सिंदबाद ट्रैवल्स-38जर्मनी-7बर्लिनSindbad Travels-38Germany-7Berlin

सिंदबाद ट्रैवल्स-38
जर्मनी-7
बर्लिन

Sindbad Travels-38
Germany-7
Berlin

Berlin Coordinates 52° 31' 12" N
                               13° 24' 18" E


अगली सुबह मैं जल्दी तैयार होकर अपनी बर्लिन यात्रा के लिए चल दिया था।हाइडलबर्ग से बर्लिन लगभग 630 किमी का रास्ता था और फ्रैंकफर्ट से ICE ट्रेन से केवल 3 घण्टे 45 मिनट का रास्ता है।बहरहाल उस जमाने यानी 1991 के अक्टूबर में जब मैं हाइडलबर्ग से बर्लिन को निकला तो पहली बात तो ये थी कि जिस ट्रेन से मैं बर्लिन को चला वो तो अच्छी थी किंतु बर्लिन शहर की ट्रेनें अन्य शहर की रेलों जितनी शानदार न होकर कुछ पुरानी किस्म की थी।बर्लिन की यह दूरी मेरी ट्रेन लगभग 7 घण्टे से कुछ कम में तय करने वाली थी।
मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में M.A. Modern History का छात्र रहा हूँ और B.A. में भी मेरे पास Med/Mod History विषय था।ट्रेन में बैठे हुए मुझको अपने गुरु श्री विनय चंद्र पांडे जी और श्री सी0पी0झा साहब की याद आ रही थी।उन लोगों ने हम छात्रों को यूरोप का इतिहास ऐसे बताया और पढ़ाया था कि यूरोप के जिन देशों में भी मैं गया वहाँ की जमीन,शहर,इतिहास सबसे मुझको ऐसा महसूस होता रहा कि इनसे मेरा भी कुछ सम्बन्ध है,मैं भी थोड़ा बहुत यहाँ के विषय में जानता हूँ,यहाँ से परिचित हूँ।मुझको याद आ रहा था वी सी पांडे सर का फ्रेंच रिवोल्यूशन पढ़ाना,सीपी झा साहब का eu de cologne शब्द का सही उच्चारण बताना।हम लोग यू डी कोलोन बोलते थे जबकि झा सर ने बताया कि सही शब्द ओ द कोलन है।सी पी झा साहब में पापा के साथ सर गंगा नाथ झा छात्रावास में रहे/पढ़े भी थे और शादी विवाहों में वो हमारे घर फिरोजाबाद आते भी थे।वी सी पांडे सर भी बहुत विद्वान व्यक्ति तो थे ही साथ ही हम सब छात्रों के साथ उनका व्यवहार बहुत ही सहज था।मुझको आज तक उनके घर जाना, उनकी पत्नी मालविका मैडम द्वारा हम ल9गों को दी गयी चाय पीना,उनकी छोटी सी बेटी सुपर्णा से बातें करना आज भी ऐसे याद जैसे कल ही की बात हो।
ट्रेन अपने गंतव्य बर्लिन की ओर बढ़ती जा रही थी,दोनों तरफ हरियाली,पेड़,सुंदर मकान जो अधिकांशतः सफेद थे और जिनकी छतें ढलवां भूरी या चॉकलेटी रंग की,बीच-बीच में एकाध घर चटक पीले रंग का भी दिख जाता था।यूरोप और खासतौर पर जर्मनी में एक और चीज जो आपका ध्यान आकर्षित करती है वो है दीवारों पर ग्राफिटी यानी विभिन्न किस्म के रंगों का इस्तेमाल ब्रश या स्प्रे से करते हुए दीवार पर कुछ लिखना या डिज़ाइन बनाना और वो भी काफी बड़े रूप में।इन्हीं दृश्यों के बीच तेज रफ्तार से हमारी ट्रेन चलती जा रही थी और मैं जर्मनी,बर्लिन,वहाँ का इतिहास यही सब बातों को सोच रहा था।जर्मनी के इतिहास की बहुत सी वो बातें भी मुझको याद आ रही थीं जो मैंने AJP Taylor की पुस्तक The Origins of the Second World War में पढ़ी थीं और इस विषय में उनकी सोच अन्य इतिहासकारों से थोड़ी भिन्न भी थी।जब मैं बर्लिन पहुँच रहा था तो मुझको जर्मनी के एकीकरण के सूत्रधार ऑटो वॉन बिस्मार्क के विषय में पढ़ा इतिहास भी बहुत याद आया।हमारे भारत के एकीकरण में लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की जो अविस्मरणीय भूमिका थी कुछ उसी किस्म का रोल जर्मनी के एकीकरण में एकीकृत जर्मनी के पहले चांसलर बिस्मार्क का भी था।
जैसा हम सभी को पता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी को दो भागों में बांट दिया गया था;GDR या पूर्वी जर्मनी रूसी खेमे का साथी था और यहाँ कम्युनिस्ट शासन था जबकि FRG या पश्चिमी जर्मनी अमेरिका,इंग्लैंड, फ्रांस आदि के खेमे का था और यहाँ पश्चिमी पूंजीवादी और लोकतांत्रिक शासन पद्वति अपनायी गयी थी।पश्चिमी जर्मनी की राजधानी बॉन थी और पूर्वी जर्मनी की राजधानी बर्लिन बनी।इन दोनों देशों के निवासी एक दूसरे के देश में आ-जा नहीं सकते थे और इनमें कोई भी सम्पर्क न राह पाए इसके लिए 1961 में बर्लिन शहर के बीचोबीच एक दीवार उठा दी गयी जिस पर कई टावर,चेकपोस्ट आदि थे जिनसे एक अलग किस्म के भय की अनुभूति भी वहाँ के नागरिकों को होती थी।समय ने पलटा खाया और शीत युद्ध के खात्मे के साथ ही परिस्थितियां बदलने लगीं।पोलैंड के लेक वालेचा के नेतृत्व वाले सोलिडेरिटी मूवमेंट, दिसम्बर 1989 के अमेरिका-रूस के माल्टा शिखर वार्ता आदि ने बता दिया था कि युग बदल रहा है।अक्टूबर 1989 में जर्मनी के रीयूनिफिकेशन की प्रक्रिया आरम्भ हुयी और 9 नवम्बर 1989 की ऐतिहासिक तारीख को जैसे-जैसे दिन ढलता जा रहा था बर्लिन की दीवार के दोनों तरफ के दो अलग-अलग भौगोलिक देशों के नागरिक अब अलग रहने को तैयार न होने की वजह से दीवार के दोनों ओर इकट्ठे होते जा रहे थे।कुछ देर में ही पूर्वी बर्लिन पुलिस-प्रशासन की ताकत जनता की इच्छा के आगे लाचार हो गयी और दोनों बर्लिन को अलग करने वाली दीवार ने भूतकाल के इतिहास में अपनी जगह बना ली।यूरोप के इतिहास और जर्मनी के इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मेरी दिली इच्छा थी उस बर्लिन को और उस दीवार के अवशेषों को देखने की और यही ललक थी जिसका परिणाम था कि मैं 6 घण्टे से ज्यादा का सफर करते हुए बर्लिन को ट्रेन से जा रहा था उसी दिन शाम को लौटने के कार्यक्रम के साथ क्योंकि अगले दिन मेरी रोम-इटली की फ्लाइट थी।
हमारी ट्रेन बर्लिन पहुँच चुकी थी और रेलवे स्टेशन से सबसे पहले मैंने जिस स्थान पर बर्लिन की दीवार थी उस क्षेत्र के एक स्थान के लिए मैंने मेट्रो ली और पहला फर्क देखने को मिला।ये मेट्रो अत्यंत सादा थी,अभी दोनों जर्मनी को एक हुए बहुत समय नहीं हुआ था तो पूर्वी बर्लिन का फर्क पश्चिम के आगे बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिख रहा था।एक ही शहर में विकास के दो रूप थे।मैं यह सोचने पर मजबूर था कि कम्युनिस्ट शासन सिस्टम में कमी थी या शासकों में…विचारधारा तो बहुत आदर्शवादी प्रतीत होती थी और हम भारतीयों को उस समय शायद रूस से अधिक घनिष्ठता की वजह से आकर्षित भी करती थी किंतु यहाँ आकर जो हकीकत दिखी वो बहुत खोखली लगी।ऐसा लगा कि दोनों क्षेत्रों के विकास की कहानी बहुत भिन्न है।
बर्लिन 13वीं सदी का शहर है और जर्मनी का सबसे बड़ा शहर भी कहा जाता है;क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही के हिसाब से।अब ये यूरोपीय यूनियन का भी सबसे अधिक आबादी वाला शहर है।यहाँ की विशेषता यहाँ के खूबसूरत जंगल,पार्क,बगीचे,नदियां,नहरें और झील हैं किंतु इस शहर के कुछ हिस्से काफी उदास से भी लगे।
बर्लिन का एक भव्य और समृद्ध इतिहास है।यह जर्मनी के एकीकरण के पहले 1870 तक प्रशा राज्य की राजधानी था।1871 से 1918 तक यह जर्मन साम्राज्य की राजधानी रहा,1919 से 1933 तक यह वाइमर रिपब्लिक की राजधानी था और 1933 से 1945 तक नाज़ी जर्मनी की राजधानी भी बर्लिन ही थी।1920 के दशक में बर्लिन आबादी के लिहाज से विश्व का तीसरा सबसे बड़ा शहर था।बर्लिन 1990  के बाद जर्मनी के दुबारा एकीकरण के बाद पुनः जर्मनी की राजधानी बनाया गया।बर्लिन की पहचान अब हाई टेक कम्पनियों,विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों जैसे Humboldt University, Free University,Hertie School, University of Arts के लिए तो है ही साथ ही यह अपनी संस्कृति,राजनैतिक मीडिया,विज्ञान से जुड़ाव आदि के लिए भी प्रसिद्ध है।यहाँ तीन विश्व प्रसिद्ध हैरिटेज साइट्स भी हैं और यहाँ की Reichstag building तथा   Brandenburg Gate भी बहुत प्रसिद्ध स्थल हैं।बर्लिन में 1936 के ओलिम्पिक खेलों का भी आयोजन हुआ था जिसके प्रसिद्ध भारतीय हॉकी खिलाड़ी दादा ध्यानचंद और हिटलर वाला किस्सा हम सब ने सुना है।दादा ध्यानचंद ने यहाँ भी नंगे पैर धुकी खेल कर भारत को स्वर्ण पदक की जीत दिलाई थी।इस खेल में भारत ने फाइनल में जर्मनी को 8-1 से हराया था जिसमें ध्यानचंद ने खुद 6 गोल किये थे,नंगे पैर खेलते हुए और जर्मन गोलकीपर से टकराने से एक दांत टूटने के बावजूद।ये भी एक याद थी जो बर्लिन घूमने के दौरान मेरे मन को प्रफुल्लित कर रही थी।
बर्लिन उत्तरी पूर्वी जर्मनी में स्थित है।यहाँ की जमीन अधिकांशतः समतल है और खूब हरियाली है।इस शहर की एक विशेषता मुझको नज़र आई कि यहाँ पर प्राचीन और आधुनिक समय ऐसा लगता है मानो साथ ही साथ चल रहे हैं।अनेकों ऐतिहासिक इमारतें पूरे शहर के आधुनिक वास्तुकला की इमारतों के साथ ही खड़ी हैं और ऐसा आधुनिकता और प्राचीनकाल का संगम बहुत कम शहरों में एक साथ देखने को मिलता है।यहाँ ऐसा लगता है जैसे हम वर्तमान में घूमते हुए अचानक किसी पुराने युग में पहुँच जाते हैं। हमारी दिल्ली में भी अनेकों प्राचीन इमारतें और स्मारक हैं किंतु जहाँ नया शहर है वो इलाका अधिकांशतः अलग-अलग ही है।
बर्लिन की मेट्रो से जब मैं उस स्थान पर पहुँचा जहाँ कभी बर्लिन की दीवार उस शहर को दो हिस्सों में बांटा करती थी तो मेरा मन खुश भी हुआ और निराश भी।निराश तो इसलिए कि वहाँ अब किसी दीवार का चिन्ह नहीं था हाँ जब कई लोगों ने बताया और मैंने उस स्थान को अपने हाथों से कुछ दूरी तक टटोला तो लगा कि शायद यहाँ कभी दीवार रही होगी और किसी-किसी जगह कुछ धातु के टुकड़े महसूस हुए पर असलियत में वहाँ ऐसा कुछ जिसको दीवार या उसके अवशेष कहा जा सके वो नहीं दिखा।मेरा मन प्रसन्न इसलिए हुआ कि अब इस प्राचीन,ऐतिहासिक शहर के लोगों और सही कहूँ तो विश्व की दो विचारधाराओं को बांटने वाली किसी चीज़ का अब वहाँ कोई नामो-निशान नहीं था।बर्लिन देखने के बाद अब समय था हाइडलबर्ग वापिस जाने का और अगले दिन यात्रा थी रोम-इटली की।
हाइडलबर्ग पहुँच कर मैंने शाम को ही वहाँ की मुख्य सड़क के आगे चलकर कुछ लोग सिल्क के स्कार्फ बेच रहे थे उनको अपने साथ लाये सैम्पल के सारे स्कार्फ भेंट कर दिए और मोतियों की दुकान वालों को सारे मोती क्योंकि जो सामान बिका नहीं था उसके सैम्पल वापिस लाद कर ले जाने का कोई लाभ नहीं था और मेरे पास विभिन्न देशों से खरीदे गए सामन,गिफ्ट्स का भी काफी वजन हो चुका था।
इस सबके बाद रात को लौट कर जब मैं इस्कॉन हाइडलबर्ग पहुँचा तो काफी थकान हो चुकी थी।अपनी इस यात्रा में जर्मनी के इस्कॉन गैस्ट के रूप में 7 दिन मैं यहाँ रुक लिया था और अगले दिन सुबह अपनी इस विदेश यात्रा के आखिरी देश या आखिरी लैग में जाना था।रात को लेटे हुए मैं सोच रहा था कि जल्द ही अब वापिस घर पहुँचूँगा और सबके साथ मिलूंगा,यहाँ के किस्से सुनाऊंगा और अपने अनुभव शेयर करूंगा तथा साथ ही साथ एक एक्सपोर्टर के रूप में अपने इस कैरियर की शुरुआत भी करूंगा।
अगली सुबह जल्दी उठ कर तैयार हो गया और इस्कॉन,हाइडलबर्ग  के सभी लोगों से और विकास बाफना तथा उनके साथ वाले मित्र से विदा ली।एक सप्ताह के समय में उन सभी से अच्छा परिचय हो गया था और इसी कारण चलते समय हम सभी थोड़ा भावुक भी हो गए थे।सुंदर,शांत हाइडलबर्ग से ट्रेन पकड़ के मैं फ्रैंकफर्ट मेन हॉप्टबाह्नहॉफ पहुँचा और वहाँ से एयरपोर्ट की ट्रेन लेकर फ्रैंकफर्ट के शानदार हवाई अड्डे पर पहुँच गया।फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर ड्यूटी फ्री एरिया की दुकानों की रौनक के क्या ही कहने थे।एयरपोर्ट पर ही कर का डिस्प्ले हो रहा है-लाल रंग की विशाल कर खड़ी थी,Mont Blanc pen की दुकान थी,Philipshave की भी एक दुकान थी,कहने का मतलब यह है कि उस समय हमारे भारत के हवाई अड्डे इतने शानदार नहीं होते थे तो इन देशों के एयरपोर्ट्स की चकाचौंध प्रभावित करती थी और मन होता था कि कब हमारे देश के हवाई अड्डे भी इतने बड़े और सुंदर होंगे।
थोड़े ही समय में चैक-इन,इमिग्रेशन और सिक्युरिटी चैक के बाद मैं फ्रैंकफर्ट से रोम-इटली के लिए अल-इटालिया एयरलाइंस की फ्लाइट में बैठ कर अपनी आगे की यात्रा पर चल दिया था।



Comments

  1. वाकई कलाम के जादूगर हैं आप,,ऐसा लिखते हैं जैसे पढ़ने वाला खुद वहीं पे घूम रहा हो !🙏🙏🙏

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