अस्तित्व भाग 4

मेरी आगामी पुस्तक के कुछ अंश
भाग 4

इवान अब परेशान हो गया था और उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि आखिर उस पर ये हमला हुआ क्यों। साथ ही इवान ये भी सोच रहा था कि उसका इस कार्यक्रम के विषय में मिस्टर लोरेंजो के अतिरिक्त तो किसी को पता नहीं था। उसने  तय किया कि अब वो वापिस होटल जाएगा और अपने कमरे में लेट कर आराम करेगा। इवान होटल पहुँचा ही था कि उसके पास मिस्टर लोरेंजो का फोन आ गया। वो उसकी कुशलता- हालचाल पूछ रहे थे और उन्होंने कहा कि उन्होंने बस उसकी खोज-खबर लेने को कॉल किया था। इवान की समझ में कुछ आ नहीं रहा था।
बिल्कुल तरोताजा होकर इवान अगले दिन की अपनी घर वापिसी की यात्रा को तैयार था। ये कहना मुश्किल है कि घड़ी की सुइयाँ ज्यादा तेज चलीं या भारत की तरफ जाने वाला जहाज जिसमें इवान बैठा था लेकिन घर पहुँचने के उत्साह में इवान को पता ही नहीं चला कि कब उनका विमान दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पहुँच चुका था और शीघ्र ही वह एयरपोर्ट के बाहर था जहाँ उसके माँ-पापा उसको लेने आये हुए थे। इवान जब भी विदेश से लौटता था उसके माँ-पापा हर बार उसको रिसीव करने अवश्य आते थे। माँ और पापा से बात करते हुए और थोड़ी झपकी लेते हुए 5 घण्टे में इवान अपने घर पहुँच गया था।

   भालू, वानर तथा अशोक का पत्ता

अगले दिन तैयार होकर, अपनी नित्य पूजा आदि से निवृत्त होकर इवान अपने माँ - पापा के पास उनके कमरे में गया। इवान की दिनचर्या में यह एक नियम सा था कि यदि और जब वो अपने घर पर होता था तो सुबह का नाश्ता और रात्रि का डिनर अपने माँ- पापा के कमरे में ही करता था और तभी सारे समाचार-बातें हो जाती थीं। नाश्ता करते हुए इवान ने अपने पापा से पूछा कि, “ अब मुझे क्या करना है?” तो इवान के पापा ने कहा कि, “ तुम अभी आराम से अपना रूटीन कार्य करो। जब उन्होंने तुमको इस कार्य के लिए चिन्हित कर लिया है और शक्ति- सज्जित भी कर दिया है जिसको तुम यूनिवर्सिटी के ग्रैजुएशन की तरह समझो तो समय आने पर तुमको वो खुद सूचना भी देंगे। कब, कैसे और कहाँ ये बताना मुश्किल है?” इवान की माँ ने कुछ चिंतित होते हुए कहा कि, “ कहीं मेरा बेटा किसी झंझट में तो नहीं फंस जाएगा, उसको कोई खतरा तो नहीं होगा?”  इस पर उसके पापा ने कहा,
 “ देखो, हमारे परिवार पर अनादि काल से यह जिम्मेवारी है या कहा जा सकता है कि जिन कुछ परिवारों पर ये जिम्मेवारी है उसमें हम भी हैं। यह बहुत ही गोपनीय जिम्मेदारी होती है और ये हमारा सौभाग्य है कि हमारा जन्म उस परिवार में हुआ जिस पर ये जिम्मेदारी है। जब आप पर कोई अहम जिम्मेदारी होती है तो आप के कई किस्म के शत्रु भी हो जाते हैं लेकिन मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि यदि हम सावधान रहें तो शत्रु हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकेंगे पर साथ ही यह भी ध्यान रखने की बात है कि जो उद्देश्य हमारे जिम्मे है वो इतना बड़ा है कि उसके आगे बाकी  सारी बातें बहुत छोटी ही हैं ।” आगे पापा ने इवान की मम्मी को आश्वस्त किया कि, 
“ तुम बेफिक्र रहो, इवान पर परमशक्ति की विशेष कृपा है और उसका बाल भी बांका नहीं होगा।”
इवान घर लौट कर अपनी सामान्य दिनचर्या में लग कर अपना काम कर रहा था कि इसी दौरान एक दिन उसका कार्यक्रम किसी काम से दिल्ली जाने का बना। उस दिन दिल्ली पहुँच कर काम खत्म होते हुए काफी देर हो गयी तो उसका लौटने का कार्यक्रम अगले दिन का तय हुआ। अगले दिन दिल्ली से लौटते में इवान का मन हुआ कि मथुरा से होकर गोवर्धन गिरिराज जी की परिक्रमा करके लौटा जाए। अगले दिन सुबह 9 बजे तक इवान गिर्राज की परिक्रमा शुरू कर चुका था।हल्की सर्दी शुरू हो गयी थी, परिक्रमा के लिए मौसम बहुत अच्छा था। इवान के लिए यह पहला मौका था जब वो गिर्राज जी की परिक्रमा अकेले कर रहा था नहीं तो हर बार वह अपने कुछ साथियों के साथ ही आता था। इवान ने दानघाटी  के दर्शन कर  परिक्रमा शुरू कर दी थी। यह 7 कोस की अर्थात लगभग 21 किलोमीटर की परिक्रमा है । इस परिक्रमा के दो हिस्से हैं जिसमें पहली बड़ी परिक्रमा 12 किलोमीटर की है जो दानघाटी के मंदिर के दर्शन से अधिकांश लोग शुरू करते हैं। इवान ने परिक्रमा मार्ग में अन्यौर, गोविंद कुंड, पूंछरी का लौटा , जतीपुरा आदि स्थलों से होते हुये और श्री मुखारबिंद के दर्शन करते हुए  आगे राधा कुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा वाली 9 किलोमीटर की छोटी परिक्रमा को भी पूरा किया और इस परिक्रमा को करने में उसको लगभग साढ़े 6 घण्टे लग गए।परिक्रमा पूरी करके इवान ने वहीं पर हलवाई की दुकान से समोसे और एक कुल्हड़ लस्सी का लिया और गाड़ी को आगे थोड़े एकांत में रुकवा कर समोसा खाने लगा और साथ मे लस्सी भी पी रहा था कि वहाँ कुछ बन्दर आ गये और ताज्जुब की बात ये थी कि उनके साथ एक अत्यंत वृद्धकाय भालू भी था। ये सभी लोग इवान की कार को घेर कर बैठ गए। इवान को कुछ अजीब सा लगा कि उनमें से एक बंदर बोला, “ सुनो इवान।” अब तो इवान और चौंक गया। उसने देखा तो बंदरों की संख्या 7 ही थी भालू 8वें थे । तुरन्त इवान को वही बात याद आ गयी और उसने वहीं बंदरों की ओर मुख करके बहुत धीरे से कहा कि “सातके” जिसके जवाब में वो बन्दर और भालू समवेत स्वर में मानो बोले, “मातके- सातके मातके ।” इवान ये तो समझ गया कि ये अपने शुभचिंतक ही हैं लेकिन उसका आश्चर्य अपनी जगह था ही। इस पर वो बन्दर बोले, “ चौंको मत, इवान । अब ध्यान से सुनो, समय आ गया है। वे दुष्ट लोग कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र हजारों साल से रच रहे हैं और अब वो अपने कुटिल मन्तव्य के निकट पहुँच सकते हैं। इसी वजह से अष्टग्रहों को तुमसे स्वयम साक्षात्कार करना पड़ा और फिर नवग्रहों, 27 नक्षत्रों और 12 राशियों के समक्ष तुमको विशिष्ट शक्तियों से परिपूर्ण करना पड़ा। समस्या ये है कि हम सबको हजारों साल से मालूम है कि वो लोग एक बहुत बड़े कुटिल उद्देश्य को लेकर चल रहे हैं और यदि वो उसमें सफल हो गए तो न सिर्फ अच्छाई और सच्चाई का नाश हो जाएगा अपितु देवासुर संग्राम से भी ज्यादा विकट स्थिति इस संसार को झेलनी पड़ जाएगी। ये संघर्ष न जाने कब से चल रहा है जिसमें हमारी भी या कहो सत्य और  धर्म के लिए लड़ने वालों के खाते में भी कई असफलताएं हैं जैसे जटायु का मरण, अभिमन्यु की हत्या, राजा परीक्षित की हत्या, द्वारिका का समुद्र में डूब जाना, सिंधु घाटी की सभ्यता का नष्ट कर दिया जाना, इंका सभ्यता की समाप्ति, सुकरात को विष का प्याला , ईसामसीह को सलीब पर लटका देना आदि ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हैं जब हम चूक गए और कुछ कर न सके।”  इस पर इवान पूछ बैठा,” ऐसे तो न जाने कितनी राजनैतिक और सामाजिक घटनाएं भी हुयी हैं तो क्या ये भी वही लोग कर रहे थे?”  इस पर उन वानरों में से एक बोला, “जो भी ऐसी बड़ी और बुरी घटनाएं हैं जिनका मानवता पर बुरा प्रभाव पड़ता है उनके पीछे यही शक्ति या उसके लोग होते हैं लेकिन ऐसी बहुत सी सामाजिक- राजनैतिक किस्म की घटनाओं को वो अन्य माध्यमों से करवाते हैं जैसे 1932-33 का होलोडोमोर यानी लोगों को भूख से मारना जो यूक्रेन आदि देशों में हुआ, या 1919-20 की महामारी, हिटलर का उदय, ईदी अमीन के अत्याचार , कम्पूचिया में ख्मेर रूज द्वारा नरसंहार या हाल ही की कोविड महामारी” वानर लोग बोल रहे थे और इवान उतनी ही उत्सुकता से सारी बातें सुन रहा था। इवान उत्सुकतावश पूछ बैठा कि, “ कोविड भी?!!” तो उनमें से एक वानर जो अपेक्षाकृत काफी कम उम्र के लग रहे थे लेकिन सब उनका कुछ अलग आदर कर रहे थे वो  वानर बोले, “हाँ कोविड महामारी के पीछे भी उन्हीं कुटिल शक्तियों का हाथ था।” वही वानर आगे बोल रहे थे कि, “लेकिन अब वो लोग जो करने जा रहे हैं वो इन सभी घटनाओं से बहुत ज्यादा भयावह और विध्वंसक हो सकता है। इसके लिये उन्होंने कई देशों और क्षेत्रों में अपनी पैठ सामाजिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक और आपराधिक किस्म के लोगों के तबकों में कर ली हैं। हम लोग बहुत कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनकी योजना की पूरी और सही जानकारी हमको नहीं  मिल सकी है पर इतना जरूर पता है कि जो भी है बहुत भयंकर है, उसके परिणाम न सिर्फ मानवता , न सिर्फ पृथ्वी के जीवों बल्कि सृष्टि के इस इलाके की सम्पूर्ण जीव, अजीव यहाँ तक कि दैविक शक्तियों तक के लिए बहुत विनाशकारी हो सकते हैं। इस लड़ाई में हमारी तरफ के परमशक्ति के बहुत लोग लगे है पर इस युद्ध/संघर्ष में इवान तुम्हारा बहुत बड़ा रोल होने वाला है और अब उसका समय आ गया है।” 
इस पर इवान ने कहा,” लेकिन मुझको क्या करना है , कैसे करना है ये तो मुझको कुछ मालूम ही नहीं है”  जिस पर उन सभी वानरों में एक बहुत धीर गम्भीर और अत्यंत तेजवान से दिखते  वानर बोले1, 
“ बस तैयार रहो, सब मालूम पड़ेगा, जल्द ही।” इस पर इवान ने कहा कि, “अब क्या उनको मालूम पड़ गया तो मुझ पर फिर हमले शुरू हो जाएंगे?”  इस पर वो सुनहरे से चमकते बालों वाले वही वानर बोले, “ नहीं, अभी चिंता की कोई बात नहीं। इस इलाके को भी तुम ऋष्यमूक पर्वत की भांति समझो जहाँ कोई बुरी शक्ति आ  नहीं सकती न यहाँ होने वाली कोई बात उन तक पहुँच ही सकती है और यही सुरक्षा तुम्हारे अपने घर और तुम्हारे सारे अड्डों को प्राप्त है।”  इवान को विदा करते हुए उन्हीं वानरराज ने कहा, “ तुमको अष्ट सिद्धि - नौ निधि का आशीर्वाद देता हूँ” और आश्यचर्यचकित सा इवान कुछ समझ बोल पाता तभी उन्होंने इवान को एक पेड़ का एक पत्ता दिया और कहा, “ यह बहुत अद्भुत, अनमोल चीज है इसको अपने पास सदैव रखना प्रभु श्री राम और सीता माँ तुम्हारे ऊपर कृपा बनाये रखें।”  इवान ने देखा तो वो बिल्कुल ताजा पत्ता था जैसे अभी ही किसी पेड़ से तोड़ा है। इवान उस पत्ते को ध्यान से देख ही रहा था कि तभी फिर एक-एक करके सातो बंदरों और आठवें उस वृद्ध रीछ ने इवान के सर पर कुछ बुदबुदाते हुए हाथ रख कर मानो अपना आशीर्वाद दिया। इसके बाद वो सारे बन्दर और वो रीछ वापिस चल दिये और जब तक इवान उनकी तरफ देखता मानो वो हवा में विलीन हो गए थे। इवान ने उस पत्ते को ध्यान से देखा तो उसकी समझ में आया कि विशाल वानर राज ने जो पेड़ का पत्ता उसको दिया था वो पत्ता अशोक के पेड़ का पत्ता था।
अपनी इस मुलाकात से इवान की मनःस्थिति कुछ अलग ही हो गयी थी। उसका मन बहुत आनन्दित हो रहा था और वो अपने अंदर एक नयी, अलग किस्म की ऊर्जा का अनुभव कर रहा था। उसको लग रहा था कि मानो उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में एक आमूल-चूल परिवर्तन हो गया है। वो अपनी हथेली पर रखे उस अशोक वृक्ष के पत्ते को देख रहा था जो अभी-अभी वानरराज ने उसको दिया था कि तभी बहुत तेज हवा चलने लगी। इवान को लगा कि कहीं यह पत्ता तेज हवा में उड़ न जाये तो जब तक वह अपनी मुट्ठी बन्द करता तभी वो क्या देखता है कि  पत्ता उसकी खुली हथेली पर वैसे ही रखा है, उस पर हवा का कोई असर नहीं है। इवान कुछ सोचता उस से पहले उस पत्ते पर कुछ अक्षर से चमके और एक इबारत बन गयी। उस पर चमक रहा था कि, “ मेरे लिए परेशान मत हो मुझको हवा नहीं उड़ा पाएगी”  और फिर वो एक सामान्य पत्ते की भांति मानो इवान के हाथ से चिपक सा गया। ताज्जुब की बात ये थी कि उस पत्ते का अपने हाथ को स्पर्श करना इवान को एक अद्भुत आनन्ददायक अनुभूति दे रहा था। ये वानर कौन थे? वो भालू कौन था? इवान जब तक अपने घर नहीं लौट आया वो इसी घटना के विषय में सोचता रहा चूंकि घर लौटते हुए बहुत देर हो गयी थी तो इवान सीधे अपने कमरे में जाकर सो गया। 
अगले दिन सुबह के नाश्ते के समय उसने पूरा किस्सा अपने पापा-माँ को बताया तो उसके पापा बहुत ही भावविह्वल हो गए और बोले, “ बेटा, तुझ पर प्रभु की विशेष कृपा हो गयी है। तुमको अष्ट-सिद्धि और नव निधि के दाता ने स्वयम अपने दर्शन और उसका वरदान दिया और वो भी पूरे जूथ के साथ। जय सिया राम!”
इवान भी मन ही मन बहुत हर्षातिरेक से भरा तो था ही साथ ही बहुत आश्चर्यचकित भी था कि क्या सचमुच उसको उन सबके दर्शन हुए या सब महज एक स्वप्न मात्र था कि तभी अशोक का वो पत्ता खड़खड़ाया और उस पर अक्षर चमक रहे थे, “ सचमुच हुए दर्शन तुमको!”  इवान ने आगे अपने माँ-पापा को अशोक के उस पत्ते के विषय में बताया और उनको दिखाने को हाथ आगे बढ़ाया तो उसकी हथेली में रखा वो पत्ता उन लोगों को दिखा ही नहीं जबकि इवान अपने हाथ में रखे उस पत्ते को बिल्कुल साफ न सिर्फ देख पा रहा था अपितु महसूस भी कर पा रहा था। आखिर में उसने मन ही मन प्रार्थना की कि केवल एक बार ही उन लोगों को भी वो पत्ता दिख जाए तो अचानक ही चमत्कार से हो गया। इवान की हथेली में वो पत्ता मानो चमकने सा लगा , उस पूरे कमरे में एक अद्भुत, अकल्पनीय , शांत, शीतल प्रकाश सा भर गया और इवान के माँ-पापा को उसकी हथेली पर चमकता वो पत्ता दिखने लगा। उस पत्ते को देखकर इवान के माँ-पापा भावातिरेक में भावविह्वल होकर रोने लगे और बार-बार उस पत्ते को प्रणाम करने लगे। इवान के पापा कह रहे थे कि, “ हमारे तो जन्म-जन्मांतर की साध पूरी हो गयी कि हमको अशोक वाटिका के उस वृक्ष के इस पावन पत्ते के दर्शन का सौभाग्य मिला। हम कैसे अपने ईश्वर और रामदूत अतुलित बलधामं हनुमान जी को धन्यवाद दें।” कुछ समय में ही वहॉं का माहौल वापिस सामान्य हो गया और वह पत्ता भी इवान के माँ-पापा को दिखना बन्द हो गया।
इवान का जीवन कुछ दिन सामान्य चला, ये समय कुछ हफ्ते का था या महीनों का ये तो बताना मुश्किल है लेकिन कुछ समय हो गया था।

लेखक अतुल चतुर्वेदी

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