​इतिहास और संस्कृति के किस्से-49 आज चर्चा है विदेशियों और मुगलों की समुद्री झड़प, पुर्तगालियों द्वारा शाहजादे सलीम की नाव पर हमला तथा यूरोपीय यात्रियों की जो मध्यकाल में भारत आये

इतिहास और संस्कृति के किस्से-49


आज चर्चा है विदेशियों और मुगलों की समुद्री झड़प, पुर्तगालियों द्वारा शाहजादे सलीम की नाव पर हमला तथा  यूरोपीय यात्रियों की जो मध्यकाल में भारत आये 


मध्यकाल में भारत में यूरोपीय यात्रियों का आना शुरू हो गया था। प्रो0 हेरम्ब चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत के विदेशी यात्री में तीन विशिष्ट यात्रियों को उनके वृत्तांतों के आधार पर प्रारंभिक पथ प्रदर्शक ‘यूरोपीय यात्री’ माना है। ये यात्री थे:-


1.वेनेशियन यात्री निकोलो द कॉन्ती

2.रूसी यात्री ऐथनाशियस निकितिन और

3.जिनोआ का हियरोनिमो दी सैंटो स्टेफेनो


उन्होंने अपनी पुस्तक में पुर्तगाली यात्री पेड्रो कोविल्हाम का जिक्र किया है कि वह स्टेफेनो से भी पहले आया था। प्रो0 हेरम्ब चतुर्वेदी Heramb Chaturvedi जी ने लिखा है कि भारत (मुग़ल भारत) का प्रथम अंग्रेज यात्री लंदन का ‘मास्टर राल्फ फिच’ था।

यूरोप के जो यात्री भारत आये उन्होंने अपने बहुत ज्ञानवर्धक और रोचक संस्मरण लिखे हैं जिनसे बहुत जानकारी मिलती है।

 आज के इस लेख में हम जिक्र कर रहे हैं मध्यकाल या उसके मुग़ल दौर में कैसे इन यूरोपीय लोगों ने समुद्र में अपनी गतिविधियां फैला रखी थीं और मौका लगते ही वह लोग भारतीय नावों,जहाजों यहाँ तक कि मुग़ल जहाजों को भी लूटने का प्रयास करते थे।


अकबर–सलीम के समय यूरोपीयों से हुई झड़पें — 


मुग़ल दौर के अंतर्गत एक छोटा-सा लेकिन दिलचस्प समुद्री प्रसंग मिलता है, जो उस समय के बदलते हालात को बहुत साफ़ दिखाता है। 16वीं सदी के आख़िरी वर्षों में सूरत और उसके आसपास के तटीय इलाक़ों पर यूरोपीय प्राइवेटियर—खासतौर पर पुर्तगाली लोग अक्सर वहाँ से गुजरने वाली नावों को रोकने की कोशिश करते थे।

इन्हीं दिनों एक मुग़ल शाही नाव तट के पास से गुजर रही थी।नाव पर शाही लोग थे और यात्रा सामान्य थी।

 कुछ दूरी पर यूरोपीय प्राइवेटियरों ने उस नाव को मूल्यवान समझकर पीछा करना शुरू कर दिया। यह उस समय उन लोगों  की आम समुद्री रणनीति थी—किसी भी ‘मोगोर’ नाव को रोककर माल या व्यक्ति को क़ब्ज़े में लेना।शाही नाव ने अपनी परिस्थिति ऐसी न समझी कि वह युद्ध में उलझती तो उन्होंने युद्ध या मुकाबले के बजाय एक आसान रास्ता चुना—

 कम गहराई वाले पानी की ओर मुड़ना,

 जहाँ भारी यूरोपीय जहाज़ प्रवेश नहीं कर सकते थे।

 कुछ ही देर में पीछा रुक गया और नाव सुरक्षित बाहर निकल गई।

इस घटना के संकेत तीन जगह मिलते हैं ऐसा उल्लेख है—

पुर्तगाली इतिहासकार Diogo do Couto के विवरण में


फ़ारसी ग्रंथ Khulasat-ut-Tawarikh में


और Tarikh-i-Salim Shahi के एक उल्लेख में


इन तीनों को मिलाकर यह साफ़ होता है कि एक शाही मुगल नाव यूरोपीय समुद्री हमलावरों के पीछा करने से रणनीति से बचकर निकल गई—

 न कोई बड़ा संघर्ष, न कोई नाटकीय मोड़, बस समुद्री स्थिति को समझने का एक व्यावहारिक फैसला।

कुछ लोगों ने  इस प्रसंग को आगे बढ़ाकर इसे ‘सलीम’ जो बाद में जहाँगीर के नाम से बादशाह बना जो

 लेकिन मूल स्रोतों में नाव पर मौजूद व्यक्ति का स्पष्ट नाम नहीं मिलता—

 सिर्फ़ इतना कि वह “शाही महत्व” की नाव थी।

इसी विषय का समकालीन पुर्तग़ाली रिकार्डों में यह उल्लेख मिलता है कि जब सलीम राजकुमार था, तब एक बार गुजरात के तटीय इलाक़े से गुजरते समय पुर्तग़ाली गश्ती जहाज़ों ने उसकी नाव/काफ़िले को रोकने की कोशिश की।

उन दिनों पुर्तग़ाली ‘कार्ताज़’ (पास) के बिना किसी जहाज़ को जाने नहीं देते थे—चाहे वह आम व्यापारी हो या किसी बड़े अमीर का काफ़िला।

इस दुस्साहस के चलते:

मुग़ल सुरक्षा को तुरंत हस्तक्षेप करना पड़ा

काफ़िले को सुरक्षित निकालने के लिए तत्काल नौकाएँ भेजी गईं

और घटना की सूचना सीधे राजधानी तक गई

इस घटना का असर दरबार में गहरा पड़ा।

समकालीन विवरण बताते हैं कि सलीम की माता (महारानी) इस ख़बर से बहुत व्यथित हो गईं:

उन्हें इस बात ने सबसे अधिक परेशान किया कि किसी विदेशी शक्ति ने राजकुमार के सुरक्षित मार्ग में हस्तक्षेप करने की हिम्मत की

उन्होंने कहा कि “शहज़ादे की राह को रोकना, दरबार की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना है”

और उन्होंने आग्रह किया कि अकबर इस प्रकार की घटनाओं को भविष्य में दोहराने न दे

दरबार में यह बात स्पष्ट रूप से महसूस की गई कि यह घटना सिर्फ़ सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि मुग़ल गरिमा पर सीधी चोट थी।

अकबर ने इसके बाद गुजरात और तटीय प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए कि पुर्तग़ालियों की ऐसी हरकतों पर सख़्त नज़र रखी जाए।

अकबर का पुर्तग़ालियों से बढ़ता तनाव

अकबर के समय पुर्तग़ाली तट पर अपनी मनमानी कर रहे थे—हज यात्रियों से कर वसूली, जहाज़ रोकना, और कई बार लूटपाट तक।

तारीख-ए-फरिश्ता और पुर्तग़ाली नौसैनिक रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि अकबर ने बार-बार स्पष्ट किया:

मुग़ल जहाज़ों की राह में बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी,

यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार अस्वीकार्य है,

और तटीय चौकियों को पुर्तग़ाली अतिक्रमण का तुरंत प्रतिकार करना चाहिए।


1570–1580 के बीच दमन, दीव और सूरत के पास कई छोटे-मोटे सैन्य टकराव हुए।

 जहाँगीर (सलीम) का सबसे बड़ा संघर्ष — 1613 का ‘रहमी’ जहाज़ प्रकरण


राजकुमार रहते हुए जो यूरोपीय दुस्साहस सलीम ने देखा था, उसका कठोर प्रतिफल उन्होंने शासन संभालने के बाद दिया।

1613 में पुर्तग़ालियों ने मक्का जा रहे यात्रियों के जहाज़ “रहमी” को रोककर:

यात्रियों को उतारा,

माल लूटा,

और महिलाओं को परेशान किया।

तुजुक-ए-जहाँगीरी, सलीम-शाही और अंग्रेज़ फैक्टरी के रिकॉर्ड इस घटना का उल्लेख करते हैं।

जहाँगीर का उत्तर बहुत स्पष्ट था—

पुर्तग़ाली पादरी कुछ समय के लिए नजरबंद,

चर्चों को अस्थायी रूप से बंद करवाया,

दमन–सूरत पर मुग़ल क़िलेबंदी बढ़ाई,

और पुर्तग़ालियों को संकेत दिया कि “अब मुग़ल समुद्र को छूकर नहीं निकलेंगे, उसकी इज़्ज़त करेंगे।”

इस घटना ने यूरोपीयों को दिखा दिया कि सलीम अब वही राजकुमार नहीं रहा जिसे कभी नाव में रोकने की कोशिश की गई थी।

जहाँगीर के समय अंग्रेज आने लगे थे।

कैप्टन हॉकिन्स के दरबार में कुछ तनाव भी हुए थे, पर उनका स्वरूप सीमित रहा।

1612 में स्वाली की लड़ाई में अंग्रेज़ों की जीत ने पुर्तग़ाली प्रभुत्व को चुनौती दी।

जहाँगीर ने इसे पुर्तग़ाली अत्याचारों के ख़िलाफ़ एक उपयोगी संतुलन माना।

इसके बाद अंग्रेज़ों को सूरत में फैक्टरी की अनुमति मिली।

अकबर और सलीम के दौर में यूरोपीयों—विशेषकर पुर्तग़ालियों—के साथ झड़पें सिर्फ़ समुद्री व्यापार का मसला नहीं थीं।

कभी वे हज यात्रियों के जहाज़ रोकते थे, कभी मुग़ल काफ़िलों को परेशान करते थे, और जैसा हमने देखा कि एक बार तो राजकुमार सलीम की नाव रोकने की कोशिश तक कर बैठे।

लेकिन क्या किसी ने कभी सोचा था कि ये साधारण से दिखने वाले विदेशी अंग्रेज किसी दिन इस देश के लोगों के भाग्यविधाता बन जाएंगे और सारा देश उनका गुलाम हो जाएगा….

आज की पोस्ट में बस इतना ही 

अगली पोस्ट में फिर मिलेंगे इतिहास के किसी और किस्से के साथ

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