बुजुर्गों के किससे-2 काका जी बनारसीदास जी

बुजुर्गों के किस्से — 2

काकाजी बनारसीदास चतुर्वेदी जी

आज अपने परिवार के एक और बुजुर्ग का किस्सा।

बात संभवतः सन 2018 या 2019 कभी की है। हम दिल्ली में अकबर रोड स्थित कांग्रेस दफ्तर पहुँचे और उस वक्त भारत सरकार के एक पूर्व मंत्री के कमरे में उनसे मिलने गए। वहाँ काफी लोग बैठे थे और हम भी जाकर बैठ गए।

कुछ देर में उन्होंने वहाँ बैठे एक इंप्रेसिव पर्सनैलिटी वाले सज्जन से हमारा परिचय करवाया कि ये कुँवर विक्रम सिंह जी “नाती राजा” हैं, छतरपुर मध्यप्रदेश की राजनगर विधानसभा से एम एल ए।

जब हमको मालूम पड़ा कि उनके बाबा छतरपुर के महाराजा थे और अब ये दरअसल वहाँ के राजा ही हैं, तो हमने उनको बताया कि हमारे बाबा के चाचा स्वर्गीय बनारसीदास जी (मास्टर बाबा राय साहब पूरनमल जी और अच्छी अम्मा के पुत्र) आपके राज्य में किसी पद पर थे, संभवतः अकाउंट्स विभाग।

काकाजी का नाम सुनते ही नाती राजा अपनी कुर्सी से उठकर खड़े हो गए और उन्होंने हमारा हाथ पकड़ लिया कि अरे, आप उनके परिवार के हैं?

यह देखकर हमको लगा कि कहीं इनको कोई कन्फ्यूजन तो नहीं है। तो हमने कहा कि हम पद्मभूषण बनारसीदास जी, जो टीकमगढ़ में रहे, उनकी बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने बाबा के चाचा की बात कर रहे हैं और उनका देहांत सन 1936 में हो गया था।

तो वह बोले कि मुझको कोई कन्फ्यूजन नहीं है और मैं समझ रहा हूँ। वो बोले कि वह हमारे राज्य में बहुत सीनियर पद पर थे और उनकी बहुत इज्जत थी।

नाती राजा हमसे खड़े होकर ही बहुत सम्मान से बात करते रहे। हमको बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि ऐसे परिवार में हम लोग पैदा हुए और ऐसे थे हमारे बुजुर्ग।

लेकिन बात केवल यहीं खत्म नहीं होती है।

हमने बाबा से सुना था कि काकाजी छतरपुर में थे और वहीं उनका देहांत सन 1936 में हुआ था। उनका अंतिम संस्कार बाबा ने ही वहाँ किया था।

बाबा ने हमको यह भी बताया था कि छतरपुर में काकाजी के नाम पर एक चौराहा भी था।

सन 2000 के दशक में हम दो बार छतरपुर गए थे, श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी जी के यहाँ। उस समय तक न तो हमको काकाजी की उस फ़ाइल के बारे में कुछ मालूम था और न ही नाती राजा जी से हमारी मुलाकात हुई थी। लेकिन काकाजी का छतरपुर से संबंध हमको मालूम था और बाबा से उनके नाम पर चौराहा होने की बात भी सुन रखी थी। इसलिए हमने वहाँ उस चौराहे को खोजने की कोशिश भी की, लेकिन वह हमको नहीं मिल सका।

अब कभी फिर छतरपुर जाना हुआ तो उस चौराहे के बारे में दोबारा पता करने की कोशिश जरूर करेंगे।

खैर, कोविड के दौरान या उसके कुछ बाद एक दिन हम घर के इतिहास के विषय में पढ़ने को बाबा के कुछ कागज देख रहे थे, तो हमको एक कपड़े में बंधे कुछ कागज और एक फ़ाइल मिली। वह सब कागज काकाजी के थे।

उस फ़ाइल में काकाजी के पत्राचार, यानी काकाजी के लिखे पत्रों की कॉपी और काकाजी को लिखे पत्र थे। जब हमने वो पत्र पढ़े, तो उसमें एक सीरीज थी काकाजी और एम ए चच्चा यानी दीवान बहादुर जानकी प्रसाद चतुर्वेदी के बीच की खतो-किताबत।

उसमें काकाजी ने एम ए चच्चा को लिखा और जो उनके जवाब थे, उससे पता लगा कि शायद राज्य का कुछ मामला ऐसा पड़ गया था कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार महाराज को या तो पदच्युत कर देती या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई की आशंका थी।

तो महाराज छतरपुर एम ए चच्चा से इस मामले में मदद चाहते थे और इसके लिए उन्होंने काकाजी से अनुरोध किया कि वो अपने बड़े भाई से कहकर अंग्रेज रेजीडेंट से सिफारिश करवा दें और महाराज का पक्ष बताकर उनकी मदद करें।

यहाँ एम ए चच्चा के विषय में एक बात बताना भी जरूरी है। एम ए चच्चा का चयन यू पी पी सी एस में बहुत अच्छी मेरिट पर हुआ था, लेकिन उन्होंने अंग्रेज सरकार की नौकरी करने के बजाय रीवाँ के महाराजा के यहाँ नौकरी करना पसंद किया। उनकी योग्यता और प्रतिष्ठा ऐसी थी कि अंग्रेज अधिकारी भी उनकी बात को गंभीरता से लेते थे और उनकी राय को महत्व देते थे। लेकिन उनकी यह प्रतिष्ठा उनकी अपनी योग्यता, स्वतंत्र सोच और व्यक्तित्व के कारण थी, न कि अंग्रेज सरकार से किसी विशेष निकटता के कारण। एम ए चच्चा अपने आप में एक बहुत बड़ी शख्सियत थे। उनके बारे में बहुत-सी बातें और किस्से हैं, जो फिर कभी उनके विषय में लिखते समय बताऊँगा।

पत्राचार से पता चलता है कि महाराज की मदद की गयी।

वह शायद इतना बड़ा कुछ मसला था कि मदद होना नामुमकिन सा ही रहा होगा शायद, लेकिन मदद हुई।

लेकिन ये भी बहुत बड़ी बात है कि 1920 या लगभग सन 1930 के आसपास की ये घटना (सही तारीख और पूरी घटना तो फिर से कागज देखने पर ही ध्यान आएगी) सन 2010 के दशक में भी महाराज छतरपुर के वंशजों को न सिर्फ मालूम थी, बल्कि उनके मन में उस परिवार के प्रति सम्मान भी था।

ये भी मानना पड़ेगा कि महाराज छतरपुर की भी ग्रेटनैस थी कि उन्होंने अपने वंशजों को ये संदर्भ बताया और वंशजों को ये याद रहा।

इस फ़ाइल को पढ़ने के बाद हमने यही सोचा कि वाकई एक बहुत बड़ी बात थी।

ऐसे थे हम लोगों के पूर्वज और हम लोग निश्चित तौर पर सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे दूसरों की मदद करने वाले बुजुर्गों के परिवार में हमारा जन्म हुआ।

आज के लिए बस इतना ही।

जल्द ही अपने किसी पूर्वज का कोई और किस्सा बताएंगे।


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