Exports documentation & beginning of the International Trade Fairs (1994)

Exports documentation & beginning of the International Trade Fairs

अपनी पहली विदेश यात्रा के बाद जब मैं भारत लौटा तो बहुत से देशों की यात्रा से बहुत सारे अनुभव बटोर चुका था।जो ऑर्डर लेकर आया था उनकी सप्लाई करने में बहुत कुछ सीखा।फ़िरोज़ाबाद में उस समय विदेशी मुद्रा के खाते नहीं होते थे तो अपनी फ़िरोज़ाबाद वाली बैंक की ही आगरा की ब्रांच में खाता खोला था।उस बैंक के अधिकारियों ने ही इनवॉइस,पैकिंग लिस्ट, बिल ऑफ एक्सचेंज आदि कैसे बनाते हैं ये सिखाया।हमारे देश की एक खास बात ये है कि सरकारी सीट पर कैसा अधिकारी बैठा है कानून,व्यवस्था और जनता की मदद उस बात पर निर्भर करती है।बैंक में उस समय बहुत अच्छे लोग थे तो उन्होंने मेरी ही नहीं अपितु अपने सभी कस्टमर्स की खूब मदद की और आगे चल कर उसी बैंक में जब एक सनकी और गड़बड़ किस्म के अधिकारी आये तो उन्होंने मेरे व्यापार में नुकसान पहुँचाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी और कमाल इस बात का था कि बैंक के उच्चाधिकारी सदैव अपने मातहतों की ही सुनते रहे।खैर अभी लिखने का विषय यह नहीं है,यहाँ मेरा इस बात के जिक्र का आशय केवल इतना था कि हमारे देश के कायदे कानून इतने फ्लेक्सिबल हैं कि उनको सीट पर बैठा व्यक्ति अधिकतर मामलों में अपने मनोनुकूल चला लेता है।

1994 में जब मैंने पहली बार ट्रेड फेयर में दिल्ली प्रगति मैदान की यूपी पैवेलियन में भाग लिया तो उसी समय भारत की एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल फॉर हैंडीक्राफ्ट्स(EPCH) ने भी अपने व्यापार मेले की शुरुआत की थी।हम लोग जब यूपी पैवेलियन से प्रगति मैदान के हॉल नम्बर 18 में लगे हस्तशिल्प के मेले को देखने गए तो मानो आंखें ही चौंधिया गयीं।इस किस्म का बहुत अच्छी तरह से व्यवस्थित ढंग से आयोजित ऐसा फेयर मैंने पहले कभी देखा नहीं था और अगले वर्ष से मैंने भी उसमें भाग लेना आरम्भ कर दिया।हाँ तो मैं इधर हॉल नम्बर 18 में था उधर यूपी पैवेलियन में हमारे स्टाल पर एक यूरोपियन व्यापारी पहुँच गए और हमारे स्टाल पर कोई और व्यक्ति सही से अंग्रेजी भी नहीं जानता था जो उन महोदय से बात कर लेता लेकिन भाग्य हम लोगों के संग था सो इत्तेफाक से मेरे पिता जी जो फ़िरोज़ाबाद के विधायक रहे अपने मित्र श्री गुलाम नबी अंकल के साथ किसी काम से दिल्ली आए हुए थे उन्होंने सोचा कि अतुल ने कोई फेयर में भाग लिया है वो देख लिया जाए तो वो लोग हमारे स्टाल पर आ गए थे। इस ट्रेंड फेयर के दौरान मेरी इलाहाबाद वाली मौसी के बड़े लड़के श्री विनीत कुमार (गुड्डा दादा) जो भारतीय वन सेवा के हिमाचल प्रदेश में बहुत वरिष्ठ अधिकारी रहे बाद में वो भी आ गए थे और रामू भाईसाहब तथा राजा बाबू तो थे ही साथ में हमारे।इस ट्रेंड फेयर में हमारे स्टाल पर छोटे भाई अभिनव गुड्डू के मिलने वाले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मंत्री श्री रशीद किदवई और तत्कालीन उद्योग निदेशक श्री आर0 ऐन0 त्रिवेदी का भी आना हुआ था।
 अब पापा ने एक आदमी मुझको हॉल नम्बर 18 पर बुलाने भेजा और मेरे आने तक उन व्यापारी महोदय को स्टाल पर बात करते हुए रोके रखा।उस समय मोबाइल फोन शुरू नहीं हुए थे पर खबर पाते ही मैं दौड़ता हुआ यूपी पैवेलियन आ गया और व्यापारी से बातचीत की।वो फ्रांस के एक व्यापारी थे और उन्होंने मुझको एक पूरे 40 फिट के कंटेनर माल का ऑर्डर दिया।उस समय पूरे फेयर में मैं काँच के उत्पादों का एकमात्र एक्सपोर्टर था जो फ़िरोज़ाबाद से था और खुद ही इन उत्पादों का निर्माता भी था।फ्रांस के व्यापारी मिस्टर शॉपियाँ महोदय के जाने के बाद इंग्लैंड के एक व्यापारी आये मिस्टर ली।उन्होंने भी एक कंटेनर का ऑर्डर लिखवाया।जब हमने उनको माल सप्लाई किया तो वो हमारी डिलीवरी और क्वालिटी से इतने खुश हुए कि उन्होंने मुझको एक फैक्स भेजा जिसमें हमारे उत्पादों की तारीफ करते हुए लिखा कि,”You are King of Glass.”स्वाभाविक है कि इस सबसे हम लोगों के हौसले काफी बढ़े।

जैसा कि मैंने बताया कि अगली बार से मैं भी EPCH के फेयर में भाग लेने लगा था।ये फेयर गजब का होता है और मैं खास तौर पर ईपीसीएच के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर श्री राकेश कुमार,डिप्टी डायरेक्टर श्री आर के वर्मा,उस समय के मुख्य आयोजकों में से एक श्री नवरत्न समदरिया का उल्लेख करना चाहूंगा कि इन लोगों की गजब की मेहनत और आयोजन की कार्यकुशलता ने इस फेयर को विश्व के सर्वश्रेष्ठ व्यापार मेलों की कतार में अग्रणी स्थान पर खड़ा कर दिया था।मेरा दावे के साथ यह कहना है कि पहली बार जो ईपीसीएच के हैंडीक्राफ्ट फेयर को देखेगा वो अपने दांतों तले अपनी उंगलियों को दबा लेगा क्योंकि सामान्य तौर पर भारत के इतने किस्म के हस्तशिल्प एक जगह किसी का देख पाना मुमकिन ही नहीं है और इस ट्रेड फेयर की भव्यता का तो कहना ही क्या है!!!

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