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इतिहास की दृष्टि और सरदार बूटा सिंह

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आज मैं आपसे जो किस्सा शेयर करने जा रहा हूँ वह एक ऐसे राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा है जिन्होंने मुझको इतिहास पढ़ने में एक नयी दृष्टि दी और रुचि भी बढ़ाई। किस्सा कुछ यूँ है कि कांग्रेस के प्रसिद्ध नेता और भारत सरकार के गृह मंत्री रहे स्व0 सरदार बूटा सिंह जी के मेरे पापा स्व0 श्री अशोक चतुर्वेदी जी से काफी घनिष्ठ सम्बन्ध थे और उनका हमारे घर फिरोजाबाद कई बार आना हुआ था। चूँकि सरदार बूटा सिंह जी को Z+ सुरक्षा मिली हुयी थी तो उनका आना काफी सुरक्षा बलों के साथ तो होता ही था जिसमें सबसे विचित्र लगता था उनकी गाड़ी के पीछे एक खुली गाड़ी में Light machine gun जिसका मुँह पीछे की दिशा में होता था और उस पर बैठे एक चुस्त-दुरुस्त सरदार सिपाही! साथ में लोकल अमला और ताम-झाम भी बहुत रहता था जैसे डॉक्टर, एम्बुलेंस इत्यादि। बूटा सिंह जी को खाने-पीने को वही चीज दी जा सकती थी जिसको उनकी सुरक्षा में इस विषयक लगे लोग स्वयं चखकर ओके कर दें। मथुरा-गोवर्धन क्षेत्र में एक बहुत प्रसिद्ध और सिद्ध संत हुए हैं स्वामी कंचन दास जी महाराज; वह एक बहुत उच्च कोटि के पहुँचे हुए संत थे पर मेरे पिता...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-15. हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-15 हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी मुहम्मद कासिम हिंदू शाह ‘फरिश्ता’ मध्ययुगीन भारत का इतिहास लिखने वाला एक प्रसिद्ध इतिहासकार हुआ है। फ़िरिश्ता का जन्म कैस्पियन सागर के तटीय नगर अस्त्राबाद में गुलाम अली हिन्दू शाह के घर सन 1570 में हुआ था। अपने बचपन में ही फ़िरिश्ता अपने पिता के संग भारत में अहमदनगर आ बसे। वहां के निज़ाम के शहज़ादे मिरान हुसैन निज़ाम शाह को फ़ारसी पढ़ाने का न्यौता इसके पिता को मिला था, जिसके साथ फ़रिश्ता ने भी अपनी पढ़ाई की। फरिश्ता की काबिलियत  से प्रभावित होकर बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह सानी या इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने उससे ‘हिंदुस्तान में इस्लामी शासन काल’ का इतिहास लिखने को कहा जिसके लिए पहले तो फरिश्ता मना करता रहा फिर बहुत जोर देने पर उसने नमूने के कुछ पृष्ठ लिख कर बादशाह के सामने पेश किए। इसमें फरिश्ता ने जानबूझ कर इब्राहिम के पिता अली आदिलशाह प्रथम के समय का इतिहास लिखा और उसकी हत्या की घटना को जैसा का तैसा लिख कर पेश कर दिया। दरअसल यह फरिश्ता का बहुत बड़ा साहस था क्योंकि फरिश्ता न...

सिंदबाद ट्रैवल्स-38जर्मनी-7बर्लिनSindbad Travels-38Germany-7Berlin

सिंदबाद ट्रैवल्स-38 जर्मनी-7 बर्लिन Sindbad Travels-38 Germany-7 Berlin Berlin Coordinates 52° 31' 12" N                                13° 24' 18" E अगली सुबह मैं जल्दी तैयार होकर अपनी बर्लिन यात्रा के लिए चल दिया था।हाइडलबर्ग से बर्लिन लगभग 630 किमी का रास्ता था और फ्रैंकफर्ट से ICE ट्रेन से केवल 3 घण्टे 45 मिनट का रास्ता है।बहरहाल उस जमाने यानी 1991 के अक्टूबर में जब मैं हाइडलबर्ग से बर्लिन को निकला तो पहली बात तो ये थी कि जिस ट्रेन से मैं बर्लिन को चला वो तो अच्छी थी किंतु बर्लिन शहर की ट्रेनें अन्य शहर की रेलों जितनी शानदार न होकर कुछ पुरानी किस्म की थी।बर्लिन की यह दूरी मेरी ट्रेन लगभग 7 घण्टे से कुछ कम में तय करने वाली थी। मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में M.A. Modern History का छात्र रहा हूँ और B.A. में भी मेरे पास Med/Mod History विषय था।ट्रेन में बैठे हुए मुझको अपने गुरु श्री विनय चंद्र पांडे जी और श्री सी0पी0झा साहब की याद आ रही थी।उन लोगों ने हम छात्रों को यूरोप का इतिहास ऐसे बताया और पढ़ाया था कि यू...

भारत में काँच उद्योग का इतिहास-विशेष संदर्भ फिरोजाबाद भाग-1

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आजकल भारत में काँच उद्योग,विशेष सन्दर्भ फिरोजाबाद विषय पर काम कर रहा हूँ।उसी से कुछ अंश:- भारत में काँच उद्योग का इतिहास- विशेष संदर्भ फिरोजाबाद ऐसे बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने अपने जीवन में कहीं न कहीं,किसी न किसी रूप में ग्लास या काँच को न देखा हो।काँच का उत्पाद जब सजावटी होता है तो मनुष्य को आकर्षित करता है,जब औषधीय काम में प्रयुक्त हो रहा हो तो उम्मीद और भय दोनों जगाता है,जब दैनिक उपयोग की वस्तु हो तो खरीदने की इच्छा जगाता है और जब इसका उपयोग विज्ञान,उद्योग या किसी ऐसे क्षेत्र में होता दिखे जिसके विषय में हम नहीं जानते तो यह आश्चर्य, उत्सुकता और जिज्ञासा के मिले-जुले भाव उत्पन्न करता है। वैसे तो जब से यह पृथ्वी बनी है तभी से काँच भी यहाँ बन गया होगा क्योंकि जब ज्वालामुखी फट रहे होंगे तो उसकी गर्मी से लावा तो निकलता ही है पर कई स्थानों पर रेत ने पिघल कर काँच का रूप ले लिया होगा।मानव सभ्यता के विकास के क्रम में कहीं न कहीं,कभी न कभी मनुष्य का ध्यान उस काँच पर गया होगा और वो उसकी ओर आकृष्ट हुआ होगा।मानव स्वभाव है कि जब वह किसी वस्तु की ओर आकर्षित होता है तो उसमें उस वस्तु के प्रति जिज...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-8

इतिहास और संस्कृति के किस्से-8 आज चर्चा पुराणों के अनुसार पार्जिटर की इतिहास संजोने की कोशिश की। पुराणों में लिखी वंशावलियों और परंपराओं का अध्ययन करना एक बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक कार्य है। पार्जिटर महोदय ने जन सारे तथ्यों को गहरी रिसर्च करके बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से लिखा है। पुराणों में मत्स्य पुराण और वायु पुराण दोनों पौरव (या हेला) वंश की वंशावली को पांडवों से अभिमन्यु, परीक्षित और जनमेजय तक लाते हैं। आगे ये पुराण इस वंशावली को राजा अधिसीम कृष्ण तक निरन्तर रखते हैं और बताते हैं कि इस राजा के समय में 12 वर्ष का यज्ञ किया गया और इसी समय में पुराणों को गेय रूप मिला या गाया गया (कह सकते हैं कि रूप मिलना शुरू हुआ)। ये वही काल है जब ऋषिगण ने ‘सूत’ लोगों को कलिकाल का पूर्ण विवरण देने को कहा। इसके आगे राजाओं के नाम, उनमें वंश और शासनावधि कि चर्चा है। विस्तृत विवरण में न जाकर हम देखें तो पता चलता है कि इनमें निम्नलिखित प्रमुख राजवंशों, उनके राजाओं और शासनावधि का विवरण है:- 1.पौरव राजवंश (अभिमन्यु से वंशावली शुरू है और परीक्षित से होते हुए 29 राजाओं के नाम हैं)। 2.इक्ष्वाकु वंश (बृहद बल से श...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 48 गंगा किनारे करेंटी की हवेली,

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 48 गंगा किनारे करेंटी की हवेली,  हुमायूँ को शरण,  जयपुर के महाराजा भारमल की सहायता, सुप्रीम कोर्ट का फैसला…  एक ही धागे से जुड़ी विरासत की महागाथा। आज इतिहास और संस्कृति के किस्सों में चर्चा है उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के करेंटी गांव की कोविड के दौरान जब मैं मथुरा से सम्बंधित श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के लोगों के इतिहास और संस्कृति पर आधारित अपनी यूट्यूब श्रृंखला Chaturvedi Heritage by Atul Chaturvedi बना रहा था तो एक बहुत रोचक किस्सा मेरे संज्ञान में आया जो आज मैं आपके सामने फेसबुक पोस्ट के रुप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।  करेंटी की हवेली, गंगा का तट, हुमायूँ का भागना और माथुर चतुर्वेदी विरासत की अद्भुत कहानियाँ विरासत सिर्फ़ पुरानी बातों का ढेर नहीं होती—विरासत वह सांस है जो पीढ़ियों के बीच चलती रहती है।  इस किस्से का समय वह समय था जब हिंदुस्तान का शहंशाह हुमायूँ अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से निकल रहा था—  सेना बिखरी हुई, शरीर घायल, मन भयभीत।  दुश्मन उसके पीछे और भाग्य उसके सामने खड़ा। जब हिंदोस्तान क...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-2 बौहरे बसंतराय और मुगल शहजादा जिसने पैसे उधार लिए

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इतिहास और संस्कृति के किस्से-2 हाल ही में मैंने बूटा सिंह जी, फारसी भाषा, इतिहास के मूल सोर्स पढ़ना और अकबर बादशाह आदि से सम्बंधित एक पोस्ट की थी जिसको काफी लोगों ने पसंद किया और कुछ लोगों ने मुझसे संपर्क करके भी कहा कि इतिहास,संस्कृति आदि से सम्बंधित और भी किस्से में लिखना शुरू करूँ तो आज एक ऐसा ही किस्सा और पेश है। आज मैं आपसे जो किस्सा शेयर करने जा रहा हूँ इसमें चर्चा है एक ऐसे मुगल राजकुमार की जिसने कुछ व्यापारियों से रुपये उधार लिए और जब वो हिंदुस्तान का शहंशाह बना तो उसने वो पैसे वापिस भी किये। पहले मैं बताता हूँ कि यह किस्सा मेरी जानकारी में कैसे आया। कोविड के दौरान मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत से विषयों पर फेसबुक लाइव किया और इसमें बहुत से विषय ऐसे थे जिनके लिए मुझको काफी रिसर्च करनी पड़ी। इसी दौरान आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब की पुस्तक  “चतुर्वेदियों का इतिहास” से प्रेरणा लेकर मेरे मन में आया कि मैं भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास और संस्कृति के विषय में जानकारी करूँ और इस कार्य में मुझको गाइड करने को हेरम्ब भाईसाहब तो मौजूद थे ह...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-30. चचनामा : सिंध से उपजी एक अनकही दास्तान

इतिहास और संस्कृति के किस्से-30 चचनामा : सिंध से उपजी एक अनकही दास्तान क्या आपको पता है कि भारत में पहला मुस्लिम आक्रमण कहाँ हुआ था? भारतीय उपमहाद्वीप में हम दिल्ली या दक्षिण के राज्यों की और उनके इतिहास की बातें करते सुनते रहते हैं लेकिन हमको उन स्थानों के इतिहास की जानकारी भी करनी होगी जहाँ की घटनाओं ने हमारा इतिहास ही बदल दिया। उन किस्सों को बताने वाले ग्रन्थों को भी पढ़ना होगा जिनमें ऐसे वाक्यात दर्ज किए गए हैं। ऐसा ही एक ग्रंथ है चचनामा जिसके विषय में मुझको मेरे पुत्र अर्पित से पता चला। चचनामा केवल एक युद्ध और विजय की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि किस प्रकार सत्ता, राजनीति, धर्म और संस्कृति आपस में टकराते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप में अरबों के आगमन का पहला बड़ा लिखित दस्तावेज़ है और पाकिस्तान व भारत के इतिहास को समझने का आधार भी। इस चचनामा में जिक्र है सिंध के रायवंश का और फिर उनके बाद चच और उसके पुत्र दाहर के शासन का जिसके समय में भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण मुहम्मद बिन कासिम ने किया। सदियों पहले, 8वीं शताब्दी में जब मुहम्मद बिन क़ासिम की सेनाएँ सिंध की धरती पर उतरीं, तो यह ...

बुरा ना मानो होली है

#बुरा_ना_मानो_होली_है इन दिनों पूरे ब्रज क्षेत्र में होली का माहौल और खुमार रहता है पर इस बार तो लगता है न सिर्फ पूरे देश में बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में भी होली की रंग-तरंग की धूम है शायद सारे कुओं और नदियों में भांग पड़ गयी है या शायद समंदर में भी... होली मतलब हँसी, ठिठोली,भांग की तरंग और nothing serious. ब्रज क्षेत्र में तो भंग की तरंग का ऐसा जोर है कि जो छाने वो ताने , जो न छाने वो भी न जाने और ना ही माने. खुमार तो मुझ पर भी छा रहा है,इतिहास का विद्यार्थी हूँ और इतिहास ही गड्ड-मड्ड हुआ जा रहा है.  हांलांकि इस होली के माहौल में ये भी बता दूँ कि मैंने गोविंदा की एक फ़िल्म देखी थी,"क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता" तो देखिए मैं भी झूठ नहीं बोलता लेकिन आज अगर कुछ इधर का उधर हो जाये तो बस यही कहूँगा कि ,"बुरा न मानो होली है". ये तो हम सब ही जानते हैं कि होली हमारा सदियों पुराना त्योहार है और जब भगवान श्री कृष्ण ने पूतना का वध किया था तबसे होली मनाने की प्रथा शुरू हुयी यह ऐतिहासिक तथ्य हम सभी जानते हैं.बात जब इतिहास और होली की हो रही है तो लगे हाथ ये भी बता दूँ कि होली क...

ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय

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​ ज़िंदगी मेरी?-6 चाबी के गुच्छे, ब्लैक आउट और विजय  #AtulChaturvediKeKisse #BharatBharatiTales #HostelDiaries    बचपन में हमें इतिहास की किताबें बाद में मिलीं, इतिहास पहले जीने को मिला..  आज के हॉस्टल की यादों के लेख में मुझको दो घटनाएँ याद आ रही हैं। बात शायद नवंबर महीने की है और सं था 1971, इलाहाबाद सिविल लाइंस में कॉफी हाउस के सामने एक भार्गव इंजीनियरिंग करके बहुत विशाल बिल्डिंग हुआ करती थी जिसके बाहर एक काफी बड़ा खाली मैदान था और उसके पास एक बड़ा सा घर था 16-A MG Road  जो मेरे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र जी के बड़े भाई जज साहब स्वर्गीय सुरेश चंद्र जी का हुआ करता था और फिर उसमें उनके मँझले पुत्र जिनको हम लोग पी दादा कहा करते थे वह और उनका परिवार रहते थे। पी दादा के बड़े लड़के थे ध्रुव भाईसाहब जो कि इलाहाबाद के बहुत बड़े और नामचीन वकीलों में हुआ करते थे और हमारे पापा और वो लगभग हमउम्र से थे हाँलांकि रिश्ते में पापा और वे चाचा भतीजे थे।ध्रुव भाईसाहब 1983 में अमेरिका से दिल का ऑपरेशन करा के आए थे और एक महीने बाद ही काफी यंग ऐज में उनकी मृत्यु हो गयी थी।खैर, तो बा...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-28. किस्सा है रामायण का

इतिहास और संस्कृति के किस्से-28 आज किस्सा है रामायण का पुष्पक विमान का और लंका के महलों में रावण और राक्षसों के लिए बनने वाले भोजन का। मूल सोर्स श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण साथ में फादर कामिल बुल्के की 'रामकथा' बहुत समय से मेरा मन उपरोक्त विषय पर लिखने का था। रामायण को आप इतिहास मानें या मिथक यह मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ । किसी मिथक या विश्वास के सम्बंध में जब तक हमको किसी किस्म के पक्के साक्ष्य नहीं मिल जाते जिनका तर्कसंगत विश्लेषण करके उस चीज या तथ्य को ऐतिहासिक सिद्ध किया जा सके तब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले विद्वान उसको इतिहास न मान कर मिथक ही मानते हैं लेकिन अपने विश्वास और रामायण के विविध संस्करणों को पढ़कर, उसमें दिए रूट को देखकर मेरा मन इसको मिथक न मान कर ऐसा इतिहास मानता है जिसकी वो कड़ी अभी लुप्त है जिसके प्रमाण के आधार पर इसको ऐतिहासिक मानने के साथ ही साथ ऐतिहासिक साबित भी किया जा सके। शायद उसके लिए अभी काफी उत्खनन आदि होने की आवश्यकता है और बिना राजनीति के। खैर जो मैं आज लिखने जा रहा हूँ उस लेखन के सोर्स के रूप में मैंने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्वाल्मीकीय रामा...

सिद्धांत के लिए मुगल कारवां से लोहा लेने वाले हमारे पूर्वज चौबे दुर्गादास फिरोजाबाद

पिछले कुछ समय से मैं यात्रा वृतान्त, समाज, संस्कृति और इतिहास सम्बंधित लेखन के अलावा श्री माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण समुदाय से संबंधित इतिहास, संस्कृति और विरासत पर भी रिसर्च, लेखन, यूट्यूब सीरीज़ बनाना (चतुर्वेदी हैरीटेज नाम से) आदि काम भी कर रहा हूँ।इसी श्रृंखला में फिरोजाबाद के श्री माथुर चतुर्वेदी पुरोहित वंश के यानी कि अपने परिवार के इतिहास को भी लिपिबद्ध करने का प्रयास चल रहा है। इस प्रक्रिया में बहुत सी रोचक जानकारी मिली है और मिल रही है जैसे राजस्थान के चतुर्वेदी बौहरे बसंत राय ने मुगल सम्राट शाहजहाँ को पैसा उधार दिया था जब वो बादशाह नहीं बना था या मथुरा के चतुर्वेदी पांडे भाइयों ने कैसे मथुरा के काजी को मारा और काजीमार पांडे कहलाये आदि।लेकिन आज आपके सामने किस्सा प्रस्तुत कर रहा हूँ अपने पूर्वज फिरोजाबाद के चतुर्वेदी पुरोहित वंश के चौबे दुर्गा प्रसासाद का जिन्होंने मुगल सम्राट के कारवां से महसूल वसूला था। किस्सा कुछ यूँ है कि:- हमारे पूर्वज: स्व0 दुर्गाप्रसाद चतुर्वेदी समय 16-17वीं शताब्दी  फ़िरोज़ाबाद में हम लोगों के परिवार का इतिहास बहुत पुराना है और हमारे परिवार यानी कि सौश्र...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12 जहाँआरा बेगम का किस्सा इतिहास और संस्कृति के किस्सों की कड़ी में एक और किस्सा पेश है।  जैसा मैं पहले बता भी चुका हूँ और आप सब जानते ही होंगे कि भारत में प्राचीनकाल से विदेशी यात्रियों का आना-जाना लगा रहा है और उन विदेशी यात्रियों ने अपनी-अपनी यात्राओं के अनुभव अपने देशों में जाकर, अपनी-अपनी भाषाओं में लिखे। उन यात्रियों द्वारा लिखे गए यह यात्रा वृतांत आज हमारे लिए न सिर्फ उनकी यात्रा के समय का समाज, व्यवस्था, संस्कृति के बल्कि उस समय के इतिहास को भी जानने के अमूल्य ‘मूल-स्त्रोत’ हैं। मैं पिछले लेखों में इब्नबतूता और मनूची की चर्चा कर चुका हूँ। आज चर्चा में एक और यात्री के लेखन का भी जिक्र करूंगा। इस यात्री का नाम था फ्रांसुआ बर्नियर और यह फ्रांस का रहने वाला था। इसका जन्म सन 1620 में फ्रांस के ‘जूए’ कस्बे में हुआ था। इसको नए-नए देश देखने, वहाँ के लोगों से मिलने और उनकी संस्कृति को समझने का बड़ा शौक था। इसने फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक गेसन्डी से शिक्षा प्राप्त की। 1652 में इसने मौंतपेलियर विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की शिक्षा भी प्राप...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-18सुल्तान बलबन का शाही दरबार – रौब, वैभव और अनुशासन की मिसाल

इतिहास और संस्कृति के किस्से-18 सुल्तान बलबन का शाही दरबार – रौब, वैभव और अनुशासन की मिसाल  आज का किस्सा है दिल्ली के सुल्तान गियासुद्दीन बलबन के दरबार के नजारे का।  ‘मुन्तख़ब उत तवारीख’ में मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं लिखता है कि बलबन सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद के बाद चूँकि उसका कोई वारिस नहीं था इसलिए अमीरों की रजामंदी से 1266 ईस्वी में दिल्ली का सुल्तान बना। वह गुलाम था और नसीरुद्दीन के पिता का दामाद था। सुल्तान बनने से पहले वह वजीर था और उसका खिताब ‘उलग खान’ था। बलबन शमसुद्दीन के चालीस गुलामों में से एक था जिन्हें अमीर का खिताब मिला था। उसका वास्तविक सत्ता काल दिल्ली के राजाओं में काफी लंबा रहा क्योंकि वह लगभग 20 साल वजीर रहा जब वास्तविक सत्ता उसके हाथ थी और लगभग इतनी ही अवधि के लिए वह दिल्ली का सुल्तान रहा (ईस्वी सन 1266 से 1287)। उसके बारे में बदायूनीं लिखता है कि “..हिजरी 664 में बलबन मलिकों और अमीरों की रज़ामन्दी से तख्त पर बैठा और ‘कस्त्र-ए-सफेद’ (श्वेत प्रासाद) में आया।”  मध्यकाल का ही इतिहास लेखक ज़ियाउद्दीन बरनी अपनी 'तारीखे फ़िरोज़शाही' में लिखता है कि उसने अपने ना...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-7

इतिहास और संस्कृति के किस्से-7 फ्रेडरिक ईडन पार्जिटर एक ICS अधिकारी थे जो संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञाता थे। पार्जिटर  1875 ईसवी में बंगाल में इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी बने और अंडर सेक्रेटरी, 1887 में सत्र न्यायाधीश और 1904 ईस्वी में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज बने।1906 में 54 वर्ष की आयु में इन्होंने रिटायरमेंट ले लिया। इनकी प्राचीन भारत के साहित्य, संस्कृति और इतिहास में काफी रुचि थी और इस क्षेत्र में इनका काम और योगदान बहुत बड़ा है। इनकी इस विषयक पुस्तकें हैं:- 1.मार्कण्डेय पुराण संस्कृत टेक्स्ट इंग्लिश ट्रांसलेशन विद नोट्स ऐंड इंडेक्स ऑफ वर्सेस (1904) 2.ऐनशिएंट इंडियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशन्स (1922) 3.डायनेसटीज़ ऑफ कलि ऐज इनमें से दो पुस्तकों का हिंदी अनुवाद मैंने पढ़ा। इनका अनुवाद श्री मुन्नालाल डाकोत और भूमिका डॉ0 श्रीकृष्ण ‘जुगनू’  Shri Krishan Jugnu जी द्वारा लिखी गयी है। मुझको आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब Heramb Chaturvedi  जी ने कहा था कि प्राचीन भारत में पौराणिक परंपराओं और राजाओं की वंशावलियों के लिए यह बहुत अच्छी और प्रामाणिक पुस्तकें हैं। पार्जिटर साहब का यह काम न सिर्फ अद्भ...