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इतिहास और संस्कृति के किस्से-17 किस्सा है ज़ियाउद्दीन बरनी की तारीखे फ़िरोज़शाही से और चर्चा है अलाउद्दीन खिलजी के सुल्तान पद पर पहुँचने के गद्दारी भरे कत्ल के किस्से कीसुल्तान जलालुद्दीन की हत्या का पूरा प्रसंग

इतिहास और संस्कृति के किस्से-17 आज का किस्सा है ज़ियाउद्दीन बरनी की तारीखे फ़िरोज़शाही से और चर्चा है अलाउद्दीन खिलजी के सुल्तान पद पर पहुँचने के गद्दारी भरे कत्ल के किस्से की सुल्तान जलालुद्दीन की हत्या का पूरा प्रसंग सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी अपने सरल हृदय और सहृदय स्वभाव के कारण अपने भतीजे और दामाद अलाउद्दीन खिलजी पर विश्वास कर बैठा था। अलाउद्दीन खिलजी उस पर समाचार भिजवाता रहा कि अलाउद्दीन मोती ,माणिक्य, बहुमूल्य वस्तुएं, हाथी और घोड़े लेकर कड़ा पहुँच गया है। उसका निवेदन भी सुल्तान जलालुद्दीन तक पहुँचा कि यह सारी वस्तुएं वह सुल्तान के लिए लाया है। उसके मातहत लोग ऐसी आशंका व्यक्त कर रहे थे कि अलाउद्दीन के इरादे नेक नहीं नजर आ रहे किंतु सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी अलाउद्दीन की बनावटी बातों के फंदे में फंसता जा रहा था। यह भी बताते हैं कि जलालुद्दीन के मन में अलाउद्दीन द्वारा जीते धन का लालच भी हो गया था  जिसने उसके कदम उसकी मौत कि ओर खुद बढ़ा दिए। जलालुद्दीन खिलजी ने अलाउद्दीन को एक स्नेहसिक्त सन्देश अपने दो विश्वस्त लोगों के हाथ से भेजा । वे लोग जब कड़ा पहुँचे तो सारा मामला देख कर समझ गए कि ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-16आज का किस्सा है मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं की लिखी किताब मुन्तख़ब-उत-तवारीख से अकबर की शादी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-16 आज का किस्सा है मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं की लिखी किताब मुन्तख़ब-उत-तवारीख से। बदायूनीं लिखता है कि यह उस वक़्त की बात है जब बादशाह अकबर के दिमाग में खुद को शादी के रिश्ते में जोड़ने का ख्याल आया। कव्वालों (वे व्यक्ति जो लड़की के पिता को शादी के लिए राजी करते थे-पुराने नाइयों की तरह) तथा हिजड़ों को इस काम की जिम्मेदारी दी गयी। इन लोगों ने कुलीनों के हरमों में जानकारी करना शुरू कर दिया। उस समय का यही तरीका था और ऐसा करने से पूरे शहर में आतंक फैल जाता था जो हुआ भी। आगरा के मौतबीर शेख बदाह के एक पुत्र की मृत्यु हो चुकी थी और उनकी पुत्रवधु विधवा थी।इस विधवा पुत्रवधु के अपनी दर्जिन के माध्यम से पड़ोसी बुजुर्ग अधम ख़ाँ के भाई बाकी खाँ से अनैतिक सम्पर्क थे लेकिन बाद में इन सम्बन्धों की परिणित विवाह में हुई । यह विधवा महिला जब उत्सवों में जाती तो शेख बदाह की अन्य पुत्रवधु को भी लाती जिसका पति जीवित था और उसका नाम अब्द-उल-वासी था।  इस अब्द-उल-वासी की पत्नी बेहद खूबसूरत थी। संयोग से या कह सकते हैं कि वासी के दुर्भाग्य से एक दिन शहंशाह अकबर की दृष्टि उस महिला पर पड़...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-15. हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-15 हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी मुहम्मद कासिम हिंदू शाह ‘फरिश्ता’ मध्ययुगीन भारत का इतिहास लिखने वाला एक प्रसिद्ध इतिहासकार हुआ है। फ़िरिश्ता का जन्म कैस्पियन सागर के तटीय नगर अस्त्राबाद में गुलाम अली हिन्दू शाह के घर सन 1570 में हुआ था। अपने बचपन में ही फ़िरिश्ता अपने पिता के संग भारत में अहमदनगर आ बसे। वहां के निज़ाम के शहज़ादे मिरान हुसैन निज़ाम शाह को फ़ारसी पढ़ाने का न्यौता इसके पिता को मिला था, जिसके साथ फ़रिश्ता ने भी अपनी पढ़ाई की। फरिश्ता की काबिलियत  से प्रभावित होकर बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह सानी या इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने उससे ‘हिंदुस्तान में इस्लामी शासन काल’ का इतिहास लिखने को कहा जिसके लिए पहले तो फरिश्ता मना करता रहा फिर बहुत जोर देने पर उसने नमूने के कुछ पृष्ठ लिख कर बादशाह के सामने पेश किए। इसमें फरिश्ता ने जानबूझ कर इब्राहिम के पिता अली आदिलशाह प्रथम के समय का इतिहास लिखा और उसकी हत्या की घटना को जैसा का तैसा लिख कर पेश कर दिया। दरअसल यह फरिश्ता का बहुत बड़ा साहस था क्योंकि फरिश्ता न...

हुमायूँ के लालों (Ruby) की ईरान में चोरी इतिहास और संस्कृति के किस्से-14

इतिहास और संस्कृति के किस्से-14 हुमायूँ के लालों (Ruby) की ईरान में चोरी आज जो किस्सा मैं आपसे शेयर करने जा रहा हूँ यह बादशाह हुमायूँ से सम्बंधित है और इसको हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने अपनी पुस्तक ‘हुमायूँ नामा’ में लिखा है। यह उस समय की बात है जब शेर शाह सूरी के हाथों हार का सामना कर और अपना राज्य गंवा कर हुमायूँ ईरान के शहंशाह तहमास्प के यहाँ अपने परिवार के साथ एक शरणार्थी का जीवन गुजार रहा था। उस समय हुमायूँ के आर्थिक हालात भी काफी खराब से ही थे। हुमायूँ ने अपने पास कुछ अत्यंत कीमती माने जानेवाले जवाहरात ‘लाल’ (Ruby) सम्हाल कर रखे हुए थे जिनके विषय में या तो उसको पता था या उसकी पत्नी हमीदा बानो बेगम (अकबर की माँ) को। उन लाल को हुमायूँ अपने तोमार (सोने या चांदी की तावीजदानी जो गले में पहनी जाती थी) में रखता था और जब नहाने या कहीं जाता तो तोमार हमीदा बानो के सुपुर्द कर के जाता था। ऐसे ही एक दिन जब हमीदाबानो नहाने गयीं तो वह तोमार को एक पोटली में बांध कर बादशाह के बिस्तर पर छोड़ गयीं। इसी बीच मौका पाकर उनके यहाँ काम करने वाले ‘रोशन कोके’ ने उसमें से पाँच लाल निकाल लिए और अपने साथी ख्व...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-13

इतिहास और संस्कृति के किस्से-13 एक आम व्यक्ति की दृष्टि से मुगल काल का खुद की सोच-समझ से वर्णन:-  जौनपुर शहर का वर्णन; शाहजादे सलीम का आना  अकबर की मृत्यु के समाचार का वर्णन आज हमारे इतिहास का जो किस्सा मैं लिखने जा रहा हूँ वो मैंने ‘अर्ध कथानक’ नामक पुस्तक से पढ़ा है जिसके लेखक बनारसीदास हैं। यह एक अद्भुत और अपने प्रकार की एक ही कृति है और आपको बताता हूँ कि मैं ऐसा क्यों कहा रहा हूँ। दरअसल यह हिंदी में लिखी हुई पहली आत्मकथा मानी जाती है। बनारसीदास जैन ने अपनी यह आत्मकथा सन 1641, जी सही पढ़ रहे हैं आप सन 1641 ईस्वी, में अपनी पचपन वर्ष की आयु में लिखी थी। जैन मत और वैसे भी बहुत से लोग मनुष्य का जीवनकाल 100-110 वर्ष का मानते हैं और इसीलिए उम्र के पचपन वर्ष पर लिखी अपने जीवन की कहानी को बनारसीदास ने ‘अरध कथान’ कहा है परंतु दरअसल यह उनका पूर्णकथानक साबित हुई क्योंकि ‘अर्ध-कथानक’ लिखने के 2-3 वर्षों के भीतर ही उनका जीवन पूर्ण हो गया था। बनारसी दास का जन्म जैन धर्म मानने वाले श्रीमाल परिवार के खरगसेन के यहाँ सन 1586 में हुआ। उनका बचपन जौनपुर, उत्तर प्रदेश में बीता बाद में व्यवसाय के स...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12 जहाँआरा बेगम का किस्सा इतिहास और संस्कृति के किस्सों की कड़ी में एक और किस्सा पेश है।  जैसा मैं पहले बता भी चुका हूँ और आप सब जानते ही होंगे कि भारत में प्राचीनकाल से विदेशी यात्रियों का आना-जाना लगा रहा है और उन विदेशी यात्रियों ने अपनी-अपनी यात्राओं के अनुभव अपने देशों में जाकर, अपनी-अपनी भाषाओं में लिखे। उन यात्रियों द्वारा लिखे गए यह यात्रा वृतांत आज हमारे लिए न सिर्फ उनकी यात्रा के समय का समाज, व्यवस्था, संस्कृति के बल्कि उस समय के इतिहास को भी जानने के अमूल्य ‘मूल-स्त्रोत’ हैं। मैं पिछले लेखों में इब्नबतूता और मनूची की चर्चा कर चुका हूँ। आज चर्चा में एक और यात्री के लेखन का भी जिक्र करूंगा। इस यात्री का नाम था फ्रांसुआ बर्नियर और यह फ्रांस का रहने वाला था। इसका जन्म सन 1620 में फ्रांस के ‘जूए’ कस्बे में हुआ था। इसको नए-नए देश देखने, वहाँ के लोगों से मिलने और उनकी संस्कृति को समझने का बड़ा शौक था। इसने फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक गेसन्डी से शिक्षा प्राप्त की। 1652 में इसने मौंतपेलियर विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की शिक्षा भी प्राप...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-11

इतिहास और संस्कृति के किस्से-11 इटली का यात्री निकोलाओ मनूची और मुगल सम्राट शाहजहाँ के दरबार के किस्से आज के लेख में चर्चा है मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय के किस्सों की। शाहजहाँ के समय के कुछ बहुत रोचक वृतांत  वेनिस, इटली से आये एक यात्री जिसका नाम निकोलाओ मनूची (Niccolao Manucci) था उसने दिए हैं। मनूची एक लेखक और चिकित्सक था, जिसने 17वीं सदी में मुगल साम्राज्य का प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत लिखा था. वह लगभग 16 साल की उम्र में भारत आया और अपनी पुस्तक "स्टोरियो डू मोगोर" (Storia do Mogor) में मुगल साम्राज्य के इतिहास, रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन का विस्तृत विवरण दिया. उसने दारा शिकोह, राजा जय सिंह और कई अन्य महत्वपूर्ण हस्तियों के लिए चिकित्सक के रूप में भी काम किया था। मनूची ने शाहजहाँ के दरबार के किस्से भी अपनी पुस्तक में लिखे हैं। वह लिखता है कि एक अजीब मामला दिहली (दिल्ली) में हुआ। वहाँ चार व्यापारी थे, जिनकी एक दुकान में बराबर हिस्सेदारी थी। उस दुकान में एक बिल्ली भी थीं। तय हुआ कि वे बारी-बारी से दुकान पर बैठा करेंगे। जिस दिन जिसकी बारी होगी, वह दीपक के लिए तेल और दुकान में र...