अस्तित्व भाग 2
मेरी आगामी पुस्तक के कुछ अंश
भाग 2
होटल पहुँच कर स्नान आदि से निवृत्त होकर जब वो लोग खाना खा रहे थे तो इवान के पापा उसको बता रहे थे कि, ” बेटा हम सब सुनते आए हैं कि यह सृष्टि अनादि और अनन्त है। इसके रहस्य जानना बहुत कठिन है लेकिन अभी के लिए ये समझ लो कि हमारी पृथ्वी, हमारा सौरमण्डल इस सृष्टि का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है लेकिन जब इस क्षेत्र में विकास हुआ तो उसके कई आयाम थे। यदि कुछ शक्तियां सदैव से ऐसी थीं जो चाहती थीं कि इस सौरमण्डलीय क्षेत्र में लोग सुख-शांति से रहें , चैन से रहें, आपस में प्रेम हो, सद्भाव हो , शांति रहे तो हमेशा से कुछ शक्तियां ऐसी भी सक्रिय रही हैं जिनकी सोच इसके ठीक विपरीत है और वो अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगी रहती हैं।” इवान ने पूछना चाहा कि,” सहस्त्रों वर्ष से ये दोनों किस्म के लोग ऐसे कैसे काम कर रहे हैं?” तो उसके बोलने के पहले ही शायद उसके पापा उसके प्रश्न को भांप गए थे और उन्होंने कहा कि, “ अच्छी और बुरी कुछ शक्तियां ऐसी हैं जिनके काल की गति हमारे समय की गति से फर्क है अर्थात उन पर हमारी तरह के जीवन-मृत्यु और वर्षों के नियम लागू नहीं होते और दोनों किस्म की विचारधाराएं अपने उद्देश्य पूर्ति हेतु साधन खोज ही लेती हैं, किसी को माध्यम बनाया कर। इस सबमें कभी किसी पक्ष को सफलता मिलती है और कभी किसी को।” इवान को आगे समझाते हुए उसके पापा कह रहे थे कि, “ कभी तो ऐसा भी हुआ है कि एक शक्ति का दुष्प्रभाव इतना जबरदस्त हो जाता है कि तब उससे पूरे सिस्टम को बचाने के लिए स्वयम परम् शक्ति को किसी न किसी रूप में आना होता है।”
इवान उनकी बात सुनता जा रहा था और पापा ने आगे कहा कि, “ तुमको सुकरात का किस्सा याद है? सुकरात अपने समय में फैली बुराइयों के विरुद्ध बहुत सशक्त वैचारिक और व्यवहारिक तरीके से लोगों को शिक्षित और सचेत कर रहे थे। उनको जेल में डाल दिया गया और फिर उनको जहर का प्याला पीना पड़ा। ये सब ऐसे ही नहीं हो गया था बल्कि इसके पीछे वही नकारात्मक शक्तियां कार्यरत थीं। उस घटना के बाद से वो वाला जहर का प्याला भी गायब कर दिया गया है, पता है क्यों? क्योंकि वो एक साधारण प्याला नहीं था पर अभी उसकी चर्चा नहीं क्योंकि वो जब समय आएगा तभी करना उचित होगा।”
पापा आगे बोलते जा रहे थे , उन्होंने इवान से पूछा, “ तुमको उस व्यक्ति की कहानी तो याद होगी जो सारी दुनिया को प्रेम का संदेश दे रहा था, कह रहा था कि पाप से तौबा करो, पश्चाताप करो और परमपिता परमेश्वर पर विश्वास करो और फिर वही बुराई की ताकतें सक्रिय हुईं और उन्होंने कुछ लोगों के माध्यम से क्या करवा दिया। पता है ना, उस व्यक्ति को सलीब पर टांग कर कीलों को ठोंक कर मार दिया था। इसके लिए सामान्य दुनिया को वो लोग जिम्मेदार लगते हैं जिन्होंने यह किया पर दरअसल इसके लिए भी जिम्मेदार वही दुराचारी शक्तियां थीं और हाँ वो ईश्वर के बेटे कहलाये तो जान लो कि जिन कीलों को उनके शरीर में ठोंका गया था वो साधारण कीलें नहीं थीं। अब वो कीलें कहाँ हैं ये भी एक रहस्य ही है।”
इवान जो ये सारी बातें सुन रहा था वो अचानक बोल पड़ा कि, “पापा तो इसका मतलब है कि हमेशा बुराई वाली ताकतें ही जीतती रहीं?” इस पर उसके पापा ने कहा, “नहीं ऐसा नहीं है। तुमको वो कथा याद है जब अनैतिक तरीके से अभिमन्यु को मार दिया गया था। उस समय ऐसा लगा कि बुराई की ताकतों की जीत हो गयी किंतु अगले ही दिन फिर जयद्रथ कैसे मारा गया था? लड़ाई मानव पात्र लड़ रहे थे, परमेश्वर खुद मानव रूप में उपस्थित थे ही पर कुछ काम अच्छाई की ताकतों ने भी मैनेज किये थे जिनकी परिणति जयद्रथ के अंत से हुई।”
इवान को आज कुछ-कुछ समझ में आ रहा था कि बहुत सी घटनाएं जो हमने इतिहास में पढ़ी हैं या अपने जीवन में देखते हैं उनके पीछे के ऐसे गूढ़ रहस्य भी होते हैं।पापा बता रहे थे कि, “ जब से सृष्टि की रचना हुई है तब से दोनों किस्म की शक्तियों का संघर्ष जारी है और दोनों तरफ के कुछ ऐसे चुनिंदा लोग हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपना दायित्व निभाते आ रहे हैं।” पापा ने ये भी बताया कि, “ ये जरूरी नहीं है कि ये लोग सिर्फ मनुष्य रूप में ही हों लेकिन जब जरूरत होती है वो आपस में सम्पर्क स्थापित कर ही लेते हैं।”
इस चर्चा के बीच में ही इवान ने वो प्रश्न पूछा जिसकी अपेक्षा उसके पापा बहुत देर से कर रहे थे।इवान ने पूछा कि, “ पापा अगर ये सब ऐसा है भी तो आखिर आपको यह सब कैसे पता और हमारा इससे क्या मतलब?”
पापा का जवाब था कि, “ हम भी उन लोगों में हैं जिन पर पुश्तों से इस सृष्टि को नुकसान पहुँचाने वाले लोगों से मुकाबला करना और उनके प्रयासों को निष्फल करने की जिम्मेदारी है।” जब तक इवान अपने विषय में कुछ पूछता उसके पहले ही पापा कह रहे थे कि, “ और बेटा इवान तुम वो विशिष्ट व्यक्ति हो जिसको इतनी शक्तियां दी गयी हैं। ये लगभग 4 या 5 हजार साल बाद हो रहा है तो समझ लो कि तुम्हारी जिम्मेदारी भी विशिष्ट है और आनेवाली चुनौतियां भी।” इस पर इवान ने कहा कि, “ पापा लेकिन मुझको तो अपने अंदर ऐसी कोई शक्ति नहीं लग रही” तो उसके पापा ने कहा कि, “ शक्तियां ट्रांसफर कर दी गयी हैं और समय के अनुसार वो धीरे-धीरे जागृत होने लगेंगी और तुम उनसे परिचित भी होने लगोगे।”
फिर इवान के पापा ने हँसते हुए इवान से कहा कि, “ इसके अलावा तुमको अपने सर और शरीर की मालिश करवाने और अपना बदन दबवाने से भी तो शक्ति मिलती है।” दरअसल इवान के बचपन से उसकी यह आदत थी कि वो जब भी थककर लेटता तो उसकी माँ उसके और उसकी बहन के सर पर तेल लगा कर मालिश करती थीं और वो मुस्कुराते हुए बातें करते रहते थे। बाद में इवान की आदत में बदन की मालिश और थकान होने पर अपने बदन को दबवाने की आदत भी शामिल हो गयी।अधिकतर उसका यह काम उसके घर के पुराने नौकर जमुनालाल का लड़का रामाशीष करता था जिसको अक्सर इवान रामाशेष कह कर भी पुकारता था। रामाशीष इवान का हम उम्र था और एक तरह से उसने इवान के बॉडीगार्ड का काम भी सम्हाल लिया था। वैसे रामाशेष को इवान के माँ-पापा ने पढ़ाया लिखाया भी था और वो घर के सदस्य की भांति ही रहता था। रामाशीष इवान के प्रति ऐसे समर्पित था जैसे कोई छोटा भाई अपने बड़े भाई के प्रति होता है या जैसे कोई पुत्र अपने पिता के प्रति होता है। रामाशीष इवान के व्यापारिक कामों में भी असिस्टेंट का काम करता था और वो भी इवान के साथ कई बार विदेश हो आया था, साथ जाता रहता था।
अपने पापा से शक्तियों और विशेष दायित्व आदि की बातें काफी ध्यान से सुन कर इवान अपना सर नीचे करके किसी सोच में डूब गया और फिर थोड़ी देर बाद उसने अपना सर उठाया और अपने पापा की ओर देखते हुए उसने पूछा, “ लेकिन मैं तो अपने जीविकोपार्जन में लगा हूँ तो मुझको क्या पता कि मुझको और क्या करना है।”
इस पर पापा बोले कि, “ जब समस्या आएगी और तुमको उससे निबटना होगा तो तुमको वो सन्देश मिल ही जायेगा और जब जरुरत होगी तो सहायक भी मिल जाएंगे लेकिन हाँ तुम सावधानी सदैव रखना।”
पापा ने कहा और ध्यान रखना कि, “ जब कोई तुमको ऐसा कोई संदेश देने आए या तुमको उस पर कोई संदेह हो तो उससे पूछना ,
“सातके” ?
अगर वो हमारी अच्छे लोगों वाली टीम का होगा तो सदैव उसका जवाब होगा,
“ मातके - सातके मातके ।”
अगर वो ये पूरा जवाब देता है तो वो निसंदेह अपनी टीम का ही होगा।”
इस पर इवान का स्वाभाविक प्रश्न था कि,
” यह शब्द तो शत्रु पक्ष भी बोल सकता है?” तो पापा ने कहा, “ नहीं कभी नहीं। ये शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं हैं वो कभी स्पष्ट नहीं बोल सकते।”
ये सब बातें करते हुए न जाने कितना समय बीत गया और पता ही नहीं लगा कि कब वो सब लोग सो गए। अगली सुबह इवान के पापा ने कहा कि, “ बेटा कल तुम्हारी माँ और हम तो वापिस हिंदुस्तान अपने घर जा रहे हैं तुम्हारा क्या प्रोग्राम रहेगा?” इस पर इवान ने कहा कि, “ पापा जैसा मैंने आपसे चलते वक़्त कहा था कि मुझको इटली में कुछ काम है तो मैं वहाँ होकर फिर वापिस घर पहुँचूंगा।” अगले दिन वो लोग अपने-अपने गंतव्य को रवाना हो गए ।
7 सिस्टर्स और पहला हमला
इवान को रोम में अपने एक व्यापारी मिस्टर लोरेंजो से कुछ काम था तो उसने रोम पहुँच कर उसको फोन किया तो व्यापारी मिस्टर लोरेंजो ने उसको उसी दिन मिलने को बुला लिया। इवान को भी यह सुविधाजनक लगा क्योंकि उस दिन शुक्रवार था और फिर अगले दो दिन छुट्टी के थे। लोरेंजो से मिलने इवान उसके विया दे त्रिटोने स्थित ऑफिस गया। इवान वैसे तो तो यूरोप, इटली और रोम न जाने कितनी बार आया था लेकिन एक तो पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम के बाद वो थोड़ा मूड बदलना चाहता था और दूसरे अगले दो दिन छुट्टी होने के कारण सारे ऑफिस बन्द ही थे तो वो थोड़ा घूमना चाहता था।इवान के यह व्यापारी मिस्टर लोरेंजो गिफ्ट्स ऐंड आर्टिफैक्ट्स के इटली के एक बड़े व्यापारी थे। इवान जब उनके पास पहुँचा तो मिस्टर लोरेंजो उससे बहुत गर्मजोशी से मिले। मिस्टर लोरेंजो का कद लगभग 5 फिट 10 इंच का था, लालामी लिए हुए गोरा रंग, चेहरे की खाल नीचे जबड़ों की तरफ कुछ खिंची हुयी कुल मिलाकर मिस्टर लोरेंजो एक गरिमामय व्यक्ति लगते गए और हाँ उनके चेहरे पर उनकी दाहिनी आँख के ऊपर एक बड़ा सा मस्सा था जिसको एक बार कोई देख ले तो भूल नहीं सकता था। मिस्टर लोरेंजो ने इवान से व्यापार की बातें करके फिर उसका कार्यक्रम पूछा तो उसने बताया कि, “अभी होटल जाकर फिर शाम को थोड़ा घूमने का प्लान है।” दोपहर बाद अपने व्यापारी से मिलकर इवान पहले पैन्थियोन के पास स्थित अपने होटल गया और फिर वहाँ से थोड़ी देर में कैब लेकर कोलोजियम के लिए निकल लिया। इवान के होटल से कोलोजियम का रास्ता लगभग 15 मिनट का था और कोलोजियम पहुँच कर इवान थोड़ी देर दूर सड़क के एक किनारे खड़े होकर उस प्राचीन काल की अद्भुत इमारत को निहारता रहा। इवान के लिए कोलोजियम में घुसने के लिए टिकट की व्यवस्था मिस्टर लोरेंजो ने ऑनलाइन टिकट से करवा दी थी। वो सोच रहा था कि कभी कंक्रीट की ईंटों और चूनापत्थर के बने इस स्टेडियम नुमा इमारत में कैसे 50 से 80 हजार दर्शक बैठते रहे होंगे। कैसे युद्ध के दृश्यों या शिकार के दृश्यों पर 80 हजार लोगों का उन्मादी शोर होता होगा। यही सब सोचते हुए इवान एक मंत्रमुग्ध भाव से उस अद्भुत विशाल इमारत की ओर बढ़ता जा रहा था जिसका कुछ हिस्सा अब खंडहर जैसा है। इवान कुछ कदम चला था कि उसको आने सर के ऊपर कुछ पक्षियों की चहचहाहट सी सुनाई पड़ी। उसने सर उठाकर ऊपर देखा तो उसके सर के ऊपर 7 चिड़िया उड़ रही थीं। इवान ने पहचानने की कोशिश की तो वो 7 सिस्टर्स प्रजाति की चिड़िया थीं तो उसको ताज्जुब हुआ क्योंकि इस प्रजाति की चिड़िया भारत में, मध्य यूरोप में तो पाई जाती हैं और रोम का उसको पता नहीं था। खैर, इवान आगे बढ़ा तो उसने देखा कि वो जिधर जा रहा था वो चिड़िया समूह उसके सिर के ऊपर ही उड़ रहा था। इवान को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि तभी अजूबा हो गया। चिड़ियों के उस समूह से इवान को लगा जैसे आवाज आयी हो कि, “ सुनो इवान।” इवान ने अपना सर झटक दिया कि ये उसका वहम है क्योंकि पहली बात तो भला चिड़िया भी बोलती हैं? दूसरी बात कि भला वो उससे क्यों बोलेंगी। लेकिन ये क्या हुआ, उनमें से एक चिड़िया बिल्कुल इवान के सर के पास आकर चहचहाते हुए बोली, “ इवान हम तुमसे ही बात कर रहे हैं ।” अब तो इवान भौंचक्का था कि ये क्या हुआ कि तभी उसको पापा की बात याद आ गयी और उसने उस चिड़िया से कहा “सातके” और लीजिये कमाल हो गया वो सारी चिड़ियां मानो समवेत स्वर में बोल उठीं ,” मातके - सातके मातके ।” अब तो इवान बिल्कुल अविश्वसनीय ढंग से उनको देखने लगा तो उनमें से एक चिड़िया बोली, “ताज्जुब मत करो इवान। तुमको नवग्रहों ने हम सबकी बात समझने की और हमसे सम्वाद करने की शक्ति उस दिन हाइडलबर्ग कैसल में दी है। अब ध्यान से सुनो आगे खतरा है तुम्हारे लिए और इसीलिए हम तुम्हारी मदद को आये हैं।”
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