सिंदबाद ट्रैवल्स-41इटली-3पीसाSindbad Travels-41Italy-3PISA

सिंदबाद ट्रैवल्स-41
इटली-3
पीसा

Sindbad Travels-41
Italy-3
PISA

Co-ordinates- 43°43′23″N              

                        10°23′47″E
                   

पीसा शहर फ्लोरेंस से 98 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है जबकि पीसा से रोम की दूरी लगभग 350 किलोमीटर है।पीसा इटली के पश्चिमी तट पर लीगुरियन समुद्र के पास ही स्थित है।पीसा इटली के टस्कनी रीजन के पीसा स्टेट की राजधानी है।पीसा सारे विश्व में अपनी झुकी हुई मीनार के कारण जाना जाता है।मैं पीसा सेंट्रेल रेलवे स्टेशन से सिटी बस से पीसा टावर तक गया।यहाँ सबसे पहले मेरा ध्यान गया एक बहुत विशाल शायद धातु की बनी घोड़े की मूर्ति पर जो एक ऊँचे चबूतरे  पर स्थित है फिर निगाह पड़ी एक गोल गुम्बद वाली बहुमंजिली इमारत की ऊपर की मंजिल पर लटके काहिया रंग के विशाल घण्टे पर और फिर आपको उसी इमारत से नजर आता है पीसा का विश्व प्रसिद्ध लीनिंग टावर जो लगता है कि कहीं गिर न जाये अभी।दरअसल वहाँ की अस्थिर नींव के कारण बोनानो पिसानो नामक वास्तुविद द्वारा डिज़ाइन किया और बनाया यह टावर एक तरफ लगभग 4° झुका हुआ है और समय-समय पर और झुक कर यह गिर न जाये इसके उपाय होते रहते हैं।इसकी नींव 1173 ईसवी सन में रखी गयी थी जब 5 January 1172 को Donna Berta di Bernardo नामक एक विधवा ने कुछ रकम लगभग 60 सॉल्डी की वसीयत चर्च के लिए की।इस रकम से चर्च के घण्टाघर की मीनार के निर्माण के लिए कुछ पत्थर ही आ पाए।इस घण्टाघर की मीनार को बनने में लगभग 199 वर्ष लग गए।यह मार्बल पत्थर का बना हुआ है।इसकी ऊंचाई 55.86 मित्र यानी 183 फिट और 3 इंच है जिधर ये झुका हुआ है जबकि दूसरी तरफ 56.7 मीटर यानी कि 185 फिट 11 इंच की है।इस मीनार में 296 सीढ़ी हैं और जिधर इसका झुका हुआ हिस्सा है वहाँ दो सीढ़ी कम यानी 294 सीढ़ी ही हैं।यह इमारत 7 मंजिल की है।इस को देख कर मुझको अपने दिल्ली में स्थित कुतब मीनार याद आयी जिसके बनने का काल लगभग इसी दौरान का है।कुतब मीनार की ऊंचाई 72.5 मीटर यानी 238 फीट के लगभग है और यह ईंटों की बनी सबसे लंबी मीनार है।इसको कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाना शुरू किया था और इल्तुतमिश के समय में यह पूरी हुई ऐसा बताते हैं।
एक और मीनार भी उसी काल में बनी जिसको जाम की मीनार के नाम से जाना जाता है।यह मुहम्मद गौरी के भाई ने पश्चिमी अफगानिस्तान के ग़ौर राज्य के शाहरक जिले में हरी नदी के किनारे बनवाई थी।यह भी चमकीले टाइलों और ईंटों की बनी मीनार है जो 62 मीटर लंबी है और इसका निर्माण लगभग 1190 ईसवी में हुआ था।आज इसके अस्तित्व को उचित देखरेख न होने के कारण खतरा है।
बस इन सबमें एक महत्वपूर्ण फर्क ये था कि वो दो मीनारें शासकों ने बनवाई थीं युद्ध विजय की स्मृति के रूप में जबकि पीसा की मीनार के लिए सबसे पहले एक विधवा महिला ने रकम दी थी चर्च के लिए बैल टावर बनवाने हेतु।
पीसा की मीनार जैसी अन्य झुकी हुई मीनारों में जर्मनी की 15वीं सदी की Sunrhnsen की मीनार है जो 3.97° झुकी हुई है।आबूधाबी की झुकी हुई ही बनाई गई कैपिटल गेट बिल्डिंग जो 18° झुकी है तथा Leaning Tower of Wanaka Newzealand की है जो 53° झुकी बनाई गई है।
पीसा की मीनार के बचने का एक प्रसिद्ध किस्सा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अलाइड सेनाओं को शक हुआ कि कहीं जर्मन लोग इस इमारत का उपयोग उनके खिलाफ छुपने आदि के लिए तो नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने अपने अमेरिकी सेना के सार्जेंट लियोन वैक्सटाइन को इसकी जाँच करने को भेजा।उसको यह शंका निर्मूल लगी और यह इमारत उसको इतनी अच्छी लगी कि उसने इसको टूटने से बचा लिया।
पीसा में मुझको बहुत से स्कूटर तथा मोपेड भी देखने को मिले जिस से मुझको अपनी लखनऊ वाली कुमोदिनी बुआ के लड़के पाठक कौशिक कांत चतुर्वेदी (हम लोगों के मुन्ना दा जो जब 2023 में मैं यह चैप्टर लिख रहा हूँ तो हमारे बीच नहीं हैं) की याद आयी क्योंकि उन पर जब हम लोग लखनऊ पढ़ते थे तो एक स्वेगा मोपेड हुआ करती थी।
पीसा मुझको बहुत सुंदर जगह लगी और चूँकि इतिहास मेरा विषय रहा है तो इसको देख कर मुझको और अच्छा लगा।
पीसा के कैथड्रल ऑफ सांता मारिया असुंता,लीनिंग टावर के अलावा बैप्टिस्ट्री जो वहीं स्थित है उसकी इमारत भी देखने में बहुत अच्छी लगी यद्यपि उसको मैंने अंदर से नहीं देखा।
मेरा मन तो पीसा के और स्थल भी देखने का था पर रोम वापिसी के लिए ट्रेन भी लेनी थी तो मैं वापिस पीसा सेंट्रेल स्टेशन आ गया और वहाँ से ट्रेन लेकर रात तक वापिस रोमा टरमीनी स्टेशन पर आ गया।
यहाँ वापिसी में एक और उल्लेखनीय घटना हुई और वो यह थी कि मैं किसी से लिफ्ट लेकर स्टेशन से जहाँ इस्कॉन का गैस्ट हाउस था वहाँ तक आ गया लेकिन उस ने मुझको गैस्ट हाउस के सामने सड़क की दूसरी तरफ उतार दिया।मैंने सोचा कि आराम से सड़क पर करके दूसरी तरफ चला जाऊंगा पर ऐसा नहीं था।उस सड़क पर बहुत ट्रैफिक था और तेज ट्रैफिक था जिसके कारण मैं लगभग 40-50 मिनट इंतज़ार करता रहा।बड़ी मुश्किल लग रही थी क्योंकि सांय-सांय करके तेजी से बाह्न गुजर रहे थे और दूर-दूर तक सड़क पर करने को कोई स्थान दिख नहीं रहा था।मरता क्या न करता तो मैंने काफी हिम्मत की जो दरअसल बहुत बड़ी बेवकूफी थी और सड़क पर करने को जरा सा खाली देख दौड़ पड़ा तभी दूसरी दिशा से तेज गति से आ रही एक कार ने मेरे बिल्कुल पास आकर तेजी से ब्रेक लगाया जिस से मैं बहुत घबरा गया और कार चालक ने अपना शीशा खोल कर अपनी भाषा में कुछ मंत्रोच्चार सा किया जो निश्चित ही गालियां रही होंगी।जब मैं अपने कमरे में आया और मैंने वहीं के एक श्री कृष्ण भक्त को यह किस्सा सुनाया तो उन्होंने कहा कि यह आपने बहुत बड़ी गलती की थी,आपको ऐसा बिल्कुल नहीं करना था क्योंकि गनीमत थी कि उसने आपको देख लिया और कार के ब्रेक लगा दिए अन्यथा उस सड़क पर वाहन इतनी तेज गति से चलते हैं कि टक्कर होने पर जान के लाले पड़ सकते थे और गलती भी आपकी ही मानी जाती।आज के दिन की यात्रा हो चुकी थी और अब मैं सोने की तैयारी में था क्योंकि अगके दिन सुबह ही रोम घूमने निकलना था।


Comments

  1. Atul bhai aapne to Pura Peesa hi ghuma diya.. Maza aa gaya

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  2. Very nice and interesting blog.

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