सिंदबाद ट्रैवल्स:- इंग्लैंड में पान मसाला और पाकिस्तानी दुकानदार Pan masala in England and Pakistani store owner

सिंदबाद ट्रैवल्स
इंग्लैंड में पान मसाला और पाकिस्तानी दुकानदार
Pan masala in England and Pakistani store owner

मुझको उन दिनों पान पराग पान मसाला (सादा बिना तम्बाकू वाला) खाने का शौक था और वो मुझ पर था नहीं।मैंने वहाँ के बाज़ार में पान पराग खोजा तो कहीं मिला नहीं फिर किसी के बताने पर कि वो आगे चल कर एक स्टोर में मिल सकता है मैं उस स्टोर की तरफ पैदल ही चल दिया।वो स्टोर यद्यपि काफी दूर था किंतु बर्मिंघम की हरियाली और खूबसूरत मौसम में वो लगभग आधे घंटे पैदल की दूरी कुछ मालूम ही नहीं पड़ी।मैने उस स्टोर में पहुँच कर अपनी खोज शुरू कर दी लेकिन लगभग सारी रैकों में खोजने के बाद भी मुझको पान मसाला कहीं नहीं मिला।मेरे चेहरे पर निराशा के भाव देख कर स्टोर के मालिक जिनकी उम्र लगभग 35-40 वर्ष की रही होगी वो मेरे पास आये और उन्होंने मुझसे पूछा कि जनाब आप क्या खोज रहे हैं?मैंने उनसे कहा कि मैं कई दिनों से पान पराग की तलाश में हूँ किन्तु मिल नहीं रहा तो वो बोले कि आज तो पान पराग नहीं है।इस पर मैं थोड़ा निराश होकर चलने लगा तो वो मुझको अपने बैठने के स्थान के पास ले गए और उसके पीछे दीवाल में बनी एक छोटी सी अलमारी खोल कर उन्होंने पान पराग का डिब्बा निकाल कर मुझको खाने को दिया।मैंने धन्यवाद देते हुए मसाला खाया और चलने को हुआ तो वो बोले कि ये डिब्बा आप ले जाइए।मैंने पहले मना किया किन्तु उन्होंने बहुत जोर दिया तो मैंने पैसे पूछे तो वो मुस्कुराते हुए बोले कि अरे जनाब आप भी शौकीन हैं और मैं भी इसका शौकीन हूँ,ये तो मेरा अपने खाने का डिब्बा था अब आप ले जाइए और उन्होंने जबरदस्ती वो डिब्बा मुझको दे दिया।हम लोगों की फिर काफी देर बातचीत होती रही।वो मुझसे फ़िरोज़ाबाद, दिल्ली और भारत के विषय में बातें पूछते रहे दरअसल वो पाकिस्तान से थे।उनकी खुशमिजाजी और हँसता हुआ शालीन चेहरा मुझको आज भी याद है।अपनी विदेश यात्राओं में मैंने कई बार ऐसा महसूस किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच झगड़े और वैमनस्य जितने अखबारों और टीवी पर दिखते हैं वो जब दोनों देश के लोग आपस में मिलते हैं तब अक्सर ऐसा महसूस नहीं होता है। शायद जनता के दिल की आवाज़ और सियासत की मजबूरियों में अक्सर कर बहुत फर्क होता है।लोगों से बात कर के यह भी मालूम पड़ा कि बर्मिंघम में लगभग 25-26% आबादी एशियन समुदाय के लोगों की है जिसमें भारतीय और पाकिस्तानी भी काफी थे।इसके बाद बाज़ार में मैं थोड़ा घूमा और एक स्टोर से मैंने नई डिज़ाइन के दिखने वाले काँच के कुछ डिकेंटर्स भी खरीदे जिनको देख कर हम लोग कुछ नयी डिज़ाइन के डिकेंटर्स खुद भी बना सकें।इस सब में मेरे काफी पैसे खर्च हो गए किन्तु मेरे पास इस बार अपनी बैंक का वीसा का इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड था इस लिए चिंता की कोई बात नहीं थी।

Comments

Popular posts from this blog

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

University of Allahabad 139th Foundation Day 23 September 2026

लोकसेवक — 1 जज साहब सुरेश चंद्र चतुर्वेदी