सिंदबाद ट्रैवल्स-42इटली-4रोम :- फॉण्टाना दे ट्रेवी और पैन्थियोनSindbad Travels-42Italy-4Rome

सिंदबाद ट्रैवल्स-42
इटली-4
रोम :- फॉण्टाना दे ट्रेवी और पैन्थियोन

Sindbad Travels-42
Italy-4
Rome

अगले दिन सुबह यानी कि 22 अक्टूबर 1991 को हम लोग श्री कृष्ण भक्त जी की टैक्सी से रोम के भ्रमण को निकलने के लिए तैयार हो गए।इसके पहले सुबह ही सुबह मंदिर में पूजा और भजन में शामिल होने से एक अलग ही किस्म के आनन्द की अनुभूति हो रही थी।शांत वातावरण में हरे कृष्णा हरे रामा हरि बोल के स्वरों के साथ ढोलक मृदंग बजाते डिवोटी और पूजा करते पुजारी ये सब मिलाकर एक अलग ही माहौल बन जाता था।वहाँ उस परिसर में ही एक काफी बड़ी लाल से रंग की मूर्ति थी जो मुझको बाल कृष्ण लड्डू गोपाल की ही लगी और उसके पास खड़े होकर मद्रासी कर्नल साहब और धोती पहने त्रिपुंड धारी भारतीय पुजारी जी हरि बोल Our India is the Best के नारे से भी लगाते दिखे।
टैक्सी में हम चार लोग यानी मैं,कर्नल साहब,उनकी पत्नी और पुजारी जी को जाना था और हमारी इस दिन भर की यात्रा के श्री कृष्ण भक्त टैक्सी वाले से अति मुनासिब दाम पर 5000 (पाँच हजार) मिली लीरा प्रति व्यक्ति देना तय हुआ था।हम लोग रोम शहर की यात्रा को तैयार थे तो मैंने कर्नल साहब से पूछा कि पुजारी जी कहाँ रह गए तो उन्होंने इशारा किया कि वो तो गाड़ी में बैठ रहे हैं देखो और मेरी फिर से एक बार चौंकने की बारी थी क्योंकि जींस शर्ट पहने एक बढ़िया बैग लटकाए मुस्कुराते हुए वो गंजा शिखाधारी  नवयुवक असल में पुजारी जी ही थे जो गाड़ी में हम लोगों के साथ बैठे थे।
हमारी टैक्सी में रोमन भाषा का ही कोई गाना बज रहा था जो समझ तो नहीं आ रहा था किंतु संगीत कर्णप्रिय था।गाड़ी में ड्राइवर के सामने शीशे के बीच में रियर व्यू मिरर पर एक माला लटक रही थी और डैशबोर्ड पर भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी की फोटो विराजमान थी।ड्राइवर को अंग्रेज़ी इतनी ही आती थी जितनी प्रयास करके बस हम समझ ही सकते थे।हॉं वो श्रीकृष्ण भक्त ड्राइवर हर थोड़ी देर पर हम लोगों से बहुत गर्व से यह जरूर बताता था कि सोनो रोमानो मतलब I am Romano.वो यह भी कहता था I am Romano and I am Italiano.
हम लोग जैसे ही रोम शहर में घुसे एक बार फिर से वहाँ की सुंदरता हमारा ध्यान आकर्षित करने लगी।रोम को मूर्तियों का शहर भी कह सकते हैं।रोम में स्थान-स्थान पर फव्वारे बने हुए हैं जो बहुत सुंदर हैं और मूर्तिकला से सुसज्जित हैं।इन फव्वारों या फाउंटेंस से पिआत्ज़ा Piazza यानी कि बड़े चौक की सुंदरता भी बढ़ती है और लोगों को पीने के लिए पानी भी मिलता रहा है।यहाँ की मूर्तियां इनके सौंदर्य में चार चाँद लगाती हैं।इन मूर्तियों-चौराहों पर लोग घूमने आते हैं,इकट्ठे होते हैं खास तौर पर टाकिंग स्टैच्यूज़ के पास और अपने विचार व्यक्त करते हैं,सामयिक विषयों पर चर्चा करते हैं।इन मूर्तियों और मूर्ति वाले स्थानों में the talking statues में the pasquino और marforio काफी प्रसिद्ध हैं और लोग यहाँ एकत्रित होकर व्यंगात्मक और प्रतीकात्मक लहजों में सामयिक विषयों की चर्चा करते हैं।यह उनकी संस्कृति का अंग है जैसे हमारे कुछ शहरों जैसे दिल्ली,लखनऊ, इलाहाबाद आदि में कॉफी हाउस का रोल रहता है।यूरोप के लगभग सभी शहरों की भांति रोम में भी सड़क के किनारे फुटपाथों पर बड़ी छतरी लगाए हुए आपको टेबल-चेयर लगे रेस्टोरेंट दिखेंगे,जर्मनी में इनमें बीयर का बहुत रिवाज है जबकि रोम में पीत्जा और पास्ता काफी दिखा।
रोम की वास्तुकला क्लासिकल से लेकर इम्पीरियल रोमन स्टाइल और आधुनिक फासिस्ट स्टाइल तक फैली हुई है जो आपको देख कर समझ में भी आती है।क्लासिकल आर्किटेक्चर में नई चीजें क्रमशः विकसित होती गईं जैसे डोम, आर्च और वॉल्ट आदि।शुरू में 11वीं,12वीं और 13वीं सदी की इमारतों में आपको अर्धवृत्ताकार मेहराबों का प्रयोग दिखता है जो क्लासिकल रोमानस्क स्टाइल है जो बाद में चलकर गौथिक स्टाइल के नुकीले मेहराबों में परिवर्तित होती दिखती है।रोम की बाद की इमारतों में विशालता, वैभव, बीच में बड़ी खुली जगह, आदि जैसा रैनिसां का प्रभाव और बड़े ऊँचे गुम्बद और चर्चों में केंद्रीय गुम्बद जो बहुत ऊंचाई पर होते हैं उनसे आती प्राकृतिक रोशनी जैसा बारक्यू आर्किटेक्चर का प्रभाव जो स्वर्ग और पृत्वी के सम्बंध को दर्शाता प्रतीत होता है वो दिखता है।बाद की इमारतों का वास्तु ज्यादा आधुनिक होता गया है।रोम शहर की ख़ूबसूरती में टाइबर नदी पर बने हुए शानदार मूर्तियों वाले मेहराबदार पुल चार चाँद और लगा देते हैं।मैं सोच रहा था कि फ्रैंकफर्ट,पेरिस,लंदन,रोम और हमारे यहाँ दिल्ली,आगरा,कानपुर, लखनऊ,प्रयाग,वाराणसी आदि शहर भी नदियों के किनारे बसे हैं,हमारे यहाँ नदियों में स्नान,उनके किनारे शव जलाना तो हम लोगों की संस्कृति है किंतु हम आज भी नदियों के किनारों,उनके आसपास के स्थानों अर्थात उनका विकास पर्यटन स्थलों के रूप में नहीं कर पाए हैं।रोम के पुराने प्रसिद्ध पुलों में Ponte dei Quattro Capi,Ponte sisto,Ponte Rotto, Ponte Vittoro Emanuele आदि हैं।एनसायक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार रोम के पुराने सर्वाधिक सुंदर पुलों में जो आज भी मौजूद है वो है Ponte Sant' Angelo जो सन 135 ईसवी में बना था और सन 1688 में प्रसिद्ध मूर्तिकार बर्नीनी ने 10 देवदूतों (angels) की मूर्तियों से इसको सजाया था।
जैसा मैंने पहले बताया है कि रोम को विश्व की फैशन की राजधानी भी माना जाता है।वैलेंटिनो, फेंडी,बुल्गारी आदि ब्रांडों के मुख्यालय रोम में हैं या ये यहाँ से शुरू हुईं।यहाँ की प्रसिद्ध स्ट्रीट वीआ दे कोंडोटी पर प्रसिद्ध कैफे ग्रेको है जहाँ स्टैण्डहल,गेटे, बायरन, कीट्स, आदि अपने समय में कॉफी पिया करते थे।रेडियो के आविष्कारक मार्कोनी इसी Via dei Condotti पर रहा करते थे।यह स्ट्रीट शानदार फैशन के सामान की खरीदारी का केंद्र है और यहीं से मैंने अपनी भांजी ईशा जो उस समय लगभग पाँच वर्ष की थी उसके लिए डिज़ाइनर स्कर्ट आदि कपड़े लिए थे।
इसके बाद हम आगे रोम का प्रसिद्ध फॉण्टाना दे ट्रेवी देखने गए।यह एक 18वीं शताब्दी का फव्वारा है जिसको इटालियन डिज़ाइनर निकोला सालवी ने बनाया था और जिसेपि पानीनी ने पूरा किया था।यह 86 फीट ऊंचा है और 136.3 फीट चौड़ा है विशाल है।यह विश्व के सबसे प्रसिद्ध फाउंटेनों में है और बहुत सारी हॉलीवुड और बॉलीवुड की फिल्मों में भी यह देखने को मिला है।यहाँ तीन रास्ते आकर मिलते हैं और मुझको श्रीकृष्ण भक्त ड्राइवर साहब ने बताया कि यहाँ तीन नदियों टाइबर,टेम्स और गंगा का जल मिलकर निकलता है; जी सही पढ़ा आपने गंगा का।
यहाँ आकर लोग मनौती मान कर फाउंटेन के जल में सिक्के पीछे मुँह करके फेंकते हैं और मान्यता है कि जो यहाँ सिक्का फेंकते हैं वो रोम लौट कर आते हैं।कुल मिलाकर यह रौनक से,चहल-पहल से भरा एक सुंदर स्थान है।
फॉण्टाना दे ट्रेवी से फिर हम लोग पैन्थियोन Pantheon देखने गए।यह पूर्व में एक रोमन मंदिर हुआ करता था जिसको बाद में चर्च बना दिया गया।यह सन 609 ईसवी से एक कैथोलिक चर्च है।यह सिलेन्डरिकल आकार का  एक बड़ा सा ग्रेनाइट पत्थरों का बना  पोर्टिको यानी बारामदानुमा एक इमारत है जिसमें विशाल खम्भे हैं जो आगे 8 और फिर पीछे 4-4 दृष्टिगोचर होते हैं।पैन्थियोन का गुम्बद विश्व के कंक्रीट के बने विशालतम गुम्बद में गिना जाता है।इसके गुम्बद में केंद्र से प्राकृतिक रोशनी आती है जो स्वर्ग और पृथ्वी का सम्बंध स्थापित करती मानी जाती है।इसको रोम के सबसे अच्छे रूप में संरक्षित स्मारक का दर्जा भी प्राप्त है।
इतना घूमने के बाद हम लोगों को श्री कृष्ण भक्त ड्राइवर साहब ने एक जगह लंच कराने को रोका जहाँ हमने खाना खाया और मुझको भी कुछ शाकाहारी खाने को मिल गया था।हमारा अगला गंतव्य अब वैटिकन सिटी था।

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