ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय
ज़िंदगी मेरी?-6
चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय
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बचपन में हमें इतिहास की किताबें बाद में मिलीं, इतिहास पहले जीने को मिला..
आज के हॉस्टल की यादों के लेख में मुझको दो घटनाएँ याद आ रही हैं।
बात शायद नवंबर महीने की है और सं था 1971, इलाहाबाद सिविल लाइंस में कॉफी हाउस के सामने एक भार्गव इंजीनियरिंग करके बहुत विशाल बिल्डिंग हुआ करती थी जिसके बाहर एक काफी बड़ा खाली मैदान था और उसके पास एक बड़ा सा घर था 16-A MG Road जो मेरे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र जी के बड़े भाई जज साहब स्वर्गीय सुरेश चंद्र जी का हुआ करता था और फिर उसमें उनके मँझले पुत्र जिनको हम लोग पी दादा कहा करते थे वह और उनका परिवार रहते थे। पी दादा के बड़े लड़के थे ध्रुव भाईसाहब जो कि इलाहाबाद के बहुत बड़े और नामचीन वकीलों में हुआ करते थे और हमारे पापा और वो लगभग हमउम्र से थे हाँलांकि रिश्ते में पापा और वे चाचा भतीजे थे।ध्रुव भाईसाहब 1983 में अमेरिका से दिल का ऑपरेशन करा के आए थे और एक महीने बाद ही काफी यंग ऐज में उनकी मृत्यु हो गयी थी।खैर, तो बात हो रही थी भार्गव इंजीनियरिंग के बाहर के बड़े मैदान की. उस मैदान में एक विशाल प्रदर्शनी या नुमाइश लगी थी जिसको देखने हम सब स्कूल के बच्चे गए थे। उस नुमाइश में भांति-भांति के स्टाल थे जिनमें एक स्टाल था प्लास्टिक के चाबी के गुच्छों का जिन पर वो लोग नाम लिख देते थे किसी प्रेस जैसी चीज में गुच्छे को दबा कर कुछ गरम करते, उसमें से धुआँ निकलता और फिर उस गुच्छे पर बहुत खूबसूरत अक्षरों में जो नाम बताया होता वह लिखा हुआ मिल जाता था।हम लोग उन गुच्छों से बहुत आकर्षित हुए और मैंने अपने घर वालों के नामों के गुच्छे बनवा लिए।वैसे भी घर से दूर रहने पर घर वालों के प्रति स्नेहभाव ज्यादा होने लगता है। कुछ समय बाद ये बात समझ में आई कि गुच्छे तो बनवा लिए लेकिन इनको रखेंगे कहाँ? और यदि बहन जी को मालूम पड़ गया तो??? यह सोच कर तो हालत खराब हो गई कि क्या कहूँगा कि पैसे कहाँ से आए आदि? तो रास्ता यह समझ में आया कि वह गुच्छे एक थैली में लेकर भाग कर जल्दी से ध्रुव भाईसाहब के यहाँ रखवा आया लेकिन उनको ऐक्सप्लेन करने लायक कुछ तर्क था नहीं तो बस रखवा आया और दौड़ता हुआ वापिस हॉस्टल के अन्य साथियों के साथ मिल गया। अब यह सब इतनी जल्दी हुआ कि ध्रुव भाईसाहब के घर पर किसी कि समझ में कुछ आया नहीं और अगले दिन वो लोग बड़ी मौसी के या हॉस्टल में कहाँ यह तो ठीक से याद नहीं लेकिन वो गुच्छे दे आए और गुच्छे तो मिल गए लेकिन साथ ही बहुत डाँट भी पड़ी।
बचपन की वे छोटी-छोटी चिंताएँ कब राष्ट्रीय चिंता में बदल गईं, इसका एहसास हमें दिसंबर 1971 में हुआ...
तभी तो आज सोचता हूँ तो लगता है कि बचपन में हमें इतिहास की किताबें बाद में मिलीं, इतिहास पहले जीने को मिला..
तो दूसरा किस्सा कुछ यूँ है कि बात दिसंबर 1971 की है। भारत और पाकिस्तान के बीच काफी टेंशन का माहौल चल रहा था और तभी 3 दिसंबर को शाम को ऑपरेशन चंगेज़ खान के नाम से पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमला कर दिया और जिन स्थानों पर ये हमला हुआ था आगरा भी उनमें से एक था। पाकिस्तानी सैबर जैटों ने आगरा पर बमबारी भी की थी किन्तु भारतीय सेनाओं ने युद्ध के परिणाम के रूप में पाकिस्तान को बदले में बांग्लादेश का तोहफा दिया था। आगरा हमले की खबर से हॉस्टल में मुझको बहुत घबराहट हुयी क्योंकि हम लोगों का घर फिरोजाबाद आगरा के बहुत पास था। उस समय का माहौल जब आज भी याद आता है तो मन बहुत अजीब सा हो जाता है। हॉस्टल के सभी रोशनदानों और खिड़कियों में काले कागज लगा दिए गए थे और रात को चाहे कब ब्लैक आउट हो जाता था। मुझको अपने घरवालों की बहुत चिंता होती रहती थी। फिर एक दिन मम्मी का पत्र आया जिसमें लिखा था कि आगरा के पास झरना नाला एक स्थान है उसके मोड़ पर ऐन्टी ऐयर क्राफ्ट गन्स लगी हुयी थीं जिनसे हमले कि आशंका होने पर गोले दागे जाते थे और सायरन बजता था।ऐन्टी ऐयर क्राफ्ट गन्स के दागने कि आवाजें फिरोजाबाद तक सुनाई पड़ती थीं और दहशत का माहौल हो जाता था।मम्मी ने ये भी लिखा था कि आगरा के लाजपत कुंज में हमारी रेखा मौसी का घर था और उनके पड़ोस या सामने के एक घर पर, पाकिस्तान द्वारा की गयी बमबारी के बमों में से एक किसी बम का खोल या शैल गिरा था जिससे उस घर के छज्जे को नुकसान पहुँचा था। इन सब खबरों से घर से दूर होने के कारण और ज्यादा दहशत होना स्वाभाविक ही था परंतु एक 10 वर्षीय बालक चिंता और भगवान से घरवालों की रक्षा करने की प्रार्थना के अतिरिक्त कर भी क्या सकता था......
कुछ दिनों में ही इस युद्ध में भारत की जीत और बांग्लादेश के उदय के साथ ही साथ पाकिस्तान के लगभग 1 लाख (93000) सैनिकों के आत्मसमर्पण की खबर आई जिससे सभी जगह हर्ष की लहर फैल गयी थी और हम सब बच्चे भी हॉस्टल में इतने खुश हुए थे कि मानो यह युद्ध हमने ही लड़के जीता हो। जनरल नियाजी से आत्मसमर्पण करवा कर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और इस युद्ध की जीत के बाद जनरल मानेकशॉ (बाद में फील्ड मार्शल बने) हर भारतीय के हीरो बन चुके थे। इंदिरा गांधी जी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। इन लोगों के अतिरिक्त एक-एक बच्चे को ऐयर चीफ मार्शल पी सी लाल और नेवी के चीफ ऐडमिरल ऐस ऐम नंदा के नाम याद हो चुके थे। फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सैखों के अदम्य साहस, वीरता और शहादत के किस्से बच्चे-बच्चे की जबान पर थे। परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल, लांस नायक आल्बर्ट एक्का और फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों अपनी शहादत की कहानियों से हमारे दिलों में न सिर्फ वीरता भर रहे अपितु सदैव के लिए हमारे हीरो और श्रद्धा के पात्र बन कर देश के लोगों को अपना ऋणी बना चुके थे। इसी युद्ध में मेजर होशियार सिंह दहिया वो पहले अफसर बने जिनको अपनी वीरता के लिए सर्वोच्च पुरस्कार परमवीर चक्र उनके जीवित रहते मिला। ये सब देश के नए हीरो थे। INS Khukri के कमांडर कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला के किस्से भी सबकी जबान पर थे जिन्होंने खुद को बचाने के स्थान पर अपने डूबते जहाज आई ऐन ऐस खुखरी के साथ खुद भी समुद्र में जल-समाधि लेना चुना और एक शहीद की भाँति मौत का वरण किया। सही बात तो यह है कि इस दौरान सिर्फ युद्ध की चर्चाएँ होती थीं और हमारी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में एक ऐसे भारत का उदय हो चुका था जो डरा नहीं, दबा नहीं और जिसने विश्व का इतिहास ही नहीं भूगोल भी बदल दिया।
जब मैं जाड़ों की छुट्टियों में घर गया तो आगरा जाते और लौटते में झरना नाले के मोड़ पर मैंने खुद ऐन्टी ऐयर क्राफ्ट गन देखी थीं जिन पर कभी-कभी कपड़ा डाल कर उनको ढाँक भी दिया जाता था। लाजपत कुंज में रेखा मौसी के घर जाने पर उत्सुकतावश उनके घर से उस घर का छज्जा भी पूछा था जिस पर बम का शैल गिरा था।
जब हम छुट्टियों के बाद इलाहाबाद लौटे तो कई बार अपने ताऊबाबा यानी जज साहब सुरेश चंद्र जी के मिलने उनके मेहदौरी स्थित निवास जाते थे तो वहाँ जाते में रास्ते में सेना का एरिया पड़ता था और वहाँ भी पाकिस्तानी सेना के वे सैनिक रखे गए थे जिन्होंने आत्मसमर्पण किया था। मैंने खुद उनको तारों की बाड़ के अन्दर के इलाके में घूमते देखा और कई बार उनके हाथ में ऐल्यूमुनियम की एक थाली नुमा तश्तरी भी दिखती थी जिसमें शायद वे खाना खाते रहे होंगे। मुझको ऐसा याद पड़ता है कि वे लोग अक्सर खाकी नेकर या पेंट और सफेद बनियाइन में घूमते दिखते थे। सच बात यह भी है कि उस इलाके से निकलने पर उनको देखने की उत्सुकता होती थी और उनको देखकर अपने बालमन में भी एक विजय भाव जागता था, पता नहीं क्यों....
या शायद यह स्वाभाविक भाव ही था।
आज जब उस पूरे दौर को याद करता हूँ तो लगता है कि उस युद्ध ने हम जैसे लाखों बच्चों को भी कहीं न कहीं बदल दिया था। हम इतिहास की किसी पुस्तक में नहीं, बल्कि इतिहास के बीच खड़े होकर बड़े हो रहे थे। ब्लैक आउट की रातें, सायरन की आवाज़ें, मम्मी के पत्र, झरना नाले की एंटी एयरक्राफ्ट गन, तारों की बाड़ के पीछे घूमते पाकिस्तानी सैनिक और फिर भारत की विजय—ये सब केवल घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि उस पीढ़ी की सामूहिक स्मृतियाँ थीं। शायद इसी कारण आज भी जब 1971 के युद्ध का नाम आता है तो मन स्वतः गर्व से भर उठता है।
लेख समाप्त करते हुए आपसे अनुरोध करने का मन हो रहा है कि आप भी मेरे साथ कहें —
जय हिन्द की सेना!
जय हिन्द!
जय हिन्द!
जय जय जय हिन्द!
भारत माता की जय!
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