हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन-2 यज्ञोपवीत-इतिहास,परंपरा और अब
हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन-2
यज्ञोपवीत-इतिहास,परंपरा और अब
आज मैं घर के कुछ पुराने फ़ोटो ऐल्बम देख रहा था तो उनमें मेरे और मेरे छोटे भाई अभिनव “गुड्डू” के यज्ञोपवीत संस्कार अथवा जनेऊ के कार्यक्रम का ऐल्बम देखा और पुरानी यादें ताजा हो गयीं।
हमारे बाबा स्वर्गीय सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी ने 1910 के दशक में B.Sc., LL.B. आदि की पढ़ाई की थी और वो साइंटिफिक टैंपर वाले व्यक्ति थे। किन्तु साथ ही साथ धार्मिक परम्पराओं में भी उनकी रुचि थी, लेकिन न अंधविश्वास था और न ज्यादा कर्मकांड। यद्यपि हमारी दादी स्वर्गीय कृष्णा चतुर्वेदी जी का धार्मिक, पौराणिक पूजा-पाठ और कर्मकांडों आदि में काफी रुझान था।
हमारे बाबा का बहुत मन था कि हम लोगों का जनेऊ हो जाए। उन्होंने हमसे कहा कि हम चाहते हैं कि तुम लोगों का जनेऊ हो जाए लेकिन दो बातें हैं। एक तो तुमको उसके संस्कार के दौरान बाल मुँड़वाकर गंजा होना पड़ेगा, दूसरे जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना पड़ेगा।
हम लोग उसके लिए तैयार हुए और बड़े उत्साह से मार्च 1977 में 28 और 29 तारीख को हम दोनों भाइयों के यज्ञोपवीत का संस्कार हुआ और हमारे कान में विधिविधान के अनुसार गायत्री मंत्र दिया गया अर्थात हम उसके पढ़ने,जपने के अधिकारी बने। हमारे बाबा, मम्मी, पापा और सभी घरवालों का अद्भुत उत्साह देखते बनता था और उस कार्यक्रम में दूर-दूर से हमारे न जाने कितने परिवारीजन, रिश्तेदार, नातेदार और परिचित आकर शामिल हुए।
दरअसल सारे समाज के इकट्ठा होकर विद्यार्थी या बटुक को पढ़ने का अधिकार देना एक बहुत अच्छा अनुभव रहा होगा। आज जब उस विषय में सोचता हूँ तो कल्पना करता हूँ कि जब वास्तव में प्राचीन काल में सारी सुविधाएँ त्याग कर बच्चे गुरुकुल जाते होंगे तो कैसा अनुभव होता होगा। भगवान रामचन्द्र जी जब लक्ष्मण जी के साथ ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में गए या भगवान श्रीकृष्ण और बलदेव जी जब गुरु संदीपन के आश्रम में गए जहाँ उनको सुदामा भी मिले तो कैसा अनुभव रहा होगा?!!
चूंकि परंपराएँ अब संक्षिप्त रूप से निर्वहन की रह गयीं थीं तो भिक्षा मांगना,माता की आज्ञा से गुरुकुल जाना आदि सब विधियाँ हुयी थीं लेकिन मात्र रस्मी तौर पर ही, पर हाँ हम लोगों को आनंद और कौतूहल दोनों ही थे।
हमारे जनेऊ के कार्यक्रम में आचार्य के रूप में हमारे पारिवारिक पुरोहित, प्रसिद्ध विद्वान सप्ताचार्य स्वर्गीय डॉक्टर वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी जी और उनके पुत्र डॉक्टर सहदेव कृष्ण चतुर्वेदी जी उपस्थित थे।
मैं आज भी जनेऊ पहनता हूँ और थोड़ा बहुत उसके नियमों का पालन भी करता हूँ क्योंकि एक तो मैंने अपने बाबा से तब हाँ कहा था, दूसरे वो जीवनचर्या का अंग सा हो गया है। लेकिन इसके धार्मिक संदर्भ से मैं निश्चित ही पूरे तौर पर आज के परिप्रेक्ष्य में सहमत नहीं हूँ।
आज जब उस कार्यक्रम की फ़ोटो देखीं तो याद आया कि उस समय के हमारे प्रिय मित्र विनोद, जो कॉल्विन तालुकेदार्स कॉलेज के मेरे साथी थे, ने मुझको उस अवसर पर पत्र द्वारा शुभकामना संदेश भेजा था और उसमें एक श्लोक भी लिखा था। विनोद उस उम्र में भी बहुत विद्वान और साहित्यिक व्यक्ति हुआ करते थे।
वह श्लोक था :-
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ॥
अर्थात गर्भाधान के समय से गणना करते हुए ब्राह्मण बालक का उपनयन 8वें वर्ष में, क्षत्रिय बालक का 11वें वर्ष में और वैश्य बालक का 12वें वर्ष में करना चाहिए।
आज जब यह सब याद किया तो मन में आया कि “हमारी मान्यताएँ, परम्पराएँ, धर्म और जीवन” विषय पर जो मैंने लिखना शुरू किया है, उसके लिए यह एक अच्छा विषय हो सकता है। अस्तु, यह लेख।
मैंने जनेऊ या यज्ञोपवीत और धर्म के बारे में जब भी विचार किया तो इसके दो पहलू सामने आए। एक तो इसका संबंध सनातन धर्म के षोडश संस्कारों में से एक उपनयन संस्कार से है, दूसरे इसका प्रतीक यानी कि तीन या छह लड़ वाला धागा जिसमें गाँठ होती है और लोग उसको धारण करते हैं।
अब उपनयन संस्कार का मतलब, जितना मैंने समझा, वह यह है कि जब बच्चा प्राचीन काल में शिक्षा ग्रहण करने को तैयार होता था तो उसकी एक सेरेमनी होती थी। आज भी बहुत सी जगहों पर बच्चा जब पढ़ाई शुरू करे तो पट्टी पूजी जाती है। और क्योंकि मनुष्य स्वभाव से उत्सव प्रेमी जीव है तो इस संस्कार को एक सामाजिक-पारिवारिक उत्सव का रूप भी मिलता गया।
अब दूसरा सवाल ये उठता है कि जैसा कि मेरी समझ है, जब सनातन धर्म के मानने वाले लोगों में वर्ण व्यवस्था की शुरुआत हुई तो यह जन्म से न होकर कर्मानुसार थी। इस पर किसी और लेख में चर्चा करने की इच्छा है, पर अभी यही कि जब समाज में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ने लगीं तो वर्ण को भी एक हथियार की भाँति प्रयुक्त करने की मंशा उत्पन्न होनी लाजमी थी और ऐसा होते हम देखते भी हैं।
लोगों की आदर्श सोच अधिकांशतः यूटोपिया की कल्पना जैसी होती है और वास्तविकता का धरातल लाभ और स्वार्थ से ज्यादा प्रभावित होता है। तो द्विज और वर्ण व्यवस्था भी अब लाभ के लिए काम करने लगी थीं। लेकिन चूँकि आज के लेख का विषय यह नहीं है तो वापस आते हैं यज्ञोपवीत संस्कार पर।
हमारे साहित्य, पौराणिक आख्यानों और इतिहास में उपनयन, जनेऊ और पढ़ने जाने से संबंधित संस्कारों और किस्सों की कई बार चर्चा देखने को मिलती है। लेकिन जब इस विषय में थोड़ा और जानने की कोशिश की तो एक बात सामने आयी कि उपनयन, यज्ञोपवीत और जनेऊ एक-दूसरे से सम्बन्धित तो हैं, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से पूरी तरह एक ही चीज नहीं हैं।
उपनयन मूलतः विद्यार्थी को गुरु के पास ले जाने और वैदिक अध्ययन में प्रवेश कराने का संस्कार है। यज्ञोपवीत का प्राचीन अर्थ शरीर पर विशेष ढंग से धारण किया गया वस्त्र या सूत्र भी रहा है, जबकि जनेऊ आज सामान्यतः कन्धे से छाती के पार धारण किए जाने वाले पवित्र धागे को कहते हैं। ऐसा लगता है कि समय के साथ कुछ अलग-अलग चीजें आपस में गड्ड-मड्ड होकर एक हो गयीं।
इसलिए किसी प्राचीन ग्रन्थ में उपनयन का उल्लेख मिलने से अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि उस समय आज जैसा तीन सूत्रों वाला जनेऊ भी प्रचलित था।
यज्ञोपवीत का एक अत्यन्त प्राचीन उल्लेख हमको तैत्तिरीय संहिता — 2.5.11.1 में मिलता है। यह कृष्ण यजुर्वेद की वैदिक परम्परा का ग्रन्थ है और इसका निर्माण ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के प्रारम्भिक भाग से सम्बन्धित माना जाता है।
इसमें वस्त्र या उपवीत धारण करने की तीन स्थितियों का उल्लेख है। देवकार्य के लिए उपवीत, पितृकार्य के लिए प्राचीनावीत और सामान्य मानवीय व्यवहार के लिए निवीत।
इसके बाद तैत्तिरीय आरण्यक 2.1 तथा गृह्यसूत्रों में भी यज्ञोपवीत और उसे धारण करने के नियम मिलते हैं।
प्राचीन व्यवस्था में यज्ञोपवीत का सम्बन्ध विशेष ढंग से धारण किए गए उत्तरीय वस्त्र से था और समय के साथ धागे का प्रतीक अधिक प्रमुख हुआ। धर्मशास्त्र के इतिहासकार पी. वी. काणे के शोध में भी इस विकास की चर्चा मिलती है।
इसलिए तैत्तिरीय संहिता को यज्ञोपवीत सम्बन्धी उपलब्ध प्राचीनतम स्पष्ट सन्दर्भों में तो गिना जा सकता है, लेकिन इसे आज के जनेऊ का सबसे पहला निर्विवाद प्रमाण कहना ठीक नहीं होगा।
अब बात करते हैं वाल्मीकि जी की रामायण और भगवान राम और उनके भाइयों के यज्ञोपवीत की।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड, सर्ग 18, श्लोक 23–24 में राजा दशरथ द्वारा अपने पुत्रों के जन्म के बाद संस्कार करवाने का उल्लेख है :-
तेषां जन्मक्रियादीनि सर्वकर्माण्यकारयत्।
अर्थात उन्होंने अपने पुत्रों के जन्म से सम्बन्धित तथा उसके बाद के सभी संस्कार सम्पन्न करवाए।
कुछ अनुवादों में इन संस्कारों के अन्तर्गत उपनयन का भी उल्लेख किया गया है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस श्लोक में स्वयं ‘यज्ञोपवीत’ या ‘जनेऊ’ शब्द नहीं आता। इसलिए यह सामान्य संस्कारों का सन्दर्भ तो है, लेकिन भगवान रामचन्द्र जी के जनेऊ समारोह का विस्तृत प्रत्यक्ष वर्णन नहीं।
राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की शिक्षा तथा गुरु वशिष्ठ से उनका सम्बन्ध परम्परा में प्रसिद्ध है। फिर भी केवल इन बातों के आधार पर आज जैसे जनेऊ की आकृति या विधि निश्चित नहीं की जा सकती।
लेकिन जब हम श्रीमद्भागवत महापुराण की बात करें तो हमको इसमें भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी के यज्ञोपवीत की बात मिलती है और यहाँ उल्लेख रामायण की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध, अध्याय 45, श्लोक 29 में लिखा है :-
ततश्च लब्धसंस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ।
गर्गाद् यदुकुलाचार्याद् गायत्रं व्रतमास्थितौ॥
अर्थात श्रीकृष्ण और बलरामजी ने विधिपूर्वक संस्कार प्राप्त किया, द्विजत्व प्राप्त किया और यदुकुल के आचार्य गर्ग से गायत्री सम्बन्धी व्रत ग्रहण किया।
गीताप्रेस के हिन्दी अनुवाद में भी वसुदेवजी द्वारा गर्गाचार्य तथा अन्य ब्राह्मणों से दोनों पुत्रों का यज्ञोपवीत संस्कार करवाने का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इसके बाद उनके गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने का प्रसंग आता है।
इससे एक बात तो समझ आती है कि उस पौराणिक आख्यान में उपनयन का सम्बन्ध केवल धागा पहनने से नहीं, बल्कि विद्यार्थी जीवन, ब्रह्मचर्य और शिक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
अब जब पाण्डवों के यज्ञोपवीत की बात करें तो महाभारत में पाण्डवों की शिक्षा, गुरु द्रोणाचार्य और पुरोहित धौम्य का उल्लेख तो मिलता है, लेकिन पाँचों पाण्डवों के व्यक्तिगत उपनयन संस्कार का कोई स्पष्ट उद्धरण मुझे देखने को नहीं मिला।
हाँ, इस विषय से सम्बन्धित एक उल्लेख अवश्य मिलता है। Puranic Encyclopaedia में महाभारत के आदिपर्व, अध्याय 220, श्लोक 87 के आधार पर धौम्य द्वारा पाण्डवपुत्रों के संस्कार सम्पन्न कराने का सन्दर्भ दिया गया है, हालाँकि मूल पाठ से इसकी पुष्टि अभी बाकी है। महाभारत के अनुशासनपर्व में ब्रह्मचर्य, वेदाध्ययन और यज्ञोपवीत धारण करने के कर्तव्यों की भी चर्चा मिलती है।
अब यहाँ से मेरे मन में एक दूसरा सवाल उठता है कि जब उपनयन मूलतः शिक्षा से जुड़ा संस्कार था तो आज का यह तीन या छह लड़ वाला धागा, उसकी गाँठें और उससे जुड़े इतने सारे नियम कैसे और क्यों बने होंगे?
मेरा मानना है कि समय के साथ समाज आगे बढ़ रहा था और वर्ण व्यवस्था भी रूप ले चुकी थी। व्यक्ति का वर्ण और तदनुसार कर्म दूर से पता चले, लड़का पढ़-लिख रहा है, शादीशुदा है या अविवाहित है, घर में कोई शोक या सूतक तो नहीं है—एक तो ये बातें। दूसरे घर में पूजा-पाठ, खान-पान के दौरान शुद्धता रहे, हाइजीन बरती जाए, इसकी व्यवस्था भी आवश्यक समझी जाती रही होगी।
मुझको लगता है कि इन सब चीजों के लिए उपनयन संस्कार के साथ ही एक ऐसी चीज को व्यवहार में लाया गया होगा जो उपरोक्त विषयों में मददगार हो और यह चीज थी वो तीन या छह लड़ का धागा जिसको हम जनेऊ कहते हैं।
हमारे यहाँ प्रचलित मान्यताओं में यदि तीन लड़ का है तो व्यक्ति अविवाहित है, छह का है तो शादीशुदा। उसमें लगी गाँठ को भी वर्ण आदि से जोड़कर देखा जाता रहा है। यदि जनेऊ पहने है तो उसका उपनयन संस्कार हो चुका, अर्थात वह वैदिक शिक्षा ग्रहण करने का अधिकारी माना गया है।
परिवार में शोक होने पर जनेऊ को अशुद्ध होना बताया गया और संस्कार के समय जनेऊ बदलकर बिना रंगा सफेद जनेऊ पहनने की प्रथा भी देखने को मिलती है। संभवतः इससे जो देखे उसको मालूम पड़ जाए कि परिवार शोक में है। तेरहवीं के दिन फिर से जनेऊ बदलकर हल्दी या किसी चीज से रंगकर जनेऊ पहनने का भी प्रचलन रहा है जिससे मालूम पड़ जाए कि शोक का समय निकल गया।
हालाँकि इन मान्यताओं और प्रथाओं का इतिहास कितना पुराना है और किन-किन क्षेत्रों में ये किस रूप में प्रचलित रही हैं, यह अलग अध्ययन का विषय है।
जनेऊ पहनने वाले को गायत्री मंत्र पढ़ने का विधान भी इसमें जुड़ा और इसके साथ स्वच्छता या स्नान करके पूजा और तभी भोजन जैसी जीवनचर्या भी जुड़ी। यानी कि हाइजीन भी इसका एक व्यावहारिक पक्ष हो सकता है।
ऐसा ही परिवार में संतान के जन्म के समय भी हाइजीन के मद्देनजर सोवर की व्यवस्था बनायी गयी होगी, ऐसा मेरा अनुमान है क्योंकि अभी कुछ दशक पहले तक संतानों के जन्म या महिलाओं की डिलीवरी के लिए अस्पताल नहीं थे बल्कि डिलीवरी घरों में ही होती थी तो अपनी समझ के अनुसार समाज ने हाइजीन के नियम भी बनाए ही होंगे।
समस्या तब शुरू होती है जब हम समय और जरूरत के अनुसार न खुद को बदलें और न अपने नियम-कायदों को। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि समय की अपनी गति है और उसके हिसाब से चीजें बदलती ही हैं।
तो जब समय के साथ हाइजीन के लिए अन्य साधन हो गए, शोक और शुद्धता के मानक बदलने लगे तो जनेऊ के इस धागे की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न उठाया जाना स्वाभाविक ही था और ऐसा हुआ भी है। बल्कि काफी कुछ होना भी चाहिए था।
हमने देखा है कि समय और परिस्थिति के अनुरूप बहते पानी की तरह आगे बढ़ना सनातन संस्कृति का एक आवश्यक अंग है ही।
बहुत से लोग बताते हैं कि जनेऊ कान पर चढ़ाने से कोई नस दबती है जिसके कुछ लाभ हैं, लेकिन यह कहीं वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो, ऐसा मेरी जानकारी में अभी तक आया नहीं है।
अलबत्ता जब लोग एक अधोवस्त्र पहनते थे और लघुशंका निवारण हेतु बैठने का प्रचलन था, क्योंकि आधुनिक टॉइलेट प्रचलन में नहीं आए थे, तो केवल अधोवस्त्र पहनने वाले हमारे देश के लोगों ने बेहतर ही समझा होगा कि जनेऊ को छींटों से बचाने के लिए ऊपर कहीं या तो बाँध लें अथवा सुविधानुसार अपने कान पर ही चढ़ा लें।
अब जो द्विज वाली बात है उसका अर्थ मूलतः दूसरी बार जन्म लेने से है। उपनयन और वैदिक शिक्षा में प्रवेश को यह दूसरा जन्म माना गया। मेरी समझ में इसका सम्बन्ध शिक्षा से भी रहा होगा, लेकिन समय के साथ जब वर्ण व्यवस्था एक लाभदायक टूल के रूप में प्रयुक्त होने लगी तो द्विज का भी अपने लाभानुसार निर्धारण होना ही था।
हमको यह भी देखने को मिलता है कि धीरे-धीरे समाज की सुविधा के लिए बनाए नियम धर्म के रूप में या धार्मिक परम्परा के रूप में परिवर्तित होकर एक कठोर नियम का रूप ले लेते हैं और इनसे लड़ना आसान नहीं होता।
इसका एक बहुत रोचक उदाहरण प्रसिद्ध समाज सुधारक राजा राममोहन रॉय के मामले में देखने को मिलता है।
उन्होंने सती प्रथा, स्त्रियों की स्थिति और जातिगत विभाजन जैसी सामाजिक समस्याओं पर प्रश्न उठाए, लेकिन उन्होंने स्वयं जनेऊ का पूर्ण त्याग नहीं किया था।
उनकी मृत्यु 1833 में इंग्लैंड के ब्रिस्टल में हुई। मृत्यु के बाद उनके शरीर पर जनेऊ होने का ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की पत्रिका Comparative Studies in Society and History में प्रकाशित एक शोध में इस घटना का विश्लेषण किया गया है।
यहाँ विचारणीय बात है कि एक समाज सुधारक जातिगत भेदभाव की आलोचना करते हुए भी अपनी पारिवारिक-धार्मिक पहचान का एक प्रतीक धारण करता रहा।
इसकी शायद एक वजह ये भी है कि बहुत सी चीजें-बातें हमारे संस्कार के रूप में आती हैं और फिर हमारे रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न अंग बन जाती हैं।
स्वामी विवेकानंद उपनयन और आज के जनेऊ के स्वरूप में अन्तर मानते थे और वह गैर-ब्राह्मणों को भी जनेऊ धारण कराने के पक्षधर थे। उन्होंने 1898 में श्रीरामकृष्ण के जन्मोत्सव पर गैर-ब्राह्मण भक्तों को भी जनेऊ धारण कराया था।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने उपनयन को शिक्षा, अनुशासन, गायत्री उपदेश और ब्रह्मचर्य से जोड़ा।
उनके ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में लड़के और लड़कियों, दोनों की शिक्षा पर बल दिया गया है। इसमें पुत्रों और पुत्रियों को शिक्षा के लिए भेजने, गायत्री मन्त्र का अर्थ समझाने और यज्ञोपवीत संस्कार की व्यवस्था का वर्णन मिलता है। आर्य समाज की परम्परा में कन्याओं के उपनयन का भी समर्थन किया गया।
यह उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्वामी दयानन्द ने संस्कार को केवल वंशानुगत प्रतिष्ठा के बजाय शिक्षा और वैदिक कर्तव्य से जोड़ने का प्रयास किया।
अब यदि हम महात्मा गांधी की बात करें तो उनकी आत्मकथा सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा में इस विषय का एक बड़ा रोचक प्रसंग मिलता है।
गांधीजी बताते हैं कि लगभग दस वर्ष की आयु में उन्हें जनेऊ पहनाया गया था। काठियावाड़ के उनके वैश्य समुदाय में तब जनेऊ पहनना सामान्य प्रथा नहीं थी। बचपन में उन्हें ब्राह्मण लड़कों के जनेऊ में बँधी चाबियाँ आकर्षित करती थीं। बाद में उनका जनेऊ टूट गया और उन्होंने दूसरा नहीं पहना।
1915 में हरिद्वार-ऋषिकेश यात्रा के दौरान एक संन्यासी ने उनसे जनेऊ और शिखा न रखने पर आपत्ति की।
गांधीजी ने उत्तर दिया कि जब शूद्रों को जनेऊ पहनने का अधिकार नहीं दिया जाता तो अन्य वर्णों को उसे धारण करने का विशेष अधिकार क्यों होना चाहिए?
उनका तर्क था कि जनेऊ यदि आध्यात्मिक पुनर्जन्म और अधिक शुद्ध जीवन का प्रतीक है तो पहले समाज को अस्पृश्यता और ऊँच-नीच जैसी बुराइयों से मुक्त होना चाहिए।
यानी गांधीजी के लिए प्रश्न केवल जनेऊ पहनने या न पहनने का नहीं था, बल्कि उसके साथ जुड़ी सामाजिक व्यवस्था का भी था।
जब हम इस विषय में चर्चा कर ही रहे हैं तो एक और बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न दिमाग में आता है कि क्या प्राचीन भारत में स्त्रियों का भी उपनयन होता था?
बाद के धर्मशास्त्रीय साहित्य में एक प्राचीन परम्परा का उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार कन्याओं का भी मौञ्जीबन्धन, वेदाध्ययन और सावित्री अर्थात गायत्री मन्त्र का उपदेश होता था।
इससे सम्बन्धित एक प्रसिद्ध श्लोक है :-
पुरा कल्पे कुमारिणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते।
अध्ययनं च वेदानां सावित्रीवचनं तथा॥
अर्थात प्राचीन काल में कन्याओं के मौञ्जीबन्धन, वेदाध्ययन और सावित्री उपदेश की परम्परा का उल्लेख किया गया है।
हालाँकि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उस समय सभी वर्गों की महिलाओं को समान रूप से शिक्षा और उपनयन का अधिकार प्राप्त था। लेकिन इतना अवश्य है कि स्त्रियों के उपनयन की परम्परा का उल्लेख हमारे पुराने धर्मशास्त्रीय साहित्य में मिलता है।
और जैसा मैंने पहले भी कहा है, मामला सारा स्वार्थ, लाभ, हित और उपयोगिता से जुड़ता जा रहा था। मानव जाति बात नैतिकता की और कर्म स्वार्थ के करने की ओर प्रवृत्त होना शुरू कर चुकी थी। तो महिलाओं को फिर से पुरुषों के बराबर आने को अब कई सहस्राब्दियों का सफर तय करना था और अभी भी वह सफर जारी ही है।
अंत में कहा जाए तो मैं तो यह समझ पाया हूँ कि समाज में नियम और परम्पराएँ उस वक्त की जरूरत के अनुसार और परिस्थितियों के अनुरूप बनती हैं। लेकिन एक समझदार प्रजाति होने के नाते मनुष्य से अपेक्षा है कि वह इन चीजों में समय के अनुरूप बदलाव लाए।
और धर्म के जो दो पक्ष हैं, एक व्यावहारिक और एक आध्यात्मिक, तो उसमें व्यावहारिक पक्ष जो सामान्य जीवन से संबंधित होता है, उसमें कट्टरता के स्थान पर समय की जो माँग है उसके अनुरूप बदलाव करे।
और यदि आप इतिहास को देखेंगे तो पाएँगे भी कि ऐसा ही होता भी है।
आध्यात्मिक पक्ष पर किसी और लेख में चर्चा करेंगे।
आज के लेख में बस इतना ही।
शेष फिर …..


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