लोकसेवक — 1 जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी
लोकसेवक — 1
जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी
लोकसेवक कौन है?
क्या केवल कोई सरकारी अधिकारी? कोई न्यायाधीश? कोई मंत्री या शासक? या फिर हर वह व्यक्ति जिसे किसी समय समाज, राज्य या व्यवस्था ने कोई सार्वजनिक जिम्मेदारी सौंपी और जिसके फैसलों का असर दूसरे लोगों के जीवन पर पड़ा?
इतिहास में सत्ता की चर्चा बहुत होती है, लेकिन सत्ता और समाज के बीच खड़े उन लोगों की चर्चा शायद उतनी नहीं होती जिन्हें किसी न किसी रूप में लोकसेवा की जिम्मेदारी मिली।
इनमें राजा भी रहे, मंत्री भी, न्यायाधीश भी, प्रशासक भी, पुलिस अधिकारी भी, सेनापति भी, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक भी और बहुत से ऐसे लोग भी जिन्हें शायद इतिहास ने उतनी जगह नहीं दी जितनी मिलनी चाहिए थी।
अलग-अलग कालखंड। अलग-अलग क्षेत्र। अलग-अलग देश और भौगोलिक परिस्थितियाँ। अलग-अलग व्यवस्थाएँ और अलग-अलग तरह की लोकसेवा।
और जाहिर है, सभी लोकसेवक आदर्श नहीं रहे।
किसी ने अपने पद की मर्यादा बढ़ाई तो किसी ने उसे विवादों में डाला। किसी ने सत्ता के सामने खड़े होकर अपने दायित्व को निभाया तो किसी पर सत्ता के सामने झुकने के आरोप लगे। किसी के फैसले आज भी मिसाल के रूप में याद किए जाते हैं तो किसी के फैसलों पर दशकों और सदियों बाद भी बहस होती है।
आज भी हम आए दिन लोकसेवकों की भूमिका, उनकी निष्पक्षता, उनके अधिकारों, उनकी जवाबदेही और सत्ता से उनके रिश्तों को लेकर विवाद और बहस देखते रहते हैं।
शायद इसलिए लोकसेवकों के किस्से केवल व्यक्तियों के किस्से नहीं होते। उनके माध्यम से अपने-अपने समय की व्यवस्था, सत्ता, समाज और मूल्यों को भी समझा जा सकता है।
काफी समय से मन में था कि ऐसे लोगों के बारे में जो पढ़ा, सुना या जाना है, उसे समय-समय पर लिखूँ।
इस श्रृंखला में प्राचीन काल से लेकर आज तक के लोकसेवक होंगे। भारत के भी और दुनिया के दूसरे हिस्सों के भी। राजनीति, प्रशासन, न्यायपालिका और दूसरी विधाओं से जुड़े लोग भी। बहुत प्रसिद्ध नाम भी और कुछ ऐसे लोग भी जिनके बारे में शायद कम लोग जानते हों।
यह केवल अच्छे लोकसेवकों की श्रृंखला भी नहीं होगी। जहाँ उपलब्ध तथ्य और इतिहास किसी व्यक्ति के काम पर सवाल उठाते हैं, वहाँ उन सवालों और विवादों की बात भी होगी।
क्योंकि किसी लोकसेवक को समझना केवल उसकी प्रशंसा या आलोचना करना नहीं है। शायद ज्यादा जरूरी यह समझना है कि जब उसके सामने सत्ता, पद, व्यक्तिगत संबंध और उसका सार्वजनिक दायित्व एक साथ खड़े हुए, तब उसने क्या किया।
इसीलिए शुरू कर रहा हूँ एक नई श्रृंखला—
“लोकसेवक”।
संयोग से इसकी शुरुआत पितृ पक्ष में हो रही है और पहला किस्सा मेरे अपने परिवार के ही एक बुजुर्ग का है—जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी जी का।
शायद इससे अच्छी शुरुआत मेरे लिए हो भी नहीं सकती थी।
यह किस्सा मुझे खुद मेरे पापा ने सुनाया था। बात बहुत पुरानी है और पापा से सुने हुए भी कई दशक हो गए, इसलिए घटना की कुछ छोटी-छोटी बातें अब मुझे ठीक से याद नहीं हैं। लेकिन इस किस्से की मूल घटना आज भी मेरी स्मृति में है।
सुरेश चंद्र चतुर्वेदी जी हमारे परिवार के बुजुर्गों में थे। वह बापू हजारी लाल जी के ज्येष्ठ पुत्र थे और डिस्ट्रिक्ट एवं सेशन्स जज रहे। वह 1945 में रिटायर हुए थे।वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे।
यह बात सन 1960 के आसपास की होगी।
पापा को इलाहाबाद से पढ़कर फिरोजाबाद आए हुए कुछ ही समय हुआ था। उनके एक परिचित या मित्र फिरोजाबाद में CO हुआ करते थे—M.C. माथुर साहब, जो स्वयं IPS थे।
एक दिन पापा उनके ऑफिस में बैठे हुए थे। खबर आई कि मैनपुरी के SSP वहाँ से निकल रहे हैं और रास्ते में माथुर साहब के साथ चाय पीते हुए जाएंगे। माथुर साहब ने पापा से भी रुकने को कहा।
थोड़ी देर बाद मैनपुरी के SSP साहब आए। उनका नाम जौहरी साहब था।
बातचीत के दौरान माथुर साहब ने पापा का उनसे परिचय कराया।
नाम सुनकर जौहरी साहब ने पापा से पूछा—
“एक जमाने में इलाहाबाद में सुरेश चंद्र चतुर्वेदी साहब डिस्ट्रिक्ट जज हुआ करते थे। आप उनको जानते हैं?”
पापा ने सहजता से कहा—
“वो तो हमारे ताऊजी थे।”
इतना सुनना था कि जौहरी साहब अचानक उठे और पापा के पैर छू लिए।
वह उम्र में पापा से बड़े थे।
पापा जब तक कुछ समझ पाते, जौहरी साहब बहुत भावुक होकर बोले—
“उनका मुझ पर बहुत बड़ा अहसान है।”
और फिर उन्होंने अपना किस्सा सुनाया।
जौहरी साहब अपने छात्र जीवन में इलाहाबाद में पढ़ते थे। किसी स्टूडेंट आंदोलन के दौरान कोई बड़ी घटना हो गई थी। शायद कोई व्यक्ति घायल हुआ था और संभवतः बाद में उसकी मृत्यु भी हो गई थी। इस घटना का यह हिस्सा अब मुझे ठीक से याद नहीं है।
मामला गंभीर था और उस समय अंग्रेजी हुकूमत थी।
अंग्रेज कलक्टर चाहता था कि इन नौजवानों को कड़ी से कड़ी सजा मिले—शायद फाँसी तक।
उसे पता चला कि इलाहाबाद के SSP का जज साहब से परिचय है और दोनों रोज सुबह साथ टहलते भी हैं।
कलक्टर ने SSP से कहा कि वह जज साहब तक सरकार की मंशा पहुँचा दें कि इन लोगों को कड़ी सजा दी जाए।
इलाहाबाद के वह पुलिस अधिकारी शायद मुस्लिम थे।
उन्होंने अंग्रेज कलक्टर को जो जवाब दिया, मेरे लिए वही इस पूरे किस्से की सबसे बड़ी बात है।
उन्होंने साफ कह दिया—
“मेरी क्या, किसी की ताकत नहीं है कि जिला जज साहब से ऐसी सिफारिश कर सके। वह मानेंगे भी नहीं और उल्टे नाराज और हो जाएंगे। मैं तो उनसे यह बात नहीं कह पाऊँगा।”
बाद में मुकदमा चला।
सारे नौजवान छात्र बेकसूर पाए गए और बाइज्जत बरी हो गए।
जौहरी साहब भी उन्हीं में से एक थे।
इतने वर्षों बाद भी वह उस घटना को भूले नहीं थे।
उन्होंने पापा से कहा कि आज मेरा जीवन है, मैं इस नौकरी में हूँ, यह सब इसीलिए संभव हो पाया क्योंकि उस समय उस कुर्सी पर ऐसे जज बैठे थे।
पापा ने जब यह किस्सा हमको सुनाया था तो जाहिर है हम सबको बहुत अच्छा लगा था। आखिर बात अपने बुजुर्ग की थी।
लेकिन आज जब इतने वर्षों बाद इस किस्से के बारे में सोचता हूँ तो इसकी एक दूसरी बात मुझे और भी महत्वपूर्ण लगती है।
एक तरफ अंग्रेज सरकार का कलक्टर था, जो अपनी मंशा अदालत तक पहुँचाना चाहता था।
दूसरी तरफ उसी सरकार का एक बड़ा पुलिस अफसर था, जो जज साहब को व्यक्तिगत रूप से जानता भी था और उनके साथ रोज सुबह टहलता भी था।
फिर भी उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह जज साहब से सरकार की सिफारिश कर सके।
क्योंकि उसे मालूम था कि सामने बैठा व्यक्ति किसी सरकार का नहीं, अपनी कुर्सी और अपने न्याय का आदमी है।
शायद किसी भी लोकसेवक की असली प्रतिष्ठा यही है—उसके आसपास के लोगों को यह मालूम हो कि इस आदमी से गलत बात कही ही नहीं जा सकती।
और शायद यही सवाल इस पूरी श्रृंखला के साथ भी चलता रहेगा—
पद और सत्ता के बीच जब कभी चुनाव की घड़ी आई, हमारे लोकसेवक कहाँ खड़े थे?
पितृ पक्ष में अपने एक पूर्वज को याद करते हुए “लोकसेवक” श्रृंखला की शुरुआत उनसे ही।
आज के लिए बस इतना ही।
जल्द ही एक और लोकसेवक और एक और किस्सा...
REALLY LOK SEVAK ESA HI HONA chahiye.congratulations Atul ji.bahut hi prednadayak lekh ha.
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