ज़िंदगी मेरी?-7 मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा
ज़िंदगी मेरी?-7
मालवीय जी की कोठी,गंगा किनारा और बेडू पाको बारो मासा
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जाड़ों की छुट्टियाँ हुईं तो सब लोग घर गये। घर पर तो समय अच्छा और शानदार बीतता ही था किन्तु समस्या यह रही कि हमेशा ऐसा लगा कि घर रहने की छुट्टियाँ बहुत जल्दी ही बीत जाती थीं और हॉस्टल आने पर घर की मधुर स्मृतियाँ मन के तार झंकृत करती रहती थीं। शायद स्मृतियों का यही स्वभाव है—वे समय के साथ धुंधली नहीं होतीं, बल्कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर नए अर्थ लेकर लौटती रहती हैं। लेकिन आपको एक बात बताता हूँ कि आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यह भी लगता है कि ज़िंदगी का इतना सारा समय भी मानो पलक झपकते ही बीत गया है और अब तक की बितायी ज़िंदगी की मधुर स्मृतियाँ उसी भाँति मन के तार झंकृत करती रहती हैं और जैसे किसी म्यूज़िक कंसर्ट में एक के बाद एक संगीत की स्वर लहरियाँ उठती जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और आप आनंद लेते हैं, वैसे ही ज़िंदगी भी एक किस्म का म्यूज़िक कंसर्ट ही तो है जिसमें अनेक यादों की स्वर लहरियाँ हैं, कभी उतार तो कभी चढ़ाव हैं और स्थिरता भी है और पीछे मुड़ कर देखें तो उन यादों का आनंद है।
खैर, समय अपनी गति से चलता रहा और देखते ही देखते भारत भारती में पहला वर्ष पूरा हो गया।
गर्मी की छुट्टियाँ हुईं, हम लोग घर गए और वापिस जब 7वीं क्लास के लिए इलाहाबाद लौटे तो फिर मन उतना ही खराब हुआ और रोना-धोना भी।
इस बार मेरी डोरमेट्री बदल गयी थी और हम लोगों में से कुछ लोग बहन जी के कमरे के बगल वाली डॉरमेट्री में शिफ्ट कर दिए गए थे। कुछ नए लड़के भी हॉस्टल में आए थे जिनमें देवरिया के मुकुट बिहारी लाल अग्रवाल, नरेंद्र रुंगटा थे, कलकत्ता से धर्मपाल और एक कहीं और का लड़का निर्मल था। इतने नाम तो अभी याद आ रहे हैं। वासुदेव उच्चानी की शरारतें और उनका प्रसाद भी जारी ही था।
नए सत्र के साथ केवल डॉरमेट्री ही नहीं बदली थी, हमारी दिनचर्या में भी एक नया अध्याय जुड़ गया था।
इस बार हम लोगों को क्लास करने के लिए एक और स्थान पर जाना होता था। स्कूल में छात्रों की संख्या में इजाफा हो रहा था तो स्कूल वालों ने एक बंगला किराये पर लिया था और हम लोगों की और 8वीं कक्षा वालों की क्लासें अब वहीं लगती थीं। यह कोठी या बंगला प्रसिद्ध नाम महामना मदन मोहन मालवीय जी का था और अशोक नगर के आगे जहाँ हम लोग दूध लेने जाते थे, उसके आगे गंगा जी की ओर बढ़ने पर गंगा किनारे अवस्थित था। हम लोग प्रतिदिन हॉस्टल से वहाँ पैदल चल कर जाते थे और ग्रुपों में जाते थे और ऐसे ही लौटते भी थे। हाँ, क्लास के लिए जाते और लौटते में रास्ते में प्रतिदिन हम लोगों का सामना कुछ मिनटों के लिए मरे हुए जानवरों के शरीरों से, जो सड़क किनारे के गड्ढों में पड़े हुए होते थे, जिनकी खाल उतरी हुई होती थी और उन शरीरों पर टूटते हुए गिद्ध तथा उनसे निकलती वातावरण में चारों तरफ फैली बहुत बुरी से भी बुरी दुर्गंध और बहुत जुगुप्सा भरे दृश्य से होता था और रोज दो बार तो होता ही था, लेकिन जैसे ही हम उस वातावरण को पीछे छोड़कर मालवीय जी की कोठी पहुँचते, मन की सारी वितृष्णा मानो क्षण भर में दूर हो जाती थी।
सच यही था कि मालवीय जी की कोठी पर पहुँचते ही मन हर्षित हो उठता था। बाद में इस बंगले में इलाहाबाद का आर.टी.ओ. ऑफिस बन गया था और मैं वहाँ तब भी गया था और काफी देर वहाँ खड़ा रहकर अपनी तब की पुरानी यादें ताजा करता रहा था। दरअसल सच तो यह है कि इस बंगले की बात करें तो आज भी मन प्रफुल्लित हो जाता है। यह स्थान जहाँ मालवीय जी की कोठी बनी थी गंगा नदी से काफी ऊंचाई पर था और उसके उत्तर से आकर शायद पूर्व की ओर गंगा बहती दिखती थीं। गंगा जी की धारा और इस कोठी के टीले के बीच काफी स्थान या बड़ा मैदान था और ऊपर से नीचे जाने के लिए एक बहुत पतला, अत्यधिक ढलान वाला संकरा रास्ता था जिससे हम लोग मौका मिलते ही नीचे चले जाते थे और नदी के किनारे के मैदान में दौड़ते, भागते और खेलते थे। आज भी जब मैं यह लेख लिख रहा हूँ तो ऐसा लग रहा है कि हम पहले उस टीले के ऊपर से गंगा जी की अपार जलराशि को निहार रहे हैं और फिर दौड़ते हुए किनारे की पगडंडी से नीचे उतर गए और गंगा नदी के तट पर दौड़ लगा रहे हैं। वाह, क्या दिन थे वो भी! उस स्थान की हरियाली, सामने का दृश्य और बारिश हो या सर्दी का मौसम, हर समय वहाँ की छटा मनोहर और निराली ही थी। मुझको उस प्राकृतिक सौन्दर्य और सुख की अनुभूति के वर्णन को शब्दों में समेटना बहुत कठिन कार्य लग रहा है और मैं कबीर दास के इस दोहे को ही याद करूंगा कि वह स्मृतियाँ ऐसी ही हैं जैसे कि ‘गूंगे केरी सरकरा, खाए और मुस्काय।’
मैंने जाना कि उस स्थान का प्राकृतिक सौन्दर्य ही नहीं साथ में भारत भारती का वातावरण भी सांस्कृतिक दृष्टि से उतना ही समृद्ध था।
भारत भारती के दिनों में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी बहुत होते थे और यहाँ मैं बताना चाहूँगा कि फिरोजाबाद के जिस स्कूल से मैं आया था यानी कि ‘किड्स कॉर्नर हैप्पी जूनियर हाई स्कूल’ वहाँ का स्तर भी उस समय भी बहुत अच्छा हुआ करता था और वहाँ भी सांस्कृतिक कार्यक्रम का माहौल था। इस विषय में आगे कभी चलकर आपको और जानकारी दूंगा। तो, बात चल रही थी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की। इलाहाबाद दरअसल देश की सांस्कृतिक गतिविधियों का भी एक बड़ा केंद्र हुआ करता था जैसा मैंने पहले भी बताया है और आगे चलकर ऐसी बहुत सी घटनाओं का समय-समय पर उल्लेख करूंगा लेकिन अभी बात भारत भारती के कार्यक्रम की। प्रतिवर्ष की भाँति उस वर्ष भी सालाना सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी हुई और उसमें एक गीत से मेरा परिचय हुआ जो मैं आज भी अक्सर सुनता हूँ। कार्यक्रम के लिए हम लोगों से एक साल सीनियर शशिकला थापा नामक लड़की के नेतृत्व में एक गीत तैयार कराया जा रहा था जो मैंने अपने जीवन में पहली बार सुना था पर बाद में मालूम पड़ा कि वह देश की संस्कृति से जुड़ा एक काफी प्रसिद्ध गीत था। इसकी तैयारी एक कोरस के रूप में हो रही थी जिसमें शशिकला थापा, वसुंधरा त्रिवेदी, शीला द्विवेदी आदि लोग भाग ले रहे थे। "बेडू पाको बारो मासा" यह बोल थे उस गीत के। यह गीत आज भी उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल का सर्वाधिक लोकप्रिय और कालजयी लोकगीत माना जाता है। यह किसी एक कवि की रचना नहीं, बल्कि कुमाऊँ की समृद्ध लोक परंपरा की अमूल्य धरोहर है, जो पीढ़ियों से लोकगायकों के माध्यम से जीवित रही है। बेडू और काफल जैसे पहाड़ी फलों के माध्यम से यह गीत प्रकृति, ऋतुचक्र, प्रेम और पहाड़ के सहज जीवन का सुंदर चित्रण करता है। आज भी यह गीत उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है और देश-विदेश में बड़े सम्मान के साथ गाया और प्रस्तुत किया जाता है। मुझको यह गीत इतना अच्छा लगा कि आज भी गाहे-बगाहे मैं इस गीत को सुनकर अपनी उन पुरानी स्मृतियों के आनंद को बार-बार जीता रहता हूँ।
इस गीत ने मेरे लिए केवल एक लोकधुन का ही नहीं, बल्कि एक नए सांस्कृतिक संसार का द्वार खोल दिया। तब एक बार फिर यह अहसास हुआ कि घर की चौखट से बाहर निकलते ही दुनिया कितनी विशाल और विविधतापूर्ण है।
जब आप घर से निकलते हैं तो आपको रोज, हर यात्रा में, बाहर से हर साक्षात्कार में यह समझ में आता है कि अरे, दुनिया में यह भी है और मुझको पता ही नहीं था, मैं तो अभी तक कूप मंडूक ही था, पर सच्चाई यह है कि इस जीवन में जानने को इतना है कि कितना भी जानिए आपको लगेगा यही कि आपको कुछ नहीं पता। इस जीवन में, इस दुनिया में, इस सृष्टि में जानने को बहुत है और उसके लिए एक क्या कई मानव जीवन भी पर्याप्त नहीं और शायद फिर लगता है कि सब जानकर भी यदि कुछ न जाना तो सत्य क्या है? शायद इसीलिए कहा गया है कि, “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या”।
खैर, दर्शन पर चर्चा फिर कभी। अभी तो बस इस बात के साथ आज का लेख पूरा कर रहा हूँ कि 7वीं क्लास के भारत भारती विद्यालय, इलाहाबाद के वे दिन बहुत शानदार थे जिनके लिए मन आज भी कहता है कि, “कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन।”
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