Sindbad Travels-37Germany-6 Dusseldorf

सिंदबाद ट्रैवल्स-37
जर्मनी-6 
डसेलडर्फ

Sindbad Travels-37
Germany-6
Dusseldorf

Dusseldorf Coordinates 
51° 14' N
6° 47' E

अगले दिन सुबह उठ कर हम लोग डसेलडर्फ के लिए चल दिये जिसके लिए हम पहले ट्रेन लेकर फ्रैंकफर्ट गए और फिर वहाँ से डसेलडर्फ को जाना था।फ्रैंकफर्ट के हौफ्टबानहॉफ से हमने डुसेलडॉर्फ के लिए ICE train ली।ये 1991 की बात है तब हमारे भारत में रेल और रेल सेवा बहुत अच्छी नहीं थी।वैसे भी जर्मनी की ICE Trains तो लाजवाब हैं।गजब की साफ-सफाई,बिल्कुल समय से चलना,गजब की स्पीड और शानदार डिब्बे;यानी कुल मिलाकर एक अद्भुत, आनन्ददायक, आरामदेह सफर की गारंटी।
फ्रैंकफर्ट से डुसेलडॉर्फ का सफर लगभग डेढ़ से पौने दो घंटे का,180 किमी के लगभग का था और डुसेलडॉर्फ के लिए फ्रैंकफर्ट से उत्तर पश्चिम की यात्रा करनी होती है।ये रास्ता बहुत ही शानदार है।ट्रेन लगभग पूरे रास्ते राइन (Rhine) नदी के सहारे सहारे चलती है।एक तरफ मनोरम हरियाली, कहीं-कहीं पहाड़ के मनभावन दृश्य,नदी में चलते क्रूज़ वाले जहाज जिन पर जर्मनी का झंडा फहराता दिखता था और ऐसा लग रहा था कि ट्रेन भले ही नदी के किनारे थी पर जैसे तैरती सी ही चल रही थी।हमारे देश में भी रेल के बहुत से शानदार रास्ते/ट्रैक हैं पर फ्रैंकफर्ट से डुसेलडॉर्फ का यह रास्ते वास्तव में मेरे देखे/चले ट्रेन के सर्वश्रेष्ठ रास्तों में से एक था।इसकी टक्कर का ही एक और रास्ता था म्यूनिख से वेनिस का पर उसकी चर्चा आगे करूंगा।
जल्द ही हम लोग डुसेलडॉर्फ पहुँच गए वहाँ स्टेशन पर ही विकास के दोस्त जो पंजाब से थे वो अपनी कार से हमको लेने आ गए थे।इन का नाम सूद साहब था।ये लगभग 5 फिट 4-5 इंच के गोरे, गठे शरीर वाले हँसमुख स्वभाव के व्यक्ति थे।उन्होंने मुस्कुराते हुए हम सबका स्वागत किया और फिर मार्केट में अपनी दुकान पर आए गए।सूद साहब का कपड़ों का काम था।सूद साहब ने हमको बर्गर आदि खाने में खिलाया और भरपेट कहा कर हम लोगों ने उनके साथ डुसेलडॉर्फ का चक्कर लगाया।
डुसेलडॉर्फ एक सुंदर शहर है जिसको राइन नदी दो भागों में बांटती है।शहर का पुराना हिस्सा जो Altstadt कहलाता है यह नदी के पूर्वी ओर अवस्थित है जबकि आधुनिक हिस्सा पश्चिमी तट की तरफ है।डुसेलडॉर्फ जर्मनी की फैशन कैपिटल कहलाती है।यह शहर फैशन इंडस्ट्री,आर्ट और म्यूज़िक के लिए प्रसिद्ध है।यह शहर जर्मनी के North Rhine Westphalia की राजधानी है।Altstadt अपनी शानदार बीयर Altbier और अपनी नाइट लाइफ के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। डुसेलडॉर्फ की चौड़ी सड़कें,किनारे पर करीने से कटे-छंटे ख़ूबसूरत पेड़,फव्वारे,बड़े शानदार चर्च,फार्मर्स मार्केट,कैंसर प्लात्ज ये सभी बहुत ही सुंदर नजारे थे।यूरोप के अधिकांश शहरों में और खासतौर से जर्मनी में कई स्थान ऐसे दिखते हैं जो सुंदर तो बहुत हैं किंतु वहाँ का सन्नाटा और नीरवता आपको उदास सा करने लगती है और डुसेलडॉर्फ में भी कुछ जगहों पर मुझको ये उदास ख़ूबसूरती फैली मिली।
सूद साहब ने बताया कि उनका कपड़ों,फैशन के वस्त्रों आदि का व्यापार है और उन्होंने वहीं की एक जर्मन युवती से शादी की हुयी है।उन्होंने मुझको बताया कि मुझसे रिटेलर्स सामान नहीं लेंगे और मुझको इम्पोर्टर्स और होल सेलर्स को खोजना चाहिए।उस समय तक मुझको व्यापार मेले/ट्रेड फेयर्स के विषय में कोई जानकारी नहीं थी;न कोई बताने वाला था और न ऐसा कोई ट्रेड फेयर उस समय हमारे देश में लगता ही था।इतने समय में मेरी समझ में भी यह बात आ गयी थी कि यूरोप में काम करने हेतु मुझको अभी और तैयारी करनी होगी तभी यहाँ का व्यापार सम्भव हो सकेगा और इसलिए अब आगे इस यात्रा के बचे हुए दिन मैंने एक सैलानी की भांति बिताने का विचार कर लिया था और वैसे अरब देशों से मिले ऑर्डरों के कारण मेरा एक्सपोर्ट का व्यापार शुरू होना तो सुनिश्चित हो ही चुका था,यात्रा का उद्देश्य तो सफल हो ही चुका था।
सूद साहब से बातचीत में मालूम पड़ा कि उनका रहना,खाना और सोना अपनी दुकान में ही होता था हाँलाँकि अपनी जर्मन पत्नी के पास भी किसी-किसी दिन वो रह लेते थे और अपने जीवन से वो संतुष्ट और सुखी थे।मुझको ऐसा लगा कि इन विकसित देशों में विकासशील देशों के बहुत से नौजवान वहीं की लोकल लड़कियों से इसलिए भी शादी कर लेते थे जिससे उनको वहाँ रहने/बसने की सुविधा और अधिकार प्राप्त हो जाये।
डुसेलडॉर्फ मुझको एक अच्छा शहर लगा लेकिन सच्ची बात ये थी कि शहर से ज्यादा मेरा दिल फ्रैंकफर्ट से डुसेलडॉर्फ जाने वाले रास्ते पर फिदा था।ये एक ऐसा मनोरम रास्ता था जिस पर चलने से शायद ही किसी का मन कभी भरे।
हम लोग डुसेलडॉर्फ से फ्रैंकफर्ट को वापिस चल पड़े थे।ICE ट्रेन के फर्स्ट क्लास के डिब्बे में बैठ कर और बाहर का मनोरम दृश्य एक अजीब ही समां बना रहे थे।मैं रास्ते में सोच रहा था कि कब वो दिन आएगा जब हमारे देश में भी इसी किस्म की शानदार रेलगाड़ियां और रेल सेवा होगी,ऐसे सुंदर शहर होंगे।मेरा मन सूद साहब की कहानी से कुछ अन्यमनस्क सा भी था क्योंकि मैं सोच रहा था कि भला ऐसे हमारे देश में कब तक चलेगा कि हमारे देश के नौजवान अच्छे जीवन स्तर की चाह में विदेश जाकर दुकान में सोने का जीवन जीने को मजबूर नहीं होंगे।मनुष्य की नैचुरल प्रवृत्ति है बेहतर की ओर उन्मुख होना किंतु कई बार यह तय करना ही मुश्किल हो जाता है कि दरअसल बेहतर है क्या?वो जो प्राप्त किया या वो जिसको यह प्राप्त करने को छोड़ना पड़ा या जिससे समझौता करना पड़ा?लेकिन शायद मानव के लिए यह सदा सर्वदा से शास्वत प्रश्न समक्ष खड़े रहे हैं और प्रत्येक व्यक्ति अपनी सोच,समझ और परिस्थिति के अनुरूप ही इनका उत्तर तलाश करता है।
डुसेलडॉर्फ की यात्रा पूरी करके हम लोग फ्रैंकफर्ट से वापिस हाइडलबर्ग आ गए थे।मैं विकास और उनके साथी आपस में यही चर्चा कर रहे थे कि हाइडलबर्ग हमारे हिंदुस्तान के मापदंडों से एक बहुत छोटा शहर है किंतु यहाँ कितना विकास है।किसी भौतिक सुविधा की कमी नहीं है।यूरोप के अधिकांश शहरों में जहाँ मैं गया बच्चों के खेलने को,लोगों के घूमने को पार्क दिखे,शहरों में न सिर्फ साफ सफाई दिखी (कुछ अपवाद छोड़ कर) बल्कि लोग इसके प्रति सचेत भी दिखे जो एक ऐसी चीज है जो हम सभी भारतीयों को सीखनी चाहिए।
मैं इस बात से भी बहुत चमत्कृत था कि जर्मनी एक ऐसा देश था जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध के आखिरी दिनों में बहुत बर्बादी को झेला था और कुछेक स्थान छोड़ कर इस देश का चप्पा-चप्पा बर्बाद हो गया था किंतु इन लोगों ने अपनी मेहनत के बलबूते पर अपने देश को न सिर्फ फिर से खड़ा कर लिया अपितु विश्व के अग्रणी विकसित देशों की गिनती में भी शामिल हो गया।
अगला दिन मेरा जर्मनी की इस यात्रा का आखिरी दिन होना था और इसलिए इस आखिरी दिन का उपयोग इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मैं बर्लिन यात्रा में करना चाहता था।हाल ही में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण होकर चुका था और मेरा मन उस स्थान को देखने का था जहाँ कभी एक दीवार हुआ करती थी बर्लिन के बीचोबीच जो इस देश को दो भागों में बांटती थी।

Comments

Popular posts from this blog

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

So you are on the wrong side of the barricades

अथ श्री बार्बर कथा