इतिहास और संस्कृति के किस्से-22. फ्रांसीसी यात्री और लेखक बर्नियर की पुस्तक से एक किस्सा भारत की राजपूतानियों का

इतिहास और संस्कृति के किस्से-22

फ्रांसीसी यात्री और लेखक बर्नियर की पुस्तक से एक किस्सा भारत की राजपूतानियों का

ये घटना है जब राजा जसवंत सिंह शाहजहाँ की फौज की ओर से औरंगज़ेब की सेनाओं के विरुद्ध वीरता से लड़े किन्तु उनके 8 हजार सैनिकों में से केवल 500 बचे तो अपनी ताकत पुनः जुटाने को एक रणनीतिवश वह युद्ध से लौट आये 

लेकिन क्या एक राजपूतानी को पसंद आया कि उसका पति युद्ध क्षेत्र से ऐसे लौट आये?

क्योंकि उनका मानना था….
या तो विजय या वीरगति…….

‘किले के फाटक बन्द कर दो… मैं ऐसे पति का मुख नहीं देखूँगी!’  
ऐसी नारी थीं राजपूतानियाँ। 

ये कहानी है उस राजपूतानी की… जिसके लिए मान–सम्मान, जीवन से बड़ा था।

उस अवसर पर राजा जसवंत सिंह की पत्नी, जो राणा के कुल की थीं, का व्यवहार जानने योग्य है।  

जब उसने सुना कि उसका पति आठ सहस्त्र की विशाल सेना में से केवल पाँच सौ योद्धाओं के साथ लौटा है—वह भी पराजित होकर नहीं, बल्कि रणभूमि में अदम्य वीरता दिखाकर—तो उसे गर्व होना चाहिए था।  

लेकिन हुआ इसके विपरीत।  

> “किले के सब फाटक बन्द कर दो! मैं ऐसे निन्दित पुरुष को भीतर नहीं आने दूँगी।”  

और फिर उसकी वाणी गरजी—  

> “यह व्यक्ति और मेरा पति? 
राणा (चित्तौड़ के राणा यानी महाराणा प्रताप के कुल का ) का दामाद और इतना निर्लज्ज?
 मैं उसका मुख कभी नहीं देखना चाहती।  
> यदि रणभूमि में शत्रुओं को हरा नहीं सका तो यहाँ लौटने की क्या आवश्यकता थी?  
> वहीं वीरता दिखाकर प्राण दे देता तो उचित था!”  

उसके शब्द मानो तलवार की धार से भी अधिक तीखे थे।  
युद्ध से इस प्रकार से लौटना… उसे मृत्यु से भी बड़ा कलंक लगा।  

इधर उसके मन में एक और विचार ज्वाला बनकर उठा।  

और बोलीं
-“कोई है जो मेरे लिये चिता तैयार करे?  
 मैं अपनी देह अग्नि को अर्पण कर दूँगी।  
मुझे धोखा हुआ है।  
मेरा पति वास्तव में रणभूमि में मारा गया है—इसके अतिरिक्त और कोई बात हो ही नहीं सकती!”  

इसके बाद वह दिन-रात क्रोध में न जाने क्या-क्या बोलती रही।  
आठ-दस दिन तक उसकी यही दशा रही।  
इस दौरान उसने जसवंतसिंह से एक बार भी भेंट नहीं की।  

इसी दौरान उसकी माँ का वहाँ आना हुआ जो कुछ बात बनाने वाला साबित हुआ 
माँ उसके पास आई और धीरे से समझाया—  

“घबराओ मत। राजा फिर से नयी सेना संगठित करेगा और  औरंगजेब पर दुबारा आक्रमण होगा।  
उसकी (राजा जसवंत सिंह की)  वीरता और साहस की लोग फिर प्रशंसा करेंगे।”  

यह सुनकर उसका क्रोध शांत होने लगा।  

शायद सही भी है क्योंकि वह मध्ययुग का काल था और यही  उस समय की स्त्रियों की सोच थी।  
वे अपने नाम, अपने कुल की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान के लिए जीती थीं और उनकी सोच के अनुसार यदि उस पर कोई ठेस लगती तो फिर जीना कठिन था।

 “पति के साथ अग्नि में कूद जाना… उनके लिए धर्म था, गौरव था।” 

लेखक बर्नियर स्वयं कहता है—  

 “मैंने अपनी आँखों से अनेक स्त्रियों को अपने पतियों के साथ अग्नि में जलकर मरते देखा है।  
परंतु इन प्रसंगों का विस्तार किसी और अवसर पर करूँगा।  
तब दिखाऊँगा कि मनुष्य के चिन्तन पर आत्मा, आत्मनिष्ठा, धार्मिकता और मान-सम्मान का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।”

हमारी आज की सोच से उस समय की घटनाओं का आकलन करना तो शायद ठीक नहीं होगा परन्तु उस समय और उस समय की सोच पर आज सिर्फ टिप्पणी की जा सकती है लेकिन  इस घटना से मध्यकाल में महिलाओं की मनःस्थिति और दशा का बयान तो होता ही है। अच्छी बात है कि अब 21वीं शताब्दी है और इसमें ऐसी परिस्थितियां नहीं है।

आज के किस्से में बस इतना ही।
अगले लेख में मुलाकात होगी एक नए किस्से के साथ।

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