ज़िंदगी मेरी?-4 हॉस्टल का दूध घोटाला और पाँच रुपये सुभाष मामा के

ज़िंदगी मेरी?-4 

हॉस्टल का दूध घोटाला और पाँच रुपये सुभाष मामा के 

#atulchaturvedikekisse

#BharatBharatiTales


इलाहाबाद और भारत भारती में रहते अब कुछ समय हो चला था और मैं वहाँ के माहौल में रमने भी लगा था। एक दिन स्काउतींग में छोटे बच्चों को “शेर बच्चे” कहते थे उसकी प्रतियोगिता के लिए हम लोग नैनी के किसी स्कूल गए और वहाँ हमने प्रतियोगिता जीती भी। वहाँ अन्य कई स्कूलों के बच्चों से भी मिलना हुआ। यह अपने आप में एक अलग किस्म का अनुभव था। यहाँ जब हम और स्कूलों के बच्चों के साथ एक बड़े कमरे से में थे तो मैं एक कोने में खड़ा हुआ था और अकेले कुछ सोच रहा था कि अचानक मैंने देखा कि कुछ बच्चे मेरे घुटनों कि तरफ इशारा करके हँस रहे हैं  तब मेरी समझ में आया कि मैं खड़े -खड़े घुटने ऊपर-नीचे चला रहा था जिसमें दरअसल हँसने की कोई बात नहीं थी किन्तु जब बच्चों ने हँसना शुरू किया तो मैं उसके प्रति कौन्शस हो गया और बच्चों के हँसने से खिसिया कर मैंने अपने घुटने ऊपर ही चढ़ाए रखे कि अब नीचे करूंगा तो बहुत हँसी  फिर से बनेगी लेकिन आखिर ऐसा कितनी देर किए रहता क्योंकि ऐसा किए हुए बहुत दर्द भी होने लगा था तो फिर  जब घुटने  नीचे किए तो बच्चों का फिर हँसना और चिढ़ाना शुरू था लेकिन अब मैं संभल गया था और इस बात पर खुद भी हँसने लगा और फिर उन बच्चों से जो मेरे ऊपर हँस रहे थे मेरी दोस्ती भी हो गयी। नए लोगों से झिझक और संकोच दूर करके दोस्ती करने का एक नया पाठ सीखा जा चुका था। 

हॉस्टल के बच्चों के पीने के लिए एक डेयरी से दूध लाने की व्यवस्था थी और वह व्यवस्था यह थी कि दूध लेने जाने को हॉस्टल के बच्चों की ही ड्यूटी लगती थी।ड्यूटी वाले बच्चों को सुबह ही सुबह लोहे के दो बड़े से केन लेकर दूधिये के यहाँ जाना होता था और उन दोनों केनों  में शायद लगभग 17-18 लीटर प्रत्येक केन में नपवा कर दूध लाया जाता था। इन केनों को दो बच्चे एक एक हाथह से पकड़ कर झुलाते हुए ले आते थे। दूध मिलने का स्थान हॉस्टल से लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर की दूरी पर था अशोक नगर चौराहे से जब गंगा की  तरफ मालवीय जी की कोठी की तरफ जाएँ (बाद में इस कोठी में आर टी ओ औफ़िस बन गया था) उस रास्ते में। इस स्थान के आगे सड़क के दोनों ओर गहरी खादर जैसी नीचा स्थान हुआ करता था और थोड़ा आगे जाएँ तो बहुत बदबू आती थी जो दरअसल मरे हुए मवेशियों कि होती थी जिनको वहाँ गड्ढों में लोग खाल  निकालने के बाद गिद्धों एवं अन्य पक्षियों के भक्षण हेतु फेंक देते थे और उस समय वहाँ से जो लोग निकलते रहे होंगे उनको यह बात याद होगी। यह चीज वहाँ मैंने सन 1973 तक खूब देखी थी। 

आगे चलकर एक दिन मेरी भी ड्यूटी दूध लाने को लगी। हम सब लोग वहाँ पहुँचे और बहुत खुश थे क्योंकि इस बहाने हॉस्टल से बाहर निकालने का मौका मिलता था। वहाँ पर अपने सामने भैंस का दूध निकलवा कर उन केनों में भरवाया और वापिस हॉस्टल को चल दिए। साथ में शैलेन्द्र और दो साथी और थे। कुछ आगे चलकर वो लोग रुक गए तो मुझको भी रुकना ही था।वो सभी पहले से इस काम को आते रहे थे और मेरा ये पहला दिन था। फिर उन्होंने एक दूसरे की तरफ देखा और इशारा किया कि हो जाए और जब तक मैं कुछ समझता उन्होंने दूध के वो केन खोले और उनमें से साथ के नपने से दूध निकाल कर पी लिया तथा मुझसे भी कहा कि तुम भी पी लो लेकिन मैंने कहा कि एक तो यह गलत है, दूध कम हो जाएगा दूसरे मैं कच्चा दूध नहीं पीता, मैंने कभी नहीं पिया है। इस पर वे बोले कम होने की चिंता छोड़ो और जब तक मैं कुछ समझूँ उनमें से एक ने पास के नल से पानी उसी नपने में भर कर केन में वापिस उतना ही पानी डाल दिया जितना निकाला था। बाद में मेरी समझ में आया कि हमारे यहाँ घोटाले कैसे होते हैं और उनकी ट्रेनिंग कब से शुरू हो जाती है। ये कुछ बातें ऐसी होती हैं कि बच्चों को एहसास ही नहीं होता कि वे कुछ अनैतिक या गलत कर रहे हैं और यदि पता नहीं चले तो मजाक-मजाक में ऐसी चीजें हमारी आदत में आ जाती हैं और फिर उनका परिणाम अच्छा नहीं होता है लेकिन हमारे हॉस्टल के बच्चे इस विषय में भाग्यशाली थे। कुछ दिनों बाद या शायद अगले साल की बात है किन्हीं और बच्चों की  ड्यूटी दूध लाने की लगी थी और उन बच्चों में बहनजी का एक जासूस भी था और परिणाम था कि  वासुदेव जो उस दिन दूध लाने वालों में एक था उसको मिले डंडे के प्रसाद से बाकी सब को भी ईमानदारी का सबक मिला हालांकि दूध-पानी घोटाले की  चर्चा बच्चों में गाहे-ब-गाहे सुनने में फिर भी आती रहती थी। 


एक बार हॉस्टल में  मेरे सुभाष मामा जो कि उस समय बंबई में रहते थे (और अब मुंबई में रहते हैं) मुझसे मिलने के लिए आए। मेरे बड़े मामा रमेश मामा तो जल्दी चले गए थे पर  सुभाष मामा, प्रकाश मामा एवं अपने अन्य मामा लोगों से हम लोगों के संबंध रिश्ते के सम्मान के अलावा भी बहुत आत्मीय और कह सकते हैं कि अत्यंत प्रगाढ़ मित्रवत रहे हैं जिसकी चर्चा मैं करता रहा हूँ और आगे भी किस्से लिखूँगा।  सुभाष मामा मामीजी के साथ बंबई की तथा प्रकाश मामा लीना मामीजी के साथ दिल्ली की न जाने कितनी बहुत अच्छी यादें हैं जिनको भी  मौका मिलने पर लिखता रहूँगा।तो मैं बताया रहा था कि हॉस्टल में सुभाष मामा मिलने आए और चलते समय हॉस्टल बिल्डिंग के बाहर उन्होंने मुझको 5 रुपये दिए ( हालांकि  उनका कहना है कि 10 रुपये दिए थे 😁😁😁 ) अब हॉस्टल में तो रुपये रखने कि पर्मिशन होने का सवाल ही नहीं था और रुपये न रखने का भी कोई कौलम नहीं था तो मन में घबराते हुए जल्दी से वो रुपये उनसे लेकर मैंने अपने मोजों में जो मैं पैर में पहने हुए था छिपा लिए।जो लोग बचपन में हॉस्टल रहे हैं वे सब घर से आए सामान और पैसे कैसे छिपा कर रखे जाते हैं उन विधाओं से भली भाँति परिचित होंगे।हॉस्टल के प्रशासन चलाने वालों, हॉस्टल में रहने वालों और बच्चों के घर वालों के बीच के ये दांव-पेंच अनादि काल से चले आ रहे हैं और अनंत काल तक चलते रहेंगे।हॉस्टल के वार्डन आदि इन तरीकों को पकड़ते रहते हैं और बच्चे नए तरीके ईजाद करते रहते हैं और निश्चित ही मेरी शुभकामनाएँ इस मामले में बच्चों के ही साथ रही हैं और रहेंगी और हाँ ये तब भी हो रहा था जब मेरे बच्चे हॉस्टल में रहे, बस पात्र और किरदार बदल गए थे। 

दशहरे दिवाली की छुट्टियाँ होने वाली थीं और मेरे पास भी खबर थी कि उस दिन मम्मी और पापा घर ले जाने के लिए आएंगे तो उस दिन का इंतजार कई दिनों से था और आखिर वो दिन आ गया। पूरे दिन सुबह से मन नहीं लग रहा था, स्कूल की क्लास में भी बस लगता था कि जल्दी स्कूल की छुट्टी का घंटा बजे और निकलें। छुट्टी हो चुकी थी और मैं बाहर बेचैनी से फील्ड में ही टहलने लगा, बच्चों के घर से उनको लेने आना और लेकर जाना शुरू हो चुका था और मुझको बार-बार लगता कि क्या मम्मी पापा का प्रोग्राम बदल गया? क्या वो आज नहीनन आएंगे कि तभी एक नीले रंग की ऐंबैसडर स्कूल के गेट में घुसती हुयी दिखी। मैंने अपने साथी से कहा कि ऐसी ही गाड़ी हमारे घर पर भी है। फिर उस गाड़ी का नंबर दिखा USA 3418 तो मैंने अपने दोस्त से कहा कि ये नंबर तो पापा की  गाड़ी का भी है तो कहीं ये हमारी ही गाड़ी तो नहीं है, और हाँ वह हमारी ही गाड़ी थी। मम्मी पापा लेने आ चुके थे और मैंने दौड़ कर पापा मम्मी  के पैर छुए, अपने बहन भाई से मिला और मम्मी की  गोदी में जाकर उनसे चिपक गया। उस पल की  खुशी के विषय में जब यह लिखते हुए सोच रहा हूँ तो  आज भी मेरे अंदर एक अजीब सी प्रसन्नता और अलग तरह कि अनुभूति हो रही है। अपनों का मिलना, माँ की गोदी शायद स्वर्ग यही था। 


आज के लेख में इतना ही।

स्काउटिंग की प्रतियोगिता, दूध-पानी के घोटाले का पहला पाठ, मोजों में छिपे पाँच रुपये और फिर दशहरे की छुट्टियों में मम्मी-पापा की प्रतीक्षा... भारत भारती का जीवन हर दिन कुछ नया सिखा रहा था।

शेष फिर...

#AtulChaturvediKeKisse

 #BharatBharatiTales

 #ZindagiMeri

 #HostelDiaries

 #BharatBhartiMemories

Comments

Popular posts from this blog

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

So you are on the wrong side of the barricades

दीपावली की कुछ यादें