इतिहास और संस्कृति के किस्से-15. हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी
इतिहास और संस्कृति के किस्से-15
हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी
मुहम्मद कासिम हिंदू शाह ‘फरिश्ता’ मध्ययुगीन भारत का इतिहास लिखने वाला एक प्रसिद्ध इतिहासकार हुआ है।
फ़िरिश्ता का जन्म कैस्पियन सागर के तटीय नगर अस्त्राबाद में गुलाम अली हिन्दू शाह के घर सन 1570 में हुआ था। अपने बचपन में ही फ़िरिश्ता अपने पिता के संग भारत में अहमदनगर आ बसे। वहां के निज़ाम के शहज़ादे मिरान हुसैन निज़ाम शाह को फ़ारसी पढ़ाने का न्यौता इसके पिता को मिला था, जिसके साथ फ़रिश्ता ने भी अपनी पढ़ाई की। फरिश्ता की काबिलियत से प्रभावित होकर बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह सानी या इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने उससे ‘हिंदुस्तान में इस्लामी शासन काल’ का इतिहास लिखने को कहा जिसके लिए पहले तो फरिश्ता मना करता रहा फिर बहुत जोर देने पर उसने नमूने के कुछ पृष्ठ लिख कर बादशाह के सामने पेश किए। इसमें फरिश्ता ने जानबूझ कर इब्राहिम के पिता अली आदिलशाह प्रथम के समय का इतिहास लिखा और उसकी हत्या की घटना को जैसा का तैसा लिख कर पेश कर दिया। दरअसल यह फरिश्ता का बहुत बड़ा साहस था क्योंकि फरिश्ता ने उन पृष्ठों में वो सच्चाई लिख दी थी जो कि जानते सब थे पर बादशाह के भय से बोलता कोई नहीं था और यह लिखने पर इब्राहिम आदिल शाह फरिश्ता को सजा ए मौत भी दे सकता था क्योंकि अपने पिता के लिए ऐसी बात सुनना किसी भी बेटे के लिए बहुत मुश्किल ही था। इब्राहिम ने उसको पढ़ा और अपने पिता से बहुत प्यार करने के बावजूद फरिश्ता द्वारा लिखे सच और उसके साहस की प्रशंसा की तथा फरिश्ता को इतिहास लिखने की आज्ञा दी। फरिश्ता ने 1606 ईस्वी से यह इतिहास लिखना शुरू किया और 1611 ईस्वी में इसको पूरा किया जिसको हम ‘तारीखे फरिश्ता’ नाम से भी जानते हैं। फरिश्ता की मृत्यु सन 1612 में बीजापुर में हुयी।
आज का किस्सा फरिश्ता की ‘तारीखे फरिश्ता’ से जो फारसी में लिखी गयी थी और जिसका सीधे फारसी से हिंदी में अनुवाद उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ के लिए डॉक्टर नरेंद्र बहादुर श्रीवास्तव ने किया।
यह किस्सा है बहमनी सल्तनत के शासक सुल्तान अलाउद्दीन हसन गंगू बहमनी के विषय में जिसको अलाउद्दीन हसन बहमन शाह के नाम से भी जाना जाता है। वह बहमनी साम्राज्य का संस्थापक था, जिसकी स्थापना उसने 1347 ईस्वी में की थी। पहले वह मोहम्मद बिन तुगलक की फौज में एक पदाधिकारी था और बाद में उसने दिल्ली सल्तनत से अलग होकर दक्कन क्षेत्र में अपना स्वतंत्र मुस्लिम साम्राज्य स्थापित किया और गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाया।
कहानी कुछ ऐसे है कि हसन नाम का व्यक्ति राजधानी दिल्ली के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी ‘गंगू ब्राह्मण’ का सेवक हुआ करता था। यह ब्राह्मण ज्योतिषी दिल्ली के तत्कालीन शासक गयासुद्दीन तुगलक और उसके युवराज मुहम्मद तुगलक का विशेष कृपा पात्र था।हसन का जीवन उस समय बहुत विपन्नता की हालत में बीत रहा था तो एक दिन उसने गंगू ब्राह्मण को अपना हाथ दिखलाया। गंगू ने उज़का हाथ देख कर बताया कि उसका भविष्य बहुत शानदार है। हसन का बुरा हाल देख कर गंगू ने उसको दिल्ली के निकट ही एक बंजर भूमि का टुकड़ा, दो बैल तथा दो मजदूर दे दिए जिससे खेतीबाड़ी करके वह अपना पेट पाल सके।
एक दिन मजदूर खेत में हल चला रहे थे कि हल की फाल जमीन के अंदर फंस गई और खोदने पर एक बर्तन निकला जिसमें सोने के सिक्के और अशर्फियाँ भरी हुयी थीं। हसन की नैतिकता ने उसको यह लेने से रोक दिया और वह ये सारा धन लेकर गंगू ब्राह्मण के पास पहुँचा और उसको पूरा किस्सा बयान किया और कहा कि जमीन के मालिक आप हैं तो ये सारा धन आपका ही है। गंगू उसकी ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुआ और उसने अगले दिन प्रातः ही यह किस्सा तत्कालीन राजकुमार मुहम्मद तुगलक को बताया। युवराज मुहम्मद तुगलक ने हसन को बुला कर उससे बात की और वह खुद भी उससे प्रभावित हुआ और उसने यह बात अपने पिता सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक को बताई। दिल्ली का सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक भी हसन से प्रभावित हुआ और उसको सम्मानित करके अपने ‘एक सदी’ अमीरों के वर्ग में शामिल कर लिया।
जब हसन ने गंगू से अपना भविष्य पूछा था तो दोनों में तय हुआ था कि यदि कभी हसन बादशाह बना तो वह अपने नाम के साथ गंगू ब्राह्मण का नाम भी जोड़ेगा जिससे उसका नाम भी अमर हो जाये और उसे और उसके बच्चों के अलावा किसी और को खजांची के पद पर नहीं रखा जाएगा। हसन ने दोनों वायदों को पूरा करने का वचन दिया और बिना कोई उच्च पद मिले अपना नाम ‘हसन गंगू बहमनी’ लिखना शुरू कर दिया।
फरिश्ता आगे लिखता है कि एक दिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ड्योढ़ी पर सभी के लिए भोज का आमंत्रण था। युवराज मुहम्मद तुगलक आदि के चले जाने के बाद हसन गंगू भी उनसे भेंट की इच्छा से वहाँ पहुँचा। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को उसके आने का आभास हो गया था और उन्होंने अपने एक सेवक से कहा कि बाहर एक अत्यंत सहृदय, सीधा सच्चा आदमी खड़ा है उसको बुला कर लाओ। सेवक ने बाहर हसन गंगू को फटे पुराने वस्त्रों में खड़ा देखा तो उसको विश्वास ही नहीं हुआ कि ये वही व्यक्ति है जिसको हज़रत साहब ने बुलाया है। उसने वापस आकर उनसे कहा कि बाहर तो कोई नहीं है बस एक फटे पुराने कपड़े पहने आदमी है। इस पर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने कहा कि हाँ, ये ही वो व्यक्ति है जो देखने में फ़क़ीर मालूम पड़ता है पर एक दिन ये दक्षिण का शासक होगा। अब जब हसन गंगू अंदर आया तो हज़रत ने उसके हाल चाल लिए और उसको आशीर्वाद दिया। खाना समाप्त हो चुका था तो शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने रोज़ा के इफ्तार के लिए जो रोटी रखी थी उसी में से थोड़ी सी रोटी का टुकड़ा अपनी उंगलियों के सिरे पर रखकर हसन गंगू को दी और कहा कि यह दक्षिण के शासन का ताज है जो बहुत ही संघर्ष और कष्ट के बाद तेरे सर पर रखा जाएगा।
समय का चक्र घूमा, हसन गंगू दक्षिण भारत की उस सेना का एक प्रमुख हिस्सा बना जो मुहम्मद तुगलक के विरोध में थी और सन 1346 को हसन गंगू के सिर पर दक्षिण की सल्तनत का ताज रखा गया। छत्र स्याह (काला छत्र) जो अब्बासी खलीफाओं का राष्ट्रीय चिन्ह था वह मंगलकारिता के लिए उसके सिर पर फहराया गया। इतिहास में यह बादशाह बहमनी सल्तनत को स्थापित करने वाले बादशाह अलाउद्दीन हसन बहमन शाह या अलाउद्दीन हसन गंगू बहमनी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
आज का किस्सा इतना ही।
अब अगले लेख में फिर होगा इतिहास के पन्नों से एक रोचक वाकया।
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