ज़िंदगी मेरी?-2 #AtulChaturvediKeKisse #BharatBhartiMemories

ज़िंदगी मेरी?-2
#AtulChaturvediKeKisse
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हॉस्टल में पहुँचना मेरे लिए मानो एक नयी दुनिया में पहुँच जाना था।मेरा ऐडमिशन कक्षा 6 में हुआ था।
स्कूल के गेट से अंदर घुसते ही लंबा ईंटों के खरंजे का पाथ वे और दाहिने हाथ पर एक बड़ा सा वृक्ष जिसका फल जंगल जलेबी कहलाता था जो मुझको बाद में मालूम पड़ा।रास्ते से आगे बढ़ते हुए ही दाहिने हाथ पर दो फील्ड दिखते थे जिनके बीच में क्लासरूम्स भी बने थे।आगे एक नींबू के पेड़ का इतना बड़ा झाड़ था कि उसके अंदर या नीचे 5-7 लोग बैठ जाएँ और ठीक उसके ऊपर एक बहुत लंबे खंबे पर रात के लिए बड़ी लाइट थी। पाथ वे बाउंड्री के सहारे चलता हुआ एक शानदार बिल्डिंग के पोर्टिको में ले जाता था जो कि दरअसल इलाहाबाद के पुराने शानदार बंगलों में से एक थी। पोर्टिको में हमारा तांगा रुका और वहाँ से दो सीढ़ी चढ़ कर मुख्य बिल्डिंग के सामने के हिस्से में एक बरामदा था जिसमे अंदर के हिस्से के दरवाजे खुलते थे।बड़ी मौसी, मौसाजी मुझको वहाँ छोड़ कर जा चुके थे और मैं कुमारी कांता भार्गव जी के साथ अंदर पहुँचा तो देखा कि सामने एक बहुत बड़ा हॉल है जिसका फर्श लकड़ी का है और उसमें 6-6 लकड़ी के तख्त पड़े हुए थे जिनकी तीन लाइन थीं यानी 18 बिस्तर या 18 बच्चों के लिए स्थान। इस हॉल के दोनों तरफ एक-एक डॉरमैट्री और थी जिनमें लगभग 12-12 बच्चे रहते थे। दाहिनी तरफ वाली डोरमैट्री के आगे भार्गव बहन जी का कमरा या निवास था। मुझको बीच वाली मुख्य डॉरमैट्री में एक तख्त अलॉट हुआ और उस पर मेरे बिस्तर बिछा दिए गए। उस तख्त के नीचे ही मेरा बक्सा आदि समान रखा गया और हॉल के साइड में रखी हुयी रैकों में से एक रैक मेरे लिए थी। बायीं तरफ की डॉरमैट्री के आगे एक बाथरूम था, दूसरी तरफ के दरवाजे से घुसने पर एक कमरा था जिसको ड्रैसिंग रूम कह सकते हैं उसमें एक टेबल जिस पर बड़ा शीशा था और सामने कंघे और एक शीशी में तेल रखा रहता था। इस कमरे से ही एक दरवाजा पीछे को था जिसमें से एक कमरे में मैस था जहाँ सब जमीन पर पट्टी पर बैठ कर खाना खाते थे और ड्यूटी के हिसाब से बच्चे ही खाना परोसते थे।मैस के पीछे किचन था और उधर से ही बाहर घूम कर पाथवे वाली जगह पहुँचा जा सकता था। बाहर के बरामदे में फर्श बिछा था जिस पर लकड़ी की डेस्क रखी थीं जिन पर बैठ कर शाम को स्टडी की जाती थी। इसी बरामदे के शुरुआती छोर पर भी दो बाथरूम आदि थे। हॉस्टल में अपने बिस्तर खुद सही करने होते थे, अपने रोज के कपड़े खुद धोने होते थे और ड्यूटी होने पर खाना भी परोसना होता था, मेरे लिए ये सभी अनुभव नए थे। रात के खाने तक कुछ लोगों से परिचय हो चुका था जिनके नाम अशोक द्विवेदी, अजय मातनहेलिया, उमाशंकर सिंह, शिवकुमार बर्नवाल, शैलेन्द्र,अजित कुमार,नंदकिशोर डालमिया, वासुदेव उच्चानी,चंद्रप्रकाश गुप्ता जिसको हम सब मून लाइट कहते थे, जगदीश पटेल, संजय आदि थे। इनके अतिरिक्त हॉस्टल में शीला (जो स्कूल के मैनेजर या मालिक तुलसयान जी, जो सेक्रेटरी साहब कहलाते थे और बैतूल या वहीं कहीं रहते थे,उनकी पुत्री थी), अशोक द्विवेदी की बहन शीला द्विवेदी थी, इनके अलावा भी कई बच्चे थे जिनके नाम याद आने पर लिखूँगा। यह स्कूल और हॉस्टल कक्षा 8 तक का था।
अगले दिन सुबह नाश्ते के समय हमको दूध और कॉर्नफ्लेक्स मिला और असलियत यह थी कि कॉर्नफ्लेक्स से मेरा यह पहला परिचय था। घर पर हम लोग रेस्टोरेंट आदि में पापा, मम्मी के साथ खूब जाते थे, पेस्ट्री, चीज पकौड़ा आदि सब जानते थे लेकिन फिर भी बहुत सी चीजों से परिचय इलाहाबाद पहुँच कर ही हुआ जैसे क्रीम रोल, जंगल जलेबी, इलाहाबाद का प्रसिद्ध बन मक्खन और कॉर्नफ्लेक्स आदि। हॉस्टल में शुरू में अपने सब कार्य करना कुछ असहज सा था लेकिन ये आगे आने वाले जीवन के लिए हमको तैयार किया जा रहा था। स्कूल की क्लास के बाद जब शाम को खेल का समय होता तो शुरुआत में मेरे लिए वह भी एक अजूबे से कम नहीं था क्योंकि वो टीवी आदि का जमाना नहीं था तो खुद फुटबाल खेलना या क्रिकेट खेलना शुरू में बहुत ही ऐक्साइटिंग था और फीरोजाबाद में मैंने उस समय तक वो खेल कभी खेले भी नहीं थे क्योंकि हम लोग घर पर उस समय बहुत ही प्रोटेकटेड माहौल में रहे थे। हॉस्टल में खेल के दौरान बच्चों को अलग-अलग ग्रुपों में बाँट दिया जाता था जैसा कि बाद के स्कूलों में हाउस सिस्टम देखा पर यहाँ उनको टोली कहते थे जैसे जवाहर टोली, सुभाष टोली आदि।
धीरे-धीरे हॉस्टल का जीवन मुझको अच्छा लगने लगा था। अब सुबह उठना, अपना बिस्तर ठीक करना, स्कूल जाना, खेलना, शाम को स्टडी करना और रात को सबके साथ एक ही हॉल में सो जाना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनता जा रहा था। घर की याद तो आती थी, विशेषकर रात के समय, किन्तु नए मित्रों और नई गतिविधियों के बीच वह उदासी अधिक देर टिक नहीं पाती थी हालांकि याद आने पर मन में एक हूक सी तो जरूर उठती थी और बहुत टीस भी होती ही थी।
धीरे-धीरे नए दोस्त भी बनने लगे, स्कूल में डे स्कॉलर बच्चे भी थे और उनसे भी दोस्ती होने लगी। एक दिन क्रिकेट में बहुत मजेदार वाकया हुआ। दरअसल हुआ ये कि हम लोग दो टीम बाँट कर एक मैच खेल रहे थे जिसमें हमारी टीम में जगदीश पटेल भी था। बहुत मजेदार खेल चल रहा था और मुझको अम्पायरिंग करने को बोला गया। हमारी टीम ही बैटिंग कर रही थी और जगदीश पटेल सामने बैटर था। सामने वाली टीम के बॉलर ने एक बहुत ही जबरदस्त बॉल फेंकी जिससे जगदीश पटेल क्लीन बोल्ड हो गया और मुझको अपनी उंगली उठा कर उसको आउट देना पड़ा जिससे कि जगदीश पटेल नाराज हो गया। जब हमारी टीम की बैटिंग की बारी आयी और मैं जब बैटिंग करने गया तो एक बॉल को मैंने जोर से उठा कर मारा जिसको सामने अचानक एक लड़के ने आकर कैच कर लिया और पता है वो लड़का कौन था? वो हमारी ही टीम का कैप्टन जगदीश पटेल था और इससे भी बड़ा कमाल यह हुआ कि मुझको विपक्षी टीम की अपील पर अंपायर ने आउट भी करार दे दिया और इस प्रकार से जगदीश पटेल का बदला पूरा हुआ। जब भी वो वाकया याद आता है तो मैं सोचता हूँ कि आखिर यह कैसे हो सकता था लेकिन फिर बचपन की इस बात पर बहुत हँसी आती है। खैर, इसके बाद हम सबने जंगल जलेबी के उस पेड़ से जिसके नीचे ही मैच हो रहा था उससे जंगल जलेबी तोड़ीं और खायीं। जंगल जलेबी एक बड़ा वृक्ष होता है जिसमें जलेबी के आकार के हरे फल लगते हैं और उनको छीलने पर उनके अंदर सफेद चपटे दाने से होते हैं जो खाए जाते हैं और उस समय बड़े ही स्वादिष्ट लगते थे। जंगल जलेबी उस स्कूल को छोड़ने के बाद कभी नहीं खाया किन्तु सोचते ही आज भी उसके स्वाद की स्मृतियाँ जैसे ताजी सी महसूस होती हैं।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि जीवन में आत्मनिर्भरता, अनुशासन और विभिन्न परिवेशों में स्वयं को ढाल लेने की जो क्षमता आगे चलकर काम आई, उसकी नींव शायद यहीं पड़नी शुरू हो गई थी। उस समय तो यह सब केवल एक नए और रोचक अनुभव जैसा था, परन्तु वास्तव में एक नौ वर्ष का बालक धीरे-धीरे अपने घर की सुरक्षित दुनिया से निकलकर जीवन के बड़े विद्यालय में प्रवेश कर रहा था।
मुझे तब कहाँ मालूम था कि भारत भारती के इस छोटे से हॉस्टल में बिताए जाने वाले वो तीन वर्ष मेरी स्मृतियों में इतने गहरे बस जाएंगे कि पाँच दशक बाद भी वहाँ के साथी, वह लकड़ी का फर्श, जंगल जलेबी का पेड़ और क्रिकेट के वे मैच आज भी उतनी ही शिद्दत से याद आएँगे।
मेरे सर गंगानाथ झा हॉस्टल के साथी रहे डॉक्टर कमलेश त्रिपाठी DrKamlesh Tripathi
(सुल्तानपुर) ने लिखा है कि मैं सर गंगानाथ झा हॉस्टल की स्मृतियाँ भी यहाँ साझा करूँ तो ईश्वर की कृपया रही तो आगे चलकर कॉलविन कॉलेज और सर गंगानाथ झा हॉस्टल के संस्मरण भी लिखेंगे।
आज के लेख में इतना ही
शेष फिर ......
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