ज़िंदगी मेरी?-9 3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर

ज़िंदगी मेरी?-9

3-बैंक रोड, मिन्नम की तकलीफ और स्कूल का टूर

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जाड़ों की छुट्टियाँ समाप्त हो गयीं और सन 1973 की जनवरी में हम लोग एक बार फिर से वापिस हॉस्टल आ गए थे। घर से वापिस आते में उदास होना, रोना-धोना अनिवार्य था तो वह सब इस बार भी होना ही था और हुआ भी। स्कूल में मेरी गिनती अब एक सिन्सियर और पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ तो नहीं लेकिन बेहतर बच्चों में की जाने लगी थी। खेलों में मैं कभी भी अच्छा नहीं था लेकिन हॉस्टल में रहने का यह लाभ अवश्य हुआ कि मैं लगभग सारे खेल, जो स्कूल में होते थे, वह खेलना सीख गया था, फिर चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो या खो-खो।

इसी बीच एक बार मुझको बीमार होने जैसी कुछ तकलीफ हुई जिसकी सूचना मैं अपने घर वालों तक पहुँचाना चाहता था पर यह हो कैसे? पत्र में लिखने पर वासुदेव उच्चानी का किस्सा याद आता था और बहन जी द्वारा प्रताड़ित होने का भय, लेकिन मन भी था कि मानता नहीं था। कई दिन सोचने के बाद एक तरकीब निकल ही आयी। मुझको याद आया कि बचपन में मेरे घर पर मेरा निकनेम ‘मिन्नम’ हुआ करता था। बस फिर क्या था, मैंने हर हफ्ते घर लिखने वाले पोस्टकार्ड में अपनी मम्मी को लिखा कि मिन्नम की तबीयत कुछ खराब हो गयी थी और जो तकलीफ थी वह भी लिखी। मेरी चिट्ठी सेंसर बोर्ड की नाक के नीचे से निकालकर घर मेरा संदेश पहुँचाने में सफल रही थी। मन को संतोष तो मिला ही, साथ ही इस घटना से यह भी समझ में आया कि सही तरीके से सोचा जाए तो अपनी बात अपने घरवालों तक ऐसे भी पहुँचायी जा सकती है।

रविवार को अक्सर प्रकाश मामा मिलने आते थे और मुझको अपने साथ ले जाकर जलेबी, बन-मक्खन आदि खिलाते ही थे, जो उस समय में बहुत बड़ी बात होती थी और उसका इंतजार रहता था। कई बार दो-तीन दिन की छुट्टी होने पर प्रकाश मामा के साथ बड़ी मौसी के यहाँ जाना होता था और वहाँ बैंक रोड पर गुड्डा दादा, बीनू दादा और वेकी आदि के साथ काफी मज़े हुआ करते थे।

3 बैंक रोड पर उस समय क्रिकेट काफी हुआ करती थी जिसमें हम लोगों के अलावा सामने और अगल-बगल में रहने वाले अतुल माथुर दादा, मित्तू दा, भैय्यू, चुन्नू हजेला भाईसाहब आदि लोग खिलाड़ी होते थे। वेकी, हिमांशु, ज्योति, पुष्पू आदि का अलग ऊधम रहता था।

3 नंबर बैंक रोड में उस समय यदि कटरा लक्ष्मी टाकीज की ओर से आयें तो लेफ्ट हैंड पर पहला घर प्रोफेसर अदावल साहब का था। उस रोड में घुसने पर सामने वाला घर हजेला साहब का था जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील थे। अदावल साहब के बाद अगला घर प्रोफेसर जे. एस. माथुर जी का, फिर अगला घर उनके बगल में प्रोफेसर बी. एन. अस्थाना साहब का था। उसके आगे चलकर कोने में प्रोफेसर प्रीति लता अदावल का घर था, जिनको बड़ी जी कहा जाता था। फिर अगला घर, जो कि अस्थाना साहब के सामने हुआ, वह था प्रोफेसर रघुवंश जी का और उनसे लगा हुआ घर, जो माथुर साहब के सामने और हजेला साहब के बगल में था, वह था मेरी बड़ी मौसी-मौसाजी अर्थात प्रोफेसर रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का।

इसके अलावा बैंक रोड पर अन्य बहुत सी हस्तियों का निवास था तथा अनेकों का आना-जाना, जिनकी चर्चा मैं आगे के लेखों में करूँगा, लेकिन अभी हमारी बैंक रोड की दुनिया मात्र 3 बैंक रोड तक की ही थी।

बैंक रोड के किस्से आगे चलकर और लिखूँगा। मेरे जीवन में बैंक रोड और वहाँ के लोगों के साथ बिताया समय बहुत अहमियत रखता है। बैंक रोड के खेल, पढ़ाई, होली, दिवाली, जन्माष्टमी—सभी से जुड़ी मेरी न जाने कितनी मजेदार यादें हैं, जो वाकई सुनहरे दिन ही थे।

1973 में स्कूल खुलने के बाद हम लोग गंगा किनारे मालवीय जी वाली कोठी वाले कैंपस में रोज जाते ही थे और वहाँ पर मौका लगते ही मैं, अजीत कुमार, मून लाइट, शिव कुमार बर्नवाल आदि किनारे वाली पगडंडी, जिसके पास एक बड़ा सा पेड़ भी था, उसके पास से उतरकर गंगा जी के पास वाले मैदान में जाते और खूब खेलते थे। गंगा का खुला तट, वहाँ का अच्छा मौसम और गंगा किनारे के उस मैदान में दौड़ना, बैठना आदि दरअसल स्वर्गिक अनुभव थे और आज वैसे अनुभवों को तलाशने लोग पैसे खर्च करके रिसॉर्ट्स में छुट्टियाँ मनाने जाते हैं।

हॉस्टल में उन दिनों एक टूर की चर्चा शुरू हो गयी थी। मेरे लिए यह भी एक नयी बात थी कि बच्चे टूर पर भी जाते हैं, पर उसके प्रति सभी बच्चों में एक उत्साह और उत्सुकता शुरू हो गयी थी। कहाँ-कहाँ जाना है, व्यवस्थाएँ कैसे होनी हैं, इसकी चर्चा हो रही थीं। स्थान जहाँ जाने की चर्चा थी वे थे—बंबई (अब मुंबई), कोचीन, कन्याकुमारी, मद्रास (अब चेन्नई), तिरुपति बालाजी, कलकत्ता (अब कोलकाता) और फिर वापिस इलाहाबाद (अब प्रयागराज)।

मेरे ननसार वालों का कारोबार बंबई और कोचीन में था तो बहन जी से बात हुई और फिर मैंने अपने सुभाष मामा को पत्र लिखा। फिर टूर के सभी लोगों के लिए बंबई और कोचीन में ठहरने की व्यवस्था सुभाष मामा ने करवा दी थी। जनवरी-फरवरी में टूर का लंबा-चौड़ा, एक किस्म का भारत भ्रमण जैसा ही कार्यक्रम था। ट्रेन आदि के भी सभी रिज़र्वेशन हो गए थे और जाने का समय पास आता जा रहा था। हम सभी बच्चों और साथ जाने वाले अध्यापकों, बहन जी आदि सभी में इस यात्रा के प्रति बहुत उत्साह और जोश था।

सन 1973…

आखिर में टूर पर जाने का दिन आ गया 

पहली बार हम लोग इतने लंबे स्कूल टूर पर निकल रहे थे...

उस समय हम नहीं जानते थे कि यह सफर सिर्फ भारत का नहीं...

बल्कि ज़िंदगी का भी पहला बड़ा सफर बनने जा रहा था 

हम लोग इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पहुँच गए और थोड़ी देर में हमारी वाली ट्रेन भी आ गयी।

हम सभी लोगों को स्टेशन पर अपने रिज़र्वेशन वाले डिब्बे में ले जाकर सबको एक-एक सीट नंबर दिया गया। उस समय का माहौल ऐसा बना हुआ था कि उसके विषय में सोचकर आज भी मन में उत्साह भर जाता है। ट्रेन चलने पर हम लोग ट्रेन के अपने डिब्बे में एक केबिन से दूसरे में जा रहे थे। कुछ लोग ग्रुप बनाकर अंताक्षरी खेलते हुए गाने गा रहे थे तो कुछ डिब्बे में खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्य निहार रहे थे। हरियाली, बाहर चरते हुए जानवर, हरे-लहलहाते खेत—इन सबका एक अलग ही आनंद था।

थोड़ी देर में दिन ढलने लगा और हम लोगों को साथ लाए गए खाने के पैकेट दिए गए। चलती ट्रेन में पूरी, सब्जी, अचार और साथ में मिठाई का पीस खाने का मजा ही कुछ और था। इसके बाद हम लोगों से कहा गया कि अपनी-अपनी सीटों पर होल्डॉल खोलकर हम लोग सोने के लिए लेट जाएँ। जिन टीचरों के जिम्मे यह काम था, उन लोगों ने आकर बच्चों को चैक किया कि सभी की संख्या पूरी है और सब ठीक से लेट गए हैं। लेकिन हम लोगों को लेटकर भी चैन कहाँ था और काफी देर तक हल्ला-गुल्ला चलता रहा। उसके बाद रात के अंधेरे में ट्रेन अपने गंतव्य की ओर हम लोगों को लेकर बढ़ रही थी और हम लोग सो गए—बंबई कैसा होगा, वहाँ क्या करेंगे, ये सब बातें करते हुए।

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