Heart Attack and Angioplasty

19 दिसंबर 2025 की वह रात मैं शायद कभी नहीं भूल सकता।


इस विषय पर मैं पहले भी एक लेख लिख चुका हूँ। यह लेख उस चिकित्सा यात्रा के एक अन्य पक्ष तथा उससे जुड़े कुछ अनुभवों को साझा करने के लिए लिख रहा हूँ, जिससे शायद हृदय रोगियों और उनके परिजनों को कुछ लाभ मिल सके।

जिसे मैं सामान्य अस्वस्थता समझ रहा था, वह हार्ट अटैक निकला। परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उसी दिन आगरा में डॉक्टर शुभम् सिंघल ने मेरी एंजियोप्लास्टी की और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्होंने मेरी जान बचाई।

उस एंजियोप्लास्टी के दौरान यह भी पता चला कि हृदय की अन्य धमनियों में भी गंभीर ब्लॉकेज हैं। डॉक्टरों की राय थी कि शेष ब्लॉकेज का इलाज उसी समय करना कुछ जोखिमपूर्ण हो सकता है, इसलिए उसे भविष्य के लिए टाल दिया गया।

इसके बाद कई जाँचें हुईं, जिनमें थैलियम स्ट्रैस टेस्ट प्रमुख था। इन जाँचों के आधार पर यह लगा कि  यद्यपि समस्या तीन आर्टरीज़ में रुकावट की थी, फिर भी शायद ओपन हार्ट सर्जरी के बजाय एंजियोप्लास्टी द्वारा ही उसका इलाज  किया जा सकता है।

आखिरकार मैंने गुड़गाँव स्थित मेदांता मेडिसिटी अस्पताल में डॉक्टर प्रवीण चंद्रा जी से परामर्श लिया। 1 जून 2026 को उन्होंने मुझे अस्पताल में भर्ती किया और उसी दिन एंजियोप्लास्टी करके आवश्यक ब्लॉकेज दूर कर दिए तथा जो उपचार आवश्यक लगा, वह भी किया। 4 जून को मैं अस्पताल से अपने घर फिरोज़ाबाद लौट आया और अब स्वास्थ्य लाभ कर रहा हूँ।

मेरे मामले में डॉक्टरों ने Three Vessel Disease बताई थी। इनमें से एक धमनी का उपचार दिसंबर 2025 में डॉक्टर शुभम् सिंघल द्वारा किया गया तथा शेष उपचार जून 2026 में मेदांता मेडिसिटी में डॉक्टर प्रवीण चंद्रा जी द्वारा किया गया।

मेरी बीमारी की इस पूरी यात्रा के दौरान मुझे एक ऐसा अनुभव भी हुआ जिसने यह सिखाया कि चिकित्सा में केवल अच्छे डॉक्टर ही नहीं, बल्कि अच्छी व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है।

थैलियम स्ट्रैस टेस्ट के लिए मैं दिल्ली-एनसीआर के ही एक प्रतिष्ठित अस्पताल गया था। यह अस्पताल  मेदांता मेडिसिटी,गुड़गाँव  नहीं था बल्कि एक अन्य अस्पताल था। अस्पताल अत्यंत आधुनिक था, डॉक्टर योग्य और अनुभवी थे तथा स्टाफ भी बहुत विनम्र और सहयोगी था।

इस अस्पताल के डॉक्टर ने निर्णय लिया कि चूँकि ट्रेडमिल पर मेरे ईसीजी में परिवर्तन आ रहे थे, इसलिए दवा के इंजेक्शन द्वारा स्ट्रैस उत्पन्न किया जाएगा।

जब मैं परीक्षण के लिए लेटा था, तब मैंने देखा कि एक बड़ी मशीन में दवा की वायल लगाकर डोज़ सैट की जा रही है। स्टाफ के बीच डोज़ को लेकर कुछ भ्रम दिखाई दे रहा था। वे बार-बार किसी एडिनोसिन जैसी दवा की मात्रा बदल रहे थे। व्यवहार उनका उत्कृष्ट था, लेकिन डोज़ को लेकर असमंजस साफ महसूस हो रहा था।

बाद में डॉक्टर आए और उन्होंने स्टाफ को याद दिलाया कि सामने दीवार पर पूरा प्रोटोकॉल लगा हुआ है जिसमें वजन, ऊँचाई आदि के अनुसार डोज़ स्पष्ट लिखी हुई है।

उस समय तो बात वहीं समाप्त हो गई, लेकिन जब दवा शरीर में गई और लगभग चार मिनट के प्रोसीजर में दो मिनट तक हृदय तथा शरीर पर अत्यधिक दबाव महसूस हुआ, तब समझ में आया कि ऐसी प्रक्रिया में डोज़ की छोटी-सी त्रुटि भी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।

स्ट्रैस टेस्ट के बाद थैलियम टैस्ट की ही प्रक्रिया में मुझे कुछ समय के लिए आराम हेतु एक बड़े हॉल में लिटाया गया। थोड़ी देर बाद मुझे अत्यधिक ठंड लगने लगी और भयंकर शिवरिंग शुरू हो गई। मेरी छोटी बहन अर्चना ने स्टाफ से कहकर मुझे कंबल भी उढ़वाया।

इसी बीच मैंने अपने छोटे भाई अभिनव से कहा कि वह कुछ खा-पी लें। परिवार के अन्य सदस्य भी  बाहर वेटिंग एरिया में थे।

इधर  मेरी शिवरिंग लगातार बढ़ती जा रही थी।उसी हॉल में मौजूद एक दूसरे मरीज के तीमारदार, जो कश्मीर से थे, उन्होंने मेरे पैरों के तलवे मलने शुरू किए। जब उन्हें लगा कि स्थिति गंभीर हो रही है तो उन्होंने तुरंत डॉक्टर को बुलाया।

मैंने स्वयं सुना कि डॉक्टर ने अपने स्टाफ से कहा कि मरीज की तबीयत बिगड़ रही है और यहाँ दवा के रिएक्शन अथवा इमरजेंसी स्थिति से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है, इसलिए मरीज को तत्काल इमर्जेंसी में शिफ्ट किया जाए।

इसके बाद जो हुआ वह किसी फ़िल्मी दृश्य से कम नहीं था। स्ट्रेचर पर मुझे लेकर कर्मचारी अस्पताल के गलियारों में दौड़ रहे थे, रास्ते के दरवाज़े खुल रहे थे, बंद हो रहे थे और पीछे-पीछे मेरी बहन, भाई, पत्नी तथा अन्य परिवारजन घबराए हुए दौड़ रहे थे।

इमर्जेंसी में पहुँचने के बाद भी कुछ समय तक डॉक्टरों के बीच यह चर्चा चलती रही कि मैं किस डॉक्टर और किस विभाग का मरीज हूँ। मुझे उस समय अनायास ही उन घटनाओं की याद आ गई जिनके बारे में कभी-कभी सुनने को मिलता है कि किसी दुर्घटना के बाद अलग-अलग थानों के बीच क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद हो जाता है कि मामला किस थाने का है। उस समय मुझे कुछ वैसा ही अनुभव हुआ।

खैर, बाद में उपचार हुआ, मैं ठीक हो गया और अपनी आगे की जाँचें पूरी करवाकर  घर लौट आया।

मैं फिर स्पष्ट कर दूँ कि इस घटना का उद्देश्य किसी अस्पताल या व्यक्ति की आलोचना करना नहीं है। अस्पताल उत्कृष्ट था, डॉक्टर उत्कृष्ट थे, स्टाफ भी बहुत अच्छा था। लेकिन इस अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि कभी-कभी व्यवस्थागत कमियाँ भी गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकती हैं। इसलिए मरीजों और उनके परिजनों को इस पक्ष पर भी ध्यान देना चाहिए।

मेदांता मेडिसिटी,गुड़गाँव  में मेरा अनुभव अत्यंत अच्छा रहा। डॉक्टर, स्टाफ, नर्सिंग सेवाएँ, डाइटिक्स विभाग तथा समग्र उपचार—सब कुछ बहुत संतोषजनक था।

हाँ, एक दूसरी परीक्षा बीमा कंपनी ने अवश्य ले ली।

मेरा इलाज स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत कवर था, लेकिन दस्तावेजों की माँग का सिलसिला ऐसा चला कि सचमुच नाक में दम हो गया। अस्पताल से बार-बार कागज़ भेजे गए, हर बार कोई नई आपत्ति सामने आ जाती।

मेरे बीमा एजेंट, मेरे छोटे भाई अभिनव, मेरी बेटी ऐश्वर्या, मेरे भतीजे अभीष्ट तथा मेदांता के अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों ने लगातार प्रयास किए। अंततः लगभग 24 घंटे से कुछ कम समय में क्लेम स्वीकृत हो गया अन्यथा मैंने मन बना लिया था कि अस्पताल का बिल स्वयं चुकाकर घर चला जाऊँगा और बाद में रीइम्बर्समेंट के लिए प्रयास करूँगा।

इस अनुभव से मैंने सीखा कि स्वास्थ्य बीमा अत्यंत आवश्यक है, लेकिन इलाज के दौरान  उसके दस्तावेजों को व्यवस्थित रखना भी उतना ही आवश्यक है।मेरे दस्तावेज दस्तावेज सही और पूरे थे लेकिन बीमा कंपनियों के इरादे और नियम तो उनके व्यापार के हिसाब से ही होते हैं। आज के समय में हम सब जानते हैं कि चिकित्सा अत्यंत महँगी हो गयी है इसलिए हैल्थ  इंश्योरेंस बहुत जरूरी है और कई बार ऐसा लगता है कि बीमा कंपनियों का व्यवहार पॉलिसी बेचते समय कुछ और तथा क्लेम के समय कुछ और होता है इसलिए सजगता और सावधानी भी बहुत जरूरी है।

इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अस्पताल या संस्था का नाम खराब करना नहीं है। इसलिए मैं न उस अस्पताल का नाम लिख रहा हूँ और न ही उस बीमा कंपनी का उल्लेख कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य केवल अनुभव साझा करना है।

अंत में मैं आगरा के डॉक्टर शुभम् सिंघल, मेदांता मेडिसिटी Medanta के डॉक्टर प्रवीण चंद्रा,उनकी ही टीम के डॉक्टर रजत पचौरी तथा डॉक्टर प्रवीण चंद्रा की  पूरी टीम का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

मेदांता के नर्सिंग स्टाफ, डाइटिक्स विभाग तथा उन सभी कर्मचारियों का भी धन्यवाद जिनसे इस उपचार के दौरान मेरा संपर्क हुआ।यहाँ इस बात का भी उल्लेख करना चाहूँगा कि डॉक्टर प्रवीण चंद्रा और मेरा कॉलेज यानी कि कॉल्विन ताल्लुकेदार्स कॉलेज,लखनऊ एक ही निकला,मैं 1978 डॉक्टर प्रवीण चंद्रा 1980 में पास होकर वहाँ से निकले थे और हाँ जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि डॉक्टर प्रवीण चंद्र को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया है।

मेरे बहनोई डॉक्टर अपूर्व चतुर्वेदी के लिए धन्यवाद के शब्द नहीं हैं। उन्होंने सदैव की भाँति  जिस प्रकार हर कदम पर  पर मार्गदर्शन, सहायता और संबल दिया, उसके लिए उनको ढेर सारी शुभकामनाएं। ईश्वर उन्हें सदैव  स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रखे तथा वे इसी प्रकार ज़रूरतमंद लोगों के काम आते रहें, उनकी सहायता करते रहें और अपने ज्ञान एवं सेवा से लोगों के जीवन में आशा का संचार करते रहें।

अपने सभी परिवारजनों, मित्रों, शुभचिंतकों और उन अनगिनत लोगों का भी कोटिशः आभार जिन्होंने इस कठिन समय में मेरे लिए प्रार्थनाएँ कीं, मेरा मनोबल बढ़ाया और हर परिस्थिति में साथ खड़े रहे।


ईश्वर की कृपा, माता पिता और बुजुर्गों के आशीर्वाद, परिवार के स्नेह और डॉक्टरों के प्रयासों से मैं आज आपके बीच हूँ।

🙏🙏

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