चूल्हे-चौके से होम डिलीवरी तक:- हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन



हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन

पहली कड़ी : चूल्हे-चौके से होम डिलीवरी तक

मुझे अपने बचपन की दो तस्वीरें आज भी याद हैं।

एक हमारे घर की रसोई की, जहाँ पहले मेरी दादी खाना बनाती थीं, फिर मेरी माँ ने यह जिम्मेदारी सँभाली और धीरे-धीरे समय बदला तो खाना बनाने के लिए एक रसोइया भी आने लगी। लेकिन एक बात हमेशा बनी रही, साफ-सफाई का विशेष ध्यान।

दूसरी तस्वीर कुछ अलग है।

उन दिनों शादी-ब्याह और दूसरी दावतों के समाप्त होने के बाद जो खाना बच जाता था, उसे फेंक दिया जाता था। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि कुछ अत्यन्त विपन्न लोग उस फेंके हुए खाने में से खाने योग्य चीजें बीनकर अपने साथ ले जाते थे। कभी उसी भोजन में कोई जानवर भी मुँह मारता हुआ या मुँह मारने की कोशिश करता दिखाई दे जाता था।

यह दृश्य बड़ा ही हृदयविदारक होता था। लेकिन उस समय के समाज में ऐसी घटनाएँ एक तरह से सामान्य और स्वीकार्य-सी हो गई थीं। शायद इसलिए भी कि अभाव और विवशता के सामने बहुत-सी सामाजिक मान्यताएँ अर्थहीन हो जाती हैं। जिन लोगों के सामने पेट भरने का प्रश्न हो, उनके लिए भोजन कहाँ से आया, किसने बनाया या किस स्थिति में पड़ा था, ये बातें पीछे छूट जाती हैं। आखिर आवश्यकता कई बार बाकी सभी बातों से बड़ी हो जाती है।

एक तरफ भोजन की शुद्धता को लेकर इतने नियम और दूसरी तरफ ऐसे लोग, जिनके लिए प्रश्न भोजन की शुद्धता का नहीं, बल्कि भोजन मिलने का था।

आज इतने वर्षों बाद जब इन दोनों दृश्यों को एक साथ याद करता हूँ तो मन में कई प्रश्न उठते हैं। हमारा समाज कितना बदला है? हमारी परम्पराएँ कितनी बदली हैं? और क्या हम सचमुच उतने बदले हैं जितना हमें लगता है?

हमने अक्सर पढ़ा और सुना है कि भारत में सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है, A way of life।

यदि ऐसा है तो यह भी समझना होगा कि जीवन जीने के तरीके समय के साथ बदलते रहते हैं। फिर हमारी धार्मिक और सामाजिक परम्पराएँ उनसे अछूती कैसे रह सकती हैं?

मुझे लगता है कि समय की गति तेज होती है और सामाजिक परिवर्तन की अपेक्षाकृत धीमी। इसलिए जब परिवर्तन हो रहे होते हैं, तब हमें उनका अहसास नहीं होता। लेकिन जब कुछ दशक पीछे मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है कि हमारे रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाजों और सामाजिक मान्यताओं में कितना कुछ बदल चुका है।

बहुत समय से मेरे मन में इच्छा थी कि धर्म, दर्शन, हमारी परम्पराओं और समाज के बदलते स्वरूप पर कुछ लिखा जाए। अपने अनुभवों के साथ इतिहास और प्राचीन ग्रन्थों को भी समझने का प्रयास किया जाए। जहाँ आवश्यक हो, पुरानी मान्यताओं पर प्रश्न उठाए जाएँ और आज के समाज को भी उसी कसौटी पर परखा जाए।

आज उसी की शुरुआत कर रहा हूँ।

शुरुआत हमारे खान-पान से ही करते हैं।

पचास-साठ वर्ष पहले बहुत से परिवारों में चौके में बैठकर भोजन करने का रिवाज था। कच्ची और पक्की रसोई के अलग-अलग नियम होते थे। कच्ची रसोई में भोजन बनाने वाली महिला को नहाकर खाना बनाना होता था। भोजन करने वालों के लिए भी शुद्धता के नियम थे। रसोई में कौन प्रवेश कर सकता है, किसके हाथ का भोजन स्वीकार किया जा सकता है, इन सबको लेकर अनेक सामाजिक मान्यताएँ थीं।

पक्की रसोई में अपेक्षाकृत अधिक छूट हुआ करती थी।

लेकिन क्यों?

कच्ची रसोई का सम्बन्ध सामान्यतः पानी में पकाए गए भोजन से और पक्की रसोई का घी या किसी भी तेल में तलकर तैयार किए गए भोजन से माना जाता था। पुराने सामाजिक व्यवहार में इन दोनों प्रकार के भोजन को स्वीकार करने के नियम भी अलग थे।

पहली दृष्टि में लगता है कि इसके पीछे स्वच्छता का विचार रहा होगा। नहाकर खाना बनाना, हाथ-पैर धोना, बर्तनों और रसोई को साफ रखना, इन सबका व्यावहारिक महत्व समझ में आता है।

लेकिन क्या केवल स्वच्छता ही इसका कारण थी?

नहीं। इतिहास और सामाजिक अध्ययनों से पता चलता है कि भोजन की शुद्धता के साथ जातिगत मान्यताएँ और ऊँच-नीच के नियम भी जुड़े हुए थे। किसके हाथ का खाना खाया जा सकता है और किसके हाथ का नहीं, यह भी अनेक समुदायों में व्यक्ति की जाति और सामाजिक स्थिति से निर्धारित होता था।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अन्तर है। स्वच्छता और धार्मिक शुद्धता एक ही बात नहीं हैं।

स्वच्छता का सम्बन्ध स्वास्थ्य और साफ-सफाई से है। लेकिन किसी मनुष्य को केवल उसके जन्म या जाति के कारण अशुद्ध मानना एक सामाजिक मान्यता थी, जिसका स्वच्छता के वैज्ञानिक सिद्धान्तों से कोई सम्बन्ध नहीं है।

और शायद यही वह जगह है जहाँ हमें धर्म और सामाजिक परम्पराओं के बीच अन्तर करने की आवश्यकता पड़ती है।

हमारे प्राचीन साहित्य में भी जीवन और उपभोग को लेकर अनेक विचार मिलते हैं।

ईशावास्य उपनिषद् के पहले मन्त्र में कहा गया है,

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

इस मन्त्र की विभिन्न दार्शनिक व्याख्याएँ हैं, लेकिन एक प्रमुख व्याख्या में त्याग की भावना से उपभोग करने और दूसरे के धन का लोभ न करने का विचार मिलता है।

अब ज़रा इस विचार को अपने सामाजिक व्यवहार के साथ रखकर देखिए।

एक ओर संयम और लोभ से बचने की दार्शनिक शिक्षा, दूसरी ओर भोजन की बर्बादी और ऐसे लोग जिन्हें खाने के लिए दूसरों का फेंका हुआ भोजन बीनना पड़ता था।

मैं यह नहीं कह रहा कि इस उपनिषद् के मन्त्र का सीधा सम्बन्ध हमारे भोजन सम्बन्धी सामाजिक नियमों से था। लेकिन यह तुलना एक प्रश्न अवश्य उठाती है कि हमारे आदर्शों और हमारे वास्तविक सामाजिक जीवन के बीच कितना अन्तर रहा है?

और यह भी याद रखना चाहिए कि हमारे देश में सभी लोगों का जीवन एक जैसा कभी नहीं रहा।

सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण लोगों के रहन-सहन, भोजन, शिक्षा और अवसरों में बहुत बड़ा अन्तर रहा है। एक ही समय में, एक ही शहर में, बल्कि एक ही मोहल्ले में लोगों की दुनिया बिल्कुल अलग हो सकती थी।

इसलिए जब हम पुराने समय की परम्पराओं की चर्चा करते हैं तो केवल अपने घर और अपने सामाजिक परिवेश के अनुभवों को पूरे भारत का अनुभव नहीं मान सकते।

जिन परिवारों में भोजन की शुद्धता के विस्तृत नियम थे, उन्हीं के आसपास ऐसे परिवार भी थे जिनके लिए दो समय का भोजन जुटाना कठिन था। और भोजन से जुड़े जातिगत प्रतिबन्धों का बोझ भी समाज के सभी वर्गों पर एक समान नहीं पड़ता था।

समाज की कहानी इन सबकी कहानी है।

फिर समय बदला।

शिक्षा का प्रसार हुआ। शहरीकरण बढ़ा। आर्थिक प्रगति के साथ लोगों के रहन-सहन और खान-पान के तौर-तरीकों में परिवर्तन आने लगे। गाँवों और छोटे कस्बों से लोग बड़े शहरों की ओर गए। अलग-अलग जातियों, धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों का एक-दूसरे से सम्पर्क बढ़ा। एक साथ पढ़ना, काम करना, यात्रा करना और भोजन करना धीरे-धीरे सामान्य होता गया।

शहरीकरण का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह भी हुआ कि व्यक्ति का जीवन केवल अपने परिवार, जाति या समुदाय की परम्पराओं तक सीमित नहीं रह गया। नए परिवेश में पुराने नियमों को निभाना कई बार व्यावहारिक रूप से कठिन भी होने लगा और उनकी आवश्यकता तथा औचित्य पर प्रश्न भी उठने लगे।

आर्थिक प्रगति ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई। आमदनी और सुविधाएँ बढ़ने के साथ अनेक परिवारों के भोजन, रहन-सहन और स्वच्छता के स्तर में सुधार हुआ। रसोई में नए उपकरण आए, साफ पानी, साबुन और सफाई के आधुनिक साधनों की उपलब्धता बढ़ी। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के बढ़ते अवसरों ने भी परिवार और रसोई की पुरानी व्यवस्थाओं को बदलने में योगदान दिया।

लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक एक समान नहीं पहुँचा। शहरों में सम्पन्नता बढ़ी तो उसके साथ झुग्गी-बस्तियाँ और आर्थिक विषमता भी बनी रहीं। पुराने कुछ सामाजिक भेदभाव कम हुए, लेकिन वे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।

सामाजिक सुधार आन्दोलनों, कानूनों, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शहरीकरण और आर्थिक प्रगति, इन सबने मिलकर समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

शादी-ब्याह और दूसरी दावतों में भोजन परोसने का तरीका भी कितना बदल गया है। कभी पंगत में बैठाकर भोजन कराने का चलन था। फिर धीरे-धीरे बुफे व्यवस्था का प्रचलन बढ़ा। लोग अपनी पसन्द और आवश्यकता के अनुसार भोजन लेने लगे। अलग-अलग परिवारों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग एक ही स्थान पर खड़े होकर भोजन लेने और खाने लगे।

इस व्यवस्था में भोजन की मात्रा स्वयं चुनने की सुविधा भी मिली, जिससे बर्बादी कम करने की सम्भावना बनी। हालाँकि यह कहना उचित नहीं होगा कि इससे भोजन की बर्बादी समाप्त हो गई। आज भी बहुत-सी दावतों में काफी खाना व्यर्थ जाता है।

लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण बात केवल भोजन परोसने के तरीके में आया बदलाव नहीं है। यह हमारे सामाजिक व्यवहार में आया परिवर्तन भी है। जिन व्यवस्थाओं में कभी साथ बैठने, परोसने और भोजन ग्रहण करने के अलग-अलग नियम हुआ करते थे, उनमें धीरे-धीरे बदलाव आया।

शायद समाज और समय की यही विशेषता है कि बदलती परिस्थितियों में जीवन जीने के नए तरीके खोज लिए जाते हैं। उनमें से कुछ पहले से अधिक सुविधाजनक होते हैं, कुछ अधिक व्यावहारिक और कुछ पुरानी सामाजिक दूरियों को कम करने में भी सहायक होते हैं।

आज हम कितनी सहजता से किसी रेस्तराँ में खाना खा लेते हैं। अक्सर हमें यह भी नहीं मालूम होता कि भोजन किसने बनाया, उसकी जाति क्या है या वह किस धर्म को मानता है।

और अब तो भोजन की होम डिलीवरी का जमाना है।

मोबाइल पर खाना ऑर्डर करते समय हम यह नहीं पूछते कि उसे बनाने वाले की जाति क्या है, वह किस धर्म को मानता है या उसे हमारे घर तक पहुँचाने वाला व्यक्ति कौन है। हमारी चिन्ता मुख्यतः इस बात की होती है कि भोजन अच्छा हो, स्वच्छ हो, समय पर पहुँचे और उसकी कीमत उचित हो।

ज़रा सोचिए, यह वही समाज है जहाँ कभी बहुत से घरों में रसोई के भीतर किसका प्रवेश हो सकता है और किसके हाथ का भोजन स्वीकार किया जा सकता है, इसके कठोर नियम हुआ करते थे।

और आज उसी घर के दरवाजे पर किसी अनजान व्यक्ति द्वारा लाया गया, किसी दूसरे अनजान व्यक्ति के हाथ का बना भोजन हम सहजता से स्वीकार कर लेते हैं।

कभी जिन बातों को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था, वे आज बहुत से लोगों के लिए अप्रासंगिक हो चुकी हैं।

क्या यह छोटा परिवर्तन है?

यही तो परिवर्तन की शक्ति है।

और शायद यही इस बात का उदाहरण भी है कि समाज में परिवर्तन हमेशा किसी घोषणा या बड़े आन्दोलन के साथ ही नहीं आता। कभी-कभी वह इतनी सहजता से हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाता है कि हमें पता भी नहीं चलता कि हमने कब और कैसे उन नियमों को पीछे छोड़ दिया जिन्हें कभी अपरिहार्य माना जाता था।

लेकिन इसके साथ यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि सारी समस्याएँ समाप्त हो गई हैं। आज भी भोजन के आधार पर भेदभाव होता है। जातिगत पूर्वाग्रह मौजूद हैं। भूख और आर्थिक विषमता भी समाप्त नहीं हुई है।

फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि समय ने करवट ली है। समाज के अनेक वर्गों में परिवर्तन आया है और बहुत-सी पुरानी व्यवस्थाओं का प्रभाव कम हुआ है।

अब जब अपने बचपन के उन दोनों दृश्यों को एक साथ रखकर देखता हूँ तो मन में एक प्रश्न उठता है।

आखिर वास्तविक धर्म क्या था? वह चूल्हा-चौका, जहाँ भोजन की शुद्धता के इतने नियम थे, या उस भूखे मनुष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी, जो दावत समाप्त होने के बाद फेंके गए भोजन में से अपने लिए कुछ खाने को तलाश रहा था?

या फिर ये दोनों ही हमारे उस सामाजिक जीवन के हिस्से थे जिसमें धर्म, परम्पराएँ, मान्यताएँ और सामाजिक विषमताएँ एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हुई थीं कि उनके बीच अन्तर करना भी आसान नहीं था?

मुझे लगता है कि धर्म और समाज की इन विद्रूपताओं के बीच एक बड़ा विचित्र और जटिल सम्बन्ध रहा है। कभी सामाजिक व्यवस्थाओं को धर्म का आधार मिला, कभी धर्म की नई व्याख्याओं ने उन्हीं व्यवस्थाओं को चुनौती दी। समय के साथ समाज बदला, परिस्थितियाँ बदलीं और धर्म तथा परम्पराओं को समझने के हमारे तरीके भी बदलते रहे।

और शायद यह बदलाव आवश्यक भी है।

क्योंकि यदि समाज बदलता रहेगा, मनुष्य का ज्ञान और अनुभव बढ़ता रहेगा, तो क्या धर्म और जीवन के सम्बन्धों को समझने की हमारी दृष्टि हमेशा एक जैसी बनी रह सकती है?

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारी सभ्यता किसी ठहरे हुए तालाब की तरह नहीं, बल्कि बहती हुई नदी की तरह है। उसमें निरन्तर नया जल आता है, दूसरी धाराएँ मिलती हैं, रास्ते और किनारे बदलते हैं, लेकिन उसका प्रवाह बना रहता है।

शायद हमारी परम्पराओं की निरन्तरता का रहस्य भी इसी प्रवाह में छिपा है।

लेकिन क्या हर परिवर्तन प्रगति है? क्या हर पुरानी परम्परा त्याज्य है? और क्या समाज की हर विद्रूपता के लिए धर्म को जिम्मेदार ठहराना उचित होगा?

ये प्रश्न इतने सरल नहीं हैं कि इनके उत्तर एक ही लेख में खोज लिए जाएँ।

धर्म, दर्शन, हमारी सामाजिक परम्पराओं और बदलते जीवन के ऐसे ही अनेक पहलुओं पर आगे भी चर्चा करने का मेरा मन है। इनमें जाति व्यवस्था और उससे जुड़े सामाजिक नियमों तथा मान्यताओं का प्रश्न भी है, जिस पर अलग से और विस्तार से विचार करना आवश्यक होगा। जहाँ आवश्यक होगा, प्राचीन ग्रन्थों और इतिहास के उदाहरणों से समझने का प्रयास करेंगे, और जहाँ उचित लगेगा, अपनी मान्यताओं पर भी प्रश्न उठाएँगे।

क्योंकि मुझे लगता है कि किसी परम्परा का सम्मान करने का अर्थ उस पर प्रश्न उठाना बन्द कर देना नहीं है।

इन विषयों पर चर्चा आगे भी जारी रहेगी।


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