ज़िंदगी मेरी?-8 पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा
ज़िंदगी मेरी?-8
पूरब पश्चिम तथा हॉस्टल की तेल की शीशी वाला किस्सा
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भारत भारती में हम लोगों को समय कब कट जाता है पता ही नहीं चलता था क्योंकि पूरे दिन की दिनचर्या नियमित और काफी कसी हुयी थी। हेस्टिन्गस रोड पर चौराहे पर ही ठीक भारत भारती के गेट के सामने एक नया मकान बन रहा था जो हम लोगों के देखते-देखते बना लेकिन उसने हमारा ध्यान आकर्षित किया जब वो पूरा बन गया और उसकी वजह थी उसका नाम। तब समझ में आया कि लोग मकानों के भी नाम रखते हैं और बाद में ध्यान भी गया कि इलाहाबाद में बैंक रोड पर मौसाजी के मकान का नाम था “पुरषोत्तम निवास” और उनके सामने प्रोफेसर जे. एस. माथुर साहब रहते थे, उनके मकान का नाम था “मातृ अञ्चल”। तो भारत भारती के सामने जो भव्य मकान बना उसका नाम उस पर सामने शायद पहली मंजिल के बॉर्डर पर बहुत बड़ा, जो दूर से पढ़ने में आता था, लिखा था, “पूरब पश्चिम”।
सन 1970 में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी “पूरब पश्चिम” जो बहुत हिट फिल्म थी और मनोज कुमार अपनी ज्यादातर फिल्में देश प्रेम, राष्ट्रीय मुद्दों आदि से संबंधित विषयों पर बनाते थे और उनकी पूरब पश्चिम फिल्म भी पूर्व यानी हमारे देश भारत और पश्चिम यानी कि इंग्लैंड के सांस्कृतिक मसलों और द्वंद्व के विषय पर बनायी गयी थी और हम लोगों को तो बहुत पसंद आयी थी भले ही हमारी उम्र उस समय लगभग 10 वर्ष की ही रही होगी। उस फिल्म के गाने भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ, ओम जय जगदीश हरे, कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे आदि बहुत लोकप्रिय हुए थे।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ में आता है कि वास्तव में एक कलाकार, फिल्मकार, लेखक की यही तो विशेषता है कि उसकी बात न सिर्फ लोगों तक पहुँचे बल्कि लोग अपने को उन बातों से, मुद्दों से जुड़ा हुआ भी अनुभव करें। चूंकि मनोज कुमार की वे फिल्में ऐसी ही होती थीं तो दर्शकों के बीच लोकप्रिय भी होती थीं और शायद उस लोकप्रियता का ही एक नमूना यह भी था कि इलाहाबाद जैसे सांस्कृतिक शहर के एक व्यक्ति ने उससे शायद प्रेरित होकर अपने उस शानदार घर का नाम रखा “पूरब-पश्चिम”।
भारत भारती की बीच वाली डोरमेट्री बहुत बड़ी थी और मैंने जिक्र किया भी है कि उसका फर्श लकड़ी का बना हुआ था और बहुत ही मैजेस्टिक लगता था। लोग बताते थे कि अंग्रेजों के समय में वह उस शानदार भव्य बंगले का डांस फ्लोर हुआ करता था। यहाँ मैं इस बात का भी जिक्र करना चाहूँगा कि बाद में जब मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगा तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और इतिहास (मध्यकालीन तथा आधुनिक) विभाग के अध्यक्ष रहे प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी यानी कि हमारे हेरंब भाईसाहब के साथ उस बंगले में गया था। तब उस बंगले में उसके मालिक लोग भवानी पेपर मिल वाले टंडन साहब रहने लगे थे और तब मैंने उनको बताया था कि किसी जमाने में उस बंगले में मैं भी रहा था भारत भारती स्कूल के छात्रावासी के रूप में।
जैसा मैंने बताया था कि हॉस्टल में एक डॉरमेट्री के पास एक कमरा था जिसमें एक टेबल, शीशा, कंघा, तेल की शीशी आदि रखे रहते थे। मैं सदैव अपना तेल और कंघा रखता था, कभी भी कॉमन कंघा-तेल का उपयोग नहीं करता था और ऐसा बहुत से लोग करते थे लेकिन काफी बच्चे उनका उपयोग भी करते थे। उस जमाने में एक क्रीम जैसी आती थी “बसंत मालती” जिसकी खुशबू जिन लोगों ने उसको यूज किया उन्हें आज भी याद होगी। मेरे पापा उसका प्रयोग करते थे और इसलिए हॉस्टल में भी मेरे पास “बसंत मालती” भी रहती थी।
तो बात हो रही थी कंघे, तेल की। जैसा मैंने पहले भी लिखा है बच्चे बहुत शरारती तो होते ही हैं, without filters होने के कारण उनकी शरारतें कई बार अजीब या गंदी सी भी हो जाती हैं और बहुत बार निर्मम भी। तो कुछ बच्चों में आपस में शरारत की कानाफूसी चलती सुनायी पड़ी और फिर जब कोई बच्चा उस दिन उस टेबल के पास जाकर अपने सर में तेल लगाता तो कुछ अजीब सा मुँह बनाता और कहता आज तेल में कुछ अजीब सी बदबू है और हम लोग यह भी देख रहे थे कि कुछ बच्चे (2 या 3) यह सुनकर हँस भी रहे थे। बहरहाल, एक-दो दिन बाद मालूम पड़ा कि कुछ शरारती बच्चे उन जाड़े की रातों में बाथरूम तक जाने की जहमत नहीं उठाते थे बल्कि उस किस्म की आधी शीशियों को पूरा कर देते थे। विश्व के कुछ अबूझे रहस्यों की भाँति यह रहस्य भी इतिहास की परतों में दफन रहा कि आखिर वह बच्चे कौन थे......
ऐसी या इससे मिलती-जुलती घटनाएँ इलाहाबाद के यूनिवर्सिटी वाले हॉस्टल में भी हुईं जिनकी चर्चा जब उसके विषय में लिखूँगा तब करूँगा।
सन 1972 का साल चल रहा था और हम लोग स्कूल के सालाना उत्सव की तैयारियाँ कर रहे थे जिसके बाद जाड़ों की छुट्टियाँ होनी थीं। स्कूल के फ़ंक्शन में एक ड्रामा था जिसका विषय महाभारत की किसी कथा से जुड़ा था और मेरे लिए उसका महत्व यह था कि मुझको भी उस ड्रामे में भाग लेने का मौका मिला था और मुझको प्रसिद्ध पौराणिक पात्र ‘कर्ण’ का रोल मिला जिससे मैं बहुत उत्साहित था। उत्साह इस बात का और ज्यादा था कि पहली बार होगा कि मेरे मम्मी पापा, भाई-बहन मुझको स्टेज पर देखेंगे। उत्सव का दिन आया और मेरा उत्साह भी सातवें आसमान पर था। मुझको अपने घर वालों का इंतजार था। हमारे वाले कार्यक्रम का समय आ गया, मैं स्टेज पर अपना किरदार निभा रहा था पर मन और निगाहें अपने घरवालों के इंतजार की ओर लगे थे किन्तु गाड़ी आती नहीं दिखायी दी। कार्यक्रम खत्म हो गया और घर से कोई नहीं आया था। 11 वर्ष का वह बालक यानी कि मैं अपना मेकअप लगाए हुए घूम रहा था, ड्रामे की ड्रेस भी मैंने नहीं उतारी थी, चेहरे पर मूँछें बनी थीं, रंग लगा था वह भी नहीं धोया था कि कैसे भी मेरे घर वाले मुझको इस रूप में देख लें। बस उस समय यही चाह थी लेकिन अब शाम ढल चली थी और अब मन में कई शंकाएँ भी जन्म ले रही थीं कि मम्मी पापा क्यों नहीं आए? मैं घर कब जाऊँगा? और बच्चों के घरवाले आ रहे थे और बच्चे घर जा रहे थे। मैं बार-बार बहन जी से पूछता कि घर से कोई खबर है और मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। कर्ण के रूप को दिखने की चिंता अब घरवालों की चिंता में बदल चुकी थी। मैं रूआँसा हो गया था और बहुत बेबसी भी थी मन में कि तभी अचानक एक गाड़ी का हॉर्न सुनायी दिया और नीले रंग की ऐंबैसडर कार USA 3418 आती दिखाई दी जिसकी ओर मैं भागा। गाड़ी रुकी, मम्मी, पापा, मिन्नी, गुड्डू उससे उतरे और मालूम पड़ा कि रास्ते में गाड़ी में कुछ समस्या हो गयी थी जिससे आने में देर हो गयी लेकिन अब मेरी उदासी, चिंता सब दूर हो चुकी थी और खिलखिलाता हुआ मैं लिपटा हुआ था अपनी मम्मी से।
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