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Showing posts from July, 2026

ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा

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​ ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries भारत भारती में हम लोगों को समय कब कट जाता है पता ही नहीं चलता था क्योंकि पूरे दिन की दिनचर्या नियमित और काफी कसी हुयी थी। हेस्टिन्गस रोड पर चौराहे पर ही ठीक भारत भारती के गेट के सामने एक नया मकान बन रहा था जो हम लोगों के देखते-देखते बना लेकिन उसने हमारा ध्यान आकर्षित किया जब वो पूरा बन गया और उसकी वजह थी उसका नाम। तब समझ में आया कि लोग मकानों के भी नाम रखते हैं और बाद में ध्यान भी गया कि इलाहाबाद में बैंक रोड पर मौसाजी के मकान का नाम था “पुरषोत्तम निवास” और उनके सामने प्रोफेसर जे. एस. माथुर साहब रहते थे, उनके मकान का नाम था “मातृ अञ्चल”। तो भारत भारती के सामने जो भव्य मकान बना उसका नाम उस पर सामने शायद पहली मंजिल के बॉर्डर पर बहुत बड़ा, जो दूर से पढ़ने में आता था, लिखा था, “पूरब पश्चिम”। सन 1970 में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी “पूरब पश्चिम” जो बहुत हिट फिल्म थी और मनोज कुमार अपनी ज्यादातर फिल्में देश प्रेम, राष्ट...

ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा

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​ ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा #AtulChaturvediKeKisse #ZindagiMeri #BharatBharatiTales #HostelDiaries जाड़ों की छुट्टियाँ हुईं तो सब लोग घर गये। घर पर तो समय अच्छा और शानदार बीतता ही था किन्तु समस्या यह रही कि हमेशा ऐसा लगा कि घर रहने की छुट्टियाँ बहुत जल्दी ही बीत जाती थीं और हॉस्टल आने पर घर की मधुर स्मृतियाँ मन के तार झंकृत करती रहती थीं। शायद स्मृतियों का यही स्वभाव है—वे समय के साथ धुंधली नहीं होतीं, बल्कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर नए अर्थ लेकर लौटती रहती हैं। लेकिन आपको एक बात बताता हूँ कि आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यह भी लगता है कि ज़िंदगी का इतना सारा समय भी मानो पलक झपकते ही बीत गया है और अब तक की बितायी ज़िंदगी की मधुर स्मृतियाँ उसी भाँति मन के तार झंकृत करती रहती हैं और जैसे किसी म्यूज़िक कंसर्ट में एक के बाद एक संगीत की स्वर लहरियाँ उठती जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और आप आनंद लेते हैं, वैसे ही ज़िंदगी भी एक किस्म का म्यूज़िक कंसर्ट ही तो है जिसमें अनेक यादों की स्वर लहरियाँ हैं, कभी उतार तो कभी चढ़ाव हैं और स्थिरता भी है और प...

ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय

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​ ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय  #AtulChaturvediKeKisse #BharatBharatiTales #HostelDiaries    बचपन में हमें इतिहास की किताबें बाद में मिलीं, इतिहास पहले जीने को मिला..  आज के हॉस्टल की यादों के लेख में मुझको दो घटनाएँ याद आ रही हैं। बात शायद नवंबर महीने की है और सं था 1971, इलाहाबाद सिविल लाइंस में कॉफी हाउस के सामने एक भार्गव इंजीनियरिंग करके बहुत विशाल बिल्डिंग हुआ करती थी जिसके बाहर एक काफी बड़ा खाली मैदान था और उसके पास एक बड़ा सा घर था 16-A MG Road  जो मेरे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र जी के बड़े भाई जज साहब स्वर्गीय सुरेश चंद्र जी का हुआ करता था और फिर उसमें उनके मँझले पुत्र जिनको हम लोग पी दादा कहा करते थे वह और उनका परिवार रहते थे। पी दादा के बड़े लड़के थे ध्रुव भाईसाहब जो कि इलाहाबाद के बहुत बड़े और नामचीन वकीलों में हुआ करते थे और हमारे पापा और वो लगभग हमउम्र से थे हाँलांकि रिश्ते में पापा और वे चाचा भतीजे थे।ध्रुव भाईसाहब 1983 में अमेरिका से दिल का ऑपरेशन करा के आए थे और एक महीने बाद ही काफी यंग ऐज में उनकी मृत्यु हो गयी थी।खैर, तो बा...