इतिहास और संस्कृति के किस्से-13

इतिहास और संस्कृति के किस्से-13

एक आम व्यक्ति की दृष्टि से मुगल काल का खुद की सोच-समझ से वर्णन:- 
जौनपुर शहर का वर्णन;
शाहजादे सलीम का आना
 अकबर की मृत्यु के समाचार का वर्णन

आज हमारे इतिहास का जो किस्सा मैं लिखने जा रहा हूँ वो मैंने ‘अर्ध कथानक’ नामक पुस्तक से पढ़ा है जिसके लेखक बनारसीदास हैं। यह एक अद्भुत और अपने प्रकार की एक ही कृति है और आपको बताता हूँ कि मैं ऐसा क्यों कहा रहा हूँ। दरअसल यह हिंदी में लिखी हुई पहली आत्मकथा मानी जाती है। बनारसीदास जैन ने अपनी यह आत्मकथा सन 1641, जी सही पढ़ रहे हैं आप सन 1641 ईस्वी, में अपनी पचपन वर्ष की आयु में लिखी थी। जैन मत और वैसे भी बहुत से लोग मनुष्य का जीवनकाल 100-110 वर्ष का मानते हैं और इसीलिए उम्र के पचपन वर्ष पर लिखी अपने जीवन की कहानी को बनारसीदास ने ‘अरध कथान’ कहा है परंतु दरअसल यह उनका पूर्णकथानक साबित हुई क्योंकि ‘अर्ध-कथानक’ लिखने के 2-3 वर्षों के भीतर ही उनका जीवन पूर्ण हो गया था। बनारसी दास का जन्म जैन धर्म मानने वाले श्रीमाल परिवार के खरगसेन के यहाँ सन 1586 में हुआ। उनका बचपन जौनपुर, उत्तर प्रदेश में बीता बाद में व्यवसाय के सिलसिले में बनारसीदास आगरा रहने लगे जो मुगल साम्राज्य की उस वक़्त राजधानी हुआ करता था। बनारसीदास जी ने अपनी आत्मकथा ‘अर्ध-कथानक’ समकालीन ब्रजभाषा में कवित्त रूप में लिखी है और इसको लिखने में ‘दोहा, सवैया इकतीसा और चौपाई’ छंदों का प्रयोग किया है अथवा दोहा-चौपाई रूप में यह आत्मकथा लिखी है। इसका विषय स्वयं बनारसीदास का जीवन तो है परंतु इसमें हमको तत्कालीन मुगलकाल के भारत का वर्णन दिखाई पड़ता है। उनका यह ‘अर्ध-कथानक’ अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ यानी कि तीन मुगल बादशाहों के शासनकाल की झलक दिखाता है। इसको पढ़ कर हमको एक ऐसे ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनैतिक भारत की बात पता चलती है जो इतिहास की किसी भी पुस्तक में शायद ही मिले क्योंकि इसका लेखक उस समय का एक आम नागरिक है। इस आत्मकथा में हमको मध्ययुगीन जौनपुर, इलाहाबाद, बनारस, आगरा आदि स्थानों का जीवंत वर्णन दिखता है।
बनारसीदास अपनी पुस्तक की शुरुआत में कहते हैं कि, 
“जैनधर्म श्रीमाल सुबन्स। बनारसी नाम नरहंस।।
तिन मन मांहि बिचारी बात। कहौं आपनी कथा बिख्यात।।
बनारसीदास के पिता खरगसेन जौहरी का काम करते थे।
बनारसीदास ने तत्कालीन जौनपुर नगर (उत्तर प्रदेश) के वैभव का शानदार वर्णन किया है और अपने समय से पहले के जौनपुर का वर्णन करते हुए लिखा है कि जौनपुर नगर बहुत सुंदर और शानदार है।शहर में ऊँचे, ऊँचे मठ, मंडप और महल थे। वहाँ आलीशान, सात मंजिले मकान थे, जिनकी छतों पर तंबू तने और झंडे लहराते हुए दिखते थे। बनारसीदास के लिखने के अनुसार पता चलता है कि जौनपुर में बावन (52) सराय हुआ करती थीं और आसपास यानी प्रदेश में 52 परगने थे।नगर में बावन बाज़ार और आसपास मिलाकर 52 बड़ी-बड़ी मंडियां थीं। जौनपुर में एक के बाद एक नौ शासकों का शासन रह चुका था और जिनके नाम जौना शाह से लेकर नवें शासक बख़्या खां तक के नाम बनारसीदास ने लिखे हैं। तत्कालीन जौनपुर राज्य  की सीमाएं पूर्व की ओर पटना तक, पश्चिम में इटावा तक, दक्षिण में विंध्याचल तक और उत्तर में घाघरा नदी तक थीं। बनारसीदास यह भी लिखते हैं कि यह सब बातें तीन सौ साल पुरानी भी हमने अपने बुजुर्गों से सुनी हैं और उसी आधार पर वर्णन किया है।
बनारसीदास ने संवत 1657 यानी सन 1600 के विषय में लिखा है कि साहिब सलीम शाह जौनपुर आये। सलीम शाह बादशाह अकबर के बड़े बेटे थे। उन दिनों जौनपुर के हाकिम छोटे किलीच नूरम सुल्तान थे। सलीम कोल्हूबन नामक जगह जाना चाहते थे किंतु बादशाह अकबर का संदेश जौनपुर के हाकिम पर आया कि सलीम को वहाँ जाने से किसी भी तरह रोका जाए। अकबर का फरमान तो मानना ही था तो सारे रास्ते बंद कर दिए गए, गोमती नदी के तट पर नावों का रुकना रोक दिया गया, नगर में घुसने के सारे रास्ते और पुल बंद कर दिए गए और पूरा लड़ाई की तैयारी जैसा माहौल हो गया।
अनेकों पैदल सैनिक और घुड़सवार चारों ओर पहरा देने लगे और नगर के कोटों के कंगूरों पर तोपें तैनात कर दी गईं। पूरे नगर में हलचल मच गई थी। अनाज,वस्त्र और पानी जमा किया गया, सिपाहियों के लिए कवच, घोड़ों के लिए जीन, ढेर सारी शराब, बंदूकें और भांति-भांति के हथियार भी तैयार रखे गए। हालात ऐसे थे कि सारी प्रजा व्याकुल थी और बहुत से लोग जौनपुर छोड़ कर भाग गए। बनारसीदास बताते हैं कि पूरी जौनपुर नगरी उजाड़ और सुनसान हो गयी, कोई भी नगर में रहना नहीं चाहता था। सबको डर था कि सलीम कभी भी आक्रमण कर सकता है। लोगों को अपने परिवारों की भी चिंता थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। जौनपुर के सारे जौहरी और व्यापारी इकट्ठा होकर हाकिम नूरम सुल्तान के पास गए और उनसे प्रार्थना की। नूरम सुल्तान ने उन लोगों से कहा कि अरे जौहरियों, साहू लोगो, मैं तुमको क्या उपाय बता सकता हूँ। मेरी खुद की मौत मेरे सामने आकर खड़ी है। यह सुनकर जौहरी लौट आये और उन सबने वहाँ से भाग जाने का निश्चय किया। तत्पश्चात सारे बड़े व्यापारी और जौहरी अलग-अलग जौनपुर छोड़ कर चले गए, कोई किसी के साथ नहीं गया। बनारसीदास के पिता खरगसेन लक्ष्मणपुरा नामक गाँव में जाकर छुप गए। छै सात दिन बाद समाचार मिला कि जौनपुर में सब ठीक हो गया। दरअसल शाहजादे सलीम ने अपने लाला बेग नामक मीर को नूरम सुलतान के पास वकील बना कर भेजा। लाला बेग ने नूरम सुल्तान को बहुत डांटा-डपटा और फिर अपने साथ सलीम शाह से मिलवाने ले गए। वहाँ पहुँच कर नूरम सुल्तान शाहजादे सलीम के पैरों में गिर गया और सलीम ने उसको अभय प्रदान किया। इस प्रकार से यह मामला समाप्त हुआ और जौनपुर का जनजीवन सामान्य हुआ।

इसी प्रकार बनारासीदास ने बादशाह अकबर की मृत्यु के समाचार के बाद हुयी अफरातफरी का भी वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि सम्वत 1662 (सन 1605)  के कार्तिक के महीने में जलाल शाह बादशाह अकबर की आगरा में मृत्यु हो गयी। अकबर की मृत्यु की खबर आगरा से जब जौनपुर पहुँची तो हाहाकार मच गया। वह लिखते हैं कि प्रजा अपने नाथ के बिना अनाथ हो गयी थी। नगर के लोगों में असुरक्षा की भावना और भय व्याप्त हो गया था।डर के मारे लोगों के चेहरे पीले पड़ गए थे और हृदय में व्याकुलता व्याप्त हो गयी थी। बनारसीदास ने लिखा है कि जब उन्होंने अकस्मात बादशाह अकबर की मृत्यु की खबर सुनी उस समय वह सीढ़ियों पर बैठे हुए थे और इस समाचार से उनके हृदय को आघात सा लगा। सदमे से वह अपने आप को संभाल न सके और सीढ़ियों से गिर गए। उनका माथा फूट गया और खून बहने लगा और उनके मुँह से ‘देव’ ऐसा शब्द निकला। इस चोट से बहने वाले खून से उनके घर का आँगन लाल हो गया और सभी घर वाले बेहाल होकर हाय-हाय करने लगे। 
इसी बीच नगर में भी हाहाकार मच गया और चारों तरफ दंगे होने लगे। हर घर के दरवाजे बंद हो गए, दुकानदारों ने दुकानों पर बैठना बंद कर दिया। भय और अराजकता के कारण नगर में चारों ओर हाहाकार मच गया था। लोगों ने अपने अच्छे वस्त्र और आभूषण इत्यादि जमीन में गाड़ दिए और हुंडी, बही, नगद पैसा अन्य सुरक्षित जगहों पर छिपा दिया। लोग अपने घरों में अस्त्र-शस्त्र इकट्ठे करने लगे और लोगों ने अच्छे कीमती वस्त्रों के स्थान पर मोटे वस्त्र पहनना और सस्ते मोटे कम्बल और खेस ओढ़ना शुरू कर दिया। स्त्रियों ने भी साज-सज्जा छोड़ साधारण रूप धारण कर लिया। ऐसा माहौल हो गया कि अमीर-गरीब, ऊँचे और नीचे किसी की कोई अलग पहचान नहीं रही। बनारसीदास ने लिखा है कि यद्यपि कहीं कोई चोर या डाकू नहीं आये थे पर फिर भी लोग अकबर बादशाह की मृत्यु के बाद बहुत असुरक्षित महसूस कर रहे थे। जौनपुर में इसी किस्म की हलचल दस दिनों तक मची रही और दस दिन बाद जब आगरा से चिट्ठी आयी कि वहाँ सब ठीक था तब ही यहाँ भी शांति लौटी। बनारसीदास ने चिट्ठी का विवरण भी दिया है कि उसमें लिखा था कि जलाल अकबर 52 वर्ष तक बादशाह रहे ( हिजरी कैलेंडर के अनुसार) और संवत 1662 में उनका अन्तः काल हो गया। अकबर का बड़ा बेटा सलीम शाह आगरा नगर में अकबर के स्थान पर अब तख़्त पर बैठा है। उसने बादशाह बनने पर ‘सुल्तान नूरुद्दीन जहाँगीर’ नाम अपनाया है। सारे मुल्क में इसकी घोषणा की जा रही है। इस चिट्ठी को घर-घर सुनाया गया और लोगों ने यह खबर सुनकर जय जयकार के नारे लगाए।खरगसेन के घर में भी आनन्द और मंगल था। दुख और कष्ट का समय बीत गया था। बनारसी ने भी उठकर स्नान किया और खुशी में सबने उत्सव मनाया और दान दिया। 

अर्धकथानक बहुत रोचक वृतांत है और आगे भी इसके किस्से आपसे शेयर करूँगा। इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि यह एक आम व्यक्ति के दृष्टिकोण से उस समय की first hand information है।

Comments

Popular posts from this blog

काँच का इतिहास:विश्व,भारत और फ़िरोज़ाबाद

So you are on the wrong side of the barricades

अथ श्री बार्बर कथा