​अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-1 अमर शहीद राजगुरु की नींद और सरदार भगत सिंह

अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-1


अमर शहीद राजगुरु की नींद और सरदार भगत सिंह 


आजकल तबियत जो ख़राब हुई थी उसके कारण ज्यादातर बैड रैस्ट चल रहा है और अन्य सामान्य ऐक्टिविटी भी बंद सी ही हैं पर पढ़ना खूब हो रहा है। अभी 3-4 दिन पहले मेरे बहनोई डॉक्टर अपूर्व जी ने पूज्य दादाजी बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित एक पुस्तक “यश की धरोहर” का जिक्र किया।पुस्तक मिल भी गई।इस पुस्तक में क्रांतिकारियों के संस्मरण हैं अर्थात तीन क्रांतिकारियों पूज्यनीय- भगवान दास माहौर, सदाशिवराव मलकापुरकर और शिव वर्मा जी ने एक-एक में  लेख शहीदे आज़म भगत सिंह, चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ राजगुरु,सुखदेव और नारायणदास खरे जैसे अमर शहीदों के संस्मरण लिखे हैं। 

इन संस्मरणों को पढ़ना किसी गीता और रामायण के पढ़ने से कम नहीं है। ये वे वीर शहीद थे जिन्होंने हमारे सुख और देश की आज़ादी के लिए अपना जीवन हँसते-हँसते कुर्बान कर दिया। इन संस्मरणों को पढ़ कर एहसास होता है कि उनका रोज़मर्रा का जीवन ऐसा था कि उसमें देशभक्ति के जज़्बे के अलावा और कुछ नहीं था।हँसते-हँसते मौत का सामना करने वाले इन नौजवान शहीदों का रोज़मर्रा का जीवन अत्यंत दिलचस्प और प्रेरणादायक था।इतनी कठिन परिस्थितियों में भी वे अत्यंत बेफिक्री,बहादुरी और खुशमिजाज होकर जीते थे।

इन क्रांतिकारियों के तीनों मित्र लेखक जो स्वयं भी देशभक्त क्रांतिकारी थे उन्होंने पुस्तक के प्रारंभ के दो शब्द में लिखा है कि “दुःखम् न्यासस्य रक्षणम् “ अर्थात् किसी की धरोहर की रक्षा करना बड़ा दुष्कर कार्य होता है और वह धरोहर किसी के यश की धरोहर हो तो उसकी रक्षा करना और भी अधिक कठिन और कष्टसाध्य होता है।शहीदों के ये संस्मरण उसी यश की धरोहर को उसके वास्तविक अधिकारियों को लौटाने का प्रयास है।

आजकल जब हमको लगता है और दिखता है कि चारों और भ्रष्टाचार,स्वार्थपरता,एक दूसरे से लाभों की छीनाझपटी, धर्म और जाति की लड़ाइयों और वैमनस्य का कलुष मानो हम सब के मन पर चढ़ता जाता है, ऐसी परिस्थितियों में अमर शहीदों के “शौके-शहादत” की “याद में से एक चुल्लू भरकर इस कलुष को धोने का प्रयत्न करना व्यर्थ न होगा।स्वार्थ की विषैली वायु से मूर्छित जनता के मन को पावन बलिदानों के स्मरण वारि के छींटे लगने से कुछ होश तो आयेगा ही।शहीदों की याद हमें मनुष्य मात्र को स्वार्थ के पुतले समझने की भूल न करने देगी।……. दंभ और स्वार्थ के रोग से पीड़ित और खिन्न मन को पुनः स्वस्थ करने के लिए शहीदों के स्मृति सरोवर में एक डुबकी लगाने से अधिक अच्छा उपचार और हो ही क्या सकता है?”

लेखकों की दो शब्दों के रूप में लिखी इस किस्म की भावुक भावनाओं के बाद अब मैं उन वीर अमर शहीदों के कुछ किस्से आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा।


अपने पहले लेख में लेखक क्रांतिकारी वीर भगवान दास माहौर ने  अमर शहीद राजगुरु के ऊपर लिखे लेख में लिखा है कि इन सभी शहीदों को शहादत से प्यार था।ये शहादत के पीछे दीवाने थे।शहादत के लिए अपने व्यवहार में सबसे ज़्यादा उतावलापन अमर शहीद राजगुरु में दिखता था और उनका यह उतावलापन उनके साथियों सरदार भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद आदि के लिए कई बार समस्या का कारण भी बना लेकिन राजगुरु तो ऐसे ही थे।राजगुरु के अन्य साथी शहादत के लिए अपनी यह बेताबी ऐसे नहीं जाहिर करते थे जैसे कि राजगुरु। शहादत के अपने इस प्रेम में राजगुरु सरदार भगत सिंह को अपना जबरदस्त प्रतिद्वंदी मानते थे।सरदार भगत सिंह के लिए तो राजगुरु की शहादत  की यह बेताबी  एक दिल्लगी थी किंतु राजगुरु चाहते थे कि भगत सिंह से पहले वो अपनी शहादत देश की भेंट कर दें।

अपने दल में भगत सिंह को अन्य साथियों और राजगुरु आदि से ज़्यादा आदर और सम्मान मिलता था। राजगुरु की आम शिकायत यही रहती थी कि “रणजीत” (पार्टी में भगत सिंह का यही नाम था;दरअसल हर क्रांतिकारी की असली पहचान छुपाने को उनको एक छद्म नाम दिया गया था जिसमें सरदार भगत सिंह का रणजीत और राजगुरु का “रघुनाथ” था)। राजगुरु का यह उतावलापन और भगत सिंह से प्रतिद्वंद्विता दल के सदस्यों के ख़तरे से भरे जीवन में हँसी-मजाक का एक साधन था और सब इस का खूब आनंद उठाते थे।

अपने साथियों में राजगुरु के सोने के किस्से बहुत मशहूर थे।वे चाहे कहीं और चाहे कब सो जाते थे,यहाँ तक कि खड़े-खड़े भी।सरदार भगत सिंह राजगुरु का एक किस्सा सुनाते वक्त झल्ला उठते थे। हुआ यह कि एक बार सरदार भगत सिंह और राजगुरु दोनों एक रेलवे  स्टेशन पर थे।उन लोगों को जिस ट्रेन से जाना था वह लगभग रात के दो बजे आती थी।भगत सिंह दो रातों के जागे हुए थे तो उनको और जागने में बहुत परेशानी हो रही थी। साथ ही उनको लग रहा था कि साथ में राजगुरु हैं जो पता नहीं कब सो जाएं? और फिर कौन सी परेशानी खड़ी हो जाये।अब जब भगत सिंह को लगा कि जागते रहना असंभव हो रहा है तो उन्होंने राजगुरु से कहा कि, “रघुनाथ,देख भाई!तू देख रहा है मुझसे अब और जगते रहना नहीं बनता।अगर तू अपनी पूरी जिम्मेदारी समझे तो मैं एक-आध घंटा सो लूँ ।गाड़ी दो बजे आती है….” राजगुरु भगत सिंह की बात काटते हुए तपाक से बोले,”हाँ,हाँ लेट जाओ।तुम क्या मुझको बिल्कुल यूँ ही समझते हो।मजाक की बात दूसरी है।तुम सो जाओ,मैं वक्त से जगा दूँगा।” भगत सिंह ने अपना ओवरकोट उनको दिया और कहा कि, “ संभल कर रहना,होशियार रहना,भरी हुई चीज (पिस्तौल) जेब में है।करीब डेढ़ बजे मुझे जगा देना।” यह कह कर भगत सिंह सो गए। जब भगत सिंह सिंह की नींद वेटिंग रूम में लोगों की बातचीत के शोर से खुली सी तो उन्होंने घड़ी का घंटा बजते सुना “टन्न “ उनको लगा कि एक बज गया लेकिन तभी दूसरा और फिर तीसरा “टन्न” सुनाई पड़ा और उठते-उठते चौथा यानी बज गए थे चार और राजगुरु बेंच पर लेटे मजे से खर्राटे ले रहे थे।

आज की पोस्ट में इतना ही।

अगली पोस्ट में पेश करूँगा वो किस्सा जिसमें बताया जायेगा कि जो गोली सौंडर्स के लगी वो चलनी किसके लिए थी और यह भी कि सौंडर्स के किस-किसकी कितनी गोली लगीं।

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