इतिहास और संस्कृति के किस्से-50 इतिहास और संस्कृति के किस्से सीरीज में 50वां भाग टीपू सुल्तान के रॉकेट : टीपू के मैसूर ने यूरोप को रॉकेट का उपयोग दिखाया और सिखाया
इतिहास और संस्कृति के किस्से-50
इतिहास और संस्कृति के किस्से सीरीज में आज 50वां भाग आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपको इस सीरीज के लेख पसंद आ रहे हैं यह मेरे लिए बहुत प्रसन्नता की बात है और इससे हौसला भी बढ़ता है। आपकी टिप्पणियाँ और आपकी इस सीरीज में रुचि लेखन को प्रेरित करती है,आप सभी का बहुत-बहुत आभार।
टीपू सुल्तान के रॉकेट : टीपू के मैसूर ने यूरोप को रॉकेट का उपयोग दिखाया और सिखाया
18वीं सदी के भारत में युद्ध विज्ञान केवल तलवार, बंदूक और तोप तक सीमित नहीं था। दक्षिण में मैसूर के शेर टीपू सुल्तान और उनके पिता हैदर अली ने युद्धक तकनीक में ऐसा प्रयोग किया जिसने दुनिया की सैन्य रणनीति ही बदल दी। यह प्रयोग था — लोहे के आवरण वाले रॉकेट(Iron-cased War Rockets), जिन्हें नियंत्रित दिशा, बारूद क्षमता और दूर तक निशाना साधने की क्षमता के साथ बनाया गया।
टीपू ने अपने सैन्य अभियानों में इन रॉकेट्स का इतना प्रभावी उपयोग किया कि अंग्रेज़ जनरल खुद अपनी डायरी में लिखता है— “such fire in the sky we had never imagined from the natives.” यह वह समय था जब यूरोप अभी भी लकड़ी और कागज़ के रोलिंग ट्यूब वाले आदिम रॉकेट प्रयोग कर रहा था, जो अक्सर हवा में फट जाते थे या गलत दिशा में गिरते थे। इसके विपरीत मैसूर का धातु-नलिका रॉकेट अधिक स्थिर, शक्तिशाली और विनाशकारी था।
रॉकेट ब्रिगेड और Iron Tubes की शक्ति
टीपू के पास 5,000 से अधिक रॉकेट सैनिक संगठित रूप से ब्रिगेडों में तैनात थे, जिन्हें कुशालगढ़ और संगरूर बैटरियाँ कहा जाता। यह कोई अनियमित आतिशबाज़ी नहीं, बल्कि तालबद्ध सैन्य यूनिट थी। Iron casing में बारूद भरने के बाद उसका पिछला हिस्सा बाँधकर बाँस के लम्बे डंडों पर लगाया जाता। इससे वह 2 किमी से अधिक दूरी तक विनाशकारी शक्ति से उड़ सकता था— कुछ स्रोत 2.25 किमी तक की सीमा भी दर्ज करते हैं।
Fathul Mujahidin के लेखक ज़ैनुल आबेदीन शुसतरी ने टीपू के समय की पूरी युद्ध प्रणाली या युद्ध मैन्युअल का अपनी पुस्तक में जिक्र किया है।
टीपू सुल्तान ने अपने सैन्य अधिकारियों को एक विशेष सैन्य पुस्तिका (मैनुअल) बाँटी थी, जिसमें रॉकेट यूनिटों की विस्तृत व्यवस्था दर्ज थी। प्रत्येक कुशून (cushoons) में 200 विशेष सैनिक केवल रॉकेट संचालन के लिए नियुक्त किए जाते थे। मैसूर की सेना में कुल 16 से 24 कुशून होते थे। इन प्रशिक्षित सैनिकों को रॉकेट के प्रक्षेपण कोण (launch angle) को इस प्रकार निर्धारित करना सिखाया जाता था कि रॉकेट लक्ष्य पर सही कोण से गिर सके।
इसी मैनुअल में टीपू ने एक बहु-रॉकेट प्रक्षेपक (multiple rocket launcher) का भी उल्लेख किया, जो बिल्कुल संगीत वाद्य ‘ऑर्गन’ की तरह दिखता था और एक साथ 10 रॉकेट दाग सकता था। कुछ रॉकेटों के अग्रभाग पर तेज ब्लेड लगे होते थे, जबकि कुछ अग्नि प्रज्वलन (incendiary) के लिए बनाए गए थे।
हालाँकि रॉकेटों का उपयोग मैसूर में पहले से होता आया था, लेकिन 1792 की श्रीरंगपट्टनम की घेराबंदी की शुरुआत में एक ही बार में लगभग 2,000 रॉकेटों की बौछार ने ब्रिटिशों में हड़कंप मचा दिया।
एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, टीपू के पिता हैदर अली ने रॉकेट तकनीक में ऐतिहासिक परिवर्तन किया। उसने जलने वाले दहन पाउडर को रखने के लिए धातु (लोहा) के सिलिंडर का उपयोग शुरू किया। इससे रॉकेट को पहले की कागज़ी संरचना की तुलना में कई गुना अधिक दबाव सहने की क्षमता मिली और उसकी गति व दूरी बढ़ गई।
इन रॉकेटों को लंबे बाँस के डंडों पर चमड़े की पट्टियों से बाँधकर दागा जाता था और यह जमीन पर तेज़ी से फिसलते हुए या हवा में उछाले जाने पर अत्यधिक विनाशकारी साबित होते थे।
हैदर अली के बाद टीपू सुल्तान ने इसे और आगे बढ़ाया। उसने रॉकेट सैनिकों की संख्या 1,200 से बढ़ाकर 5,000 कर दी।
1792 और 1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाइयों में ब्रिटिश सेना इन्हीं विध्वंसकारी रॉकेट हमलों का सामना करते हुए चकित रह गई।
यही मैसूर के लौह-रॉकेट थे, जिन्होंने आगे चलकर यूरोप की सैन्य रॉकेट तकनीक को जन्म दिया।
आज दुनिया जिस आधुनिक मिसाइल और आर्टिलरी प्रणाली पर गर्व करती है—उसकी पहली गूँज सच्चे अर्थों में श्रीरंगपट्टनम के किलों से ही उठी थी।
टीपू सुल्तान केवल एक शासक नहीं, बल्कि युद्ध विज्ञान, रक्षा तकनीक और रॉकेट इंजीनियरिंग का अग्रदूत भी था।
हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान के लेखक हुसैन अली किरमानी दर्ज करते हैं कि जब 1792 में श्रीरंगपट्टनम् की रक्षा में रॉकेट दागे गए, तो “रात का आसमान आग और ध्वनि से फटता हुआ प्रतीत होता था, और अंग्रेज़ घुड़सवार दहशत में बिखर गए।” यही नहीं, इन रॉकेट्स में कई बार ज्वलनशील पूँछ (incendiary tails) लगा दी जाती जो लक्ष्य पर गिरते ही भीषण आग फैला देती थी।
1799 में श्रीरंगपट्टनम् के पतन के बाद अंग्रेज़ों ने सैकड़ों रॉकेट, तकनीकी स्केच और लोहे के आवरण अपने साथ ले गए। इन्हें लंदन के Woolwich Military Arsenal और Royal Artillery Laboratory में अध्ययन किया गया।
ब्रिटिश वैज्ञानिक विड्टर कॉन्ग्रीव (Sir William Congreve) ने 1804 में लिखा:
"Mysore rockets are of such precision and firepower that they can be transformed into the main armament of modern artillery."
और इसी से जन्म हुआ — Congreve Rockets, जो बाद में नेपोलियन युद्धों, Battle of Waterloo और समुद्री युद्धों में ब्रिटेन की रीढ़ बने। यह वह क्षण था जब भारतीय युद्ध तकनीक यूरोप की सैन्य क्रांति का स्रोत बनी।
हम कह सकते हैं कि दुनिया ने रॉकेट युद्ध का विज्ञान भारत से सीखा
British Royal Artillery Archives में सुरक्षित टीपू के रॉकेट अवशेष
National Army Museum Papers
Fathul Mujahidin
India Office Military Records, London
सभी प्रमाणित करते हैं कि यह एशिया से यूरोप को हस्तांतरित सैन्य तकनीक थी।
टीपू ने अपने अभियानों में लिखा था— “बारूद केवल युद्ध का धुआँ नहीं, भविष्य की दिशा है।”
सच ही, 18वीं सदी के मैसूर में गढ़ी गई आग 19वीं सदी के यूरोपीय युद्धों में चमक बनकर लौटी—
भारत ने सिर्फ़ स्वतंत्रता नहीं, युद्ध–विज्ञान में भी विश्व को दिशा दी पर अफसोस कि टीपू सुल्तान के रॉकेटों ने आगे चलकर अंग्रेजों की सेना को मजबूत बना दिया हम भारतीय उस समय की इस बढ़त को कायम नहीं रख पाए।
आज की पोस्ट में बस इतना
अगली पोस्ट में फिर मिलेंगे इतिहास के कुछ नए किस्सों के साथ
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