पुराना किस्सा नमक, लपलपाती तलवार का तथा बंदूक और भदावर के डकैतों का
पुराना किस्सा नमक, लपलपाती तलवार का तथा बंदूक और भदावर के डकैतों का
अभी हाल में ही मैं अपने सुभाष मामा से फोन पर बात कर रहा था। पुरानी बातें और पुराने किस्से छिड़ गए और बात होने लगी पुराने समय मे गांवों आदि में लोग कैसे सुरक्षित रहते थे।समय कोई भी रहा हो एक तो जनसाधारण को बिना अनुमति के हर किस्म का हथियार रखने का अधिकार कभी नहीं रहा है और दूसरे पुराने समय में घरों और गांवों की सुरक्षा का मसला और कठिन था। पहला किस्सा छिड़ा इस बात से कि हमने उनको बताया कि हमारे छोटे भाई गुड्डू कह रहे थे कि हम लोगों की ननसार में एक ऐसी तलवार थी जो कमर में लपेट ली जाती थी और जब ज़रूरत हो तो उस लपलपाती तलवार को कमर से खोल कर काम में ले लो। सुभाष मामा ने कहा कि हाँ थी और उन्होंने अपने बाबा स्व0 लेखराज जी बप्पू से उसके विषय में सुना था।
इसके बाद बातों के सिलसिले में सुभाष मामा ने अपने परिवार के प्राचीन निवास हथकांत गांव का एक पुराना किस्सा बताया कि एक बार वहाँ का तत्कालीन अधिकारी, एक और अफसर तथा अपने मातहतों के साथ आया और उसने कहा कि खबर मिली है कि इस घर में घर के सामान्य उपयोग से बहुत ज्यादा नमक जमा कर के रखा हुआ है। यहाँ ये बता दें कि उस समय में आप अपने सामान्य उपयोग से बहुत ज्यादा नमक बिना अनुमति के अपने पास ऐसे ही नहीं रख सकते थे क्योंकि जब ट्रांसपोर्ट के अब जैसे साधन नहीं थे तो दूर क्षेत्र में होने/बनने वाले उत्पाद अन्य क्षेत्रों में बहुत महँगे और कई बार अप्राप्य भी होते थे। नमक का उत्पादन क्षेत्र या तो सांभर झील अथवा समुद्री इलाके रहा है तो नमक भी ऐसा ही एक उत्पाद था।
अफसर से जवाब में घरवालों ने कहा कि ऐसा नहीं है पर वो कहाँ मानने वाला था, उसने कहा कि नहीं हम तलाशी खुद लेंगे। इस पर इस घर के एक बुजुर्ग जो महाराज भरतपुर की सेना में एक उच्च पद पर थे और मय अपने अंगरक्षकों के उस समय घर आये हुए थे, उन्होंने कहा कि ठीक है लेकिन यदि नमक नहीं मिला तो हम बाहर निकलते ही तुम्हारी गर्दन काट देंगे क्योंकिं हमारे घर में बहू-बेटी हैं उनको तुम देख लोगे। अंततः वह अफसर और उसकी टीम के लोग बिना जाँच किये ही लौट गए। भरतपुर की सेना में रहे इन बुजुर्ग के पास वह लपलपाती तलवार थी।
ऐसे ही किस्सों के सिलसिले में अगला किस्सा हथियारों और भदावर क्षेत्र के गांव के लोगों से सम्बंधित था।
सुभाष मामा ने बताया कि आगरा जिले की बाह तहसील में चतुर्वेदियों के कई प्राचीन गांव हैं। इनमें कछपुरा और कमतरी लगभग आमने सामने हैं, यमुना नदी की दिशा में सड़क से जाएं तो चंद्रपुर कछपुरा से कुछ पहले की ओर बसा है और यमुना की ओर से जाएं तो कछपुरा से जमुना का किनारा बिल्कुल लगा हुआ सा ही है। किस्सा सुभाष मामा को उनकी स्व0 बड़ी ताई श्रीमती रतन चतुर्वेदी पत्नी स्व0 चुन्नीलाल जी ने बताया था जो उनके मायके कछपुरा गांव का था। ताई के घर में उस जमाने में बंदूक हुआ करती थी। ताई ने बताया कि एक दिन खबर आई कि गांवों में डकैती पड़ने वाली है और डकैत पास के गांवों तक आ गए हैं। यहाँ ध्यान रखने की बात यह है कि तब भी डकैत डकैत ही होते थे निर्दयी, हत्यारे और लुटेरे क्योंकि अच्छे डकैत सिर्फ फिल्मों में ही होते थे। यदि डकैत कुछ लोगों की मदद या सम्मान करते थे तो ध्यान रहे कि इससे न तो उनके हाथों में लगा खून साफ होता था और मदद तो निर्दोषों के खून में भीगी होती ही थी और आज के भी सभी किस्म के अपराधियों पर ये बात लागू होती है, अब डकैतों के तरीके, प्रकार और स्थान बदल गए हैं बस।
खैर,वापिस अपने किस्से पर आते हैं, तो ताई बताती थीं कि उनके श्याम दद्दा, बंसी दद्दा और साथ के कुछ और गांव के लोगों ने तो बंदूक तैयार की और सब गांव वाले छतों पर चढ़ गए, वैसे भी कछपुरा जिधर बसा है वो हिस्सा थोड़ा ऊँचाई पर था और कमतरी की शानदार भव्य हवेलियां सामने दिखती थीं। अजब दृश्य था, डाकू पास के किसी गांव में आ गए थे और इधर आने की खबर थी और इधर कछपुरा और कमतरी के सभी निवासी अपनी-अपनी छतों पर चढ़े हैं, कुछ बंदूक कछपुरा में हैं और शायद कमतरी में भी रही हों, बाकी सब अपने साथ लाठी, बल्लम, ईंट,पत्थर लिए हुए हैं। दोनों तरफ से जोर-जोर से सब तैयारी की, चेतावनी की आवाज़ें लगा रहे हैं, जोर का शोर है और तैयारी का जोश है जिसमें भय खो गया है।
ध्यान रखिये डाकुओं वाला यह किस्सा आज के समय का किस्सा नहीं है बल्कि लगभग 100 साल पुराना सन 1920 के आसपास का किस्सा है, चारों ओर बीहड़ है, यमुना की खादर एक तरफ है और फिर यमुना नदी। गांव वालों ने ठान ली थी कि बस आज नहीं, आज तो श्याम दद्दा,बंसी दद्दा और गांव वालों की बंदूक से डकैतों से मुकाबला होगा ही और हुआ ये कि पता नहीं इस शोर से या इनके जोश के कारण डाकू उस दिन इन गांवों की तरफ नहीं आये और उसी गांव को जहाँ आये थे लूट कर वापिस चले गए। जरा सोचिए कि यदि उस समय गांव वालों पर हथियार बंदूकें और हौसला नहीं होता तो क्या होता?
ये तस्वीरें कछपुरा और कमतरी की हैं
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