ज़िंदगी मेरी?-5 फांसी वाली इमली,सिविल-लाइंस और संगम
ज़िंदगी मेरी?-5
फांसी वाली इमली,सिविल-लाइंस और संगम
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जब तक समझ में आया तब तक तो दशहरा दिवाली कि छुट्टियाँ खत्म हो चली थीं और नंबर आ गया था हॉस्टल जाने का। घर पर बहुत अच्छा समय बिताना ही था, हॉस्टल के किस्से सबके लिए ही रोचक थे और सुनाते वक्त खुद को भी ऐसा लगता था कि हमने भी कोई बहुत बड़ा काम किया है। बाबा बहुत खुश थे और प्रेरणास्पद बातें,किस्से,घर का इतिहास बताते थे और कहते थे कि खूब पढ़ लिख कर जीवन में सफल बनो। बहरहाल जैसे-जैसे हॉस्टल वापिस जाने का समय पास आया मन मलिन पड़ने लगा और दिल में धुकधुकी भी बढ़ने लगी थी।
खैर,हम लोग इलाहाबाद पहुँच गए और फिर इलाहाबाद में मम्मी पापा सबके साथ एक-दो दिन छुट्टी के और बिताए।
हम लोग हॉस्टल में जहाँ भी रहे जब पापा और मम्मी आते थे तो दो चीजें पक्की थीं एक तो कम से कम एक फिल्म देखना और दूसरा किसी अच्छे रेस्टोरेंट में लंच या डिनर पर सभी लोगों का जाना।एक बार हम लोग इलाहाबाद में थे (सन याद नहीं है लेकिन बात बहुत पुरानी है ) बात हुयी कि निरंजन सिनेमा में फिल्म ‘झुक गया आसमान’ लगी हुयी थी वो देखनी है और हम लोग पहुँच गए किन्तु वहाँ टिकट नहीं मिले तो फिर किसी और हॉल में राजकुमार वहीदा रहमान की फिल्म “नीलकमल” लगी हुयी थी और हम लोगों ने वह देखी। इलाहाबाद में हम लोगों का डिनर अथवा लंच सिविल लाइंस में Kwality रेस्टोरेंट में ज्यादा हुआ करता था बनिस्पत ऐल-चीको के, क्योंकि आगरा में भी क्वालिटी था और पापा को वह पसंद था ।पापा मम्मी का एक और नियम था कि हम लोग जहाँ भी जाते थे वो लोग अपने रिश्तेदारों और मिलने वालों से अवश्य मिलने की कोशिश करते थे इससे वह सब रिश्ते हमको भी जैसे विरासत में मिले हैं और अब तक हम भी यह कोशिश करते हैं कि जहाँ भी हम लोग जाएँ अपने रिश्तेदारों और परिचितों से मिलने का प्रयास करते हैं।
खैर, पापा मम्मी मुझको बड़ी मौसी के छोड़ कर जाने लगे और मेरा मन बहुत खराब होने लगा, मेरी कोशिश थी कि मुझको इलाहाबाद छोड़ कर वो लोग न जाएँ और मन तो उनका भी यही रहा होगा लेकिन मजबूरी थी अच्छी पढ़ाई के लिए छोड़ने की, तो वो लोग मुझको छोड़ कर चल दिए इधर मैं रो रहा था और उधर मम्मी रोते हुए गयीं,उदास तो पापा भी थे लेकिन उनकी उदासी तब समझ में नहीं आती थी, उसको समझने के लिए मुझको अभी और बड़ा होना था।अब मम्मी पापा तो चले गए इधर बड़ी मौसी के मेरा रोते-रोते बुरा हाल था और बड़ी मौसी का मुझको सम्हालते-सम्हालते।मौसाजी, गुड्डा दादा,बीनू दादा,प्रकाश मामा शायद सब ही मुझको समझा रहे थे, वेकी तो छोटे थे लेकिन मेरा मन मानने को तैयार नहीं था। मुझको याद है कि मैंने रोते हुए बड़ी मौसी से कहा कि अरे, किसी से कहिए कि हमारे मम्मी पापा को रोके, पुलिस से कह दीजिए कि उनको आगे रोक कर बुलाया दें लेकिन फिर धीरे-धीरे मामला शांत हुआ और अगले दिन मुझको हॉस्टल छोड़ दिया गया।
हॉस्टल में सभी साथी अपने-अपने घरों से वापिस आए थे और एक -दो दिन में सब वापिस अपने रूटीन पर आ चुके थे। एक दिन हम सबको घुमाने के लिए संगम ले जाने का कार्यक्रम बना। सब बच्चों को लाइन में खड़ा किया गया और दो की लाइन बनी जिसमें एक के पीछे एक चलते हुए हम लोगों को जाना था। स्कूल से निकल कर हम लोग पैदल चलते हुए बढ़े। पहले बाएँ हाथ पर सर्किट हाउस था, उसके आगे किसी ने बताया कि एक नेता हैं हेमवती नन्दन बहुगुणा उनका घर था ( ये बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री भी बने थे), आगे बढ़ते गए फिर लेफ्ट हैंड पर ही पोलो ग्राउंड था और आगे चलकर दाहिने हाथ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट दिखा। उस हाईकोर्ट के सामने चौराहे पर ही एक हनुमान जी का मंदिर था जिसमें हम सबने हनुमान जी के दर्शन किए और मैं इलाहाबाद जाने पर अब भी उस मंदिर पर जाकर श्री हनुमान जी के दर्शन का प्रयास करता हूँ। जाड़े की सुबह थी, हॉस्टल से हम लोग लगभग 6 बजे तो चल ही दिए रहे होंगे और रास्ता काफी लंबा था लेकिन बच्चों की उमंग और उत्साह उससे भी ज्यादा था। हनुमान जी के मंदिर के बाहर एक इमली का पेड़ था जिसका इतिहास हम लोगों को बताया गया। यह 1857 के गदर से जुड़ी बात थी। हमको बताया गया कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उस पेड़ से न जाने कितने क्रांतिकारियों को लटका कर फांसी दे दी गयी थी। तब भी और आज भी उन घटनाओं के विषय में पढ़ कर मन सिहर उठता है।
खैर, अब हम लोग आगे बढ़ रहे थे सिविल लाइंस की तरफ।
सिविल लाइंस की तरफ बढ़ते में दूर से ही एक इमारत ने हम लोगों का ध्यान खींच लिया। यह इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का प्रसिद्ध सैंट कैथीड्रल चर्च था। इस चौराहे से सीधी सड़क सिविल लाइंस को जा रही थी जबकि दाहिनी तरफ मुड़ने पर इलाहाबाद रेलवे स्टेशन की सिविल लाइंस साइड पहुँचा जा सकता था और बाएँ हाथ पर जाने पर यू पी बोर्ड के ऑफिस आदि थे। पत्थर गिरजा, जिसका आधिकारिक नाम ऑल सेंट्स कैथेड्रल है, हमारे स्कूल से अधिक दूर नहीं था और उस समय इलाहाबाद की सबसे भव्य तथा विशिष्ट इमारतों में उसकी गणना होती थी। गोथिक शैली में बने इस विशाल गिरजाघर की नींव 10 अप्रैल 1871 को रखी गई थी। इसका डिज़ाइन प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार सर विलियम इमर्सन ने तैयार किया था, जिन्होंने बाद में कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल जैसी ऐतिहासिक इमारत भी बनाई। लगभग सोलह वर्ष के निर्माण के बाद 1887 में इसका औपचारिक अभिषेक (Consecration) हुआ और यह उपासना के लिए खोल दिया गया या कहें तो इसका लोकार्पण हुआ। क्रीम रंग के पत्थरों, बलुआ पत्थर की सज्जा, ऊँची मेहराबों, रंगीन काँच की खिड़कियों और लगभग 125 फ़ीट ऊँचे विक्टोरिया टॉवर के कारण यह इमारत आज भी इलाहाबाद की पहचान मानी जाती है।
उस समय शायद इसकी ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्ता का अनुमान नहीं था, लेकिन जब भी इस रास्ते से निकलते थे तो इसकी भव्यता अनायास ही ध्यान अपनी ओर खींच लेती थी। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हम केवल एक विद्यालय में नहीं पढ़ रहे थे, बल्कि ऐसे शहर में बड़े हो रहे थे जिसकी हर सड़क, हर इमारत और हर मोड़ इतिहास की कोई न कोई कहानी अपने भीतर समेटे हुए था।
इसके बाद हम लोग इलाहाबाद की शान- शानदार,अद्भुत और एक समय में देश के विद्वानों के जमावड़ा वाली जगह यानी कि सिविल लाइंस से गुजर रहे थे। चौड़े फुटपाथ, उन पर इमली के शानदार वृक्ष, शांत सड़कें, चारों ओर मानो एक भव्य शांति ऐसा था पहली नजर में 1971 का सिविल लाइंस। आगे चलकर दाहिने हाथ पर कॉफी हाउस, बाएँ हाथ पर भार्गव लोगों का प्रतिष्ठान, फिर दाहिने ही अम्बर कैफे,लोकभारती प्रकाशन , बाएँ यूनिवर्सल बुक्स, क्वालिटी, एल-चीको ,बी ऐन रामा, दाहिने लोकभारती के आगे पैलेस सिनेमा और हाँ बुलाकी सैलोन, चुन्नी लाल छोले भटूरे वाले, फिर अगले चौराहे पर प्लाज़ा, फिर आगे उलटे हाथ पर हनुमान मंदिर, दाहिने हाथ पर बस स्टैंड, दरअसल जब लिख रहा हूँ तो भाव और स्मृतियाँ सब गड्ड-मड्ड हो रहे हैं ,समय का ज्ञान और ध्यान धूमिल हो रहा है क्योंकि कभी 1971 तो कभी 1980 तो कभी 1985 सारे सालों में तो सिविल लाइंस जाते ही रहे थे तो वह बदलाव स्थिर नहीं हो पा रहा है और स्थान दिमाग में फिल्म की रील जैसे घूम रहे हैं।इन स्थानों के जिक्र आगे भी आने ही हैं,खैर!
घूमते-टहलते पैरों में भारीपन महसूस करते हम लोग आखिर संगम पहुँच ही गए।वहाँ हम लोगों ने लेटे हुए हनुमान जी की मूर्ति के दर्शन किए। अद्भुत मंदिर, हनुमान जी का विशाल विग्रह जहाँ वह यमुना जी की तरफ पैर किए हुए लेटे हुए हैं , दर्शन के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है,दाहिनी ओर इलाहाबाद का अकबर द्वारा बनवाया हुआ विशाल किला है जो लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है और इसके अन्दर प्रसिद्ध वट-वृक्ष और अशोक की लाट भी है।हनुमान जी के लेटे हुए स्वरूप के दर्शन करके हमारा पहला परिचय इलाहाबाद के आनंद भरे उस आलस्य से भी हो रहा था जिस पर लगभग हर इलाहाबादी गर्व का अनुभव भी करता है। हनुमान जी के बाएँ हाथ की ओर से गंगा जी आ रही हैं और सामने से यमुना मैया जो आगे वहीं जाकर अदृश्य रूपा सरस्वती के साथ समाहित होकर सनातनी आस्था और भारतीय संस्कृति का विस्व प्रसिद्ध प्रतीक संगम बनाती हैं जिसमें एक डुबकी लगा कर मानो लोगों का जीवन सफल हो जाता है। बाएँ हाथ पर तेज धार वाली श्वेत धवल गंगा,दाहिने हाथ से आती शांत गहरे हरे से रंग की यमुना जब मिलती हैं तो थोड़ी दूर तक दोनों रंग मिलते हुए भी अलग-अलग दिखाई देते हैं और फिर आगे जाकर हमारे देश की गंगा-जमुनी तहजीब की भाँति एक होकर आगे एक विशाल नद के रूप में बढ़ चलते हैं मानो इस संदेश के साथ कि कितने ही दुर्गम रास्ते और कंटक-कीर्ण पथ आयें जब हम भारतीय एक होकर आगे बढ़ते हैं तो हमारी एकता,विशालता,शुभ्र-धवलता के आगे कोई बाधा मायने नहीं रखती, भागीरथ के पुरखों तक का कल्याण हो जाता है और एक विशाल समुद्र का जैसे हम निर्माण भी करते हैं।
खैर, संगम यात्रा के बाद लौटने की बारी थी और पैर जवाब देते जा रहे थे लेकिन साथ का जोश,अच्छा मौसम और अनुशासन ये सब वह चीजें थीं जो इतनी थकान के बावजूद भी आखिर वापिस हम लोगों को हेस्टिंगस रोड पर हमारे हॉस्टल ले आयीं।हॉस्टल पहुँचते-पहुँचते हम सबका थकान के कारण बहुत बुरा हाल था लेकिन हाँ हमारी यादों और ज्ञान के खजाने में बहुत कुछ इजाफा हो चुका था।
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