सिंदबाद ट्रैवल्स अमेरिका:- एटलांटिक सिटी. किसी की राय का कोई बीमा नहीं होता

सिंदबाद ट्रैवल्स
अमेरिका:- एटलांटिक सिटी
किसी की राय का कोई बीमा नहीं होता

अमेरिका का कार्यक्रम बनाने में मैंने टीसीआई वाले लाल साहब की मदद और राय ली थी।मेरा अनुभव है कि राय का कोई बीमा नहीं होता अर्थात यदि राय देने वाले की राय गलत निकल गयी तो उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन जिसने राय ली है उसका बंटाधार हो सकता है।ये राय आपने कितने ही काबिल व्यक्ति से और कितने ही सोच समझ कर ली हो लेकिन उसके गलत निकलने पर आपकी क्षतिपूर्ति का कोई जरिया नहीं होता है।कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ।मुझको अमेरिका की ज्यादा जानकारी नहीं थी तो मुझको जहाँ-जहाँ जाना था वहाँ के हिसाब से लाल साहब की राय से और उनके द्वारा ही मैंने VUSA यानी विजिट यू ऐस ऐ की स्कीम के हवाई जहाज के टिकट लिए।ये कुछ-कुछ यूरेल जैसा था लेकिन उससे बहुत भिन्न।ये टिकट गिनती के डेस्टिनेशन्स के थे जो अपरिवर्तनीय किस्म के थे और इससे कुछ ऐसा कार्यक्रम होता कि वाशिंगटन से न्यूयॉर्क-शिकागो-बोस्टन-डलास टेक्सास-कैलिफोर्निया-लॉस एंजेल्स और वापिस वाशिंगटन।अब जब मैं यात्रा की तिथि तय करने  हेतु वाशिंगटन में सम्बंधित एयरलाइंस के ऑफिस पहुँचा तो एक नई चीज मालूम पड़ी कि आप जिस भी एयरलाइंस से जाएंगे वो पहले अपने हब लेकर जाएगी फिर वहाँ से आपके अगले डेस्टिनेशन यानी गंतव्य को जिसका अर्थ था कि मेरे ये टिकट मेरे आधे रास्ते में ही समाप्त हो जाने थे।वीकडेज़ में तत्काल नए टिकट लेना बहुत ही महंगा सौदा था और उस यात्रा में सम्भव नहीं था।मैंने बहुत मगजमारी की किंतु कोई रास्ता सम्भव नहीं था।मैंने अपने राय देने वाले लाल साहब से कहा तो उन्होंने कहा कि आप उसको अगर बिल्कुल काम में नहीं लेंगे तो हम पूरे पैसे वापिस कर देंगे जो उन्होंने किये भी किंतु मेरा यात्रा का मूल प्लान तो चौपट हो गया था।
एक दिन हम लोगों को बीनू दादा-दीपा भाभी एटलांटिक सिटी घुमाने कार द्वारा ले गए।उस समय भारत में एक्सप्रेसवे संस्कृति शुरू नहीं हुई थी तो वहाँ की सड़कें देख कर चमत्कृत तो होना ही था जैसा अब अपनी एक्सप्रेसवे देख कर गर्व की अनुभूति होती है।लगभग 200 मील का यह सफर लगभग साढ़े तीन घण्टे का था।रास्ते में हम लोग चाय आदि को रुके और वो स्थान अपने पुराने नैशनल हाईवेज़ के ढाबों के मुकाबले बिल्कुल बेजान और नीरस लगा जैसे आजकल अपने यमुना एक्सप्रेसवे के रुकने के स्थानों पर भी महसूस होता है।कहाँ उन ढाबों की रौनक और विविधता वाला खाना और कहाँ एक्सप्रेसवे के नीरस,स्वाधीन महंगे स्टॉप-ओवर।खैर,रास्ता बहुत अच्छा था,थोड़ी देर बीनू दादा ने अपनी कार को क्रूज़ कंट्रोल पर भी चलाया जो देख कर तब आश्चर्य हुआ था।
एटलांटिक सिटी एक पर्यटक लोगों के लिए बना रिसॉर्ट सिटी था।यह न्यू-जर्सी के एटलांटिक कोस्ट यानी कि एटलांटिक महासागर के किनारे अमेरिका के पूर्वी समुद्र तट पर स्थित है।एटलांटिक सिटी शहर अपने शानदार समुद्री तटों-बीचों,अद्भुत बोर्ड वाक और अपने चमकते-दमकते जुआघरों- कैसिनोज़ के लिए प्रसिद्ध है और इसकी आय का ये एक प्रमुख स्रोत हैं।इसकी स्थापना सन 1800 में एक हैल्थ रिसॉर्ट के रूप में हुई थी। सन 1976 में यहाँ पर जुआ खेलना कानूनी तौर पर जायज बनाया गया। Chalonte-Hadden Hall होटल पूर्वी अमेरिका का पहला होटल था जहाँ 26 मई 1978 को पहला कानूनी तौर पर जायज जुआघर या कैसिनो खुला।
एटलांटिक सिटी की चौड़ी सड़कें और चारों ओर फैली चकाचौंध आपको मानो मंत्रमुग्ध सा कर देती है।अमेरिका में बहुत जगहों पर आपको सबकुछ बहुत बड़ा-बड़ा लगता है,वहाँ की विशालता एक स्वतंत्रता का अलग सा अहसास लिए हुए लगती है।बहुत सी जगहों पर उन्मुक्तता भी झलकती है पर सब अपने में मगन दिखते हैं।एटलांटिक सिटी में भी चारों ओर एक विशालता का सा माहौल नजर आता है।बड़े होटल,बड़े कैसिनो,बड़ी-चौड़ी सड़कें, विशाल वृक्ष,बड़ी कारें,बहुत बड़ा समुद्र किनारे बोर्ड वाक और उसके पार विशाल लहराता उत्तंग लहरों वाला विशाल समुद्र एटलांटिक महासागर।मैंने मुम्बई में अरब सागर, कोलकाता की तरफ बंगाल की खाड़ी तथा यूरोप,दुबई,मध्य-पूर्व में अनेक सागर तट देखे हैं किंतु यहाँ एटलांटिक महासागर के तट पर खड़े होकर मुझको याद आ रहा था भारत के दक्षिण के आखिरी छोर यानी कन्याकुमारी का वो स्थान जहाँ आप तीन समुद्रों यानी कि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और महाविशाल हिन्द महासागर का संगम सा होते देखते हैं।कितना अद्भुत होता है वो दृश्य जहाँ तीनों सागर अलग-अलग रंग में अपनी छटा बिखेर रहे होते हैं और वहाँ का सूर्यास्त का दृश्य तो अलौकिक ही होता है।मैं खड़ा था एटलांटिक महासागर के तट पर और मुझको कन्याकुमारी का वो दृश्य याद आ रहा था कि मेरा ध्यान गया बड़े-बड़े झूलों,मेले के माहौल या वहाँ की भाषा में कार्निवाल,खाने पीने की अनेक दुकानें, शोर शराबा,चहल पहल बता रही थी कि ये अमेरिका है विश्व का सबसे विकसित देश।हम लोग बोर्ड वाक पर गए और वहाँ पर अपने फिरोजाबाद की रामलीला जैसी बंदूक से निशाना लगाने की स्टाल देख कर मेरा मन भी मचल उठा और सफल निशानेबाजी की गई।मैंने वहाँ की निशानेबाजी की प्रतियोगिता में बीनू दादा के पुत्र अमित के लिए एक इनाम भी जीता था।कुल मिलाकर एटलांटिक सिटी का बोर्डवाक एक मजेदार अनुभव था।
इसके बाद हम लोग वहाँ के प्रसिद्ध ट्रम्प ताज महल होटल गए।यह बहुमंजिला होटल अमेरिका के प्रसिद्ध उद्यमी डोनाल्ड ट्रम्प ने बनवाया था।यही डोनाल्ड ट्रम्प बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति भी बने।ताज महल होटल एक बहुत बड़ी बहु-मंजिला इमारत थी जिसके ऊपर बहुत बड़े अक्षरों में लाल रंग के अक्षरों से ट्रम्प तथा ताज महल लिखा था।इसके बीचोबीच एक ऊँचा गुम्बद था।
यहाँ हम लोग कैसिनो देखने गए।वहाँ का नजारा ही अलग और बिल्कुल फिल्मी था। बड़ी-बड़ी स्लॉट मशीनें,बड़ी टेबलें,सामग्री परोसते घूमते वेटर,जबरदस्त गहमागहमी,न जाने कितने लोग वहाँ मनोरंजन के लिए आये हुए थे।कोई जुए में जीत रहा था कोई हार रहा था चारों ओर चमक-दमक पार्टी जैसा माहौल था।मैं भी एक स्लॉट मशीन पर गया,मुझको खेलना तो नहीं आता था किंतु वहीं के एक कर्मचारी ने बताया,मैं कुल 15 डॉलर ले गया था बाकी पैसे बाहर ही छोड़ गया था कार में क्योंकि पता नहीं जुए में मति भ्रष्ट हो और आकर्षण और लालचवश ज्यादा पैसे न खर्च कर दूँ।मैने पहले तो कुछ पैसे जीते लेकिन अंततः हाथ झार चले जुआरी वाला हाल हुआ और पूरे 15 डॉलर गंवा कर मैं भी वापिस हुआ।इस होटल के पोर्टिको में मुझको एक बहुत बड़ी सफेद लिमोज़ीन कार दिखी जिसके साथ मैंने फोटो भी खिंचवाई।मैंने आजतक यानी जब 2023 में जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ तब तक इतनी बड़ी दूसरी कोई कार नहीं देखी।
एटलांटिक सिटी से लौट कर हम वाशिंगटन आ गए।अमेरिका में बीनू दादा,भाभी और उनके बच्चों के साथ यह समय कब निकल गया यह पता ही नहीं चला।अमेरिका तो देखा ही साथ ही यह समय था पुरानी यादों को ताजा करने का,नई मधुर स्मृतियां बनाने का।कभी हम लोग साथ बैठ कर इटावा की अपनी ननसाल की बातें करते तो कभी इलाहाबाद की यादों की।बीनू दादा,दीपा भाभी,अमित और अम्बिका ने जैसे गर्मजोशी से अमेरिका में मेरा ख्याल रखा,खाने का,घुमाने का वो सारी बातें ये बताती हैं कि रिश्तों का क्या महत्व है और कैसे निभाये जाते हैं।
जब मैं अमेरिका के विषय में सोचता हूँ और कोई मुझसे पूछे कि अमेरिकन्स कैसे दिखते हैं तो सिवाय इसके कि मैं कहूँ अच्छे दिखते हैं इसके अलावा मुझ पर कोई जवाब नहीं है क्योंकि यहाँ लगता है कि जैसे विभिन्न संस्कृतियों का,विभिन्न राष्ट्रीयताओं का,विभिन्न क्षेत्र के मनुष्यों का जैसे संगम है।आप अमेरिका के लोगों को रंग,नस्ल आदि के फिक्स्ड पैमानों से नहीं परख सकते क्योंकि जैसे समुद्र में सारी नदियाँ मिल गयीं और सब एक हैं वैसे ही अमेरिका आकर सारे विश्व के लोग चाहे मूलतः वह किसी भी देश के हों वो अमेरिकन हैं और मुझको लगा कि वो ऐसा दिल से महसूस भी करते हैं।यहीं आकर मुझको अपने हिंदुस्तान की विविधता में एकता का महत्व ज्यादा महसूस हुआ और अपने देश पर अपने देश के लोगों पर गर्व महसूस हुआ और दिल ने कहा कि सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा।
मेरी यह यात्रा भी पूरी हो चुकी थी और अगले दिन मैं अमेरिका की मधुर स्मृतियां समेटे हुए वापिस चल दिया था पेरिस के लिए।

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