​अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-2 साँडर्स गोली कांड

अमर शहीदों और क्रांतिकारियों के किस्से-2


साँडर्स गोली कांड 


सन् 2007 में मुझको कांग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह जी और अध्यक्ष उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी जी के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव का  पद और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और उनके आश्रितों से संबंधित विभाग की जिम्मेदारी दी गई थी।राजनीति की बात तो फिर कभी करूँगा यदि कभी राजनीति से संबंधित संस्मरण लिखे तो।इसके अतिरिक्त मैंने चूंकि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से आधुनिक इतिहास में ऐम ऐ भी किया था तो स्वंत्रता संग्राम से संबंधित घटनाओं में मेरी रुचि और भी ज्यादा थी।अब यश की धरोहर पुस्तक को पढ़ने के बाद लग रहा है कि कितने अद्भुत शौर्य वाले थे वो क्रांतिकारी जिन्होंने देश के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।इन संस्मरणों की विशेष बात ये है कि इनको उन लोगों ने ख़ुद लिखा है जो देशभक्ति की इन वीरतापूर्ण घटनाओं में स्वयं शामिल थे।

आज क़िस्सा लाला लाजपतराय के ऊपर मरणांतक लाठीचार्ज में शामिल अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर साँडर्स की गोली मारकर हत्या करने की घटना का।यह क़िस्सा क्रांतिकारी भगवानदास माहौर ने लिखा है।


पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज के कारण लाला लाजपतराय की मृत्यु हो गई थी। भगत सिंह का विचार था कि लाला लाजपतराय की मृत्यु और उससे राष्ट्र का जो अपमान हुआ है उसका बदला लेना चाहिए और तय हुआ कि इसके जिम्मेदार अंग्रेज़ अफ़सर पुलिस सुपरिंटेंडेंट स्कॉट को गोली से उड़ा दिया जाये।राजगुरु की ज़िद्द थी की गोली वो मारेंगे और सरदार भगत सिंह का का कहना था कि पकड़े जाने पर केस के दौरान एक जबरदस्त बयान भी देना होगा जो वह दे पायेंगे।आख़िर में तय हुआ कि राजगुरु, सरदार भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद उसको मारने को जाएँगे और जयगोपाल को रेकी करने और पहचान का काम दिया गया।

चार दिन बीत गए और स्कॉट वहाँ से निकला ही नहीं तो अपनी बेसब्री में राजगुरु ने चन्द्रशेखर आज़ाद से कहा कि मैं अंदर जाकर ही उसको ठीक कर आता हूँ।इस पर आज़ाद ने उनसे आँख तरेर कर कहा कि,”लुक लुक न किया कर, लुक लुक करना है तो घर जा।” आज़ाद अनुशासन के मामले में बहुत कड़े थे। उन्होंने पूरी प्लानिंग की हुई थी।मारने वाली टुकड़ी अलग,पहचानने वाले अलग और पीछे से एक और सशस्त्र टुकड़ी थी बैकअप के लिए जिसमें सुखदेव,विजय कुमार सिंह और किताब यश की धरोहर में राजगुरु के ऊपर लिखे लेख के लेखक भगवानदास माहौर शामिल थे।

माहौर ने लिखा है कि एक अंग्रेज अफसर कार्यालय से निकला जिसके साथ मोटरसाइकिल लिए उसका मुंशी भी था।जयगोपाल ने इशारा किया कि शायद वही यानी स्कॉट आ रहा है।भगत सिंह को पहचान में कुछ संदेह हुआ तो उन्होंने इशारा किया कि ये वो नहीं लग रहा है।राजगुरु को लगा कि भगत सिंह कह रहे हैं कि अभी मत मारो,आगे आने दो यानी कि भगत सिंह उसको मारेंगे।अब राजगुरु भला कैसे पीछे रहते तो जब तक अफ़सर मोटरसाइकिल पर पैर रखता तब तक तो राजगुरु की रिवाल्वर से चली गोली उसकी कनपटी के पार हो चुकी थी।इसके बाद भगत सिंह ने अपनी ऑटोमैटिक कोल्ट पिस्तौल से आठ गोली और उसके सीने में उतार दीं।फ़र्न्स नामक  एक अफ़सर इनको पकड़ने को लपका तो राजगुरु ने अपनी रिवॉल्वर का ट्रिगर उसकी ओर दबाया किंतु वह चली नहीं।हुआ दरअसल यह कि राजगुरु को आज़ाद ने बताया था तो वह निशाना सही लगे इसके लिए दोनों हाथों से रिवॉल्वर चलाते थे।एक रोचक बात यह और थी कि रिवॉल्वर की नली के अगले छोर पर एक मजबूत रस्सी को बाँध उसका दूसरा सिरा रिवॉल्वर के बट के कुंडे से बाँधा जाता था।बायें हाथ से इस रस्सी को खींच कर पकड़ा जाता था इससे हाथ हिलने की संभावना कम ही होती थी और निशाना ठीक लगता था।राजगुरु की रिवॉल्वर में उस समय डोरी इस प्रकार से नहीं बंधी थी तो दूसरी गोली चलाते वक्त उन्होंने बायें हाथ में रिवॉल्वर की घुमाने वाली गिर्री को पकड़ रखा था तो भला गोली कैसे चलती।यह अफ़सर स्कॉट की जगह सोंडर्स निकला हाँलांकि वह भी लाठीचार्ज के लिए ज़िम्मेदार था और लाला लाजपतराय पर उसने ख़ुद भी लाठी चलायी थी।सोंडर्स का मुंशी चनन सिंह राजगुरु को पकड़ने को लपका तो आज़ाद ने पहले एक गोली उसके पैर में मारी पर वह अपना पैर झटक कर आगे बढ़ा तो फिर आज़ाद का माउज़र फिर गरजा और गोली चनन सिंह के सीने के पार थी।राजगुरु कितने सीधे और दम्भहीन थे कि जब भगवानदास माहौर ने उनसे उनके अच्छे निशाने की तारीफ़ की तो वो बोले,”रहने भी दे यार! मैंने तो निशाना उसके सीने का लिया था और गोली लगी जाकर सिर में।” बाद में मालूम पड़ा कि दरअसल उस रिवॉल्वर में जो कारतूस भरे थे उनका बोर नाल के बोर से फ़र्क़ था और वह कुछ ढीले पड़ते थे जिसकी वजह से गोली सीने की जगह सिर में लगी।

आज की पोस्ट में इतना ही।

अगली पोस्ट में फिर एक नए किस्से के साथ मिलेंगे।

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