सिंदबाद ट्रैवल्स:- दुबई की एक और यात्रा
सिंदबाद ट्रैवल्स
दुबई की एक और यात्रा
एक्सपोर्ट का काम शुरू करने के बाद मैं न जाने कितनी बार विदेश गया और न जाने कहाँ-कहाँ गया जिसमें दुबई की भी बहुत यात्राएं हुईं।
सन 2005 की दुबई यात्रा इसलिए उल्लेखनीय है कि इस यात्रा में मेरी पत्नी रचना भी मेरे साथ थीं।हुआ कुछ यूँ कि हमारा कुछ माल दुबई गया था वो किन्हीं कारणोंवश व्यापारी की कम्पनी ने छुड़ाया नहीं और वो अंततः वहीं की पोर्ट ऑथोरिटी द्वारा वहीं बेच दिया गया।अपने कागजों की खानापूर्ति हेतु इस माल को बेच दिया गया है इस विषयक सर्टिफिकेट की हमको ज़रूरत थी जिसके लिए इस बार दुबई जाना पड़ा।
दुबई में उस समय मेरे सतीश मामा (मम्मी के छोटे ताऊजी के पुत्र) और उनका बेटा समीर रहते थे।उनका कोचीन,आगरा, एर्नाकुलम और दुबई आदि में मसालों (Spice) का पुश्तैनी कारोबार है।मैं और रचना दुबई पहुँचे जहाँ ऐयरपोर्ट पर समीर हमको लेने आ गए थे और हम लोग सीधे उनके न्यू दुबई के दुबई इन्वेस्टमेंट पार्क की ग्रीन कम्युनिटी स्थित उनके घर पहुँच गए।वहाँ पर सतीश मामा का खाने आदि का पूरा घर जैसा चतुर्वेदी परिवारों जैसे खान पान की पूरी व्यवस्था दुबई में भी थी और इसके लिए उनके यहाँ डोमेस्टिक हेल्प आदि के लोगों की पूरी व्यवस्था थी।वो तारीख 1 अगस्त थी सन 2005 की जब हम दुबई पहुँचे।थोड़ी देर में ही समीर के साथ मुझको कस्टम वालों से मिलने जाना था तो हमने रचना को इब्न बतूता मॉल छोड़ दिया।दुबई की जबेल अली विलेज की शेख जायेद रोड स्थित इब्न बतूता मॉल दुनिया का सबसे बड़ा थीम पर आधारित मॉल है।इसकी छत देखने लायक है।इस मॉल में अलग-अलग देशों जैसे भारत,इजिप्ट,तुर्की आदि की थीम पर आधारित हिस्से हैं और यह एक बहुत ही विशाल मॉल है जो दुबई की समृद्धि और सम्पन्नता की कहानी का जीता-जागता प्रतीक है।
रचना को मॉल में छोड़ कर हम लोग चले तब तक हमको खबर लग चुकी थी कि उसी दिन सऊदी अरब के शाह फ़हद बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सऊद का निधन हो गया है।ये दूसरा मौका था जब मैं विदेश में था और किसी बड़ी हस्ती के निधन का समाचार मिला था।पहली बार जब मैं फ्रैंकफर्ट में था और लेडी डायना स्पेंसर की मृत्यु का समाचार था और सारा फ्रैंकफर्ट ही नहीं बल्कि यूरोप में ही शोक का माहौल हो गया था।इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।दुबई में भी राजकीय शोक की घोषणा कर दी गयी और तमाम सरकारी कार्यालय बंद कर दिए गए जिसका परिणाम था कि अब कुछ दिन हमारा काम नहीं हो सकता था।जब हम और समीर कर से जा रहे थे तो अचानक समीर ने बायीं ओर इशारा करते हुए कहा कि दादा देखिए और मैने देखा कि ब्लिंकर जलते हुए एक रोल्स रॉयस जा रही थी जिसके पीछे केवल एक कार और थी।इस रोल्स रॉयस को एक अरबी महाशय चला रहे थे जो समीर ने बताया कि दुबई के किंग थे।बाद में समाचारों से भी मालूम हुआ कि दुबई के राजा कार से ही शायद सऊदी अरब के शोक में गए थे।खास बात यह थी कि देश का राजा खुद अपनी कार चला रहा था,सड़क पर न कोई सायरन था,न बैरीकेड था और न सुरक्षा का जनता को दिक्कत देने वाला कोई तामझाम ही था।मैं इस बात से बहुत प्रभावित हुआ।
दुबई में एक दिन हम लोग चाइनीज़ मॉल या ड्रैगन मार्ट गए जो इतना विशाल था कि सोचना भी सम्भव नहीं था।यह दुबई में चीन के सामान का सबसे बड़ा बाजार था जो बहुत बड़े इलाके में फैला हुआ है।इसमें 3500 से अधिक दुकानें हैं जिनमें चीन का फ़र्नीचर,कपड़ा,कार्पेट,ऑफिस के सामान,इलेक्ट्रॉनिक्स,खेल का सामान,फैशन का सामान आदि न जाने क्या क्या मिलता है और जिसको घूमना एक दिन में तो सम्भव ही नहीं था।
समीर के साथ हम अल रास स्थित उनके ऑफिस भी गए।अल रास दुबई के पुराने डेरा इलाके में स्थित है और यहाँ विश्व प्रसिद्ध गोल्ड सूक, स्पाइस सूक आदि हैं।यहाँ की पतली सड़कें पुरानी अमीराती संस्कृति को दर्शाती हैं।यहाँ एक मजेदार बात यह मालूम पड़ी कि अफ्रीका के बहुत से देशों के व्यापारी यहाँ नकद खरीदारी को आते हैं।वो किसी बैंकिंग ट्रांजैक्शन या अन्य झमेलों में नहीं पड़ते हैं कि पहले ऑर्डर दिया जाए फिर एल सी खुले फिर शिपमेंट हो।वो तो बस झुंड से में अपनी बोट या छोटा शिप लेकर आते हैं और मैंने देखा उनके आते ही बाज़ार में एक किस्म की खलबली सी मचती है और वो खरीद करते जाते हैं,नकद पेमेंट करते जाते हैं और सारा माल अपने-अपने जहाज पर लाद कर अपने देश वापिस चके जाते हैं और यहाँ का बाज़ार माल से खाली सा हो जाता है।यह सब देख सुनकर मुझको मध्यकाल के तटवर्ती राज्यों वाले भारतीय बाजारों के किस्से कहानी याद आ गए।
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