काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद
फ़िरोज़ाबाद और यहाँ के काँच के काम का इतिहास
फ़िरोज़ाबाद और काँच उद्योग-1
भारत में काँच का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी रहा है। देश के विभिन्न भागों में जैसे-जैसे पुरातात्त्विक उत्खनन बढ़ते गए, वैसे-वैसे यह बात अधिक स्पष्ट होती गई कि प्राचीन भारत में काँच-निर्माण कोई सीमित या केवल आयातित गतिविधि नहीं थी, बल्कि यह एक व्यापक, स्वदेशी और तकनीकी रूप से विकसित परंपरा थी। उत्तर प्रदेश के कोपिया, उत्तर-पश्चिम के तक्षशिला/टैक्सिला, सातवाहन कालीन स्थलों और अन्य अनेक पुरास्थलों से काँच के मनके, चूड़ियाँ, कटोरे, स्लैग, छोटे पात्र, टाइलें और काँच की शीशियाँ बड़ी मात्रा में प्राप्त हुई हैं। इन वस्तुओं की संख्या और विविधता यह संकेत करती है कि इन्हें केवल विदेशी आयात मानकर नहीं समझा जा सकता। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेख मिलता है कि जितने अधिक उत्खनन हुए, उतना ही यह सिद्ध होता गया कि प्राचीन भारत में काँच-कार्य व्यापक था, और उपलब्ध वस्तुओं का बड़ा भाग स्थानीय उत्पादन पर आधारित रहा होगा।
काँच की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में लंबे समय तक चर्चा रही है और यह विषय आज भी पूरी तरह “रहस्यपूर्ण” माना जाता है। फिर भी, साहित्य और पुरातत्त्व के प्रमाणों से यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भारतीय समाज काँच से बहुत पहले से परिचित था और उसके उपयोग के रूप समय के साथ बढ़ते गए। वैदिक साहित्य में काँच के संकेत बहुत आरंभ में मिलते हैं। यजुर्वेद में स्त्रियों के आभूषणों में काँच का उल्लेख मिलता है और यह भी बताया गया है कि ऐसे काँच के मनके स्वर्ण-धागे में पिरोकर पहने जाते थे। शतपथ ब्राह्मण में अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग में घोड़ों के श्रृंगार के लिए काँच के मनकों का उल्लेख मिलता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में घोड़ों की अयाल और पूँछ सजाने के लिए बहुरंगी काँच के मनकों का वर्णन मिलता है। इन उल्लेखों से यह अनुमान किया जा सकता है कि उस समय काँच का प्रयोग केवल जाना-पहचाना नहीं था, बल्कि रंग-रूप और अलंकरण के लिए उसके उपयोग की समझ भी विकसित हो चुकी थी।
बौद्ध साहित्य में विनय पिटक के महावग्ग और कुल्लवग्ग में काँच का उल्लेख एक अलग रूप में आता है। वहाँ भिक्षुओं को काँच-जड़ी जूतियाँ और काँच के पात्र रखने की मनाही का वर्णन मिलता है। यह निषेध अपने-आप में यह बताता है कि काँच की ऐसी वस्तुएँ समाज में उपलब्ध थीं और संभवतः आकर्षक, मूल्यवान या विलास से जुड़ी मानी जाती थीं। जैन ग्रंथ आचारांग सूत्र में भी काँच को भिक्षुओं के लिए वर्जित वस्तु बताया गया है। महाकाव्य परंपरा में काँच-शिल्प की झलक मिलती है। रामायण में “काचकार” अर्थात काँच बनाने वाले कारीगर का उल्लेख है, जिससे स्पष्ट होता है कि काँच-निर्माण एक विशेष शिल्प और पेशे के रूप में पहचाना जाता था। महाभारत में अग्नि द्वारा विशेष मिट्टी पर बने काँच का उल्लेख मिलता है, जो कच्चे पदार्थों और ताप-आधारित परिवर्तन जैसी बातों की ओर संकेत करता है।
काँच का उपयोग केवल आभूषणों तक सीमित नहीं रहा। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में औषधि-निर्माण तथा शल्य-चिकित्सा के संदर्भ में काँच के पात्रों और उपकरणों के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। अर्थशास्त्र में स्वर्ण आभूषणों में काँच के टुकड़ों के प्रयोग, जिसे “क्षेपण” कहा गया है, का उल्लेख मिलता है। यह काँच के सामाजिक और आर्थिक पक्ष को सामने रखता है। उत्तरवर्ती साहित्य में दिव्यावदान में आभूषणों के संदर्भ में काँच का उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता में काँच को व्यापार और वाणिज्य की वस्तु के रूप में देखा गया है। स्वप्नवासवदत्ता में मोर की गर्दन जैसा रंगीन काँच वर्णित है और रत्नपरीक्षा में रत्नों तथा आभूषणों में काँच का उल्लेख मिलता है। गरुड़ पुराण में रंगीन काँच का वर्णन मिलता है और अगस्तिमत में हरे रंग के काँच का विशेष उल्लेख आता है। अमरकोश में काँच के बर्तनों के नाम—शृंगाण, शुक्याकाच और काचस्थाली—मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि काँच घरेलू उपयोग के बर्तनों तक भी पहुँच चुका था। कुट्टनिमत में काँच के हार का उल्लेख मिलता है। इसी लम्बी परंपरा में कामांडकीय नीतिसार, गौड़वहो, भल्लट शतक, कथासरित्सागर, युक्तिकल्पतरु और शुक्रनीतिसार जैसे ग्रंथों में भी काँच के संदर्भ आते हैं। आगे चलकर व्यासयोगचरित में चश्मों का उल्लेख यह दिखाता है कि मध्यकाल तक काँच का उपयोग दृष्टि-सहायक उपकरणों में भी होने लगा था। इन सभी विवरणों का कुल निष्कर्ष यही है कि वैदिक काल से लेकर ईसा की छठी–सातवीं शताब्दी तक काँच का ज्ञान और विशेषकर रंगीन काँच का प्रयोग भारत में प्रचलित और लोकप्रिय हो चुका था।
यहाँ एक स्थान पर यह स्पष्ट कर देना उपयोगी है कि यहाँ जिन-जिन स्थानों का उल्लेख आया है, वे सभी काँच या काँच-कार्य के प्रमाणों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। इनमें मोहनजोदड़ो और हड़प्पा (जहाँ फ़ैयेंस/ग्लासी सामग्री के प्रमाण मिलते हैं), दक्षिण दक्कन का मस्की (जहाँ काँच की चूड़ियाँ मिलीं), उत्तर भारत के हस्तिनापुर और रूपड़ (जहाँ 9वीं–8वीं शताब्दी ई.पू. के स्तरों में काँच की चूड़ियाँ मिलीं), तक्षशिला/टैक्सिला (जहाँ विभिन्न शताब्दियों के मनके मिले), उत्तर प्रदेश का कोपिया (जहाँ मनकों सहित काँच अवशेष और वैज्ञानिक रूप से पहचानी गई संरचना के प्रमाण मिले), कौशाम्बी (जहाँ कोपिया-जैसी संरचना के काँच की पहचान की गई), आरिकमेडु और अहिच्छत्र (जहाँ के काँच का प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया), सातवाहन कालीन विभिन्न स्थल (जहाँ काँच की वस्तुएँ मिलीं), तमिलनाडु के अनेक स्थल (जहाँ उच्च-ऐल्यूमिना काँच के नमूनों की विशेष उपस्थिति बताई गई), पत्तनम (जहाँ बड़ी संख्या में मनकों के अध्ययन से ‘इंडो-पैसिफिक’ परंपरा को समझा गया), संजन (जहाँ 10वीं–12वीं शताब्दी की काँच की टेबलवेयर—बोतलें, शीशियाँ, फुटेड प्लेटें, डिस्टिलेशन उपकरण, गॉब्लेट आदि—मिलीं), पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में बारिकोट (जहाँ प्रथम सहस्राब्दी ई.पू. से कुषाण काल तक ग्लासी सामग्री के विकास पर चर्चा हुई), श्रीलंका का गिरिबावा (जहाँ प्राथमिक उत्पादन के संकेत बताए गए), थाईलैंड का खुआन लुकपट (जहाँ ‘इंडो-पैसिफिक’ मनके बहुत बड़ी संख्या में मिले) और प्रशिक्षण-संदर्भ में कपड़वंज (जहाँ पारंपरिक दर्पण-कार्य होता है) तथा वडनगर शामिल हैं।
इसी तरह यह भी उपयोगी है कि जिन प्राचीन ग्रंथों और पुस्तकों में काँच का उल्लेख आया है, उन्हें एक साथ देखा जाए, ताकि साहित्यिक परंपरा की निरंतरता समझ में आए। इनमें वैदिक साहित्य के यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय ब्राह्मण; बौद्ध परंपरा में विनय पिटक (महावग्ग और कुल्लवग्ग); जैन परंपरा में आचारांग सूत्र; महाकाव्यों में रामायण और महाभारत; चिकित्सा परंपरा में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता; शासन/अर्थनीति में अर्थशास्त्र; उत्तरवर्ती ग्रंथों में दिव्यावदान, वराहमिहिर की बृहत्संहिता, स्वप्नवासवदत्ता, रत्नपरीक्षा, गरुड़ पुराण, अगस्तिमत, अमरकोश, कुट्टनिमत, कामांडकीय नीतिसार, गौड़वहो, भल्लट शतक, कथासरित्सागर, युक्तिकल्पतरु, शुक्रनीतिसार और व्यासयोगचरित शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ के लिए रोमन लेखक प्लिनी की Natural History भी महत्वपूर्ण है, जिसमें भारतीय क्रिस्टल को “बेजोड़” कहा गया है।
मध्यकाल में भी भारत में काँच के अच्छे उत्पादों का प्रमाण मिला है।तारा डेस्जार्डिंस ने अपनी पुस्तक Mughal Glass-A History Of Glassmaking In India में इसका विस्तार से वर्णन किया है।उन्होंने अपनी पुस्तक में इस बात का भी उल्लेख किया है कि मुग़ल बादशाहों के महलों में फिरोजाबाद के काँच के सजावटी उत्पाद भी मौजूद थे।उन्होंने अपनी पुस्तक के पृष्ठ 39 लिखा है कि, “ अकबर के काल में काँच उत्पादन के कई केंद्र थे जिनमें एक ‘चन्द्रवार नगर’ नामक कस्बा था बाद में जिसका नाम फ़िरोज़ाबाद हुआ।” उन्होंने आगे लिखा है कि, “ ……..सबसे अधिक संभावना है कि फिरोजाबाद का काँच अकबर के शाही खजाने के कमरों को भरता था, जिसमें यूरोपीय यात्रियों के विवरण के अनुसार, चीनी मिट्टी और रंगीन काँच के हर प्रकार के सबसे सुंदर बर्तन, दो मिलियन और आधा रुपये से अधिक मूल्य के थे।लेकिन शाही राजधानी में अन्य प्रकार का काँच भी बनाया जाता था। अर्धकथानक — मुगल कालीन (कवि)बनारसी दास (1581-1643) का एक आत्मकथात्मक ग्रंथ, जो अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में लिखा गया (और 1641 में पूरा हुआ) — आगरा में सेवा व्यवसायों की सूची में काँच फूँकने वालों (काँच बनाने वालों) का भी उल्लेख करता है।
आगरा केवल सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र ही नहीं था, बल्कि इसे फतेहपुर सीकरी से जोड़ने वाली सड़क (जो 1571–85 तक अकबर की राजधानी थी) को भी एक लगातार चलने वाले बाजार के रूप में बताया गया है, जहाँ हर चीज़ प्राप्त की जा सकती थी। यह शाही बाजारों के साथ चलने वाले शिविर में भी उपलब्ध होती थी, जिसमें काँच के बर्तन भी शामिल थे।”
फ़िरोज़ाबाद या कहें कि वर्तमान फ़िरोज़ाबाद और आसपास के क्षेत्र में काँच के काम का इतिहास लगभग 400 वर्ष से ज़्यादा का कहा जा सकता है। फिरोजाबाद (बाद में नाम पड़ा) के पास अकबर के समय में गया से लौटते हुए राजा टोडरमल के काफिले और इस इलाक़े के तत्काल “सायत “ वसूलने के प्रभारी (ज़मींदार) चौबे दुर्गादास का विवाद इतिहास में टोडरमल के क़ाफ़िले की लूट की घटना के रूप में दर्ज है। उस समय प्रभावशाली ज़मींदारों को “ठाकुर” नाम से भी सम्बोधित किया जाता था तो बहुत से लोगों ने इस घटना का स्थानीय ठाकुरों और टोडरमल की लूट से भी जिक्र किया है।इस विषय में पहले भी मैं लिख चुका हूँ और फिर किसी और लेख में भी अलग से इस घटना का उल्लेख करूँगा।
आगरा में मुग़ल सल्तनत की राजधानी होने से आसपास कई किस्म के हस्तशिल्प को बढ़ावा मिला जैसे जलेसर में पीतल का काम,अलीगढ़ में पीतल की ढलाई,आगरा में पत्थर का काम,हसायन में चूड़ियों का काम,पुरदलनगर में मोतियों का काम आदि। इसी प्रकार फ़िरोज़ाबाद में काँच की उस समय की सजावट की वस्तुयें जैसे इत्र रखने की शीशियाँ आदि बनाने का काम होने लगा था। Navneet Saraswat नवनीत सारस्वत ने अपने शोधपत्र में ज़िक्र किया है कि फिरोजाबाद ने चूड़ियों के निर्माण और मनके बनाने को राजस्थान से कारीगर आमंत्रित किए जो “शीशगर” कहलाते थे।18वीं शताब्दी में जसराना और आसपास के कारीगर पुराने कपड़े और रेह के मिश्रण का उपयोग चूड़ियाँ बनाने में करने लगे।फ़िरोज़ाबाद के काँच के काम का ज़िक्र Tara Desjardins ने अपनी पुस्तक Mughal Glass-A History Of Glassmaking In India में भी किया है जिसका उल्लेख मैं ऊपर भी कर चुका हूँ।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों को ऐसी ज़रूरत थी कि उनके उपयोग की वस्तुएँ यहीं भारत में बनें क्योंकि उस समय ट्रांसपोर्ट की समस्या थी तो इसका लाभ फ़िरोज़ाबाद के काँच उद्योग को भी हुआ।प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज़ों की नीतियों में परिवर्तन आना शुरू हुआ और भारतीय उद्योग को हतोत्साहित करने को उन्होंने बड़ी मात्रा में टैरिफ़ लगाये। इनके से बहुत से कच्चे माल ऐसे भी थे जिन पर लगाए टैरिफ़ों से सारे देश और फ़िरोज़ाबाद के काँच उद्योग को भी बहुत बड़ा झटका लगा और यही वह दौर था जब कुछ पढ़े लिखे युवा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक द्वारा तलेगाँव पुणे में स्थापित कराए “पैसा फंड ग्लास” और स्वदेशी से प्रेरणा लेकर फ़िरोज़ाबाद के काँच के काम को फैक्ट्री स्टेज में ले जा रहे थे।इन लोगों में पंडित सुशील चंद्र चतुर्वेदी, बाबू गंगा प्रसाद जैन (जो बाद में मध्य प्रदेश कैडर में IAS अधिकारी बने ), कानपुर के पुरुषोत्तम दास सिंघानिया आदि प्रमुख थे।उस समय फिरोजाबाद में चूड़ी और ब्लॉक ग्लास का काम प्रमुख रूप से हो रहा था।
सन् 1931 में 20 अक्टूबर को भारत सरकार के टैरिफ बोर्ड ने एक प्रेस विज्ञप्ति निकाली कि काँच के विषय को टैरिफ़ बोर्ड को संसूचित कर दिया गया है और जो लोग इस विषय में अपने विचार देना चाहते हैं वे अपने ज्ञापन/representation 20 नवंबर 1931 तक टैरिफ़ बोर्ड को भेज दें जो सेक्रेटरी,इंडियन टैरिफ़ बोर्ड,टाउन हॉल,बॉम्बे को संबोधित हों।
इसमें लगभग 14 काँच के कारख़ानों तथा उनकी संस्थाओं ने पूरे भारत से भाग लिया और अपनी बात रखी जिनमे फ़िरोज़ाबाद का प्रतिनिधित्व Glass And Bangles Industrial Association Firozabad ने अपने प्रेसिडेंट पंडित सुशील चंद्र चतुर्वेदी, बाबू गंगा प्रसाद जैन (सैक्रेटरी) और पी डी सिंघानिया जी ने किया था। इनकी एविडेंस टैरिफ़ कमीशन में 19 जनवरी 1932 को बॉम्बे में रिकॉर्ड हुई थी जिसका सारा विवरण Indian Tariff Board, Evidence recorded during enquiry on the Grant Of Protection To The Glass Indistry नामक पुस्तक में दर्ज है। इस पुस्तक के पेज 123 से पेज 137 तक लिखित ज्ञापन दर्ज है जिसमें फिरोजाबाद के काँच उद्योग का संक्षिप्त विवरण,इतिहास,तरीक़े तथा समस्याएं दी हैं और फिर पेज 138 से पेज 157 तक मौखिक गवाहियाँ आदि दर्ज हैं।इस दस्तावेज़ से पता चलता है कि उस समय फिरोजाबाद में इस संस्था के सदस्य के रूप में तथा अन्य काँच के कारख़ानों में जो नाम दर्ज थे उनके नाम इस प्रकार हैं:-
1.The Indian Glass Works Started in 1908
2.The Coronation Glass Works in 1912
3. P.M.J.P. Friends Glass Works in 1912 & 1929
4.The Bhanni Lal Glass Works in 1919
5.The Hanuman Glass Works in 1926
6.Laxmi Glass Works in 1925/1929
7.The Nizamuddin Glass Works in 1926
8. Kadir Bux Sikander Bux Glass Works in 1927
9.Sadulla ShahabuddinGlass Works in 1927
10.Shahabuddin Riazuddin Glass Works in 1927
11.Abdul Rahman Abdul Ghani Glass Works in 1927
12.Ustad Karim Bax Glass Works in 1927
13.Gauri Shankar Dau Dayal Glass Works in 1928
14.Bhure Gulsher Glass Works in 1927
15.Vidya Ram Ram Swarup Glass Works in 1929
16.Bhajan Bihari Lal Magan Bihari Lal Glass Works in 1929
18. Ram Chand Roshan Lal Glass Works in 1927
19.Asa Ram Rati Ram Glass Works in 1931
20.Panna Lal Ram Prakash Glass Works in 1929
भारत की स्वतंत्रता तक भारत के उद्योग मुख्यत: स्वदेशी की अवधारणा से चल रहे थे और फ़िरोज़ाबाद का काँच उद्योग भी कमोबेश इसी परिपाटी पर काम कर रहा था।1930 के दशक में जैन ग्लास वर्क्स आदि कारख़ाने काँच के बर्तनों का उत्पादन शुरू कर चुके थे।1930 के दशक में ही हनुमान ग्लास के पंडित सुशील चंद्र चतुर्वेदी ने भट्टी बनाने को हॉलैंड से इंजीनियर और काँच के स्मैल्टर बुलाए थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद 1960 के दशक से फिरोजाबाद के काँच के कारख़ाने स्वदेशी के साथ साथ Import Substitution की विचारधारा और आर्थिकी को भी समझ रहे थे। स्वाधीन प्रसाद गुप्ता उन शुरुआती लोगों में थे जिन्होंने फ़िरोज़ाबाद में काँच के रंगीन उत्पाद बनाए और बाद में पॉपुलर ग्लास में लाला गंगाप्रसाद, लाला दामोदर दास गुप्ता तथा आकाशदीप ग्लास ने रंगीन काँच के अच्छे उत्पाद बनाए और इन उत्पादों के फ़िरोज़ाबाद में बनने के भविष्य की नींव रखी ऐसा कहा जा सकता है। एडवांस ग्लास, फिर वैस्ट ग्लास, सी ऐ ग्लास, ऐम के ग्लास आदि भी काँच के घरेलू उत्पाद ग्लास आदि बनाने लगे थे जबकि चूड़ी,ब्लॉक ग्लास आदि के अतिरिक्त हनुमान ग्लास और आगे चल कर श्री राघव ग्लास वर्क्स में विट्राइट ग्लास और प्लास्टिक ग्लास का उत्पादन होने लगा जो पहले हॉलैंड और जापान से आता था। विट्राइट ग्लास का उपयोग घरेलू बल्बों की कैप में तथा प्लास्टिक ग्लास का उपयोग कँचों की गोलियों में होता था। फ़िरोज़ाबाद में काँच का काम तो हो रहा था किंतु तकनीक की दृष्टि से आगे बढ़ने में बहुत बड़ी समस्या ईधन विषयक थी क्योंकि यहाँ की भट्टियाँ अधिकतर कोयले से चलती थीं और कुछेक औद्योगिक तेल से।जब तक फर्नेस बेहतर नहीं होती तब तक उत्पादन प्रक्रिया को अगली स्टेज पर ले जा सकना बहुत कठिन था।हाँलाँकि इस दौर में भी भूरे खाँ ग्लास वर्क्स में बेहतरीन लाल रंग बन रहा था और ग्लास टैक्नोलॉजी पढ़ कर वीरेंद्र कुमार गुप्ता जी “पिंक” कलर बनाने में समर्थ थे और इनके अतिरिक्त 1980 और 1990 के दशकों में पॉपुलर ग्लास और डी डी ग्लास में विशिष्ट किस्म के काँच के उत्पाद जैसे सिग्नल लाइट के ग्लास आदि भी बनने लगे थे।उधर 1960 के दशक से फ़िरोज़ाबाद में इलेक्ट्रिकल फायरिंग के उत्पाद जैसे ग्लास के लाइट के शेड, क्रिस्टल बीड्स आदि भी बनने शुरू हो गए थे जो लिबर्टी इंडस्ट्री और इम्पीरियल ग्लास आदि में बन रहे थे और आगे चलकर इंपीरियल ग्लास आदि ने झाड़ फानूस के उद्योग को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया।इसके साथ ही आकाशदीप ग्लास,ब्राइट ग्लास,रूबी नॉवल्टी जैसे कारख़ाने जापानी पॉट फर्नेस में काँच के रंगीन उत्पाद रोली पोली ग्लास आदि बना रहे थे।
चूड़ी बनाने में रुस्तम उस्ताद को इतिहास पुरुष कहा जा सकता है और काँच बनाने में पंचम सिंह या पंचा और नंदन सिंह की स्मैल्टरी का भी योगदान अनूठा रहा है।
इसके अतिरिक्त 1960 के दशक में मोतियों के उत्पादन का काम भी काफ़ी बड़े स्तर पर होना शुरू हो गया था जिसकी शुरुआत पंचशील बीड इंडस्ट्री,श्री राम माहेश्वरी जी,चोखेलाल जी, विश्राम सिंह जी आदि लोगों ने की।इस समय से ही फिरोजाबाद में काँच के खिलौने भी बनाने की शुरुआत हो चुकी थी।फिरोजाबाद में स्विट्ज़रलैंड जैसी गोल्डप्लेटेड स्क्रीन पेंटिंग जिनमें अधिकतर धार्मिक चित्र होते हैं वह बनाने की चक्रेश जैन जी ने एक अच्छी शुरुआत की थी जिनको बाद में उत्तर प्रदेश रत्न से भी सम्मानित किया गया था।
सरकार के विभिन्न अधिकारियों ने फ़िरोज़ाबाद के काँच उद्योग के विकास में सकारात्मक योगदान भी दिया है जिनमें उद्योग विभाग के ऐ जी टी रहे ऐ ऐन शर्मा, मसूद साहब, वीर बब्रवाहन, तथा उद्योग विभाग से ही जुड़े रहे पी सी गुप्ता जी, होती लाल, के ऐन शुक्ला डी ओ ग्लास आदि अनेक लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
1990 के दशक में फ़िरोज़ाबाद में सीधे निर्यात का काम श्री राघव एक्सपोर्ट्स ने शुरू किया। इसके पहले कृष्णा बीड्स वाले फ़िरोज़ाबाद में रहकर पुरदलनगर के मोतियों के उत्पादों का निर्यात कर रहे थे। आगे चलकर पूजा ग्लास, एडवांस ग्लास, झिलमिल ओवरसीज और फिर ट्रांसपेरेंट ओवरसीज़,ऐ ऐम ग्लास आदि ने निर्यात के काम को और आगे बढ़ाया और आज तो फ़िरोज़ाबाद में सैकड़ों निर्यातक हैं।
फिरोजाबाद के काँच उद्योग को 1990 के दशक में जब ईंधन के रूप में गैस मिलने लगी तो नए स्तर पर जाने का मौक़ा मिला लेकिन कुछ समस्याएं भी उत्पन्न हुईं जिनमें एक तो गैस मिलने की समस्या से फिरोजाबाद आज भी जूझ रहा है दूसरे आधुनिकीकरण के साथ जो ऑटोमेशन की दौड़ शुरू हुई है उससे फ़िरोज़ाबाद की असली शक्ति जो स्किल वाले कुशल कारीगरों के उत्पाद थी उस पर असर पड़ा है।फ़िरोज़ाबाद में यद्यपि CDGI अथवा CIGI के नाम से एक तकनीक और स्किल के विकास हेतु एक सरकारी संस्थान भी बना है किंतु तीन दशकों में भी यह अपने को अभी साबित नहीं कर पाया है।समाचारपत्रों से पता चलता है कि फिरोजाबाद में ग्लास म्यूज़ियम के बनाने की बात है जो बहुत अच्छा कदम है परंतु यह एक सरकारी ब्यूरोक्रेटिक म्यूज़ियम होगा या फ़िरोज़ाबाद के काँच की इतिहास यात्रा को सचमुच में दिखाने वाला यह तो समय ही बताएगा। आशा है आने वाले समय में यानी कि फिरोजाबाद के फ़ैक्ट्री स्टेज के काँच के काम के एक शताब्दी हो जाने के बाद अब शायद यहाँ का काँच का उद्योग अब अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने की ओर तेज गति से अग्रसर होगा।
इस लेख में बहुत से लोगों,कारख़ानों और घटनाओं का जिक्र करना रहा गया है परंतु इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इनका योगदान किसी अन्य से कम था।इस सब का ज़िक्र मैं अपनी आने वाली इस विषयक पुस्तक में समेटने का प्रयास करूँगा।
लेखक
अतुल चतुर्वेदी
फिरोजाबाद
बहुत ही शानदार वर्णन
ReplyDeleteशानदार जनकारी
ReplyDeleteधन्यवाद