सूरज भगवान की कहानी

हमारे समाज में केवल साहित्य और लोककथाएँ ही नहीं, बल्कि एक और अमूल्य परंपरा रही है—धार्मिक और संस्कारों से जुड़ी घरेलू कहानियों की परंपरा। ये वे कहानियाँ हैं जो किसी ग्रंथ में नहीं, बल्कि घरों के आँगन, रसोई की चौखट और शाम की चौपालों में जन्म लेती थीं। दादी, नानी, माँ, ताई, चाची—इन सबकी ज़ुबान से निकली ये कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी संस्कृति की धारा की भांति बहती रहीं, हमारे संस्कारों को मजबूर करती हुई।

ये कहानियाँ गणेश जी की, सूरज भगवान की, चंद्रमा की, कार्तिक मास की, चौथ जैसे व्रतों की—आस्था, नीति और जीवन-बोध से जुड़ी सरल लेकिन गहरी कथाएँ होती थीं। चूँकि ये अधिकतर लिखित रूप में नहीं थीं, इसलिए हर घर में, हर पीढ़ी में इनका स्वरूप थोड़ा बदल जाता था। कहीं शब्द बदले, कहीं पात्र—लेकिन भावना वही रहती थी, शुद्ध और आत्मीय।

मैंने भी अपने बचपन में ऐसी अनगिनत कहानियाँ अपनी दादी, नानी और माँ से सुनी हैं। अफ़सोस कि समय के साथ उनमें से बहुत-सी स्मृतियों के कोनों में धुँधली पड़ गईं। आज, स्वास्थ्य कारणों से  आराम के ये दिन मुझे स्वयं से मिलने का अवसर दे रहे हैं, तो मन हुआ कि क्यों न उन बिखरी स्मृतियों को फिर से समेटा जाए।

इसलिए जो-जो कहानियाँ मुझे याद आएँगी, मैं उन्हें आप सबके साथ साझा करने का प्रयास करूँगा। ये कहानियाँ केवल कथाएँ नहीं हैं—ये हमारी संस्कृति की साँसें हैं, हमारे बचपन की खुशबू हैं, और उन रिश्तों की आवाज़ हैं जो आज भी हमारे भीतर जीवित हैं।

यदि इन कथाओं में आपको अपने बचपन की कोई झलक, किसी दादी या नानी की आवाज़ या माँ की गोद की ऊष्मा महसूस हो—तो समझिए, ये प्रयास सफल हुआ। आइए, इन कहानियों के साथ एक बार फिर उस समय में लौट चलें… और उनका आनंद लें।


 सूरज भगवान की कहानी 


एक सूरज भगवान थे।उनकी माँ और पत्नी घर पर रहते थे जबकि सूरज भगवान अपने काम पर लंबे समय के लिए जाते थे और लगभग पूरे समय दुनिया चलाने के अपने काम में ही व्यस्त रहते थे।

सूरज भगवान की जो आय होती थी उसमें से वह आधा धन अपने परिवार के लिए भेज देते थे और शेष आधे धन को पूरे संसार के काम चलाने के लिए लोगों को देते थे।

सूरज भगवान के घर पर उनकी माँ और पत्नी का हाल बुरा ही रहता था।हर समय पैसे की समस्या, घर में गंदगी, न समय से सोना  न समय से उठना, न समय से साफ़ सफ़ाई और ना ही खाना पीना समय से होता था। एक दिन सूरज भगवान की पत्नी ने अपनी सास से कहा कि, “अम्मा, तुम अपने लड़के के पास जाओ और उनको अपने घर के ख़राब हालात बताओ, शायद वह कुछ रास्ता निकालें।


बहू की बात मान कर सूरज भगवान की माँ उनसे मिलने को निकल पड़ी।जब माँ सूरज भगवान के पास पहुँची तो उनके दरबानों ने उसको बाहर ही रोक दिया।जब उसने बताया कि वो सूरज भगवान की माँ हैं तो सूरज भगवान को ख़बर की गई कि बाहर दरवाज़े पर एक औरत आई है जो अपने आप को सूरज भगवान की माँ बता रही है। सूरज भगवान ने पूछा कि वो कैसे आई हैं? इस पर दरबान ने कहा,” लबना लटकत, कुत्ता भूँसत, ऐसे आई है” अर्थात् उनके कपड़े जगह जगह फटे हुए हैं जिनके चिथड़े लटक रहे हैं और उनका हाल ऐसा है कि सड़क के कुत्ते उनके पीछे भौंकते चल रहे हैं। इस पर सूरज भगवान ने कहा कि उनको वहीं बाहर जो कुम्हार का अवा है वहीं ठहरा दो और हम उनसे बाद में मिलेंगे। दरबान ने ऐसा ही किया।


रात को सूरज भगवान का काम जब ख़त्म हुआ, उनकी ड्यूटी ख़त्म हुई तो वह अपनी माँ के पास मिलने पहुँचे । उन्होंने अपनी माँ से कहा कि, “अम्मा, तुम कैसे आयीं? ये क्या हाल हो रहा है तुम्हारा?”

माँ बोलीं,” क्या करें बेटा, घर में बहुत ख़राब हाल है तो तुम्हारी बहू ने कहा कि तुम्हारे पास जाकर पूछें कि हमारा हाल इतना ख़राब क्यों है और कैसे सुधरे?तुम सब दुनिया को इतना देते हो कि लोग मजे से जीवन बिताते हैं फिर हमारे साथ ऐसा क्यों?”


इस पर सूरज भगवान बोले,” अरे अम्मा, हम तो आधा घर भेजते हैं और आधे में सारे संसार का पालन करते हैं।अच्छा ये बताओ कि तुम लोग की दिनचर्या क्या है?”

इस पर उनकी माँ ने जवाब दिया कि,”बेटा, सुबह हम और तुम्हारी बहू आराम से देर से उठते हैं। उठते ही तुम्हारी बहू गुट्टे लेकर आस-पास खेलने निकल जाती है। सास की चोरी बहू खाना खाती है और बहू की चोरी सास यानी हम खाना खाते हैं।जब घर के सारे बर्तन गंदे हो जायें तो धो लेते हैं और जिन बर्तनों में खाना बनता है उनमें ही खा लेते हैं। तो क्या बतायें बेटा,खर्चा पूरा ही नहीं पड़ता और घर में दरिद्रता विराजती दिखती है।”


इस पर सूरज भगवान ने कहा,”ये तो बहुत ग़लत है अम्मा।घर पर सास बहू मिलकर रहो। सुबह उठ कर घर को झाड़ो,बुहारो । आँगन और चबूतरा धोओ। आँगन और चबूतरा गोबर से लीपो फिर अग्यारी दो।उसके बाद खाना बने। बहू परोसे और सास खाये फिर सास बहू का ध्यान रखे,बहू सास का ख्याल करे।पड़ोसियों के दुःख-दर्द में काम आओ। दान करो, ग़रीब कन्याओं का ब्याह करो,कुएँ खुदवाओ, बावड़ी खुदवाओ, बगीचे बनवाओ फिर देखो कैसे सुख से रहते हो तुम लोग।”

अम्मा ने कहा,” ठीक है बेटा “ और वह वापिस लौट ली। घर आकर उसने अपनी बहू को सब हाल बताया और फिर जैसा सूरज भगवान ने कहा था वो वैसे ही करने लगे।


कुछ दिन बाद एक दिन सूरज भगवान का मन हुआ कि अपने घर चल कर वहाँ का हाल देखें।तो सूरज भगवान अपना भेष बदल कर एक साधु के रूप में चल पड़े अपने घर की ओर । रास्ते में उन्होंने सुंदर बगीचा देखा तो मालूम पड़ा कि सूरज भगवान की माता जी ने बनवाया है, ऐसे ही रास्ते में अनेकों बावड़ी,कुएँ, वृक्ष आदि मिले जो सूरज भगवान की माँ ने बनवाये थे। जब वो अपने घर पहुँचे तो उनके साधु भेष में उनको किसी ने नहीं पहचाना। उन्होंने अपनी माँ से कहा कि माता जी प्यास लगी है पानी दे दो। सूरज भगवान की माँ ने अपनी बहू से कहा कि “जाओ इस साधु को घड़े से पानी दे दो” इस पर सूरज भगवान बोले कि,” नहीं मुझको तो उसी ग्लास में दो जिसमें तुम्हारा बेटा पीता है तो उनकी माँ ने मना कर दिया। इस पर बहू ने कहा, “अम्मा उसी ग्लास में दे देते हैं क्या फ़र्क़ पड़ता है। साधु है, नाराज हो गया तो ठीक नहीं है।” अम्मा मान गईं।इसके बाद रात के खाने की बात हुई तो साधु भेष धारी सूरज भगवान ने कहा कि हम तो उन्हीं सोने के बर्तनों में खाएँगे जिनमें आपका बेटा खाता है तो अम्मा ने फिर मना कर दिया।इस पर बहू ने फिर कहा कि,”अम्मा क्या हुआ, बर्तन हैं धुल जायेंगे।” इस  पर अम्मा फिर मान गईं। अब जब रात को सोने की बात हुई तो सूरज भगवान ने जिद की कि वो तो उन्हीं बिस्तरों में सोयेंगे जिन में अम्मा का लड़का सोता था और आख़िर में अम्मा उसके लिए भी मान गईं।रात को साधु की ख़बर आई कि उसके पेट में दर्द हो रहा है और सूरज भगवान की पत्नी जब उसको दवा देने गई तो सूरज भगवान ने अपनी पत्नी को अपना असली रूप दिखाया और अपनी असलियत बतायी।सुबह साधु यानी सूरज भगवान वापिस चले गए।


कुछ दिनों बाद सूरज भगवान की माँ उनसे फिर मिलने गईं। इस बार जब दरबान ने ख़बर की और सूरज भगवान ने पूछा कि वो कैसे आई हैं तो दरबान ने जवाब दिया कि, “ वो हाथी पर बैठी हैं, आगे नौबत निसान बज रहे हैं, पीछे अनुचर चंवर ढुला रहे हैं” इस पर सूरज भगवान ने कहा, “उनको पूरे आदर से लाओ और महल में ठहराओ।”

रात को सूरज भगवान आए और उन्होंने अम्मा से खूब बात की, हाल-चाल लिए और फिर अपनी पत्नी के विषय में पूछा। इस पर अम्मा बोलीं कि,”उसका चरित्र अच्छा नहीं था” यह कहते हुए उन्होंने साधु वाला किस्सा सुनाया और बोलीं कि “फिर उसके एक लड़का हो गया तो मैंने उसको घर से निकाल दिया।” इस पर सूरज भगवान ने कहा कि, “अम्मा वो तो मैं ही था और वो लड़का भी मेरा ही है।” सूरज भगवान के यह कहने पर अम्मा बोलीं कि,”मैं ऐसे नहीं मानूँगी।अगर वो लड़का गंगासागर (पानी रखने का एक किस्म का बर्तन) की नली/टोंटी से निकल जाएगा तो मैं उसको तुम्हारी संतान मानूँगी।”


अब वो लोग घर पर आए और सूरज भगवान की पत्नी और लड़का वहाँ आए। लड़के को जब गंगासागर की टोंटी से निकाला तो वो बिल्कुल सही सलामत निकल आया बस उसकी आँख पर जरा सी चोट लग गई।अब सास ने बहू  से अपनी गलती मानी और फिर वह सब लोग हँसी-ख़ुशी सुख से साथ-साथ रहने लगे।

भगवान जैसे उनका परिवार सुख से रहा वैसे ही सबके परिवार सुख से,आनंद-मंगल से रहें।

जय हो सूरज भगवान की ।


जल्दी  मिलते  हैं  एक नयी  कहानी के  साथ 



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