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महाशिवरात्रि

आज महाशिवरात्रि का दिन है और लोग त्योहार मना रहे हैं।मुझको याद आता है जब हम इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सर गंगा नाथ झा हॉस्टल में रहते थे।हॉस्टल में वैसे तो हर त्योहार काफी धूम-धाम से मनाया जाता था किंतु महाशिवरात्रि की बात ही कुछ और थी।सुबह से सभी इनमेट्स में उत्साह देखते बनता था और शाम का इंतज़ार भी।वैसे तो हॉस्टल में सात्विक,राजसी और तामसी शौक-विचार रखने वाले अनेकों लोगों के अपने-अपने ग्रुप हुआ करते थे लेकिन महाशिवरात्रि की शाम का इंतज़ार सभी को उतने ही भक्तिभाव से रहता था। शाम होने पर हॉस्टल के कॉमन रूम में पूजा होती थी फिर भांग,प्रसाद आदि का वितरण होता था और विशेष आकर्षण रहता था गरमा गरम गुलाब जामुन का।उस समय की धूम,जोश और हो-हुल्लड़ का नज़ारा ही अलग होता था।आज भी सब महाशिवरात्रि के त्योहार को मनाते होंगे,आनन्द भी  आता होगा लेकिन छात्रावास के माहौल और इष्ट-मित्रों के साथ भांग और गुलाब जामुन के साथ का मौज और मजा कुछ और ही था।अब भी जब उन दिनों को याद करते हैं तो मन कहता है कि काश कोई लौटा दे वो बीते हुए दिन.... आप सभी को महाशिवरात्रि पर्व की बधाई! जय साम्बसदाशिव! हर हर महादेव! 🙏🙏

फिरोजाबाद के जिला बनने के 34 साल

आज जब फ़िरोज़ाबाद जनपद की स्थापना के 34 वर्ष पूरे होने पर यह लेख लिखने बैठा हूँ तो मुझको याद आ रहा है 5 फरवरी 1989 का वो दिन और उस दिन का माहौल जब फ़िरोज़ाबाद के टीबी अस्पताल ग्राउंड में मंच से उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी (अब स्वर्गीय) ने फ़िरोज़ाबाद को जिला बनाने की घोषणा की थी.मंच से ही उन्होंने जिले के पहले जिलाधीश ऐस0सी0रस्तोगी जी (अब स्वर्गीय) और जिले के पहले पुलिस अधीक्षक श्री अरविंद जैन का परिचय कराया था.मंच पर उस समय के कांग्रेस के सांसद गंगाराम जी(अब स्वर्गीय), जलेसर के सांसद रहे श्री कैलाश यादव,कांग्रेस के विधायक रहे गुलाम नबी साहब, फ़िरोज़ाबाद नगर पालिका के तत्कालीन चेयरमैन (जिले बनने के बाद पहले चेयरमैन) स्व0 श्री अशोक चतुर्वेदी जी,  नगर विधायक रघुवर दयाल वर्मा जी(अब स्वर्गीय), टूण्डला के तत्कालीन विधायक श्री अशोक सेहरा आदि मौजूद थे और सामने था उम्मीदों, आशाओं,आकांक्षाओं और कृतज्ञता से भरपूर फ़िरोज़ाबाद की जनता का अपार जनसमूह. स्व0तिवारी जी ने जब जिला बनाने की घोषणा की तब के हर्षोल्लास से भरे जयकारे आज भी फ़िरोज़ाबाद की फ़िज़ाओं में घूम रहे हैं. फ़िरोज़ाब...

कोबरा

"कोबरा" लेप लगा के चंदन का और मीठा दूध पिलाने से कोबरा  विष-हीन बन पाते हैं क्या प्यार से सहलाने से? उतार लबादा अच्छे का, मिलते ही मौका  विष-दंत अपने वो दिखाते हैं अपना जो भी फंस गया बस उसको धीरे से वो डस जाते हैं।। दशकों बिल में सिमटे रहकर, वक़्त के इंतज़ार में हॉं जी- हॉं साहब कह-कह कर, षड्यंत्र अपना रचाते हैं, मीठी-मीठी बातें कर के मृत्यु प्रयोग वो कर जाते हैं याद करो उस वक़्त को , जब फैलाये तुम सबने अपने फन औ फंदे थे, एक असहाय का खून बहा था छत पर  और तुम सबके हाथों  में पिस्तौल और डंडे थे।। दशक बीत गए मीठे-झूठे धोखा तुम्हारा सच्चा है, दाग खून के सूख गए हैं  पर वो कपड़ा अब भी रखा है।। अहसानों की तो बात ही छोड़ो कृतघ्न तो तुम पुराने हो, दुनिया तुमको ना जाने हमारे लिए तुम अब जाने पहचाने हो।। लेप लगा के चंदन का  और मीठा दूध पिलाने से कोबरा विष-हीन बन पाते हैं क्या प्यार से सहलाने से? उतार लबादा अच्छे का, मिलते ही मौका  विष-दंत अपने वो दिखाते हैं। अपना जो भी फंस गया बस उसको धीरे से वो डस जाते हैं।। एक-एक हर्फ लिखा रखा है, सच्चाई जो तुम्हारी कहता है हमको सब प...

ब्रज और आस-पास के क्षेत्र का खान-पान एवं व्यंजन

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ब्रज और आस-पास के क्षेत्र का खान-पान एवं व्यंजन आजकल यूट्यूब,टी वी चैनल्स,मैगज़ीन्स, समाचार पत्र सारी जगहों पर रेसिपीज और खाने पर काफी चर्चा और शो देखने-पढ़ने को मिलते हैं।इनके माध्यम से हमको विभिन्न देशों और खुद अपने देश के विभिन्न इलाकों के खाने के इतिहास,खाने की संस्कृति और खाने की चीज़ों के विषय में जानकारी मिलती है जो काफी अच्छी और रोचक भी होती है।अगर हम केवल अपने देश की बात करें तो कह सकते हैं कि जितना हमारे देश में विभिन्न इलाकों के मौसम, जलवायु और क्षेत्रीय संस्कृतियों में फर्क है उतना ही हर क्षेत्र के खाने में और जैसे इतनी विभिन्नताओं के बाद भी हम सब एक हैं यानी कि भारतीय वैसे ही इतनी विभिन्नताओं के बाद भी हमारे सभी खानों का मूल स्वाद और भाव एक ही है यानी कि हिंदुस्तानी-विशुद्ध भारतीय! आज अपने इस लेख के द्वारा मैं चर्चा करना चाहूंगा एक क्षेत्र विशेष यानी "ब्रज क्षेत्र" और उसके आगे भी आस-पास के परंपरागत खान-पान की।इनमें से अधिकतर व्यंजन इस इलाके में अधिकांश लोगों के खान-पान का हिस्सा सदियों से रहे हैं और कुछ चतुर्वेदी समुदाय के विशेष रूप से। जब मीडिया या सोशल मीडिया में ...

दादाजी बनारसीदास चतुर्वेदी और प्रवासी भारतीय

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आज समाचारपत्रों में एक बार फिर से मध्यप्रदेश में हो रही प्रवासी भारतीय ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को लेकर प्रवासी भारतीयों की चर्चा है। इस अवसर पर मैं याद करना चाहूँगा पदम भूषण दादा जी स्व0 बनारसी दास जी चतुर्वेदी को जिन्होंने प्रवासी भारतीयों के हित चिंतन को बहुत काम किया और महात्मा गांधी जी के कहने पर फीजी आदि देशों की यात्रा भी प्रवासी भारतीयों की उस समय की दुर्दशा देखने को की। दादा जी ने फर्रुखाबाद में अपने अध्यापन काल में ही तोताराम सनाढ्य के लिए उनके संस्मरणों की पुस्तक 'फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष' लिखी थी। 'फिज़ी द्वीप में मेरे 21 वर्ष' के संस्मरणों में उस द्वीप पर अत्यंत दारुण परिस्थितियों में काम करने वाले भारत के प्रवासी गिरमिटिया मजजदूरों की त्रासदी का बड़ा ही संवेदनाप्रवण चित्रण था। बाद में चतुर्वेदी जी ने सीएफ एंड्रयूज़ की माध्यम से इन मजदूरों की दुर्दशा का अंत सुनिश्चित करने के लिए बहुविध प्रयत्न किए।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि उस जमाने में विदेश में बसे भारतीय लोगों के हालात बहुत खराब थे और वो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहने को मजबूर थे।ये वर्तमा...

महाराज जी-1

सुबह-सुबह ठाकुर जी को स्नान करा के अपनी दैनिक पूजा-अर्चना करके महाराज जी अपना सुबह का कलेवा कर रहे थे;अमरूद, सेब,कांसे के बेले में गर्म दूध और साथ में महीन छिली सी कतरनों जैसा गुड़।जाड़ों के दिन में महाराज जी सुबह यही कलेवा करते थे बस फल बदलते रहते थे।सुबह के इस कार्यक्रम को निबटा कर अब महाराज जी जीना उतर के अपने कमरे में आकर अपने तख्त पर बैठ चुके थे अपनी गम्भीर लेकिन अति सौम्य चिंतन मुद्रा में। अपनी उम्र के आठवें दशक के आखिर में पहुँच चुके सामान्य से छोटे कद के महाराज जी गौर वर्ण, गंजे हो चले सर पर उन्नत ललाट,सफेद मूँछें,एक देवता तुल्य तेजयुक्त चेहरा, सादा खद्दर की धोती और सर्दी के दिन होने पर हाथ का बना नेवी ब्ल्यू स्वेटर इस वेशभूषा में वो एक योगी, दिव्यात्मा और महात्मा ही लगते थे और कोई कह नहीं सकता था कि इस योगी व्यक्तित्व के पीछे एक सफल उद्योगपति,अति विद्वान शालीन व्यक्तित्व था जिसने अपने बूते पर 20वीं सदी के दूसरे दशक से अपने साम्राज्य की स्थापना की सफल शुरुआत की थी और जो अब व्यवहारिक रूप से एक घरेलू सन्यास आश्रम वैराग्य अवस्थित जीवन जी रहे थे।इन्हीं महाराज जी को शहर के मुहल्ले वाल...

सिद्धांत के लिए मुगल कारवां से लोहा लेने वाले हमारे पूर्वज चौबे दुर्गादास फिरोजाबाद

पिछले कुछ समय से मैं यात्रा वृतान्त, समाज, संस्कृति और इतिहास सम्बंधित लेखन के अलावा श्री माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण समुदाय से संबंधित इतिहास, संस्कृति और विरासत पर भी रिसर्च, लेखन, यूट्यूब सीरीज़ बनाना (चतुर्वेदी हैरीटेज नाम से) आदि काम भी कर रहा हूँ।इसी श्रृंखला में फिरोजाबाद के श्री माथुर चतुर्वेदी पुरोहित वंश के यानी कि अपने परिवार के इतिहास को भी लिपिबद्ध करने का प्रयास चल रहा है। इस प्रक्रिया में बहुत सी रोचक जानकारी मिली है और मिल रही है जैसे राजस्थान के चतुर्वेदी बौहरे बसंत राय ने मुगल सम्राट शाहजहाँ को पैसा उधार दिया था जब वो बादशाह नहीं बना था या मथुरा के चतुर्वेदी पांडे भाइयों ने कैसे मथुरा के काजी को मारा और काजीमार पांडे कहलाये आदि।लेकिन आज आपके सामने किस्सा प्रस्तुत कर रहा हूँ अपने पूर्वज फिरोजाबाद के चतुर्वेदी पुरोहित वंश के चौबे दुर्गा प्रसासाद का जिन्होंने मुगल सम्राट के कारवां से महसूल वसूला था। किस्सा कुछ यूँ है कि:- हमारे पूर्वज: स्व0 दुर्गाप्रसाद चतुर्वेदी समय 16-17वीं शताब्दी  फ़िरोज़ाबाद में हम लोगों के परिवार का इतिहास बहुत पुराना है और हमारे परिवार यानी कि सौश्र...