सिंदबाद ट्रैवल्स-43इटली-5रोम :- वैटिकन सिटीSindbad Travels-43Italy-5Rome :- Vatican City

सिंदबाद ट्रैवल्स-43
इटली-5
रोम :- वैटिकन सिटी

Sindbad Travels-43
Italy-5
Rome :- Vatican City

जब हम लोग खाना खा कर चलने को निकलते तब तक मद्रासी कर्नल साहब तबाची-तबाची करते हुए एक तरफ निकल गए थे।हम लोग उनका इंतजार करने लगे तो श्रीकृष्ण भक्त ड्राइवर साहब हमको बता रहे थे कि रोम में रहने वाले लोगों को रोम से बहुत प्यार होता है और उनको वो इटैलियन हैं इससे भी ज्यादा गर्व इस बात पर होता है कि वो रोमानो हैं।मुझको लगा कि कुछ ऐसा ही पेरिस वालों में भी है पर फर्क इतना है कि उनमें एक ऐंठ सी है इस बात की जो रोम वालों में नहीं दिखी।यहाँ मुझको लगा कि हमारी भाषा हिंदी में जो शब्द घमंड है वो पेरिस वाले पैरीसियन्स पर जबकि गर्व शब्द रोमानो लोगों पर उपयुक्त लगता है।
रोम में हमको सड़कों पर घोड़ागाड़ी भी चलते हुए दिखी और बहुत ट्रैफिक भी।यहाँ की गाड़ियों की नम्बर प्लेट पर Roma और गाड़ी का नम्बर लिखा होता है।हमारी वाली कार का नम्बर Roma 7013 था।यहाँ यह बताना भी रोचक है कि हमारे श्रीकृष्ण भक्त टैक्सी ड्राइवर साहब अमिताभ बच्चन के भी प्रशंसक थे और हमसे उनकी फिल्मों की बातें कर रहे थे।मैंने इजिप्ट में भी अमिताभ बच्चन और श्री देवी का जबरदस्त क्रेज़ वहाँ के लोगों में देखा था और मुझको लगा कि हमारी फिल्में और फिल्मों के कलाकार भी हमारी संस्कृति के दूतों के रूप में जबरदस्त कार्य करते हैं।यहाँ एक और बात थी कि हिंदुस्तान के एक व्यापारी जो विदेशों में अपनी पहचान बना रहे थे उनकी भी चर्चा श्रीकृष्ण भक्त टैक्सी वाले ने की।उसने कहा कि एक हिंदुस्तानी इंडस्ट्रियलिस्ट कई जगह काम कर रहा है।पहले तो मेरी समझ में नहीं आया फिर थोड़ी और बात करने पर मालूम पड़ा कि वो हिंदुजा वालों की बात कर रहा था।मुझको इस बात पर एक अच्छी अनुभूति भी हुई कि पहले दुबई में जम्बो इलेक्ट्रॉनिक्स के संदर्भ में लोग मनु छाबरिया का नाम ले रहे थे और अब इटली वाले हिंदुजा का।मेरा आशय यह है कि विश्व के पटल पर भारतीयों की पहचान अध्यात्म,सिनेमा से आगे जाकर खेल और उद्योग व्यापार के क्षेत्र में भी बननी शुरू हो चुकी थी।
अब तक कर्नल साहब भी आ गए थे और हम लोग चल दिये थे ईसाई धर्म के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण स्थानों में से एक वैटिकन की ओर।
वैटिकन अपने आप में एक स्वतंत्र देश है जो सीमाओं के हिसाब से विश्व का सबसे छोटा देश है और रोम के एक तरह से अंदर ही स्थित है।यह रोमन कैथोलिक चर्च का मुख्यालय है और कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु बिशप ऑफ रोम जिनको पोप कहा जाता है वो यहीं रहते हैं और इस देश के राजप्रमुख वही होते हैं।यहाँ की आबादी इस समय लगभग 825 के करीब है।यह देश 121 एकड़ में फैला हुआ है और इटली से अलग होकर यह 1929 ईसवी सन में यह अलग देश बना।यहाँ के सभी उच्च पदाधिकारी रोमन कैथोलिक धर्माचार्य ही हैं।यहाँ की अर्थव्यवस्था दान, यहाँ के स्मारक चिन्हों, पोस्टेज टिकटों की बिक्री,म्यूज़ियम के टिकट आदि की बिक्री से चलती है।यहाँ कोई टैक्स नहीं है और सारी चीजें ड्यूटी फ्री हैं।इस देश का इटालियन में नाम citta dei Vaticano है।यह एक यूनेस्को द्वारा घोषित वर्ल्ड हैरीटेज साइट भी है।
चूँकि इस स्थान का धार्मिक,सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है तो यहाँ पर ओरीतकों के लिए बहुत सारी देखने योग्य सहीजें हैं और पर्यटक आते भी बहुत हैं।यहाँ पर आपको कला,मूर्तिकला,पेंटिंग्स,वास्तुकला के नायाब उदाहरण देखने को मिलेंगे।यहाँ "Laocoon and His Sons" जैसी विश्व प्रसिद्ध मूर्तिकला के नायाब उदाहरण देखने को मिलेंगे।यह एक प्रसिद्ध मूर्ति है जिसमें ट्रोजन पुजारी लाओकून और दो उसके पुत्रों की आदमकद मार्बल की बनीं मूर्तियां हैं जिनपर 
समुद्री सरीसृप हमला कर रहे हैं।यह मूर्ति रोम की खुदाई में मिली थी और अब वैटिकन म्यूज़ियम में रखी हुई है।यह इतनी सजीव बनी हुई है कि आप इसको देख कर दंग रह जाएंगे।
वैटिकन में आप जब सेंट पीटर्स स्क्वायर की ओर घुसते हैं तो लोगों को नियंत्रित और शायद व्यावस्थित रखने को बहुत रेलिंग भी लगी नजर आती हैं।इस इलाके में प्रवेश  करते ही  बीच में प्रसिद्ध सेंट पीटर्स स्क्वायर है जो आपको मेहराबदार विशाल प्रवेश द्वार से इस देश में घुसते ही नज़र आता है और उसका बरामदा जो बहुत ही विशाल खंभों से जैसे भरा हुआ सा है।यहाँ जमीन पर एक गोला बना है जिसको यहाँ के लोग पृथ्वी का केंद्र मानते हैं तो मुझको अपनी  भोले बाबा की काशी नगरी याद आयी जिसको हम और हमारी संस्कृति पृथ्वी का केंद्र मानते हैं।यहाँ ओर एक गोले जैसे पेंटेड स्थान पर खड़े होकर सामने देखने पर बरामदे की इमारत के खम्भे ऐसा लगता है जैसे इमारत खम्भो की केवल एक पंक्ति पर ही खड़ी है जबकि दूसरे गोले से खड़े होकर देखने पर खम्भों की तीन पंक्ति नजर आती हैं जो हैं भी तीन।सामने विशाल सीढियां नजर आती हैं और सामने ही बड़ा सा गुम्बद है उस पर विशाल और अद्भुत मूर्तियां बनी हुयी हैं।एक बड़ी सी घड़ी लगी है और मैंने पाया कि यूरोप की वास्तुकला-इमारतों में घड़ी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
यहीं सामने पूरी दीवार पर एक पट्टी जैसे रूप में बड़ा सा कुछ लिखा भी है।एक बात जो इस लिखावट को देखकर मेरे ध्यान में आई वो यह कि हमारे आगरा के ताजमहल और सिकंदरा के प्रवेश द्वारों पर ऐसे ही बहुत बड़े आसानी से पढ़े जा सकने वाले साइज़ के अक्षरों में कुरान की आयतें लिखी हुयी हैं और वो भी बेहतरीन कैलीग्राफी का नमूना हैं।
यहीं पर एक तरफ इमारत में ही पत्थर पर अभी तक हुए सारे पोप लोगों के नाम खुदे हुए हैं।जिसमें पहला नाम S PETRVS 67 VEL 64 लिखा है।उस समय के पोप जॉन पॉल द्वितीय थे (1991 में जो 1978 से पोप थे) और पत्थर पर आखिरी पोप जिनका नाम उस समय लिखा हुआ था वो Jonnes Pavlys 1 1978 लिखा था।यहाँ ये भी बता दूँ कि 1978 में तीन पोप एक के बाद एक हुए थे क्योंकि पोप जॉन पॉल प्रथम का कार्यकाल बहुत ही छोटा रहा था,उनकी मृत्यु हो जाने के कारण।
इस विशाल स्क्वायर में मिस्र देश के सिकंदरिया शहर में बना एक विशाल स्मारक स्तम्भ जिसको प्रसिद्ध ओबिलिस्क कहा जाता है और जिसको मिस्र से रोम प्रसिद्ध राजा कैलीगुला लाया था वो लगा हुआ है।बताते हैं कि इस स्तंभ के ऊपर एक धातु का गोला है जिसमें प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीज़र की अस्थियों की राख थी ऐसा माना जाता था।रोम में 8 इजिप्ट के स्मारक स्तम्भ और 5 प्राचीन रोम के स्मारक स्तम्भ हैं।यहाँ एक और चीज ने मेरा ध्यान आकर्षित किया वो एक लंबे बड़े खम्भे पर कांसे की बनी मुर्गे की विशाल मूर्ति ने।यह मूर्ति नौवीं शताब्दी की है।पोप लियो चतुर्थ ने इसको पुराने कॉन्सटेंटाइन बासिलिका के घण्टाघर के स्तम्भ के ऊपर लगवाया था।बताते हैं कि घण्टाघर के स्तम्भ पर मुर्गे की मूर्ति सजगता और रात के अंधेरे के पश्चात सुबह की पौ फटने की प्रतीक मानी जाती हैं।
वैटिकन का एक और प्रसिद्ध स्थान-स्मारक है सेंट पीटर्स बैसिलिका।इसको समय समय और अनेकों प्रसिद्ध वास्तुविदों ने बनाने में योगदान दिया और जिसमें ब्रमांते, जिआकोमो डेला पोर्ता,मदेरनो और बर्नीनी आदि का नाम प्रमुख है।इसको यूरोपीय पुनर्जागरण की वास्तुकला के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में जाना और माना जाता है।
वैटिकन के प्रसिद्ध सिस्टिन चैपल या पूजाघर-गिरिजाघर की एक बहुत बड़ी खासियत इसकी छत और दीवारों पर बने भित्ति-चित्र (frescos) हैं।आप जब वहाँ पर होते हैं और उस स्थान से गुजरते हैं तो आपकी निगाह जिधर जाती है उधर आपको कला के बेहतरीन नमूने देखने को मिलते हैं,जिनको बनाने वालों के नाम भी कला की दुनिया में अमर हैं जैसे पर्युजीनो,डोमिनको घिरलैंडियो, बोत्तीसेल्ली,रफाएल, फ्रा एंजेलो और यहीं आपको देखने को मिलती है चित्रकार माइकलएंजिलो की बनाई प्रसिद्ध कृति 'लास्ट जजमेंट' ।इसी सिस्टिन चैपल की छत पर आप की निगाह जाएगी तो आपको माइकल एंजेलो की ही एक और प्रसिद्ध कृति 'द क्रिएशन ऑफ एडम' देखने को मिलेगी।यहाँ आपको 3 डाइमेंशनल पेंटिंग भी देखने को मिलेगी।इन पेंटिंगों में चतकीले रंगों का भी प्रयोग बखूबी से किया गया है।यहाँ के इस चैपल का फर्श जो डिजाइनदार मार्बल से ही बना है देखने लायक है।
वैटिकन घूमने के लिए लगभग एक डेढ़ घण्टे का समय काफी था और फिर गाड़ी दूर खड़ी होने के कारण हम इस देश से पैदल ही निकल कर दूसरे देश यानी इटली में प्रवेश कर गए।यहाँ से थोड़ी दूरी पर इस्कॉन वालों का भारतीय रेस्टॉरेंट गोविंदा था जहाँ हम चाय नाश्ते के लिए प्रवेश कर गए।यह रेस्टॉरेंट एक बड़े हॉल में था जिसमें करीने से गोल मेजें लगी थीं जिन के चारों ओर कुर्सियां थीं।इस रेस्टॉरेंट की पहली मंजिल पर भी कुछ बना था और कुछ मेहराब वाली खिड़कियां सी बनी थीं जिसमें से खड़े होकर किसी ने हमको आवाज दी हरि बोल।जब हमने सर उठा  कर ऊपर उधर देखा तो वो हमारे मंदिर के सूट पहने शिखाधारी गंजे पुजारी जी थे।मुझको हमारे टैक्सी वाले महाशय ने बताया था कि वहीं पास में रोम के बस से देखने के टूर का टिकट मिलता है तो अगले दिन के लिए मैंने वो टिकट वहीं से अपनी बुकिंग करा के ले लिया।
अब शाम हो चली थी तो श्रीकृष्ण भक्त टैक्सी ड्राइवर साहब हम लोगों को रोम की स्ट्रीट्स दिखाने ले गए।एक गली को देख कर मैं चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सका।इस स्ट्रीट में सड़क पर हरे रंग का कार्पेट बिछा हुआ था पूरे रास्ते पर।यहाँ बहुत चहल पहल थी,दुकानीं थीं और रेस्टॉरेंट भी थे।यहीं हमको धोती कुर्ता पहने शिखाधारी गंजे सर  वाले त्रिपुंड धारी एक और इस्कॉन भक्त मिल गए और फिर क्या था पहले तो श्रीकृष्ण भक्त टैक्सी ड्राइवर साहब और उनकी कुछ बातचीत हुई और फिर वहीं सड़क पर उन्होंने थोड़ा कीर्तन किया जिसमें कर्नल साहब,उनकी पत्नी,हमारे पुजारी जी और मैं खुद भी हरि बोल करते हुए शामिल हुए साथ में कुछ लोग जो वहाँ खड़े थे वो भी और ऐसा लगा जैसे कि रोम की गलियों में वृंदावन उतर आया हो हरे कृष्णा हरे रामा रामा रामा हरे राधे;हरि बोल,हरि बोल,हरि बोल।
इस आनन्ददायक अनुभूति के साथ ही उस दिन की हमारी यात्रा समाप्त हुई और हम वापिस अपने इस्कॉन गैस्ट हाउस में आ गए थे।गैस्ट हाउस लौट कर वहाँ के और डिवोटीज़ के साथ काफी बातचीत होती रही और ज्योतिष की चर्चा छिड़ गई।एक इटली के भक्त ने अपना हाथ मुझको दिखाया अब मुझको नहीं पता कि मुझको हाथ देखना आता था या प्रभु श्रीकृष्ण जी की कृपा हुयी कि मैंने उस से कहा कि मुझको लगता है कि आप किसी गम्भीर अपराध में लिप्त रहे हैं तो वो चमत्कृत हो गया और उसने बताया कि उससे अनजाने में एक गम्भीर हत्या का अपराध हो गया था और उसकी सजा काट कर अब वो भगवान श्रीकृष्ण की सेवा में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।बात करते करते रात्रि पूजा और कीर्तन का समय हो चला था।सच बताऊँ तो उस कीर्तन में मुझको भी आनन्द आने लगा था।वहाँ हॉल में एक तरफ इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद की आदमकद बैठी हुई मूर्ति,सामने श्री राधाकृष्ण के मनमोहक विग्रह और मंजीरा मृदंग की ताल पर चैतन्य महाप्रभु की याद दिलाता हरे रामा हरे कृष्णा,रामा रामा हरे राधे,हरि बोल,हरि बोल के समवेत स्वरों में अपनी सुध बुध भूल जाएं,प्रभु की भक्ति का आनन्द माइक ऐसा अद्भुत समां बंधता था उस कीर्तन से जिसके विषय में यही कह सकता हूँ कि "गूंगे केरी सरकरा,खाये और मुस्काय।"
इस कीर्तन आदि के बाद कमरे में आकर सोना था क्योंकि अगली सुबह मेरा बस के द्वारा रोम का डे टूर करने का इरादा था।

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