इतिहास और संस्कृति के किस्से-12

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12
जहाँआरा बेगम का किस्सा

इतिहास और संस्कृति के किस्सों की कड़ी में एक और किस्सा पेश है। 

जैसा मैं पहले बता भी चुका हूँ और आप सब जानते ही होंगे कि भारत में प्राचीनकाल से विदेशी यात्रियों का आना-जाना लगा रहा है और उन विदेशी यात्रियों ने अपनी-अपनी यात्राओं के अनुभव अपने देशों में जाकर, अपनी-अपनी भाषाओं में लिखे। उन यात्रियों द्वारा लिखे गए यह यात्रा वृतांत आज हमारे लिए न सिर्फ उनकी यात्रा के समय का समाज, व्यवस्था, संस्कृति के बल्कि उस समय के इतिहास को भी जानने के अमूल्य ‘मूल-स्त्रोत’ हैं।
मैं पिछले लेखों में इब्नबतूता और मनूची की चर्चा कर चुका हूँ। आज चर्चा में एक और यात्री के लेखन का भी जिक्र करूंगा। इस यात्री का नाम था फ्रांसुआ बर्नियर और यह फ्रांस का रहने वाला था। इसका जन्म सन 1620 में फ्रांस के ‘जूए’ कस्बे में हुआ था। इसको नए-नए देश देखने, वहाँ के लोगों से मिलने और उनकी संस्कृति को समझने का बड़ा शौक था। इसने फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक गेसन्डी से शिक्षा प्राप्त की। 1652 में इसने मौंतपेलियर विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की शिक्षा भी प्राप्त की। बर्नियर लगभग 11 साल भारत में रहा और उसने मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय का, उत्तराधिकार के युद्ध और औरंज़ेब के समय का बहुत जानकारी देने वाला वर्णन किया है। तो आज बर्नियर के लिखे विवरणों में से कुछ बातें इस लेख में लिख रहा हूँ लेकिन बर्नियर से पहले आज की बात की शुरुआत करेंगे इतालवी यात्री मनूची की बात से।
शाहजहाँ के चार पुत्र और चार पुत्रियां थीं। मनूची लिखता है कि शाहजहाँ ने तय किया था कि उसके इससे ज्यादा बच्चे नहीं होने  चाहिये इसलिए इनके बाद यदि उसकी कोई भी पत्नी गर्भवती होती तो वह उनको गर्भपात करवा देता था हाँलाँकि हमने यह भी पढ़ा है कि शाहजहाँ की प्रिय पत्नी मुमताजमहल की तो मृत्यु ही उनकी चौदहवीं सन्तान के जन्म देने में हुयी थी।
बहरहाल शाहजहाँ के जो 8 बच्चे थे उनमें वह अपने बड़े पुत्र दारा शिकोह और बड़ी पुत्री बेगमसाहिबा जहाँआरा बेगम से विशेष स्नेह करता था जो उसकी संतानों में सबसे बड़ी थी। जहाँआरा बेगम बहुत समझदार, सुंदर और दयालु महिला थी। उनकी वार्षिक आय जैसा मनूची लिखता है तीस लाख रुपये थी और इसके अतिरिक्त सूरत के बंदरगाह से होने वाली आय अलग थी जो उनके ‘पान-सुपारी’ के खर्चे के लिए थी। जहाँआरा बेगम अपने भाई दाराशिकोह के कभकाम पक्ष में थी और उनका प्रयास था कि शाही तख्त का उत्तराधिकारी वही बने। 
मुगल बादशाहों के यहाँ एक प्रथा बादशाह अकबर द्वारा शुरू की गई थी कि मुगल शहजादियों का विवाह नहीं किया जाता था। मनूची लिखता है कि जहाँआरा बेगम के दारा के पक्ष में होने की एक वजह यह भी थी कि दाराशिकोह ने अपनी बहन से कहा हुआ था कि बादशाह बनते ही वह उनकी शादी की इजाज़त दे देगा।
शाहजहाँ चूँकि अपनी बड़ी बेटी यानी कि बेगम साहिब से विशेष स्नेह करता था तो उनके सम्बन्धों के विषय में आम जन में बहुत उल्टी सीधी बातें कही जाती थीं।
अब बात बर्नियर की; बर्नियर लिखता है कि प्रेम का जैसा परिणाम एशिया में होता है वैसा यूरोप में नहीं होता है। शाहजादी बेगम साहब महल के अंदर रहती और अन्य स्त्रियों की भांति उन पर भी पहरा रहता था। यह सब होने के बावजूद किसी तरह से छिपते हुए एक पुरुष का उनके पास आना जाना शुरू हो गया। यह व्यक्ति कोई ऊँचे दर्जे का व्यक्ति नहीं था किंतु सुंदर बहुत था। जब किसी तरह से यह बात बादशाह यानी शाहजहाँ को पता चली तो उसने स्वयं अचानक इसकी जाँच करने करने का निश्चय किया। एक दिन बादशाह अचानक बिना बताए बेगम साहब के महल में पहुँच गया और यह सब इतना अचानक हुआ कि बेगम साहब को अपने प्रेमी को कहीं छिपाने का अवसर भी नहीं मिला। वहीं पानी गर्म करने की एक बड़ी देग रखी हुई थी सो बेगम साहब ने अपने घबराए हुए प्रेमी को लाचारी में उसी देग में लिटा कर में छिपा दिया। बर्नियर लिखता है कि बादशाह जब अंदर आया तो उसके चेहरे पर क्रोध या आश्चर्य का कोई चिन्ह नहीं था बल्कि उसने वहाँ आकर बेगम साहब से हमेशा जैसी बातें करना शुरू किया। कुछ देर बाद उसने अपनी बेटी से कहा कि मालूम होता है तुमने आज ‘हस्ब-मामूल-ग़ुस्ल’ नहीं किया है। हम्माम करना चाहिए।’ यह कहते हुए उसने ख्वाजा सराओ को देग के नीचे आग जलाने की आज्ञा दी। बादशाह की हस्ती का आतंक इतना होता था कि न बेगम साहब के मुँह से एक शब्द निकला और ना ही देग में से कोई आवाज आयी। बादशाह शाहजहाँ को जब तक इस बात का निश्चय नहीं हो गया कि वह व्यक्ति ( उसकी पुत्री का प्रेमी) देग में जलकर मर गया होगा तब तक वो वहाँ से हटा नहीं।
बर्नियर एक किस्सा और लिखता है कि कुछ दिनों के बाद शाहजादी का प्रेम प्रसंग एक और व्यक्ति से हो गया। नजर खाँ नामक यह ईरानी नवयुवक बहुत सुंदर तो था ही साथ ही सुयोग्य,बुद्धिमान और साहसी भी था। इस नौजवान को बेगम साहब ने अपने खानासामां पद के लिए पसंद किया। शाइस्ताखाँ जो औरंगज़ेब का मामा था उसने दरबार में बादशाह के सम्मुख प्रस्ताव रक दिया कि,”यह ईरानी शख्स इस काबिल है कि बेगमसाहब की इससे शादी कर दी जाए।” शाहजहाँ को यह बात बहुत बुरी लगी और उसके मन में इस विषय में जो शक शाहजहाँ के मन मेंनघा वह भी और पक्का हो गया। बस अब तो इसका कुछ इलाज होना ही था तो एक दिन शहंशाह ने उसको अपने दरबारे-आम में बुलाया और उस पर विशेष कृपा दिखाने की रीत के अनुसार उसको पान का बीड़ा खाने को दिया। बर्नियर लिखता है कि चूँकि इस राज्य में पान का बीड़ा देना बहुत सम्मान और प्रतिष्ठा की बात है तो उस युवक ने आदर सहित पान का वो बीड़ा ले कर अपने मुँह में रख लिया। उसको सपने में भी गुमान नहीं था कि बादशाह ने हँसते हुए जो पान का बीड़ा दिया है वह विषयुक्त है। वह हर्षपूर्वक अपने भविष्य की उन्नतियों का विचार करते हुए पालकी पर बैठ कर अपने घर की ओर चला किंतु विष का असर हो नाने से अपने घर पहुँचने के पहले ही वह ऊपर वाले के पास पहुँच गया।
जहाँआरा बेगम के विषय में बर्नियर द्वारा लिखी बातों को मनूची जनता में निचले तबके के लोगों में की जाने वाली बेकार की बातें बताते हुए इनको सिरे से खारिज करता है।
बहुत पहले एक बार जब मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में उस समय प्रोफेसर रहे हेरम्ब भाईसाहब Heramb Chaturvedi जी से इस विषय में चर्चा की तो उनका कहना था कि कई बार इन विदेशी यात्रियों को बादशाह के दरबार से कुछ मनचाहा फेवर नहीं मिलता था तो वह इस किस्म की वाहियात बातें कहते/लिखते थे और बर्नियर की ये बात भी झूठ हैं। उन्होंने बताया कि बर्नियर ने जहाँआरा को भी बहुत सारे गिफ्ट्स दिए थे जो उसने अपने रोज़नामचे में दर्ज़ किए हैं।  जब बर्नियर ने बेगमसाहब से अनुचित लाभ मांगा तो शहज़ादी ने बादशाह या वली अहद से ही संपर्क करने के लिए कहा। इस के परिणामस्वरूप वो रुष्ट हो कर उसका चरित्र हनन करने लगा। हेरम्ब भाईसाहब ने अपनी शानदार और प्रसिद्ध पुस्तक जहाँआरा में इस बात का जिक्र किया भी है।
बहरहाल सच्चाई तो सम्बंधित लोग ही जानते होंगे लेकिन इतिहास में जब बादशाहों की बातें होंगी तो इस किस्म के किस्से भी कहे जाएंगे।
अगली किश्त में फिर मुलाकात होगी कुछ और किस्सों के साथ।

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