अस्तित्व भाग 3

मेरी आगामी पुस्तक जो एक mythological fiction है उसके कुछ अंश
भाग 3

7 सिस्टर्स की बातों से अचम्भित होकर अब इवान रोम की  पहली शताब्दी में बनी लगभग 48 मीटर ऊंची उस इमारत या कहें उस इमारत के खंडहरों में आगे बढ़ा।इवान की इतिहास और उससे जुड़े तथ्यों में काफी रुचि रही थी।उसको याद आ रहा था कि उसने पढा था कि रोमन साम्राज्य के फ्लावियान सम्राटों ने इस इमारत का निर्माण एक रंगशाला या एम्पीथियेटर के रूप में करवाया था जिसको बाद में कोलोजियम के नाम से प्रसिद्धि मिली। इस लम्बी और गोलाकार इमारत का निर्माण पत्थर, कंक्रीट से हुआ है और अपनी सर्वाधिक ऊंचाई पर यह एक 4 मंजिली इमारत है।इसमें एक साथ 50 से 80 हजार दर्शक बैठ कर यहाँ होने वाले ग्लैडिएटर संग्रामों, शिकार आदि के दृश्यों का सजीव आनन्द ले सकते थे। इवान जब कोलोजियम में एक तरफ खड़ा होकर उसको निहार रहा था जिसमें कई मंजिला दरवाजे या खिड़कियां सी बाहर से नजर आते हैं और उस पूरी इमारत में कई छेद दिखे जिनमें कभी लोहे से इस पूरी इमारत को लोहे की छड़ों आदि से साधने का कुछ इंतज़ाम रहा होगा लेकिन बाद में लोग धीरे-धीरे निकाल कर ले गए। इवान सोच रहा था कि ऐसे ही हिंदुस्तान की इमारतों में कीमती पत्थर जड़े हुए थे जिनसे नक्काशी का काम किया गया था और वो अंग्रेज़ निकाल ले गए। ताजमहल आगरा किला आदि इमारतों में आज भी उन स्थानों को देखा जा सकता है।
 स्तंभों और गलियारों को निहारते और उनके बीच घूमते हुए इवान को लगा जैसे वो पहली सदी के रोम में पहुँच गया है और गलियारों और खुले मैदान में जैसे जंगली जानवर लड़ रहे हैं। एक बड़े शेर से तीन-चार आदमी लड़ रहे हैं और हजारों लोग जैसे उस उन्मादी हिंसक लड़ाई का अंग बनकर शोर कर रहे हैं कि तभी दृश्य बदलता है और 5-6 आदमी ग्लैडिएटर्स युद्ध कर रहे हैं , एक दूसरे को परास्त करने का जानलेवा संघर्ष चल रहा है कि तभी इवान को लगा कि  वो सभी 5-6 लोग जैसे उसकी तरफ बढ़ने लगे।
इवान ने अपनी आंखों को मला कि यह कैसा स्वप्न है लेकिन अरे ये क्या हो गया था? वो पहली सदी के योद्धा मानो वर्तमान समय में सजीव होकर अचानक इवान की तरफ बढ़ने लगे थे। जब तक इवान कुछ समझ पाता तब तक उनमें से एक ने इवान को गर्दन से पकड़ने की कोशिश की लेकिन इवान ने सावधानी से अपने को बचाया तब दूसरे ने इवान को कमर से पकड़ने की चेष्टा की और इवान समझ गया था कि ये ग्लिमा कुश्ती के पेशेवर ट्रेंड लड़ाके थे। ग्लिमा एक नॉर्डिक क्षेत्र की पुरानी कुश्ती की कला है।इसके खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंदी को कमर से पकड़ते हैं और बल के बजाय तकनीक का उपयोग करके उसको गिराकर हराने का प्रयास करते हैं। यह आइसलैंड, नॉर्वे, फिनलैंड आदि देशों में काफी प्रचलित है। इवान ने ग्लिमा की पेशेवर ट्रेनिंग ली हुई थी । जब तक इवान कुछ समझता वो सभी लोग इस कुश्ती कला के सभी नियमों को ताक पर रखकर एक साथ इवान पर हमला करने लगे लेकिन उनको मालूम नहीं था कि इवान ने 12वीं सदी की इस कुश्ती कला के सभी रूप “वेस्टमैन” , “ईस्टमैन” , “ट्राउज़र-ग्रिप्स”, “लूज़-ग्रिप्स” , “बैक-स्पिनिंग” की ट्रेनिंग ग्लिमा के सबसे बड़े चैंपियन ‘गुडमुंडूर ऑगस्टन” के चेलों से ली थी।
ये लड़ाई धीरे-धीरे सारे नियमों को ताक पर रख कर हिंसक रूप लेती जा रही थी । अब उन लोगों में से तीन ने कमर और गर्दन पकड़ कर इवान को जमीन पर गिरा दिया और बाकी के तीन से कहा कि, “ इसका अंत कर दो।”  इवान जमीन पर पड़ा हुआ था और उनमें से दो उसकी गर्दन दबाए जा रहे थे, इवान की दम घुट रही थी और आंखें बाहर को निकली आ रही थीं , चेतना जैसे डूबती जा रही थी कि तभी वो सातों चिड़िया उन लोगों के सर पर तेजी से चक्कर करने लगीं और उनके परों के फड़फड़ाने से अचानक हवा बहुत तेज होती गयी जिससे इवान की चेतना लौट आई। इवान ने अपनी आंखें खोलीं और तभी जैसे उसमें मानो चीते की फुर्ती आ गयी , उसने पलटी मारी और दो हमलावरों की गर्दन हाथ में पकड़ कर खड़ा होता चला गया। उसके गुरु ने कहा था कि इस युद्ध कला में उनके बताए हिंसक दांव का उपयोग तभी करना है जब जान पर बन आयी हो और अब ये वही मौका था। इवान के चेहरे की सौम्यता ने एक चीते जैसी गरिमामय हिंसक मुखमुद्रा का रूप ले लिया था और उसने दो हमलावरों की गर्दन जो हाथ में जकड़ी थी उनमें से एक की गर्दन एक सैकिंड के हजारवें हिस्से के समय में मरोड़ दी जिससे उसकी आत्मा ने उसके शरीर का साथ छोड़ दिया और उसके मुख से मानो आवाज आई, “ मैं अजीका मारा गया, ‘उखाऊजाखा’ की सेवा से मुक्त हुआ।”
 यह अजीब सी घोषणा सुनकर इवान जरा चकित हुआ तो उसके चकित होने का लाभ उठा कर बाकी 5 हमलावर बच के भाग निकले और उनको भागता देखकर इवान ने वापिस मुड़ कर नीचे उस व्यक्ति की ओर देखा जिसकी गर्दन इवान ने हाल में ही मरोड़ दी थी किंतु वहाँ तो कुछ था ही नहीं। इवान की समझ में कुछ आ नहीं रहा था कि तभी 7 सिस्टर्स की आवाज आई कि, “ ताज्जुब मत करो इवान तुमने अपने ऊपर हुए हमले को नाकाम कर दिया है । तुम मृतक के शरीर के गायब होने से परेशान मत हो क्योंकि वास्तव में ये शरीर तो इनको अभी इस हमले के लिए ही मिले थे सो उसके मरते ही प्रकृति में विलीन हो गए।”  

लेखक अतुल चतुर्वेदी

नोट:-लेखक की अनुमति के बिना इस कहानी  के किसी भी अंश का उपयोग नहीं किया जा सकता है।

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