सिंदबाद ट्रैवल्स-36जर्मनी-5 फ्रैंकफर्ट-3 और हाइडलबर्ग कैसलSindbad Travels-36Germany-5Frankfurt-3 and Heidelberg Castle
पिछले काफी समय से अपनी रोजमर्रा की व्यस्तताओं के कारण मैं अपने विदेश यात्रा वृतांत की श्रृंखला में आगे की कड़ी पोस्ट नहीं कर पाया था। कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि वो उस वृतांत की आगे की पोस्ट का इंतज़ार कर रहे हैं और मुझको उस वृतांत में आगे के किस्से भी लिखने चाहिए तो उसी कड़ी की अगली पोस्ट यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा है आपको रुचिकर लगेगी।
सिंदबाद ट्रैवल्स-36
जर्मनी-5 फ्रैंकफर्ट-3 और हाइडलबर्ग कैसल
Sindbad Travels-36
Germany-5
Frankfurt-3 and Heidelberg Castle
Frankfurt Coordinates
50.1109° N, 8.6821° E
सरदार जी के से निकल कर अब अगला पड़ाव था एक स्कार्फ व्यापारी का जिसका पता मैंने फ्रैंकफर्ट के चैंबर और कॉमर्स से लिया था और उनसे अपॉइंटमेंट भी फोन से फिक्स कर लिया था।मैं आने साथ कई किस्म के उत्पादों के सैंपल लेकर आया था और उन्हीं में से फर्रुखाबाद के सिल्क के स्कार्फ भी थे । यहां यह बताना चाहूंगा कि एक समय में फर्रुखाबाद में सिल्क का बहुत बड़ा काम होता था। हमारी मां फर्रुखाबाद से सिल्की रजाई के कवर बेडशीट मंगाया करती थी। पापा के दोस्त डॉक्टर मित्तल साहब थे जो पहले फिरोजाबाद पोस्टेड थे बाद में उनका ट्रांसफर फर्रुखाबाद हो गया था उनसे हम लोगों के पारिवारिक संबंध थे और फर्रुखाबाद का सेल का बहुत सामान उनके संपर्क द्वारा मम्मी पापा मंगवाया करते थे। यह देखकर बढ़ाता जो भी होता है अफसोस भी होता है कि किसी शहर से एक प्रोडक्ट का इतना बड़ा जुड़ाव हो और कैसे समय के साथ उस प्रोडक्ट का नामोनिशान ही उस शहर से लगता है कि समाप्त हो गया हो अब बिल्कुल ऐसा ही किस्सा सिल्क के प्रोडक्ट और फर्रुखाबाद के साथ है।
खैर मैंने टैक्सी वाले को उस व्यापारी का पता बताया वह मुझको बहुत ताज्जुब हो रहा था कि कैसे रेडियो टैक्सी पर वो लोग रेडियो से पूछते हुए वह बताए हुए पते के स्थान पर बिल्कुल उनके गेट के सामने गाड़ी खड़ी करके हम लोगों को पहुंचा देते हैं। यह तकनीक थी जो अभी हमारे देश में हिंदुस्तान में उपलब्ध नहीं थी और इस कारण ताज्जुब होना लाजमी होता था। मैं व्यापारी के पास गया उनको सारा सैंपल खोलकर दिखाएं सिल्क के स्कार्फ की एक बहुत बड़ी रेंज मेरे साथ थी और उन्होंने बड़ी तसल्ली से सारे प्रोडक्ट देखें लेकिन या तो उनको लेना नहीं था या हमारी दामों में बात नहीं बनी नतीजा यह हुआ कि व्यापार उनसे नहीं बन पाया और मैं चल पड़ा वापस फ्रैंकफर्ट स्टेशन की तरफ जहां से मुझे हाइडिल वर्ग पहुंचना था। हाइडल वर्ग पहुंचते-पहुंचते रात हो चुकी थी वहां पर भोजन करके बातचीत करते हुए न जाने कब निद्रा देवी के आगोश में समा गया।
अगली सुबह विकास वाफ़ना जी और उनके साथी से हमारी बातचीत हुई व हम लोगों ने तय किया कि हम लोग हाइडलबर्ग कैसल देखने जाएंगे।
हाइडल बर्ग जर्मनी की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है, द्वितीय विश्व युद्ध में जब पूरा जर्मनी तबाही का सामना कर रहा था उस समय हाइडल वर्ग उन स्थानों में से था जो बमबारी से बचा रहा। हाइडलबर्ग के विषय में वहाँ रहने वालों से पूछिए तो वो इस बात की बहुत जोर देकर चर्चा करते हैं।उन लोगों के लिए इस बात का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी ने बहुत नुकसान उठाया था और वो होना भी था क्योंकि इस विश्वयुद्ध के तात्कालिक कारकों में भी तो इसी देश का तत्कालीन नेतृत्व था।
हाइडलबर्ग में जर्मनी की सबसे प्राचीन यूनिवर्सिटी है जो सन 1386 ईस्वी में स्थापित हुई थी। इस शहर का अपना एक बहुत मूल्यवान इतिहास रहा है और एकेडमिक सिटी के रूप में कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड से इसकी तुलना की जाती है। हाइडिल वर्ग को जर्मनी की अनऑफिशियल इंटेलेक्चुअल कैपिटल भी कहा जाता है। न जाने कितने विद्वान अकादमीशियन्स,कवि,लेखक आदि हाइडिल वर्ग में आते रहे हैं।ज्यां पॉल सार्त्र,गेटे आदि ने भी हाइडलबर्ग में समय गुजारा था।यह खूबसूरत शहर नेकर नदी की घाटी में स्थित है,ये नदी पूर्व से पश्चिम को बहती है अर्थात यहाँ का ढाल पूर्व से पश्चिम की ओर है।हाइडलबर्ग ही वो शहर है जहाँ 1907 में लगभग 6 लाख से 2 लाख वर्ष पूर्व का मानव का जबड़ा मिला था जो यूरोप में मानव जीवन का सबसे प्राचीन सबूत माना जाता है।इसके लिए "हाइडलबर्ग मैन" टर्म का प्रयोग किया गया है।हाइडलबर्ग में ही 1421 ईस्वी में स्थापित हाइडलबर्ग लाइब्रेरी है जो वर्तमान में जर्मनी की सबसे पुरानी लाइब्रेरी है।जब मुझको इस लाइब्रेरी की जानकारी मिली तो मुझको तक्षशिला और नालंदा के वो विशाल पुस्तकालय याद आ गए जिनमें उपलब्ध ज्ञान के अथाह भंडार को निर्मम और अज्ञानी दरिंदे आक्रमणकारियों ने जला दिया था और जो कई दिन जलते रहे थे।विश्व के प्राचीनतम पुस्तकालयों को जला देने से न सिर्फ भारतवर्ष की प्राचीन ज्ञान और साहित्य की परंपरा का नुकसान हुआ अपितु यह विश्व के लिए भी एक बहुत बड़ा नुकसान था जिसकी भरपाई कैसे भी सम्भव थी ही नहीं।मुझको लगा कि इनकी कुछ शताब्दी पुरानी "प्राचीनतम लाइब्रेरी" के अस्तित्व में आने से कई शताब्दी पूर्व हमारे पुस्तकालय तो आतताइयों की जाहिलियत की भेंट चढ़ चुके थे।
हाइडलबर्ग की एक और खास बात यहाँ की शॉपिंग स्ट्रीट Hauptstrasse है।यह लगभग पौने दो किलोमीटर लंबी स्ट्रीट है और यह यूरोप की सबसे पुरानी,सबसे लंबी और शायद सबसे पसंदीदा शॉपिंग स्ट्रीट्स में से है।इस पर घूमने पर आपको शानदार बुक स्टोर,कपड़ों की दुकानें,फूलों की दुकानें और चॉकलेट की मन लुभाने वाली दुकानें देखने को मिलेंगी।इस पर घूमने का आनन्द ही कुछ और था,खेलते हुए बच्चे,घूमते हुए युगल जोड़े,कुछ किनारों पर फुटपाथ पर भी सामान बेचते लोग सब मिलाकर एक अलग सा माहौल था।हाँलाँकि यहाँ मैं जिक्र करना चाहूँगा हमारे लखनऊ के हज़रत गंज का।जब हम लोग लखनऊ में पढ़ते थे तो हज़रत गंज में घूमने के लिए एक शब्द " गंजिंग" भी प्रचलित था और जिसने लखनऊ में गंजिंग नहीं की उसने वहाँ क्या किया।हाइडलबर्ग की इस हॉप्ट्सट्रासे और लखनऊ के हज़रत की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि हज़रत गंज की भीड़ और रौनक अलग है किंतु यूरोप और खास तौर से जर्मनी में हाइडलबर्ग की इस स्ट्रीट की बात अलग है।दर असल कुछ ऐसे आइकोनिक बाज़ार होते ही हैं जैसे इलाहाबाद का सिविल लाइंस,आगरा का सदर बाजार,जयपुर का चांदपोल और जौहरी बाजार,कोलकाता का बड़ा बाजार,मुम्बई का जवेरी बाज़ार,दिल्ली का कनॉट प्लेस,दुबई का गोल्ड सूक,काहिरा का खान अल खलीली बाज़ार,पेरिस का Champs de Elysees और लंदन की ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट आदि जो लोगों के मन में घर कर जाते हैं।
हाइडलबर्ग शहर से हाइडलबर्ग कैसल 15-20 मिनट में बस से पहुँचा जा सकता है इसके अलावा ट्रेन,ट्राम,टैक्सी के साधन हैं और पैदल भी टहलते हुए जाया जा सकता है।
हम लोग टैक्सी करके कैसल पहुँचे और वहाँ पहुँच कर पहले तो लगा जैसे पहाड़ी के किनारे मसूरी में खड़े हो गए हों लेकिन जब कैसल पर निगाह डाली तो ख्याल आया कि ये हाइडलबर्ग जर्मनी है।यह किला,महल या कैसल जो भी कहिए काफी बड़े इलाके में पहाड़ी पर ऊंचाई पर बना हुआ है।यह कैसल पत्थर से बना हुआ है।वैसे तो इसका बनना सन 1214 में आरम्भ हुआ बताते हैं किंतु प्रिंस Elector Ruprecht 3rd (1398-1410) ने इसकी पहली इमारत इसके अंदर के अहाते में रिहायशी परिसर के रूप में बनवाई थी।यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यह कैसल और इसके बगीचे कई बार बने और कई बार उजाड़े गए।इस कैसल को आकाशीय बिजली गिरने से भी नुकसान पहुँचा है।यह किला कोनिंगस्थल हिल के उत्तरी भाग पर लगभग 80 मीटर की ऊंचाई पर बना है।
इस पहाड़ी पर ऊपर चढ़ कर जब कैसल के हिस्से में पहुँचते हैं तो बड़ा ही मनमोहक दृश्य दिखता है।एक तरफ पहाड़ी की घाटी सी दिखती है तो ऊपर जहाँ खड़े हैं वो बहुत अच्छा हरा भरा अहाता से है जिसके एक तरफ कैसल की ऊंची सी इमारत और दीवार दिखती है।यह किला गौथिक और रैनिसां यानी पुनर्जागरण काल की वास्तुकला से बना है।यह कैसल अनेकों युद्धों,राजनैतिक उतार-चढ़ावों का साक्षी तो रहा है है साथ ही जर्मनी के इतिहास में भी समय-समय पर इसकी और इसके मालिकों की बड़ी भूमिका रही है।
इस कैसल में बड़ा अहाता,इसके किसी समय के आलीशान बगीचे,टावर और पुरानी किले जैसी इमारतें सब मिल कर इसके ऐतिहासिक महत्व के साथ ही साथ इसकी ख़ूबसूरती को भी बयान करते हैं।एक तरफ निगाह डालने पर इसके एक पुराने किले की ऊंची टूटी हुई दीवार में खाली दरवाजे और झरोखे अहसास कराते हैं कि शायद ये जर्मनी और हाइडलबर्ग का हवामहल था।
इस कैसल का जिक्र बहुत से प्रसिद्ध लोगों ने किया है।1838 में प्रसिद्ध फ्रेंच लेखक विक्टर ह्यूगो ने इस कैसल की ख़ूबसूरती का बहुत अच्छा वर्णन किया है।1880 में अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने भी अपनी ट्रैवल बुक A Tramp Abroad में हाइडलबर्ग कैसल का जिक्र किया है।अनेकों प्रसिद्ध हॉलीवुड मूवी में इस स्थान की शूटिंग की गई है।विकास बाफना ने मुझको बताया कि जेम्स बॉन्ड की प्रसिद्ध फ़िल्म A Spy Who Loved Me में भी इस कैसल की शूटिंग की गयी है।
हम तीनों लोगों ने उस मनोरम इलाके का खूब आनन्द उठाया,उस कैसल और उस इलाके के इतिहास,भूगोल,सुंदरता,सामरिक महत्व आदि की चर्चा की।वहीं पर आइसक्रीम मिल रही थी और हम तीनों का मन हुआ कि आइसक्रीम खाएं तो हम लोग आइसक्रीम वाले के पास पहुँचे और मैंने आइसक्रीम वाले से तीन आइसक्रीम देने को कहा कि तभी विकास ने कहा कि तीन नहीं पाँच आइसक्रीम लीजिए।मैंने विकास की तरफ प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा तो उसने पास ही खड़े दो लोगों के लिए कहा कि इनके लिए भी।उन दोनों को मैं पहचान नहीं पा रहा था,दोनों लोग बढ़िया जींस और टी शर्ट पहने हुए स्मार्ट से नौजवान लग रहे थे जिनमें से एक का सर घुटा हुआ अर्थात गंजा था।विकास ने कहा अरे इनको पहचाना नहीं आपने तो मैं क्या कहता क्योंकि मैं वाकई उनको पहचान नहीं पा रहा था फि वो और पास आकर हँसे और उनको पहचान गया था।वो घुटे सर वाले शिखा धारी हाइडलबर्ग के इस्कॉन मंदिर वाले ओडिशा वाले पुजारी जी थे शायद।मैंने विकास की तरफ देखा तो उसने पुष्टि की कि हाँ ये वही थे।मंदिर में वो सिर्फ धोती पहने,चंदन त्रिपुंड लगाए रहते थे और यहाँ बिल्कुल आधुनिक पहनावे में अपने साथी के साथ थे तो पहचानने में समस्या आना स्वाभाविक ही था।फिर तो हम सब ही हँस पड़े और फिर वापिस चल दिये हाइडलबर्ग शहर की ओर।
हाइडलबर्ग पहुँच कर मैंने वहाँ की कुछ दुकानों पर चक्कर लगाए स्कार्फ, पत्थर,झाड़-फानूस सभी से सम्बंधित दुकानों पर गया किंतु बात नहीं बनी और इसकी जो मुख्य समस्या सामने मालूम पड़ रही थी वो ये थी कि ये सब दुकानदार थोड़ा-थोड़ा सामान खरीदकर बेचते रहते थे जो इनका काम इम्पोर्टर या होलसेलर से माल लेकर बन जाता था जबकि सीधे इम्पोर्ट करने में इनको ज्यादा माल लेना पड़ता और जिसकी वजह से ज्यादा इन्वेंट्री रखने में झंझट और लागत दोनों ज्यादा होते।
रात को खाने में एक बहुत मजेदार वाकया हुआ।हुआ कुछ यूँ कि रात को जब हम सभी लोग साथ-साथ खाने बैठे तो मथुरा,ब्रज और मेरे वहाँ के कनेक्शन की चर्चा शुरू हो गयी।इसी बीच हम खाना परोसा चुके थे और मैंने खाना खाते हुए अपने हाथ में चावल का एक कौर उठाया।चावल मुँह तक नहीं पहुँचा तब तक वहीं के एक यूरोपीय इस्कॉन शिष्य ने मुझसे कहा कि अरे आज आप चावल कैसे खा रहे हैं?आज तो एकादशी है,आप तो मथुरा से हैं तो एकादशी के दिन तो वैष्णव लोगों में चावल खाने का निषेध है फिर आप कैसे खा रहे हैं…???
अब तो मेरे सामने बहुत बड़ा धर्म संकट उत्पन्न हो गया।इधर हाथ में चावल का कौर और उधर एकादशी….
मेरे पास अब भगवान श्री कृष्ण का ही सहारा था,मैंने उनको याद किया और उत्तर हाजिर था।मैंने उन लोगों को यह जवाब दिया कि भाई ये नियम सन्यासियों का है,हम लोग गृहस्थ हैं और हम पर यह नियम लागू नहीं होता,यह कहते हुए मैंने वो चावल मुस्कुराते हुए अपने उदरस्थ किया।
अगले दिन हम लोगों का डुसेलडॉर्फ का कार्यक्रम था जहाँ विकास के कोई परिचित रहते थे।
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