सिंदबाद ट्रैवल्स इटली:- मुरानो-वेनिस मुरानो की स्किल और चार टाँग वाला काँच का घोड़ा
हम ऐसा घोड़ा बना पाए वह भी बिल्कुल ऐसा नहीं
ग्राहक हमसे ऐसा घोड़ा बनवाना चाहता था जो मुरानो के स्किल्ड कारीगर ने आसानी से बना दिया जबकि हम नहीं बना पाए

सिंदबाद ट्रैवल्स
इटली:- मुरानो-वेनिस
मुरानो की स्किल और चार टाँग वाला काँच का घोड़ा
वहाँ की फैक्ट्री में वो कैसे काँच का सामान बनाते हैं आप आराम से जाकर देख सकते हैं।मैं भी उत्सुकता और जिज्ञासावश एक फैक्ट्री में चला गया।वहाँ एक तरफ खड़े होकर मैंने देखा कि हम लोगों की फैक्ट्रियों के मुकाबले वहाँ की फैक्ट्री बहुत ही साफ सुथरी और व्यवस्थित थी,छोटी फर्नेस थी और काम करने वाले कारीगर भी काफी कम थे।मेरे देखते ही देखते एक कारीगर ने जो अपने सर पर हैट लगाए था,उसके मुँह में होठों में एक सिगरेट दबी हुई थी उसने एक गाना गुनगुनाते हुए मस्ती और अत्यंत नफासत से लगभग 15 मिनट से कम समय में चार टांगों का एक क्रिस्टल फिनिश का काँच का घोड़ा बना दिया जिसको देख कर मैं दंग रह गया।मुझको याद आया कि 1994 में फ्रांस के एक व्यापारी ने ऐसे ही घोड़े का हमको ऑर्डर दिया था जो हमारे कारीगर नहीं बना पाए थे,फिर ऑर्डर की डिजाइन को आसान करके हमने वो घोड़ा बनाया पर उसमें भी लगभग बीस कारीगर दिन भर में 10-15 के आसपास ही ऐसे घोड़े बना पाते थे जो एक्सपोर्ट किये जाने योग्य थे।यहाँ देख कर मेरी समझ में आया कि असलियत में कला क्या है,स्किल क्या होती है।हमारे यहाँ इतने मेहनती और योग्य कारीगर हैं किंतु उनको सिखाने का कोई सही सिस्टम नहीं है।कागजों पर दशकों से न जाने कितनी योजनाएं हैं स्किल डिवेलपमेंट की, सीडीजीआई जैसे संस्थान भी हैं फिरोजाबाद में किंतु इन योजनाओं,संस्थानों और कार्यक्रमों से जिस का भी और जिस चीज का भी विकास हुआ हो किंतु स्किल का तो नहीं हुआ है और आज भी हम कलात्मक कारीगरी में मुरानो के पासंग भी नहीं हैं।
वहाँ की साफ सुथरी छोटी-छोटी फैक्ट्री देख कर मुझको लगा कि हमारे फिरोजाबाद में गैस आयी किंतु सरकार की नीति ऐसी रहीं कि बड़े उद्योगपतियों का तो लाभ हुआ किंतु छोटे उद्योग चलाने वालों और छोटे कारीगरों के लिए कोई रास्ता नहीं सोचा गया।मैं ये सोचने पर मजबूर था कि क्या काश कभी ऐसा होगा कि हमारे फिरोजाबाद के काँच के उत्पादों का ऐसा नाम होगा?हम भी अपना सामान इतनी ठसक और शान से कभी बेच पाएंगे?हम भी क्या कभी इतनी अनोखी डेकोर की वस्तुएं बना सकेंगे?क्या हमारे यहाँ भी कभी पर्यटन और उद्योग का समीकृत-एकीकृत विकास हो सकेगा?क्या हमारे यहाँ यह सम्भव नहीं है कि जो पर्यटक आगरा घूमने आते हैं उनको फिरोजाबाद नहीं लाया जा सकता जहाँ उनके घूमने को कुछ सांस्कृतिक विरासतों का टूर हो,वो कारखानों में भी जाएं और काँच बनते देखें और इस सवके परिणामस्वरूप फिरोजाबाद में न सिर्फ एक अतिरिक्त उद्योग के रूप में पर्यटन का भी विकास हो साथ ही साथ दुकानदार,रेस्टोरेंट तथा न जाने कितने लोगों के लिए रोजगार का सृजन होगा।जब वेनिस जाने वाले लोग मुरानो के काँच की कला देखने को उत्सुक रहते हैं तो आगरा और फिरोजाबाद का भी इस प्रकार का सम्बंध विकसित करने के प्रयास किये जा सकते हैं।वाराणसी-भदोही,मुरादाबाद आदि जाने कितने स्थान ऐसे हैं जहाँ उद्योग से जुड़ा पर्यटन विकसित हो सकता है।पर क्या कभी ऐसा होगा?क्या हमारे यहाँ की नीतियां भी कभी ऐसी होंगी कि बिना झंझटों के काम करने की इच्छा वाला व्यक्ति काम कर सके और सीखने वाला सीख सके….
बहरहाल इन सभी अनुत्तरित प्रश्नों और मुरानो की उम्दा यादों को अपने हृदय में समेटे मैं वापिस वेनिस को वाटर टैक्सी लेकर चल पड़ा था।
जो फोटो इस पोस्ट के साथ हैं वो इंटरनेट से मुरानो की विभिन्न वेबसाइट्स से ली गयी हैं, साभार
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