अस्तित्व 1
मेरी अगली आने वाली पुस्तक जो एक mythological fiction है उसके कुछ अंश आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
1.
सुबह ही सुबह ये कहना मुश्किल था कि कमरे की खिड़की से रोशनी पहले आयी या इवान की आँख पहले खुली पर हाँ वो समय से तैयार था। पापा ने बताया कि,
“ हम लोग अब यहाँ के प्रसिद्द कैसल चल रहे हैं।” जब वो लोग कैसल पहुँचे तो इवान तो उस नजारे को देखता ही रह गया। ऊपर पहाड़ी पर कैसल की दीवार के किनारे खड़े होकर चारों ओर का नजारा बहुत अद्भुत था।पापा ने बताया कि, “ इस विश्वप्रसिद्ध कैसल में बहुत सी प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।” फिर पापा ने इवान से कहा कि, “ बेटा तुमने बेहतरीन जगहों से पढ़ाई की है, जुडो, कराते, जाइजित्सु, मुये थाई, कलारिपायट्टू, सिलाम्बाम, कैंने इटालियाना , ग्रीको रोमन, फ्री स्टाइल कुश्ती, पहलवानी इंडियन स्टाईल, बूख, शुआई जियाओ, ग्लीमा , काइपोईरा आदि विधाओं में तुम विश्व में सर्वश्रेष्ठ में से एक हो, मेडिटेशन में तो सारे चक्रों को साध चुके हो और अब समझ लो कि जिस काम के लिए तुम तैयार हो रहे थे उसका समय आ रहा है।” इवान ने कहा, “पापा मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है” तो पापा ने कहा, “ हर बात को समझने का एक समय होता है तो बस समय की धारा में चलते रहो सब पता चलता जाएगा अपने समय पर।” पापा ने इवान से आगे कहा, “ एक बात याद रखना कि मैं नहीं दिखूं तो भी मैं हूँ और फिर दिखूँगा।” अब इवान की माँ से नहीं रहा गया और वो बोलीं कि, “ बच्चे को बहुत पहेलियां मत बुझाओ” तो पापा हँसने लगे और बोले, “अब सब जानने का ही तो समय शुरू हो रहा है।”
थोड़ा समय और बीता तो पापा ने एक तरफ देखते हुए हाथ हिलाया, इवान ने उधर मुड़ कर देखा तो एक बुजुर्ग से सफेद दाढ़ी वाले व्यक्ति आते दिखे जिन्होंने पीले कपड़े पहने हुए थे और केसर का तिलक उनके भव्य ललाट पर था।उनके चेहरे से ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वो ज्ञान का भंडार हों।जब वो नजदीक आये तो पापा ने उनको प्रणाम किया और इवान से कहा कि प्रणाम करो।इवान ने जैसे ही झुक कर प्रणाम किया तो उन्होंने कहा, “ कैसे हो इवान?” अब इवान की चौंकने की बारी थी कि इनको मेरा नाम कैसे मालूम पड़ा।एक कोने में 11 कुर्सियां पड़ी हुई थीं।वो महाशय वहाँ बैठ गए और उन्होंने बाकी तीनों को भी बैठने का इशारा किया तो इवान के पापा, माँ और इवान भी बैठ गए।दाढ़ी वाले सज्जन ने कहा, “ अविजित मुहूर्त तो शुरू हो गया” तो इवान के पापा ने हाँ में सर हिलाया।इवान ने घड़ी पर निगाह डाली तो सुबह के साढ़े ग्यारह बजे गए थे।
कुछ पल ही बीते थे कि सामने से एक अत्यंत शीलवान, जँचते हुए व्यक्ति ने आकर बुजुर्ग सज्जन को प्रणाम किया।इन सज्जन का का रंग कुछ-कुछ कनेर के फूल जैसा पीला सा था या कुछ कुछ हरे रंग की झलक भी आ रही थी। उन्होंने हरे वस्त्र पहने हुए थे।उनके चेहरे से बुद्धिमत्ता झलक रही थी।इवान के पापा मम्मी ने उनको प्रणाम किया और इवान ने भी तो इवान को चौंकाते हुए धीर गम्भीर आवाज में उन्होंने पूछा, “इवान तुमने तो लॉजिक भी पढ़ी है?” इवान चमत्कृत था और उसने हामी में अपना सिर हिलाया। वो भी एक खाली कुर्सी पर बैठ गए। इवान सोच रहा था कि कुछ अजीब सा आउट ऑफ द वर्ल्ड सा महसूस हो रहा है किंतु उसकी समझ में कुछ आ नहीं रहा था।
कुछ ही समय बीता था कि इवान ने देखा सामने से एक और नौजवान चले आ रहे थे। उनके चेहरे पर तेज था और उनका रंग लालामी लिए हुए था। वो लाल रँग के वस्त्र और लाल ही माला पहने हुए थे। प्रणाम की प्रक्रिया फिर दोहराई गयी और इवान की बारी आने पर उन महापुरुष ने अपनी तेज से भरी वाणी में पूछा, “कैसे हो इवान? तुमने सारे हथियार चलाना तो अपनी डिफेंस ट्रेनिंग के दौरान सीखा था ना?” इवान का सिर हामी में हिलना ही था और उसको चौंकना भी था ही। अब ये महोदय भी बैठ गए।
कुछ और पल बीते ही थे कि सामने से एक अनूठा व्यक्तित्व आता नजर आया। इतना सुंदर कि मानो सुंदरता भी शर्मा जाए, चेहरे से ऐश्वर्य मानो टपक रहा है, उम्र दराज होंगे लेकिन बिल्कुल नौजवान से लगते हुए। गुलाबी रंगत का वर्ण था , बेहतरीन किस्म की खुशबू आ रही थी और ऐसी पर्सनैलिटी कि जिसका वर्णन शब्दों में करना सम्भव नहीं था। उन्होंने ऐसे वस्त्र पहने हुए थे जो सफेद थे लेकिन कभी गुलाबी कभी लैवेंडर रंग की झलक आ रही थी। जब वो आये तब प्रणाम की प्रक्रिया हुयी लेकिन न तो उन्होंने पीले वस्त्र वाले बुजुर्ग को प्रणाम किया और ना ही पीले वस्त्र वाले बुजुर्ग ने उनकी और देखा। इस पर इवान के पापा ने हँसते हुए विनम्रता से कहा कि, “ देखिए आज का उद्देश्य ही महत्वपूर्ण है और आज तो जब सब साथ हैं तो तात्कालिक मैत्री ही सही लेकिन आज का दिन दोस्ती का।” इस पर उन दोनों ने भी हँसते हुए एक दूसरे का अभिवादन किया।
ये सब बातचीत चल ही रही थी कि हवा मानो अजीब सी हो गयी। वातावरण में एक अजीब सी सरसराहट होने लगी तथा ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सारा माहौल ही रहस्यमय हो गया हो। वहाँ ऐसा लगा जैसे खुली रोशनी को किसी छाया ने घेर लिया हो। तभी सामने से एक व्हील चेयर आती हुयी दिखी जिसको कोई चला नहीं रहा था हाँलाँकि एक व्यक्ति कुछ भूरी सी या कहें चितकबरे से रंग की चादर ओढ़े उस पर बैठे थे और उनका केवल सर यानी गर्दन और उसके ऊपर का हिस्सा ही दिखाई दे रहा था। उस व्हील चेयर के साथ एक काला कुत्ता चल रहा था। उनके आने पर पर सिर्फ इवान के पिता, माता और हरे कपड़े वाले सज्जन तथा गुलाबी झलक वाले तेजोमय महाशय ने नमस्कार किया जबकि अन्य से कोई अभिवादन नहीं हुआ तो फिर इवान के पापा ने ही सबका यथोचित अभिवादन कराया। इवान ने उनको प्रणाम किया तो वो बोले, ”इवान राजनीति की बारीकियों को अभी और माँजना होगा।” उनकी आवाज ऐसी थी जैसे कोई बड़ा नाग हिस्स करता हुआ सरसराते हुए बोल रहा हो। उनकी व्हील चेयर ने भी एक कुर्सी का स्थान ले लिया।
इसी बीच इवान की निगाह सामने गयी तो उसने देखा कि अत्यंत मन्थर गति से एक पैर से कुछ कमी के साथ चलते हुए एक व्यक्ति आ रहे थे जो सामने न देख कर जमीन की ओर ही देख रहे थे। वो कालेपन लिए गहरे नीले वस्त्र पहने थे , उनका वर्ण बिल्कुल श्याम था और जब वो पास आये तो अभिवादन की प्रक्रिया हुयी। उन्होंने किसी की भी ओर देखे बिना अभिवादन किया और जब इवान ने उनका अभिवादन किया तो वो बोले, “इवान तुमने न्याय और कानून की पढ़ाई तो खूब मन से की है ना?” इवान ने अब चौंकना बन्द कर दिया था। इवान ने देखा तो उसको लगा कि मानो इनके चेहरे से धीर-गम्भीरता और न्याय की परिपूर्णता मानो टपक रही है लेकिन चेहरा था कठोर।
अभी कुछ समय निकला ही था कि इवान को अचानक लगा जैसे वातावरण में एक सुखद-शांत रोशनी फैल गयी हो, मन्द-मन्द हवा चल रही थी और सामने से एक अत्यंत सौम्य व्यक्ति जिनकी चाल काफी तेज थी आते दिखे। वे श्वेत वस्त्र पहने थे, उनके चेहरे पर कभी चंचलता दिखती तो कभी गाम्भीर्य और हाँ दूर से आते में इवान को ऐसा लगा कि उनके चेहरे का कभी चौथाई हिस्सा दिखता है, कभी उससे भी कम, कभी आधा , तो कभी लगा जैसे है ही नहीं और जब पास से पूरा चेहरा दिखा तो ऐसा लगा कि बस देखते रहो। अभिवादन की प्रक्रिया हुई, इन महोदय ने व्हील चेयर वाले से कन्नी काटी तो फिर इवान के पापा ने वही बात कह कर बैठाया लेकिन इवान ने देखा कि ये आगन्तुक व्हील चेयर वाले से काफी दूर और आड़ लेकर बैठे। जब इवान ने उनको प्रणाम किया तो उन्होंने अपनी वात्सल्य भरी वाणी में आशीर्वाद देते हुए कहा कि, “इवान मन की शांति को रोज ध्यान लगा रहे हो ना?”
इवान ने हाँ में उत्तर दिया ही था कि मानो वहाँ एक अद्भुत किस्म का राजसी दैवीय तेज सा छा गया जिसके प्रकाश में एक बार तो जैसे सबकी आँखें चौंधिया गयी हों पर हाँ इसी बीच इवान के पापा अपने, इवान की मम्मी और इवान की आँखों में धूप का चश्मा लगा चुके थे । वहाँ बैठे सभी लोगों ने उनका अभिवादन किया और इवान के अभिवादन करने पर वो बोले, “ इवान ऐश्वर्यवान हो और तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण हों" यह कहते हुए लाल झलक और नारंगी झलक वाले सफेद से कपड़े पहने वो राजसी तेज वाले व्यक्ति भी उस व्हील चेयर से काफी बचते हुए दूसरी ओर जाकर सबसे बड़ी वाली कुर्सी जो शायद उनके ही लिए ही खाली थी उस पर जाकर बैठ गए और बैठने के बाद उन्होंने पूछा, “ हम आठ तो इकट्ठे हो गए पर वो नवम कहाँ हैं?” इस पर इवान के पिता ने व्हील चेयर की ओर इशारा करते हुए अत्यंत आदर पूर्वक कहा कि, “ महोदय वो तो सदैव इनसे 180° पर बराबर की दूरी पर ही रहेंगे तो भला वो यहाँ कैसे आते” इस पर उस राजसी व्यक्तित्व ने अपनी अत्यंत तेजोमय वाणी में कहा कि,
“ हाँ ठीक है तो अब क्या करना है?” इस पर इवान के पापा ने दूर एक कोने में बैठे इवान की ओर इशारा करते हुए उन लोगों से कुछ कहा। इसके बाद उन लोगों का वार्तालाप शुरू हो गया। इवान वैसे तो बहुत धैर्यवान था लेकिन इस समय तक वो आश्चर्यचकित हो चुका था, उसका कौतूहल भी अपने चरम पर था । इवान एक अलग किस्म के कन्फ्यूज़न में था क्योंकि पहले तो उसकी इस वार्तालाप में कोई विशेष रुचि नहीं थी लेकिन फिर इस अजीब से घटनाक्रम और उन लोगों के प्रति उसका कौतूहल ऐसा हो रहा था जो उस वार्तालाप की ओर उसका ध्यान बरबस आकृष्ट कर ही रहा था। इस बातचीत के क्रम में उसने बीच-बीच में कुछ जाने पहचाने शब्द सुने जैसे, रोम का कोलोजियम और विश्वामित्र, रावण, कंस, जूलियस सीज़र, सिकंदर, नेपोलियन, हिटलर, लक्ज़र, प्रयागराज इलाहाबाद, रामेश्वरम, लेक ऊरो (Mburo) आदि। इवान ने बातचीत में एक मस्से वाले आदमी की चर्चा सुनी, टेम्पल माउंट, गीज़ा, आदि शब्दों को भी सुना किंतु उसकी समझ से बाहर का था वो वार्तालाप।
वार्तालाप थोड़ा शांत हुआ और तभी इवान के पापा ने उस को अपने पास उन कुर्सियों के बीच में बुलाया। इवान जब उन लोगों के बीच पहुँचा तो पापा इवान को वहीं रुकने का इशारा करते हुए उस घेरे से बाहर निकल गए और तभी केसर के तिलक वाले वृद्ध पुरुष ने इवान को अपने पास आने का इशारा किया। जब इवान उनके पास पहुँचा तो उन्होंने इवान के माथे पर हाथ रखते हुए कहा “दृष्टि” और मानो कुछ चमत्कार सा हो गया हो। अचानक इवान को लगा कि उस कैसल में अब सिर्फ वो और कुर्सी वाले आठ लोग ही हैं। इनके अलावा उसको अब कोई और दिख नहीं रहा था उसके पापा भी नहीं। जब तक वो कुछ समझता वो क्या देखता है कि मानो वो जमीन पर बीचोबीच खड़ा है और ये आठो व्यक्ति ऊपर आसमान में हैं अलग-अलग जगह और दूर एक तरफ एक नौंवे व्यक्ति का होने का भी अहसास लगता है लेकिन वो साफ दिखता नहीं है, बस ऐसा लग रहा था कि वहाँ भी कोई है जिसके सर के स्थान पर सर नहीं है बस कोई चमकदार चीज है शायद हीरे जैसी। इवान को ऐसा लगा जैसे ये जो नौ लोग हैं इनमें जो राजसी तेज वाले व्यक्तित्व आये थे वो जैसे बीच में थे और बाकी के आठों उनके इधर-उधर अलग अलग ऑर्बिट में जैसे चक्कर लगा रहे थे और इनमें से हरेक के पीछे तीन-तीन व्यक्ति और थे तथा आसमान में चारों ओर देखने से ऐसा भी लगा कि पूरा आकाश जैसे 12 भागों में बंटा दिख रहा था। इवान ये सब देख कर कुछ चकरा सा गया था कि उन सबने जैसे इवान को आशीर्वाद से देते हुए कहना शुरू किया, ”आगम, निगम, यामल, वाणी, बोली, गति, मति, घ्राणशक्ति, ध्यानशक्ति, अस्त्र, शस्त्र, तकनीकी, शास्त्र आदि- आदि।” और अब इवान की चेतना एक दूसरा रूप लेती जा रही थी जो इससे पहले उसने न कभी जाना था और न कभी सोचा ही था और अचानक इवान के मन में आया कि,
“ अरे क्या ये नव ग्रह हैं साक्षात? उनके पीछे क्या यह 27 नक्षत्र हैं और 12 राशियां भी? अरे हाँ, वो ही हैं । पर ये हो क्या रहा है?” कुछ ऐसा हो रहा था जिसने इवान, जिसका असली नाम राघव था लेकिन प्यार से सब उसको इवान ही कहते थे, उसको पूरे तौर पर बदल दिया था और शायद उसको भी नहीं पता था कि अब आगे के लिए उसकी जिंदगी बदलने ही जा रही थी। ये सारी प्रक्रिया न जाने कितनी देर चली लेकिन सब सब शांत हुआ तो फिर दृश्य वही पुराना था यानी कि कुर्सियां, उनपर बैठे वो 8 लोग, साथ में इवान के माँ, पापा और वो खुद। हाँ एक बात और थी कि कैसल में जो बाकी के पर्यटक थे वो आराम से घूम फिर रहे थे, इन लोगों की गतिविधियों का उन पर कोई असर नहीं था या उन पर वो दृष्टि ही नहीं थी जो यह सब घटनाक्रम देख पाती।
इवान अब महसूस कर रहा था कि उसमें मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार से कुछ परिवर्तन तो हुआ ही है और यह निरुद्देश्य नहीं ही है। उधर उन लोगों की बातचीत चल ही रही थी कि उनमें से जो सौम्य व्यक्तित्व वाले तेज चाल से चलते हुए आये थे और इवान समझ चुका था कि दरअसल वो चन्द्रमा या चंद्र ग्रह ही थे, वो बोले,”अब मेरा चलने का समय हो गया, मैं ढाई दिन से ज्यादा एक स्थान पर रुक ही नहीं सकता इसलिए अब चलूँगा।” इवान की समझ में कुछ-कुछ आ रहा था लेकिन अब वो समझा कि वो लोग लगभग ढाई दिन से वहीं कैसल में थे और जो कुछ भी प्रक्रिया चली उसमें ढाई दिन का समय लग गया था किंतु इवान को उसका अहसास ही नहीं हुआ। वो आश्चर्यचकित था कि तभी जैसे उन सबने एक साथ कहा, “ इवान हम सब की उम्मीदें तुमसे हैं और आशीर्वाद भी तुम्हारे साथ है। यदि तुम इस जिम्मेदारी के प्रति अपनी सहमति जताते हो तो समय के साथ-साथ तुमको सब मालूम पड़ता जाएगा कि तुमसे क्या अपेक्षाएं हैं और वो सब कैसे होगा और जो शक्तियां तुमको दी गयी हैं वो जाग्रत हो जाएंगी। हमारे आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं और हमारी तुम्हारी मुलाकात भी होती रहेंगी लेकिन हम सब अब एक साथ बहुत समय बाद ही एकत्रित हो सकेंगे।” यह सब कह कर उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि से इवान की ओर देखा और इवान ने मन पक्का करके उसी समय निर्णय लिया और अपने माँ-पापा की ओर देखा तो दोनों ने कहा,”हमारी सहमति है लेकिन तभी जब तुम्हारा मन सहमति दे” इस पर इवान ने उन सभी लोगों की ओर मुख करते हुए कहा कि, “ मैं तैयार हूँ और मेरा प्रयास होगा कि आप सबकी अपेक्षाओं पर खरा उतरूं।” इसके बाद उसके पापा-माँ ने उन सबको प्रणाम किया और इवान ने भी और तभी देखते ही देखते आशीर्वाद देते हुए वो लोग आगे बढ़े और मानो वायुमण्डल में ऐसे विलीन हो गए कि मानो कभी साक्षात आये ही नहीं थे। इवान ने मुड़ कर देखा तो वहाँ कोई कुर्सियां नहीं थीं।इवान ने एक पल को सोचा कि शायद ये सब एक सपना था किंतु तभी उसके पापा ने कहा, “ चलो बेटा अब होटल चलें।”
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