा लिखी चीजों में से कुछ को संक्षिप्त रूप देते हुए ईस्वी सन 1979-1980 में दोबारा अपडेट करते हुए लिखा था और यह उसी समय वाले नोट्स के अंश हैं और हाँ इसमें जिन लोगों का जिक्र है उनमें से कई लोगों की मृत्यु सन 1930 के दशक में अर्थात आबसे लगभग 100 वर्ष पूर्व हो गयी थी अर्थात इस लेख में लिखी बातें उस सन 1930 के दशक या उससे पहले की भी हैं। नीचे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी के लिखे लेख के अंश प्रस्तुत हैं।
बाबा का देहांत 18 दिसंबर 1980 को हुआ था।
श्री हनुमान जी महाराज मंदिर
यह मंदिर नगर की उत्तर दिशा में स्थित है। चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को यहाँ बड़ी भीड़ होती है। मूर्ति दक्षिण मुखी है।यह मंदिर मरहठाओं का बनवाया हुआ कहा जाता है। कुर्सी बहुत ऊँची है और आगे जो सीढ़ी हैं उनके दोनों तरफ नीचे दो डाट द्वार कोठरी हैं जिनकी छतें बैठने के लिए बहुत अच्छी हैं।अगल बगल और सामने चबूतरे हैं,बीच में नीचा हिस्सा कच्चा था जो मिट्टी से भर दिया गया और खरंजा लगा दिया। मंदिर के सामने एक उत्तर-मुख दालान है जो सीकचा लगा कर बंद कर रखा है। दूसरी तरफ पच्छिम-मुख खुला दालान है। दोनों पुराने चूने ककइया ईंट के बड़े मजबूत हैं। उत्तरमुख वाले के बराबर झब्बूलाल चपरासी ने एक कमरा बनवा दिया। सामने उत्तर-मुख दालान है जिसके बगल में एक सोफ़ा है और उसमें महादेव जी का लिंग स्थापित है। इस दालान के पूर्व कुआ है और जमीन पड़ी है जिसमें कुछ वृक्ष हैं और कुआ के उत्तर जो दालान है उसके बाद दक्षिण में जो जगह है उस चबूतरे पर चरण स्थापित हैं तथा जो पूर्व-मुख दालान है उसके बाद दक्षिण में जो चबूतरा है उस पर बाबा प्रागदास की समाधि है,जिनके चमत्कार सुने जाते हैं। आगे एक नया दरवाजा बना दिया है जिस पर दाताओं के नाम हैं फिर सड़क है जिसके पूर्व में जाइगई का थान है और अब कुछ दालान बना कर संस्कृत पाठशाला के काम में आ रही है। जगह की सड़क के पच्छिम में नीची जमीन पर कदम खंडी थी जहाँ अब संस्कृत पाठशाला की बोर्डिंग बन गयी है। यह कदम खंडी तथा हनुमान जी के सामने की जो पक्की जमीन हो गयी उस जगह के भी वृक्ष अब नहीं रहे। हरिश्रृंगार, नईमौश्री आदि मारे गए। कदम खंडी के बाद तलाब है जिसमें रामलीला होती है। बाद में कतूरी की बगिया है और तालाब के उत्तर तथा दक्षिण में जमीन बहुत पड़ी थी उन दोनों जगह भी कुछ कुछ इमारत बन गयी है। जो नया दरवाजा बना है उसके आगे सड़क सड़क के पूर्व की तर्फ चौबे फुलजारीलाल की ओर से कुछ इमारत जो कुआ था उसके पास भी इमारत बनवा दी गई है फिर भी सड़क के दोनों ओर अब कच्ची जमीन पड़ी हुयी है। बाद को सड़क की पूर्व की तरफ तो कालेज हो गए हैं और पच्छिम में एक बगिया है जिसके आगे पच्छिम की दूर तक जमीन है जिसमें भी एक कुआ है। एक कुआ कतूरी की बगिया में और एक कुआ हनुमान जी के मंदिर के पीछे भी है और इस जगह भी पहिले बहुतेरे वृक्ष थे जो अब नहीं रहे। वहाँ पीएसी आदि का वास है। पहिले हम लोगों की भवानीदास के बाग पर शुद्धी होती थी। वहाँ से हटकर हनुमान जी की नीचे की जगह में कुआ और खाली जमीन पर होने लगी। वहाँ पाठशाला आदि आबादी होने से मंदिर के पीछे होती है। वहाँ भी कुछ इमारत बन गयी है। एक तर्फ सड़क है दूसरी तर्फ कस्तूरबा पाठशाला है इस तरह चारों ओर ही बड़ी आबादी हो गयी है। यह स्थान बड़ा रमणीय तथा स्वच्छ था, शहर से कुछ दूर और बाहर होने के कारण शहर के लोग काम पहुँचते थे। चौबे लोगों के पास होने के कारण और शांति वातावरण होने से यह लोग बहुतेरे जाते थे, कुछ दोनों समय और कुछ सायंकाल। गर्मी में तो रात को 10 बजे तक बैठक होती थी। फाटक वाले अधिकांश पहुँचते किन्तु गलीधरे वाले मध्यवय वाले भी जाने लगे थे। कुछ और लोग भी शाम को पहुँचते थे जिनकी चौबे लोगों में बैठक थी। चच्चन (चौबे कमलापति) का आधिपत्य था जो शायद ट्रस्टी हों। वह चुंगी के मेम्बर थे,रामलीला में भाग था।सायं लोगों में मुख्य थे और नौकर लेकर पहुँचते थे। बृजमोहनलाल भी उनके साथी थे। वैसे मुहल्ला (चौबान मुहल्ला) से देवीप्रसाद,पन्नालाल,राजाराम,रोज वाले थे। जब यहाँ होते थे तब बाबू चच्चा (डॉक्टर गुलजारीलाल चतुर्वेदी)पूरी बैठक वाले,भीम चच्चा (रोशनलाल चतुर्वेदी), ऐम ए चच्चा (दीवान बहादुर जानकी प्रसाद चतुर्वेदी रीवा वाले) काफी देर वाले, तथा हम लोग सुरेश चंद्र (चतुर्वेदी,जज साहब), (डॉक्टर) संपतराम,(प्रोफेसर) चंपाराम,चिंतामणि, (सभी चौबे) अधूरी बैठक वाले थे। काकाजी बनारसीदास (चतुर्वेदी, छतरपुर में रहे) दोनों समय वाले। कभी कभी मुंशी जी (बृजनारायण),ब्राहम्मण रामसहाय लंबरदार, पंडित राजाराम, भी पहुँचते थे।पिछले दोनों सज्जन शाम की पूरी बैठक वाले थे।किसी का आयोजित भोग प्रसाद बटता तो और निमंत्रित पहुँचते थे।हकीम चोखेलाल भी पहुँचते थे किन्तु हम लोगों की ही समाज में (या बड़ों कि में चुपचाप बृजमोहनलाल के कारण रहते थे। गर्मियों में खुली जगह चबूतरे पर फिर खुले बड़े दालान में बाद को बंद वाले बैठक में टाट पर होती थी।सब ही बोलने को स्वतंत्र थे। ऐसा भी होता था कि वहीं दो-तीन गोष्ठी पार्टी हो जाती थीं।इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।चाहे कालेज की बात हो,चाहे खेत,गाय बैल,चाहे शहर पार्टी की। हाँ, देवीप्रसाद अनख से उठ जाते थे। दामोदरदास (दमदम) दाढ़ी वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक में रहे थे वह दाढ़ी वाले कभी कभी आ जाते थे।कक्का ख्यालीराम (चौबे) (जो पीछे मुंतजिम रहे थे) व भीम चच्चा (रोशन लाल चतुर्वेदी मृत्यु सन 1932 में हो गयी) (दोनों ही ज़फ़ील) ने हिन्दू मुस्लिम यूनिटी (एका) एक दूसरे के सामने खड़े होकर जीभें निकाल कर दिखलायीं थीं। इसी तरह और भी रहस्य होते थे जैसे काका जी बनारसी दास और काकाजी प्रागदास का संवाद “तुम और हम और” “हौ किसकी बदौलत”।
लेखक:- पंडित सुशील चंद्र चतुर्वेदी,फिरोजाबाद (1893-1980)
नोट:-इस लेख की भाषा जो थी वही लिख दी है,कुछ शब्द या तो पढ़ने में समझ नहीं आए या अब उपयोग में नहीं हैं जैसे “ज़फ़ील”। ऐसे ही 




अब मराठा लिखा जाता है परंतु पहले “मरहठा” लिखते थे और अब पहले लिखते हैं परंतु पहले “पहिले” भी लिखा जाता था।
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