ज़िंदगी मेरी?-3 वासुदेव की हथेली पर बहनजी का डंडा

ज़िंदगी मेरी?-3

वासुदेव की हथेली पर बहनजी का डंडा 

#AtulChaturvediKeKisse

#BharatBharatiTales


मेरा हॉस्टल में पहला हफ्ता ही था और हम लोग शाम को अपनी-अपनी डैस्क पर बैठ कर स्टडी कर रहे थे कि अचानक दरवाजे में से बहन जी  प्रकट हुईं, उनके हाथ में एक मोटा सा डंडा था और चेहरे पर क्रोध था।उन्होंने आवाज दी, “वासुदेव उच्चानी।” वासुदेव खड़ा हो गया, वह कानपुर का रहने वाला था और हमसे एक क्लास जूनियर था। बहन जी ने उससे पूछा कि, “ तुमने घर पर चिट्ठी में हॉस्टल की बुराइयाँ लिखी हैं? अगर कोई बात थी तो मुझसे कहनी चाहिए थी।हाथ आगे बढ़ाओ।” इसके बाद वासुदेव ने अपने दोनों हाथ एक-एक करके आगे बढ़ाए और उसकी दोनों हथेलियों पर उस मोठे डंडे से पिटाई हुयी। बाद में मालूम पड़ा कि घर लिखे जाने वाले और घर से आने वाले सारे पत्र हॉस्टल में बहन जी या  उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा पढे जाते थे। यहाँ मैं यह बताना  चाहूँगा कि उस समय ना तो आराम से मिल जाने वाले फोन थे और ना ही संचार के अन्य कोई साधन तो घर से संपर्क अमूमन पत्रों द्वारा ही होता था। हर बच्चे को सप्ताह में एक पोस्टकार्ड घर लिखने को दिया जाता था। जब मुझको हॉस्टल छोड़ा गया तो घर वालों से कह दिया गया था कि वे एक महीने तक मिलने ना आयें  और ना ही हॉस्टल के नंबर पर मुझसे बात करने को फोन करें अलबत्ता खतो-किताबत की  अनुमति थी। 

रात को बिस्तर पर लेट कर मैं सोच  रहा था कि घर पर तो मुझको कभी जोर से डाँट भी शायद ही कभी पड़ी हो और यहाँ हॉस्टल में तो  मोठे डंडे से पिटायी होती है.... मुझको अपनी मम्मी की गोदी याद आने लगी और न जाने कब मेरी आँख लग गयी। सुबह हम लोगों को बहुत जल्दी लगभग 4:30 बजे उठना होता था और दैनिक कर्म से निवृत्त होकर दौड़ लगाना,पीटी-कसरत फिर नहा-धो कर नाश्ता और स्कूल जाना होता था। इसी किस्म से धीरे-धीरे एक महीना हो गया और अब आने वाले इतवार को घर यानी कि बड़ी मौसी के घर से किसी के  मिलने आने की संभावना थी और सुबह से ही इंतजार भी। थोड़ी देर हुयी और मालूम पड़ा कि मुझसे मेरे प्रकाश मामा अपने दोस्त सिन्हा साहब के साथ मिलने आए हैं। उनको देखते ही जो खुशी मुझको हुयी उसका मैं बयान नहीं कर सकता हूँ। आज सोचता हूँ तो लगता है कि शायद पहले के समय में जब संचार के साधन सुलभ नहीं थे तो किसी लड़की से मिलने  को उसकी ससुराल में जब उसके मायके से कोई आता होगा तो  ऐसे ही इतनी ही खुशी होती होगी। प्रकाश मामा 

ने बहन जी से पूछा और उनकी अनुमति लेकर मुझको थोड़ी देर घुमाने को बाहर ले गए।प्रकाश Prakash Chaturvedi मामा और सिन्हा साहब दोनों अपनी-अपनी साइकिलों पर थे और मैं प्रकाश मामा की साइकिल पर बैठ कर गया था।रास्ते भर हम लोग बात करते रहे और प्रकाश मामा ने मुझको ले जाकर जलेबी और दही खिलवाया तथा बन मक्खन भी। उनके साथ साइकिल पर बाहर घूमने जाने कि खुशी आज भी जैसे मेरे मन-मस्तिष्क के किसी कोने में विराजमान है और इन पंक्तियों को लिखते समय मुझको जैसे उसकी अनुभूति सी हो रही है। यह समय जल्द ही कट गया और मुझको हॉस्टल छोड़ कर प्रकाश मामा चले गए इस आश्वासन के साथ कि एक या दो इतवार बाद वह फिर आएंगे, उनके जाते समय मन को दुखी और खराब तो होना ही था। तब तक चूँकि मुझको हॉस्टल में एक महीना हो चला था तो  घर से उस इतवार को फोन भी आया और मम्मी, पापा,अपनी बहन मिन्नी और छोटे भाई गुड्डू की  आवाज सुन कर बहुत प्रसन्नता हुयी हालांकि उस समय में फोन पर बात तीन मिनट की  हो सकती थी और फिर बढ़ाने की कहने पर अधिकतम 6 मिनट जो पलक झपकते ही बीत जाते थे। मेरे पास घर से पत्र आते थे और मेरे बाबा के पत्रों से तो सारी दुनिया के समाचार मुझको मिल जाते थे। 

स्कूल में टीचर्स काफी अच्छे थे और उनका व्यवहार भी आम तौर पर अच्छा ही था। टीचर्स को वहाँ आचार्य जी कह कर संबोधित किया जाता था। एक दास आचार्य जी थे यानी कि श्री टी के दास जिनका कड़क स्वभाव था लेकिन थे भले आदमी ,एक श्रीवास्तव आचार्य जी थे कुछ उम्र-दराज जो धोती कुर्ता पहनते थे और आर्ट्स के शिक्षक थे उनका अत्यंत गरिमामय व्यक्तित्व और बहुत अच्छा तरीका सिखाने का था। एक वहाँ पर कोहली बहनजी थीं जिनके घर वाले शायद डिफेंस में थे और वह अंग्रेजी पढ़ाती थीं। एक टीचर जो स्काउटिंग  के टीचर थे और हॉस्टल में निवास करते थे वह थे शुक्ला  आचार्य जी जो पहले भारत स्काउट्स ऐंड गाइड्स में भी पढ़ा चुके थे।टीचर्स थे तो और भी किन्तु अभी इस लेख को लिखते समय सिर्फ इतने ही याद आ रहे हैं।स्कूल के प्रिंसिपल थे श्री परमानन्द मिश्रा जी जो कि एक लहीम-शहीम व्यक्तित्व के मालिक, गौर वर्ण किन्तु चेहरे पर तेज से ज्यादा सादगी झलकती हुयी, लंबी ढीली सी पैन्ट और बेल्ट के साथ उसके अंदर खुर्सी हुयी कमीज, कुल मिलाकर यह उनका व्यक्तित्व था।शांत स्वभाव, गरिमामयी छवि लेकिन बहन जी के आगे मानो उनकी भी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी। 


यहाँ मैं यह जरूर बताना चाहूँगा कि भारत भारती उस समय भारतीय परंपरा से चलने वाली एक अच्छी शैक्षिक संस्था थी जिसको एक बड़ी सम्पन्न मारवाड़ी फैमिली चलाती थी और इनके स्कूल मध्य प्रदेश के बैतूल, उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तथा एक-दो अन्य शहरों में थे और वहाँ शिक्षा और खेलों का स्तर बहुत अच्छा था। उत्तर प्रदेश के देवरिया, इलाहाबाद के आसपास, आजमगढ़, कानपुर,बिहार के कोइलरी वाले इलाकों आसनसोल आदि, कलकत्ता इन सब जगहों के बच्चे उस स्कूल में-हॉस्टल में आते-रहते थे। 

आज इस लेख को लिखते समय मेरे पास मेरी बड़ी मौसी के छोटे पुत्र विवेक या वेकी Vivek Chaturvedi

का फोन आया जो उन्होंने मेरे भारत भारती विषयक लेखों को पढ़के किया था। हम लोग बहुत देर तक पुरानी बातों और उस इलाहाबाद कि बातें करते हुए  उस सुनहरे दौर की स्मृतियों के समुद्र में गोते लगाते रहे। दरअसल इलाहाबाद या प्रयाग सदियों से न सिर्फ शिक्षा अपितु संस्कृति का भी बहुत बड़ा केंद्र रहा है जहाँ न सिर्फ गंगा-यमुना और सरस्वती का संगम रहा है बल्कि एक जमाने में सम्पूर्ण भारत की संस्कृतियों का भी इसी इलाहाबाद में संगम देखने को मिलता था जिसके  प्रमाण वहाँ उत्तर भारत के अलावा दक्षिण के कैफे और व्यंजन के रूप में उस जमाने में भी मौजूद थे, बंगालियों के अनेकों त्योहार जैसे दुर्गा  पूजा और सरस्वती पूजा आदि तथा न जाने कितने सांस्कृतिक समारोह होते ही रहते थे और हाँ धन के या शक्ति के बल पर उस जमाने में इलाहाबाद में किसी की  शायद ही कोई पहचान रही हो जबकि विद्वता के बल पर पहचान वालों की कोई कमी नहीं थी और इस विषय में आगे कई किस्से लिखूँगा भी। 

खैर, बात वापिस हॉस्टल की। एक दिन सुबह-सुबह कुछ शोर से नींद खुली तो देखा कि हमारी डॉरमेट्री में बदबू भरी हुयी है तो मालूम पड़ा कि एक बच्चे को कोई समस्या ऐसी थी कि रात को सोते में उसका मल-त्याग हो जाता था जो कि उसको मालूम ही नहीं पड़ता था। यह घटना कोई पहली बार नहीं हुयी थी।जब वह साफ-सफाई के बाद आया तो बच्चों की ठिठोली और बहन जी का बेंत उसका इंतजार कर रहे थे।आज जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो लगता है कि इसमें उस बच्चे का क्या दोष था जो उसकी इस बात पर पिटायी होती थी या हँसी उड़ायी जाती थी।दरअसल बच्चे बहुत निर्मल मन के तो होते हैं लेकिन कई बार साथ ही साथ बहुत निर्मम और निष्ठुर भी होजाते  हैं यानी कि without filters और यही  तो समय होता  है जो उनको व्यवहार में सही-गलत,उचित-अनुचित  तथा इस संसार की  व्यावहारिकता आदि का ज्ञान कराता है जिससे उनका व्यक्तित्व बिगड़ता या बनता जाता है। हॉस्टल में जब बच्चे इतने लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो उनमें समय के साथ एक जबरदस्त और अद्भुत किस्म का जीवन पर्यंत चलने वाला बॉन्ड भी बन जाता है जो बहुत ही सुखद होता है।  मैं उस बच्चे का नाम जानबूझकर नहीं लिख रहा हूँ क्योंकि इस किस्म की किसी भी बातों में नाम न लिखना ही मुझको उचित लगता है हालांकि न सिर्फ उसका नाम अपितु उसकी शक्ल भी इस बात को लिखते समय मेरी स्मृति में ताजा हो चली है। 

आज के लेख में इतना ही, अगले लेख में आपको बताऊँगा कि जब हम लोग स्काउटिंग या शेर बच्चों के कार्यक्रम में नैनी गए तो क्या हुआ था। 


शेष फिर...... 


फ़ोटो में प्रकाश मामा और मैं

Comments

Popular posts from this blog

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

So you are on the wrong side of the barricades

दीपावली की कुछ यादें