हुमायूँ के लालों (Ruby) की ईरान में चोरी इतिहास और संस्कृति के किस्से-14

इतिहास और संस्कृति के किस्से-14

हुमायूँ के लालों (Ruby) की ईरान में चोरी

आज जो किस्सा मैं आपसे शेयर करने जा रहा हूँ यह बादशाह हुमायूँ से सम्बंधित है और इसको हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने अपनी पुस्तक ‘हुमायूँ नामा’ में लिखा है।

यह उस समय की बात है जब शेर शाह सूरी के हाथों हार का सामना कर और अपना राज्य गंवा कर हुमायूँ ईरान के शहंशाह तहमास्प के यहाँ अपने परिवार के साथ एक शरणार्थी का जीवन गुजार रहा था। उस समय हुमायूँ के आर्थिक हालात भी काफी खराब से ही थे। हुमायूँ ने अपने पास कुछ अत्यंत कीमती माने जानेवाले जवाहरात ‘लाल’ (Ruby) सम्हाल कर रखे हुए थे जिनके विषय में या तो उसको पता था या उसकी पत्नी हमीदा बानो बेगम (अकबर की माँ) को। उन लाल को हुमायूँ अपने तोमार (सोने या चांदी की तावीजदानी जो गले में पहनी जाती थी) में रखता था और जब नहाने या कहीं जाता तो तोमार हमीदा बानो के सुपुर्द कर के जाता था। ऐसे ही एक दिन जब हमीदाबानो नहाने गयीं तो वह तोमार को एक पोटली में बांध कर बादशाह के बिस्तर पर छोड़ गयीं। इसी बीच मौका पाकर उनके यहाँ काम करने वाले ‘रोशन कोके’ ने उसमें से पाँच लाल निकाल लिए और अपने साथी ख्वाजा गाज़ी को दे दिए कि कुछ समय गुजरने के पश्चात उनको खर्च किया जाएगा।
हमीदा बानो बेगम नहा कर आयीं तो हुमायूँ भी आ गया था और उसने तोमार उनके सुपुर्द किया परन्तु तोमार हाथ में आते ही हमीदा बानो बोलीं कि तोमार कुछ हल्का लग रहा है। इस पर हुमायूँ बोला कि ऐसा कैसे हो सकता है, मेरे और तुम्हारे अलावा किसी अन्य को मालूम ही नहीं है कि इसके अंदर क्या है। बड़ी अजीब स्थिति थी कि परदेस में न किसी से कुछ कह सकते न कुछ कर सकते।
हमीदा बानो बेगम ने अपने भाई ख्वाजा मुअज़्ज़म को सारा वाकया बताया और कहा कि इसमें मेरी बहुत बेइज़्ज़ती है तुम भाई का हक अदा करो और मामला की तफ्तीश ऐसे करो कि किसी को कानो कान खबर न हो। इस घटना के चोरों का पता चल जाये अन्यथा मैं बादशाह के सामने हमेशा शर्मिंदा रहूँगी।
गुलबदन बेगम का भाई इस विषय में काफी खोजबीन करता रहा और फिर बहुत सोच विचार कर ख्वाजा मुअज़्ज़म ने अपनी बहन से कहा कि एक बात मेरी भी समझ में नहीं आ रही कि मैं तो हज़रत बादशाह के इतना करीबी हूँ लेकिन मेरी हैसियत एक टट्टू खरीदने की नहीं है जबकि ख्वाजा गाज़ी और रोशन कोके दोनों ने न जाने कैसे उम्दा ‘तेपूचाक’ नस्ल  का एक एक घोड़ा (इस नस्ल के घोड़े बहुत अच्छे और कीमती होते थे) खरीद लिया है हाँलाँकि अभी उसके पैसे नहीं दिए हैं। 
ख्वाजा मुअज़्ज़म घोड़े के व्यापारियों के गया और आख़िर में उसको पता चल गया कि वो दोनों लोग कुछ समय बाद घोड़ों की कीमत के रूप में 'लाल' देने का वायदा करके वो शानदार घोड़े खरीद कर ले गए है। 
अब मुअज़्ज़म ख्वाजा गाज़ी के घर गया और उसके नौकर से पता किया कि ख्वाजा गाज़ी अपने कीमती वस्त्र और ख़िलअतें कहाँ रखता है। नौकर ने बताया कि उसके मालिक के पास न कोई थैली है, न खिलअत या कुछ और कीमती सामान है पर उस पर एक लंबी सी टोपी है जो वह हमेशा पहने रहता है और सोते वक्त उस टोपी को अपने सर या बाजू के नीचे रख लेता है। अब मामला साफ था कि लाल उसी टोपी में हैं। ख्वाजा मुअज़्ज़म ने लौट कर हुमायूँ को पूरी बात बताई और कहा कि मैं किसी भी तरीके से वो लाल हासिल कर लूँगा लेकिन वह मेरी शिकायत लेकर आये तो आप अनसुनी कर देना। हुमायूँ ने इस पर बिना कुछ बोले बस हँस कर अपनी सहमति दे दी।
अब अगले दिन मुअज़्ज़म ने ख्वाजा गाज़ी से खूब मजाक किया और फब्तियां कसीं और जब ख्वाजा ने हुमायूँ से उसकी शिकायत की तो हुमायूँ बोले कि अरे आप उसकी बात का बुरा मत मानो। वो तो नवयुवक है और हर किसी से मजाक करता है। अब दूसरे दिन जब ख्वाजा दीवानखाने में हुमायूँ बादशाह की बारगाह में बैठा था तो ख्वाजा मुअज़्ज़म कुछ इस तरह से आकर ख्वाजा गाज़ी से टकराया कि उसकी टोपी सर से उतर कर दूर ज़मीन पर जा गिरी। ख्वाजा मुअज़्ज़म जल्दी से उस टोपी पर लपका और उसको टटोल कर उसमें से लाल निकाल लिए और बादशाह हुमायूँ व हमीदा बानो बेगम को पेश कर दिए।

कहने को ये पुराने जमाने बीते युग के वाकयात  हैं पर इन सबमें जिंदगी की कड़वी हकीकतें और सबक छिपे हुए हैं। हुमायूँ जो इतना बड़ा बादशाह था जब उसका खराब समय था तो उसके मातहत नौकर भी उसके पास जो थोड़ी सी सम्पत्ति (लाल आदि) थी उसको चुराने से नहीं चूक रहे थे। उम्मीद है आपको मूल सोर्स से लिये गए क़िस्सों की यह सीरीज़ पसंद आ रही होगी। आज के लिए बस इतना अब अगली कड़ी में पेश करेंगे कोई नई घटना एक नया किस्सा।

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