जहाज में बैठे बैठे मैं सोच रहा था कि मैं एक बिल्कुल अनजान जगह,अनजान देशों को जा रहा हूँ।वहाँ से व्यापार करना चाह रहा हूँ लेकिन पता नहीं क्या होगा।कुछ माल बिकेगा भी कि यूँ ही खाली हाथ वापिस आना पड़ेगा।जीवन में एक नई राह की खोज में कदम तो बढ़ा दिया था अब अंजाम चाहे कुछ हो लेकिन साथ में ये बात भी मन को हौसला दे रही थी कि हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती और भगवान भी उद्यमी लोगों की मदद करते ही हैं। जब मैं अपनी पढ़ाई करके और UPSC में अपने हाथ आजमा कर अपने घरेलू व्यापार में आया तो कुछ समय मुझको काँच के व्यापार को समझने में लगा।कुछ समय बाद मुझको ऐसा लगने लगा कि मुझको तो कुछ हटके और नया काम करना है और मेरा मन था कि मैं Export के व्यापार को करूं। मेरे शहर फ़िरोज़ाबाद में तब तक export का कोई व्यापार नहीं होता था।सिर्फ एक व्यक्ति थे कृष्णा बीड्स वाले वो जरूर मोतियों के export का कारोबार करते थे किंतु उस व्यापार का मूलतः फ़िरोज़ाबाद से कुछ सीधा लेना देना नहीं था।मेरे दो मामा जी लोग निर्यात के व्यापार से जुड़े थे और इसलिए मैं बस इतना जानता था कि एक्सपोर्ट का व्यापार होता है लेकिन...