सिंदबाद ट्रैवल्स:- दुबई में पारिवारिक पल

सिंदबाद ट्रैवल्स
दुबई में पारिवारिक पल

दुबई में छुट्टी के समय का उपयोग मैंने और रचना ने दुबई,शारजाह आदि घूम कर किया।हम लोग गोल्ड सूक गए जहाँ मैं पहले भी कई बार आ चुका था किन्तु अपनी पत्नी के साथ गोल्ड सूक जाना एक अलग ही अनुभव रहा।दुबई में अल रास से बाहर समुद्र की तरफ आकर नौका भ्रमण भी होता है।दुबई की ढलती शाम में दरिया में नौका में बैठ कर घूमने का एक अलग ही आनन्द था।दुबई की ढलती शाम में शांत ठहरे समुद्र में नौका पर खेवैया के अतिरिक्त बस मैं और रचना।एक तरफ समुद्र में तीन तरफ से पड़ती दुबई की रौशनी का प्रतिबिंब और उसके बीच तैरती हमारी नाव, 
मैं बयान नहीं कर सकता उस अद्भुत अनुभव को,मन हो रहा था कि समुद्र बस ठहरा रहे,ये पल बस ठहरा रहे, नाव इसके पानी पर ऐसे ही तैरती रहे, शांत-मंद रफ्तार से, हम लोगों को समुद्र की शीतल लहरों को छूकर आती हवा जैसे अपने आँचल से सहलाती रहे और
 मैं और रचना इसी क्षण का आनन्द लेते रहें बस मौन-एक दूसरे के हाथ को अपने हाथ में थामे हुए, कभी दुबई की ख़ूबसूरती, कभी समुद्र का गाम्भीर्य और कभी एक दूसरे की आँखों में निहारते हुए।
सतीश मामा ने एक गाड़ी मय ड्राइवर हम लोगो के लिए नियुक्त कर दिया था और हम लोग अक्सर ही किसी न किसी मॉल चले जाते थे।हमने ड्राइंगरूम में एक क्रिस्टल के पीस में समीर और उनकी पत्नी की लेज़र से बनी फोटो देखी थी और हमारा भी मन हुआ कि ऐसी एक फोटो हम भी बनवाएं।मॉल में जाकर हमने अपनी दोनों की तस्वीर लेज़र से एक पिरैमिडनुमा क्रिस्टल में उकरवायी जो बनी तो बहुत अच्छी थी पर ये काम बहुत महंगा लगभग 750 अमेरिकी डॉलर का था।बाद में व्यापार  के लिए मैंने भी एक लेज़र मशीन का आयात किया था पर उसका काम इससे कुछ भिन्न था।
सरकारी कार्यालयों के खुलते-खुलते हमारी वापिसी का भी समय आ गया था।मैं दो तीन बार कस्टम कार्यालय भी गया।एक बात जो मैंने सभी मध्य-पूर्व के देशों में देखी वो यह थी कि वहाँ लगभग सभी काम भारतीय और अन्य एशियन देशों के लोग करते हैं किंतु सरकारी दफ्तरों या इमिग्रेशन आदि में अति महत्वपूर्ण स्थानों पर उनके अपने अरबी लोग ही बैठे दिखे।मेरे तमाम प्रयासों के बाद भी मुझको लगा कि मेरे सारे सर्टिफिकेट्स निकलने में लंबा समय लग सकता है तो मैंने अपनी समस्या सतीश मामा को बताई।उन्होंने बताया कि उनके एक केरल के परिचित हैं जो कोचीन कनैक्शन के नाते सतीश मामा से बहुत सम्मान वाला रिश्ता रखते थे।दुबई के मलयालम वाले रेडियो पर रोज़ उनके उद्गार और प्रवचन आते थे और मलयाली समुदाय में उनका बहुत ज्यादा प्रभाव था।ये बहुत बड़े रेडियो इंफ्लूएंसर हुआ करते थे और अब इनका एशिया टीवी नामक टीवी चैनल भी है।साईदू मुहम्मद निसार नाम के इन महाशय से सतीश मामा ने कहा और फिर मुझसे कहा कि अब तुम वापिस हिंदुस्तान जा सकते हो ये कागज 2 हफ्ते में मिल जाएंगे।सच में ऐसा ही हुआ,हम और रचना तो इसके बाद भारत आ गए और 2 हफ्तों में कस्टम के सर्टिफिकेट मेरे पास आ गए थे।
दुबई से चलते में सतीश मामा ने बहुत सारी ईरानी केसर हम लोगों के साथ रख दी यह कहते हुए कि, "रज्जन जिज्जी (मेरी माँ को उनके छोटे भाई बहिन इसी नाम से पुकारते थे) और जीजाजी के लेंन है।" दुबई में इतना समय कितने मजे और आराम से निकल गया यह पता ही नहीं चला।सतीश मामा (अब स्वर्गीय) और उनके पुत्र समीर ने मेरा और रचना का बहुत खयाल रखा तथा खातिर भी बहुत की यह कहते हुए कि, "भांजा आऔ है बहू के साथ।" दुबई की यह यात्रा भी अब समापन पर थी और हम लोग वापिस चल पड़े थे अपने देश के लिए इस दुबई यात्रा की बहुत सारी मधुर स्मृतियां अपने मनोमस्तिष्क में समेटे हुए।

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