अस्तित्व भाग:- 10
मेरे आने वाले उपन्यास 'अस्तित्व' के कुछ अंश
भाग 10
माचू-पीचू और मामा जेबो
जब इवान और उसके साथी काहिरा घूमने की तैयारी कर रहे थे तो लगभग उसी समय काहिरा से बहुत दूर दुनिया के बिल्कुल पश्चिमी हिस्से में दक्षिण अमरीका के पेरू देश में उरुबाम्बा घाटी - उरुबाम्बा नदी के पास ही कहीं कुछ लोग इकट्ठे थे।इस स्थान का नाम माचू-पीचू था , यह एक पहाड़ी स्थल है और पुरानी इंका सभ्यता के इंका लोगों के खोए हुए शहर के रूप में भी विख्यात है।उन इकट्ठे हुए लोगों में दो तो वही दक्षिण अमेरिकी लोग थे जो युगांडा की लेक ऊरो वाली मीटिंग में मौजूद थे और उनमें एक जो स्त्री थी उसका नाम मामा जेबो था और दूसरा उसका साथी पुरुष था।इनके अतिरिक्त यहाँ तीन-चार लोग और थे। मामा जेबो ने अपने साथी पुरुष से कहा ), “सुनो रिजोलू, जिस समय का हमको हजारों साल से इंतज़ार था वो समय आ गया है। ये माचू पीचू के पत्थर गवाह है कि आज हम लोग जिस कार्य के लिए इतने बेकरार हैं वो इस पूरी दुनिया या पूरे सौरमण्डल के ही भविष्य को बदल देगा। ”
इस पर रिजोलू ने कहा कि, “ अब वो समय दूर नहीं जब देवता पिकिरू और मननमका देवी के आशीर्वाद से हम उन लोगों से फिर से सम्पर्क कर सकेंगे जिन्होंने हमको धरती पर लाकर बसाया। वो समय दूर नहीं जब हमारी शक्तियां फिर से जाग्रत होंगीं और इस सौरमण्डल के ग्रह भी हमारी बातें मानने को मजबूर होंगे।” उस सुंदर जगह पर, उतने सुहावने मौसम में ये बातें जैसे भयावहता पैदा कर रही थीं। रिजोलू जो शरीर से तो मजबूत दिखता था किंतु शायद समझ में कुछ कच्चा था उसने मामा जेबो से पूछा कि, “ ये होगा कब और कैसे।?”
इस पर मामा जेबो ने उसको चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि, “ बस जितना और जो कहा जाए वो करते चलो, तुमसे बस यही अपेक्षित है।”
अपने साथ के अन्य लोगों से उसने कहा कि, “ ये सामने जो पेड़ के पीछे दो बड़े पत्थर हैं इनको हटाओ।”
उन लोगों ने वो पत्थर हटाये तो अंदर जाने का एक रास्ता सा था पर वहाँ अंदर घना अंधकार था। मामा जेबो ने अपनी जेब से एक कागज निकाला, उसको ध्यान से देखा और उन लोगों को अपने पीछे आने का इशारा किया। मामा जेबो, उसके पीछे रिजोलू और फिर और लोग उनके पीछे-पीछे अंधेरे में चले। मामा जेबो 12 कदम गिनकर आगे चली और फिर अंधेरे में ही उसने दाहिनी तरफ की दीवाल पर अपना हाथ तीन बार मारा जैसे किसी दरवाजे को खटखटा रही हो। जब उसने खटखट की तो वहाँ एक आवाज सी हुई जैसे हवा सरसरा रही हो और उस आवाज ने कहा “जेबो ?”
इस पर मामा जेबो ने कहा, “हाँ मैं ही हूँ” और लीजिये कमाल हो गया, वहाँ एक दम से रोशनी हो गयी और उस गलियारे में तीर के निशान जैसे रास्ते को इंगित करने लगे। मामा जेबो में पीछे-पीछे सभी लोग उन निशानों को देखते हुए आगे बढ़ने लगे।थोड़ा दूर चलने पर वो लोग एक बड़े से हॉल में पहुँच गए जिसमें एक अजीब सी हल्की सी रोशनी थी जो वातावरण को काफी रहस्मय बना रही थी। वहाँ बीच में एक चबूतरा बना हुआ था। तभी वही सरसराती सी आवाज न जाने कहाँ से आती सुनाई पड़ी कि, “ जेबो तुम्हारा सामान तैयार है पर क्या तुम उसको लेने को तैयार हो?” रिजोलू और बाकी लोगों की कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन मामा जेबो ने दृढ़ स्वर में कहा कि, “ हाँ मैं तैयार हूँ।”
इस पर वहाँ की रोशनी और हल्की हो गयी और उसी सरसराती आवाज ने कहा, “ तो भेजो उन चारों को।”
इस पर मामा जेबो ने उसके और रिजोलू के साथ जो चार अन्य व्यक्ति आये थे जिनमें दो बहुत हष्ट-पुष्ट पुरुष और दो बहुत ही सुंदर नौजवान स्त्रियाँ थीं उनसे कहा, “ लो आज अपनी दर्शन की इच्छा पूरी कर लो जिसके बाद सामान भी लिया जा सके” और यह कहते हुए उनको उस चबूतरे पर चढ़ने का इशारा किया। वो लोग बहुत प्रसन्न होते हुए उस चबूतरे पर जाकर खड़े हो गए और उत्सुकता से दर्शनों की प्रतीक्षा करने लगे। धीरे-धीरे रोशनी कम ज्यादा होने लगी और एक अजीब सा संगीत वहाँ न जाने कहॉं से बजने लगा। संगीत शुरू होते ही मामा जेबो ने गाना शुरू कर दिया कि,
“हे उखाऊजाखा हम आये तेरी शरण,
जिसको तू चाहे दे जीवन या दे दे मरण,
हे उखाऊजाखा हम आये तेरी शरण।
हो हो, हो हो हो,
हो हो, हो हो हो।
हे उखाऊजाखा, हो हो, हो हो हो।”
और धीरे धीरे मामा जेबो के साथ रिजोलू और बाकी के चारों भी इस गाने को गाने लगे और यहाँ तक कि वो सरसराती आवाज भी अपने सरसरे से स्वर में इस गाने को दोहराने लगे।
“हे उखाऊजाखा हम आये तेरी शरण,
जिसको तू चाहे दे जीवन या दे दे मरण,
हे उखाऊजाखा हम आये तेरी शरण।
हो हो, हो हो हो,
हो हो, हो हो हो।
हे उखाऊजाखा, हो हो, हो हो हो।”
रोशनी कम ज्यादा हो रही थी, संगीत की लय बदलती जा रही थी और गाने की गति बहुत तेज होती जा रही थी, वातावरण उन्मादी सा होता जा रहा था , सब गा रहे थे, चबूतरे पर खड़े चारों लोग तो जैसे उन्माद में नाचने से लगे थे,
“हो हो, हो हो हो
हम आये तेरी शरण
हे उखाऊजाखा तू चाहे दे जीवन या दे दे मरण।।”
और नाचते हुए उन चारों चबूतरे वालों के मुँह से इस बार जैसे ही ये शब्द निकले कि फुर्ती से मामा जेबो उछल कर उस चबूतरे पर चढ़ी और जब तक किसी की कुछ समझ में आये उसने अपनी गाउन में से एक तलवार निकाली और पल भर में “सटाक-सटाक, खचाक-खचाक” उन चारों के सर धड़ से अलग कर दिए और जोर से चिल्लाई, “स्वीकार करो उखाऊजाखा।” उसका ये करना और कहना था कि अचानक वहाँ दिन जैसी रोशनी हो गयी, म्यूज़िक ऐसा थम गया जैसे कभी बजा ही नहीं था और सबसे कमाल की बात थी कि अब वो चबूतरा बिल्कुल साफ-सुथरा दिख रहा था जिस पर उन चारों का कोई नामो-निशान ही नहीं था।
रिजोलू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था सिवाय इसके कि चबूतरे पर चार ही चढ़े थे और वो नहीं चढ़ा था और तभी वहाँ न जाने कहाँ से चबूतरे पर एक छोटा सा सन्दूक प्रकट हुआ जिसको अपने हाथ से उठा कर मामा जेबो ने रिजोलू को दिया और कहा,
“ ये उन चीजों में से एक है। इसको सम्हाल कर के चलो।” इतना कहकर मामा जेबो वापिस मुड़ी, उसके पीछे-पीछे उस सन्दूक को लेकर रिजोलू चल दिया।अब वो लोग जिस रास्ते से आये थे उसी पर वापिस चल दिये।
लेखक:- अतुल चतुर्वेदी
इस कथानक का कोई भी अंश लेखक की अनुमति के बिना उपयोग में नहीं लाया जा सकता है
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